डी मॉड्यूलेशन क्या है , कैसे होता है , आवश्यकता , फायदे , उदाहरण विधि (demodulation in hindi)

(demodulation in hindi) डी मॉड्यूलेशन क्या है , कैसे होता है , आवश्यकता , फायदे , उदाहरण विधि : किसी मॉडूलित सिग्नल में से मूल सिग्नल या मूल संकेतों को प्राप्त करने की विधि को डी मॉड्यूलेशन कहते है।

जब कोई मॉड्यूटेड सिग्नल सिग्नल प्रेषि से ग्राही तक पहुँचता है तो इस मॉड्यूटेड सिग्नल में वाहक तरंगे और मूल सिग्नल दोनों विद्यमान रहते है , इस मॉड्यूटेड सिग्नल में से मूल सिग्नल को प्राप्त करने की क्रिया को डी मॉड्यूलेशन कहा जाता है।
डी मॉड्यूलेशन के लिए किसी इलेक्ट्रॉनिक परिपथ या सॉफ्टवेर का इस्तेमाल किया जाता है तो मूल सिग्नल को मोडुलित सिग्नल में से अलग कर देता है और हमें मूल सिग्नल प्राप्त हो जाता है। अर्थात यह मूल सिग्नल और वाहक तरंगों (रेडियो तरंगो)को अलग अलग कर देता है।

सामान्य डी मॉड्यूलेशन परिपथ (demodulation circuit)

नीचे दिए गए परिपथ का उपयोग आयाम मोडुलित तरंगो के संसूचन के लिए या आयाम मोडुलित तरंगों के डी मॉड्यूलेशन के लिए किया जाता है।
चित्रानुसार इसमें एक डायोड , एक संधारित्र और एक लोड प्रतिरोध लगा रहता है , यहाँ डायोड ऋजुकारी की भाँती व्यवहार करता है अर्थात जब मोडुलित तरंग का धनात्मक भाग आता है यह डायोड धनात्मक भाग को एनवेलप के लिए निर्गत प्रदान करता है लेकिन ऋणात्मक भाग के लिए कोई निर्गत नहीं देता है।
या हम कह सकते है कि आउटपुट सिरे पर प्रतिरोध और संधारित्र अर्तात R और C जुड़े है , दोनों मिलकर केवल मूल सिग्नल को निर्गत में आने देते है , क्यूंकि आउटपुट में ये दोनों रेडियो तरंग के भाग को आने नहीं देते है।
ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि R और C का मान इस प्रकार लिया जाता है ताकि वे निम्न शर्त को पूरा करे और यदि यह शर्त पूरी हो रही है तो निर्गत में RC , रेडियो तरंगों को आने नहीं देते है और आउटपुट में केवल मूल सिग्नल तरंग प्राप्त होती है –
1/f << RC
यहाँ f = वाहक तरंग की आवृत्ति है।

मॉडुलन की संकल्पना क्या है , मॉडुलन के प्रकार , आवश्यकता , आयाम , आवृत्ति , कला मॉड्यूलेशन (modulation in hindi)

(modulation in hindi) मॉडुलन की संकल्पना क्या है , मॉडुलन के प्रकार , आवश्यकता , आयाम , आवृत्ति , कला मॉड्यूलेशन : किसी सिग्नल को अधिक दूरी तक भेजने के लिए इसे उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगों के साथ अध्यारोपित करके भेजा जाता है ताकि यह अधिक दूरी तक भेजी जा सके , इन रेडियो तरंगों को वाहक तरंगे कहा जाता है और वाहक तरंगों के साथ मूल सिग्नल को अध्यारोपण को मॉडुलन कहते है।
जब मूल सूचना सिग्नल को वाहक तरंगों के साथ अध्यारोपित किया जाता है तो ये वाहक तरंगे मूल सूचना सिग्नल के भाँती अपने आयाम , आवृत्ति और कला में परिवर्तन कर देता है।
अत: किसी उच्च आवृति वाली रेडियो तरंग के अभिलक्षण जैसे आयाम , कला , आवृत्ति के मान मूल सूचना सिग्नल तरंग के भाँती परिवर्तन होते है तो इस प्रक्रिया को मॉडुलन कहा जाता है।

 

मॉडुलन की क्या आवश्यकता होती है ?

जब हम जोर से चिल्लाते है तो हम पाते है कि हमारी चीख की आवाज कुछ दूरी पर जाने के बाद नष्ट हो जाती है या जैसे जैसे दूरी बढती जाती है वैसे वैसे हमारी आवाज कम होती जाती है और एक निश्चित दूरी के बाद हमारी आवाज सुनाई नहीं देती है , लेकिन यदि हम हमारे द्वारा चिल्लाकर भेजे गए मेसेज को यदि उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगों के साथ संचरित करे तो हम पाएंगे की हमारा मेसेज अधिक दूरी तक पहुँच पाता है , और इस उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगों को जिसके साथ मैसेज तरंग अध्यारोपित की जाती है उसे वाहक तरंग कहते है और इस प्रक्रिया को मॉडुलन कहते है।
मॉडुलन के निम्न फायदे है या आवश्यकता है –
1. एन्टीना की लम्बाई कम होने पर भी सूचना अधिक दूरी तक भेजी जा सकती है अत: एंटीना की लम्बाई घट गयी है।
2. मूल सिग्नल के साथ शोर या अन्य सिग्नल आसानी से मिश्रित नहीं हो पाता है , अत: मूल सिग्नल सुरक्षित रह पाता है।
3. ग्राही सिरे पर सिग्नल अधिक तीव्रता के साथ प्राप्त होता है।
4. सिग्नल अधिक दूरी पर संचरित हो सकता है।
5. समान ऊंचाई वाले एंटीना

मॉडुलन के प्रकार

मॉडुलन में उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों में मूल सूचना तरंग एक अनुसार परिवर्तन होता है और यह परिवर्तन तीन प्रकार से हो सकता है इसलिए वाहक तरंगों के इन विशिष्ट गुण के कारण मॉडुलन को तीन भागो में बाँटा गया है –
1. आयाम मॉडुलन (amplitude modulation)
2 आवृत्ति मॉडुलन (frequency modulation)
3. कला मॉडुलन (phase modulation)
अब हम यहाँ मॉडुलन के इन तीनो प्रकार के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे –

1. आयाम मॉडुलन (amplitude modulation)(AM)

जब विद्युत वाहक तरंग का आयाम , मूल सिग्नल या मॉडुलक सिग्नल के अनुसार परिवर्तित होता है तो ऐसे मॉडुलन को आयाम मॉडुलन कहते है। इसमें वाहक तरंग की आवृत्ति और कला में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
आयाम मॉडुलन को निचे चित्र में दर्शाया गया है –

 

 

2 आवृत्ति मॉडुलन (frequency modulation)

जब वाहक तरंग की आवृत्ति मूल सिग्नल या मॉडुलक सिग्नल के अनुसार परिवर्तित होता है लेकिन वाहक तरंग का आयाम और कला अपरिवर्तित रहती है तो ऐसे मॉडुलन को आवृत्ति मॉडुलन कहते है।
आवृत्ति मॉडुलन को नीचे चित्र में दिखाया गया है –

 

3. कला मॉडुलन (phase modulation)

जब वाहक तरंग की कला , मूल तरंग या मूल सिग्नल या मॉडुलक सिग्नल के अनुसार परिवर्तित होती है लेकिन वाहक तरंग का आयाम और आवृत्ति में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो इसे कला मॉडुलन कहा जाता है।
कला मॉडुलन को नीचे प्रदर्शित किया गया है –

एनालॉग और डिजिटल सिग्नल , अनुरूप एवं अंकीय संकेत , अंतर क्या है (analog and digital signals in hindi)

(analog and digital signals in hindi) एनालॉग और डिजिटल सिग्नल अंतर क्या है , अनुरूप एवं अंकीय संकेत : किसी सूचना को एक स्थान से दुसरे स्थान तक भेजना संचार व्यवस्था कहलाता है अर्थात जब दो व्यक्तियों में सूचना का आदान प्रदान हो रहा है तो इसका तात्पर्य है कि इनके मध्य संचार व्यवस्था संपन्न है।
संचार व्यवस्था में संकेत या सिग्नल को एक स्थान से दुसरे स्थान पर भेजा जाता है और सिग्नल में मूल सूचना विद्यमान रहती है।
सूचना के संचार के लिए परिवर्ती विद्युत संकेत (इलेक्ट्रिक सिग्नल) को भेजा जाता है , और इसके लिए हमें अपने मूल सूचना को इलेक्ट्रिक सिग्नल के रूप में बदलना पड़ता है और सूचना को इलेक्ट्रिक सिग्नल में परिवर्तित करने के बाद इसे ग्राही के पास भेजा जाता है तथा ग्राही सिरे पर इस इलेक्ट्रिक सिग्नल से मूल सूचना को प्राप्त किया जाता है।
याद रखे कि एनालॉग सिग्नल को अनुरूप संकेत कहते है और डिजिटल सिग्नल को हिंदी में अंकीय संकेत कहते है।

1. अनुरूप संकेत या एनालॉग सिग्नल (analog signal)

जब किसी परिवर्ती संकेत में समय के साथ सतत परिवर्तन होता है अर्थात जब कोई वोल्टेज सिग्नल या धारा सिग्नल सतत परिवर्तित होता है तो इसे अनुरूप संकेत या डिजिटल सिग्नल कहते है। अर्थात अनुरूप संकेत में सूचना का संचरण विद्युत स्पंदनों के रूप में होता है।
सूचना स्रोत से अनुरूप संकेत उत्पन्न करने के लिए ट्रांसड्यूसर का उपयोग किया जाता है तो सूचना को अनुरूप संकेतों में परिवर्तित कर देता है , जैसे टेलेफोन पर ध्वनि के दाब के आधार पर ध्वनी सूचना को संगत वोल्टेज या धारा स्पंदनों के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है , टेलीफोन में ध्वनि सूचना को संगत वोल्टेज या धारा अनुरूप संकेतों में बदलने के लिए माइक्रोफोन ट्रांसड्यूसर का उपयोग किया जाता है।
जब एक संकेत दो अलग अलग आवृतियों की दो या दो से अधिक तरंगों से मिलकर बना होता है तो ऐसे संकेत को मिश्रित अनुरूप संकेत कहते है।

2. अंकीय संकेत या डिजिटल सिग्नल (digital signal)

जब कोई परिवर्ती संकेत असतत परिवर्तन होता है अर्थात इसमें वोल्टेज सिग्नल या धारा सिग्नल असतत रूप से परिवर्तित होता है इसलिए इसे अंकीय संकेत या डिजिटल सिग्नल कहते है।
अंकीय संकेत में केवल दो विविक्त मान संभव है इसलिए इस संकेत को द्विआधारीय संख्या अंक 0 और 1 के द्वारा व्यक्त किया जाता है।
अत: जब कोई सूचना बाइनरी फॉर्मेट अर्थात 1 और 0 के रूप में परिभाषित हो तो ऐसे सिग्नल को डिजिटल सिग्नल कहते है।

प्रकाशीय तन्तु क्या है , परिभाषा , प्रकाशीय तंतु का सिद्धांत , कार्य ऑप्टिकल फाइबर (optical fiber in hindi)

(optical fiber in hindi) प्रकाशीय तन्तु क्या है , परिभाषा , प्रकाशीय तंतु का सिद्धांत , कार्य ऑप्टिकल फाइबर : एक बहुत ही बारीक या पतला तंतु जो प्लास्टिक या काँच का बना हुआ होता है और इसके द्वारा प्रकाशीय सिग्नल या सूचना को एक स्थान से दुसरे स्थान तक पहुँचाने के लिए किया जाता है।

अत: प्रकाशीय तंतु एक माध्यम है जो प्रकाशिक सिग्नल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक संचरण के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रकाशीय तंतु की सहायता से किसी प्रकाशीय सूचना या सिग्नल को बहुत अधिक दूरी तक बिना सिग्नल को प्रवर्धित किये पहुँचाया जाता है क्यूंकि इस संचार विधि में सिग्नल की हानि नहीं होती है या बहुत कम होती है। इसमें सिग्नल विद्युत चुम्बकीय व्यतिकरण से भी प्रभावित नहीं होता है इससे सिग्नल में कोई शोर उत्पन्न नहीं होता है।
प्रकाशिकी तंतु , प्रकाश के पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के सिद्धांत पर आधारित होता है , इसमें प्रकाशीय सिग्नल बहुत बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन को प्रदर्शित करता हुआ तंतु की लम्बाई के अनुदिश आगे की तरफ गति करता रहता है और ग्राही सिरे की तरफ पहुँच जाता है अर्थात इसमें प्रकाश सूचना या सिग्नल का संचरण इसकी लम्बाई के अनुदिश होता है।
प्रकाशीय तंतु में दो भाग होते है एक आंतरिक भाग जिसे क्रोड़ कहते है और एक इस क्रोड़ (core) के ऊपर का भाग अर्थात बाहर का भाग जिसे अधिपट्टन (cladding) कहते है।
क्रोड़ का अपवर्तनांक , अधिपट्टन (cladding) के अपवर्तनांक से अधिक होता है अत: जब इस तंतु में प्रकाश डाला जाता है तो यह प्रकाश अधिक अपवर्तनांक वाले माध्यम से कम अपवर्तनांक वाले माध्यम में जाता है और जिससे एक निश्चित कोण पर इस प्रकाश का पूर्ण आंतरिक परावर्तन हो जाता है और आगे से आगे इस प्रकाश का पूर्ण आन्तरिक परावर्तन होता रहता है और प्रकाश सिग्नल आगे से आगे संचरण करता रहता है और इस प्रकार गति करते हुए यह प्रकाश या सूचना या सिग्नल एक सिरे से दुसरे सिरे तक पहुच जाता है।
प्रकाशीय तंतु द्वारा कई सिग्नल को एक साथ भेजा जा सकता है क्यूंकि इसमें सिग्नल का व्यतिकरण नही होता है जिससे सिग्नल में कोई शोर उत्पन्न नही होता है लेकिन तार संचार विधि में केवल एक सिग्नल एक साथ भेजा जा सता है।

प्रकाशीय तंतु के उपयोग

चिकित्सा में डॉक्टर हमारे शरीर की जांच करने या बिना चीरा के ऑपरेशन करने के लिए शरीर में प्रकाशीय तंतु डाला जाता है और इलाज किया जाता है , क्यूंकि यह बहुत ही बारीक होता है अर्थात यह लगभग बाल के आकार का होता है इसलिए शरीर के किसी भी हिस्से में आसानी से जा सकता है।
इन्टरनेट के लिए आजकल अधिक स्पीड में इन्टरनेट उपयोग के लिए प्रकाशीय तंतु का उपयोग किया जाने लगा है क्यूंकि यह कम समय में अधिक डाटा का आदान प्रदान कर सकता है , यही कारण है कि आजकल इन्टरनेट की स्पीड पहले की तुलना में बहुत अधिक हो गयी है।

प्रकाशीय संचार , प्रकाशिक संचार (Optical communication in hindi)

प्रकाशीय संचार , प्रकाशिक संचार (Optical communication in hindi) : संचार की वह विधि जिसमें सूचना को एक स्थान से दुसरे स्थान तक भेजने के लिए विद्युत सिग्नल के बजाय प्रकाशीय तरंगें उपयोग में लायी जाती है , इसे प्रकाशीय संचार कहते है।
अर्थात वह संचार जिसमें सूचना या सिग्नल को एक स्थान से दुसरे स्थान तक भेजने के लिए प्रकाश तरंगों का उपयोग किया जाता है उसे प्रकाशीय संचार या प्रकाशिक संचार कहते है।
प्रकाश संचार में एक स्थान से दुसरे स्थान तक सिग्नल को भेजने के लिए प्रकाशिक तंतु का इस्तेमाल किया जाता है।
इस संचार व्यवस्था के भाग निम्न है –
एक मॉड्यूलेटर / डिमोडुलेटर, एक ट्रांसमीटर / रिसीवर , प्रकाशिक सिग्नल , एक माध्यम आदि।
इस संचार व्यवस्था के बहुत अधिक फायदे है इसलिए आजकल कई क्षेत्रों में प्रकाशीय संचार को अधिक बढ़ावा मिला है और हमें कॉपर के तार वाले संचार से मुक्ति मिली है।
क्यूंकि प्रकाशिक संचार में डाटा या सिग्नल को बहुत कम नुकसान या हानि के साथ एक स्थान से दुसरे स्थान पर भेजा जा सकता है तथा एक साथ बहुत अधिक डाटा भेजा जा सकता है इसलिए आजकल मोबाइल टेक्नोलॉजी तथा इन्टरनेट के हर क्षेत्र में प्रकाशीय संचार का उपयोग ही किया जाता है।
लगभग 1970 के दशक से कम हानि के उद्देश्य से निजात किया गया यह संचार व्यवस्था सबसे अधिक जल्दी प्रचलित हो गयी , इन संचार व्यवस्था के निम्न 3 भाग होते है –
1. ट्रांसमीटर
2. रिसीवर
3. प्रकाशित तंतु
1. ट्रांसमीटर : संचार का यह भाग इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को प्रकाशीय सिग्नल में परिवर्तित कर देता है , ट्रांसमीटर के रूप में अर्धचालक युक्तियाँ काम में ली जाती है और इनमें सबसे अधिक काम में ली जाने वाली युक्ति LED और लेजर डायोड है। जब सिग्नल कम दूरी तक भेजना होत्ता है तब LED डायोड काम में लिए जाते है और सिग्नल को अधिक दूरी तक संचरण के लिए लेजर डायोड काम में लिए जाते है।
2. रिसीवर : संचार के ग्राही भाग की तरफ एक फोटो संसूचक लगा रहता है अर्थात एक ऐसा उपकरण जो प्रकाशीय सिग्नल को विद्युत सिग्नल में परिवर्तित कर देता है , इस उपकरण में प्रकाश विद्युत प्रभाव का सिद्धांत काम में लिया जाता है जो प्रकाश को विद्युत में बदल देता है। इस उपकरण के रूप में अर्धचालक युक्ति फोटो डायोड काम में लिया जाता है।
3. प्रकाशित तंतु : यह प्रकाश के पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के सिद्धांत पर आधारित रहता है , यह एक ऐसी युक्ति होती है जो प्रकाशीय सिग्नल को एक स्थान से दुसरे स्थान तक भेजने के काम में लिया जाता है।
प्रकाशीय संचार या प्रकाशिक संचार का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसमें सिग्नल की हानि बहुत कम होती है और न इसमें विद्युत चुम्बकीय व्यतिकरण जैसी समस्या होती है , साथ ही एक साथ अधिक डाटा या सिग्नल का आदान प्रदान कर सकते है। इस संचार व्यवस्था में खराबी भी जल्दी नही उत्पन्न होती है और न कि इसका ज्यादा खर्चा आता है इसलिए यह वर्तमान समय में बहुत अधिक उपयोग में लायी जाने वाली संचार व्यवस्था है।

तार संचार : समान्तर तार लाइन , समाक्षीय तार लाइन , युग्मित तार लाइन संचार (wire communication in hindi)

(wire communication in hindi) तार संचार : समान्तर तार लाइन , समाक्षीय तार लाइन , युग्मित तार लाइन संचार : जब दो बिन्दुओं के मध्य सूचना या डाटा आदान प्रदान के लिए उन दोनों बिन्दुओं को तार से जोड़ा जाता है और इस तार के माध्यम से ही दोनों बिन्दुओं के मध्य सूचना या डाटा का आदान प्रदान होता है तो इस प्रकार तार से जोड़कर किया गया संचार तार संचार कहलाता है।

घर या ऑफिस में लगे लैंडलाइन फोन तार से जुड़े होते है और इस तार के द्वारा ही अन्य जगह पर स्थित व्यक्ति से बात होती है अर्थात सूचना का आदान प्रदान होता है इसलिए इसे तार संचार का उदाहरण कहते है।
इसके अलावा केबल टीवी , फाइबर ऑप्टिक आदि भी तार संचार के उदाहरण है।
यहाँ सूचना के संचरण के लिए तार माध्यम की तरफ कार्य करते है , सूचना के संचरण के लिए अलग अलग प्रकार के तारों का इस्तेमाल किया जाता है , हम यहाँ कुछ तार लाइनो का अध्ययन करेंगे अर्थात कुछ तार माध्यमों का अध्ययन करेंगे।
सूचना या डाटा के संचरण के लिए हम तीन प्रकार के तार काम में लेते है जो निम्न है –
1. समान्तर तार लाइन (parallel wire line)
2. युग्मित तार लाइन (paired wire line)
3. समाक्षीय तार लाइन (Co-axial Cable)

1. समान्तर तार लाइन (parallel wire line)

इस प्रकार की तार में दो धात्विक चालकों को कुचालक माध्यम में सुरक्षित रखा जाता है या दोनों के मध्य आपस में संपर्क न हो इसके लिए दोनों धात्विक चालक के मध्य कुचालक माध्यम रखा जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है –
हमने इस प्रकार के तार पहले टीवी के लिए इस्तेमाल में देखे थे , ये कुछ कठोर या लचीले हो सकते है यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमने कुचालक के रूप में क्या पदार्थ काम में लिया है। इन तारों में ऊर्जा हानि अधिक होती है इसलिए इन तारों को अधिक दूरी तक संचार व्यवस्था में काम में नही लिया जाता है।

2. युग्मित तार लाइन (paired wire line)

इस प्रकार की लाइन में तांबे के तारों को एक निश्चित अंतराल में मोड़ दिया जाता है जिससे विद्युत व्यवधान (दखल अंदाजी) कम हो जाती है अर्थात सिग्नल एक दुसरे के मार्ग में बाधा नहीं डालते है।
अर्थात इस प्रकार तारों को मोड़ने से यह अन्दर उत्पन्न विद्युत चुम्बकीय व्यतिकरण को एक दुसरे से नष्ट कर देते है , क्यूंकि यदि इसे नष्ट नही किया जाए तो शोर या वास्तविक सिग्नल अंतिम सिरे पर नहीं पहुँचता है।
युग्मित तार लाइन को निचे चित्र में दिखाया गया है –
इस प्रकार के तार द्वारा अंकीय डाटा या अनुरूपी सिग्नल किसी भी प्रकार की सूचना को एक जगह से दूसरी जगह तक भेजा जा सकता है।

3. समाक्षीय तार लाइन (Co-axial Cable)

इस प्रकार के तार में आंतरिक तार कॉपर का बना होता है और इस आंतरिक तार के ऊपर पोलीएथिलीन या टैपलोन नामक पदार्थ का कवच चढ़ा हुआ रहता है अर्थात परत चढ़ी हुई रहती है।
फिर इसके बाद दूसरा तार होता है और इसके ऊपर विद्युत रोधी पदार्थ का आवरण होता है तो इसे बाहरी नुकसान से बचाता है , समाक्षीय तार लाइन का चित्र नीचे दिखाया गया है –
इस केबल के द्वारा उन सिग्नलों को प्रेषित किया जाता है जो सिग्नल उच्च आवृत्ति के होते है या अतिसूक्ष्म तरंगों के सिग्नल होते है।

सुदूर संवेदन क्या है , प्रकार , उपयोग , अनुप्रयोग , सक्रिय और निष्क्रिय सुदूर संवेदन (remote sensing in hindi)

(remote sensing in hindi) सुदूर संवेदन क्या है , प्रकार , उपयोग , अनुप्रयोग , सक्रिय और निष्क्रिय सुदूर संवेदन : ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा किसी वस्तु या , जगह या किसी घटना के संपर्क में आये बिना ही इनकी सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ली जाती है उस प्रक्रिया को सुदूर संवेदन कहते है।
सुदूर संवेदी उपकरण द्वारा किसी वस्तु या घटना के आंकड़े इक्कट्ठे किये जाते है और इन आंकड़ों के आधार पर उस वस्तु या घटना की स्थिति आदि कई चीजो का पता लगाया जाता है।
सूदूर संवेदी उपग्रह द्वारा किया जाता है , यह उपग्रह पृथ्वी के बाहर इसकी कक्षा में स्थित रहता है और वहां से हमें जिस स्थान या घटना की स्थिति जाननी होती है उस उपग्रह को वहां सेट किया जाता है और फिर फोटो भी क्लिक करके यह उपग्रह उन फोटो को पृथ्वी पर हमारे वैज्ञानिकों के पास भेजता है।

 

सुदूर संवेदी के प्रकार

सुदूर संवेदन को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है –
1. सक्रीय सुदूर संवेदन
2. निष्क्रिय सुदूर संवेदन
1. सक्रीय सुदूर संवेदन : वे संवेदी उपकरण जो स्वयं विद्युत चुम्बकीय तरंगे उत्पन्न करते है और जिस जगह या वस्तु की जानकारी लेनी है उसकी तरफ इन तरंगों को भेजता है और ये तरंगें जब वस्तु से टकराकर आती है है इन परावर्तित तरंगों के आधार पर आंकड़ो का पता लगाता है .
उदाहरण : रडार में सक्रीय संवेदन उपयोग किया जाता है , यह ऊर्जा के एक स्पंद वस्तु की तरफ भेजता है और जब यह स्पंद वस्तु से टकराकर वापस आता है तो उससे सम्बंधित आकंड़ो को आई हुई स्पंद के आधार पर करता है .
2. निष्क्रिय सुदूर संवेदन : इस प्रकार के सूदूर संवेदी उपकरण में सूर्य का प्रकाश वस्तु से परावर्तित होकर इस उपकरण के पास आता है और इस परावर्तित सूर्य के प्रकाश के आधार पर आकंड़ो का पता लगाया जाता है या जानकारी प्राप्त की जाती है।
सुदूर संवेदन एक उपग्रह के द्वारा संपन्न होता है और यह उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर एक निश्चित कक्षा में स्थित रहता है , यह उपग्रह पृथ्वी के प्रत्येक भाग से गुजरता है और इसके गुजरने का समय निश्चित होता है अर्थात एक निश्चित समय बाद यह पृथ्वी के एक निश्चित जगह से गुजरता है अर्थात एक निश्चित समय बाद यह पृथ्वी के हिस्से की जानकारी या फोटो पृथ्वी पर वैज्ञानिकों को भेजता है और इस आधार पर वैज्ञानिक पृथ्वी के हर हिस्से की जानकारी रखते है और आगामी घटनाओं के लिए तैयार रहते है।
भारत के सुदूर संवेदन उपग्रह निम्न है –
IRS-1A , JRS-1B , IRS-1C आदि भारतीय सुदूर संवेदी उपग्रह है।

सुदूर संवेदन के उपयोग या अनुप्रयोग

इनके द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्य किये जाते है जिससे हमारा दैनिक जीवन आसान और सुविधाजनक बनता है , इनके उपयोग निम्न है –
  • मौसम विभाग द्वारा इनके आंकड़ो का उपयोग करके आने वाली मौसम परिवर्तन में और घटनाओं के बारे में जानकारी देता है , जैसे यह पृथ्वी के किसी कोने में चलने वाली किसी खतरनाक हवा या चक्रवात आदि के बारे में शुरू होते ही आगामी हिस्सों को सतर्क कर देते है।
  • किसी जगह पर या समुद्र में पानी का स्तर या बर्फ की मात्रा आदि का पता भी इन संवेदी उपग्रह द्वारा ही लगाया जाता है।
  • किसी शहर , आपातकालीन स्थिति का सर्वे या जानकारी आदि का भी पता लगाया जाता है।
  • किसी युद्ध क्षेत्र में दुश्मनों की स्थिति या उनकी गतिविधियों का पता भी लगाया जा सकता है।
  • किसी प्राकृतिक घटनाओं का पता लगाने या स्थिति का अर्थात घटना में क्षति आदि का सर्वें का पता भी लगाया जाता है।

उपग्रह संचार क्या है , परिभाषा , कैसे होता है , अनुप्रयोग (satellite communication in hindi)

(satellite communication in hindi) उपग्रह संचार क्या है , परिभाषा , कैसे होता है , अनुप्रयोग : पृथ्वी के चारों तरफ कक्षा में स्थित किसी उपग्रह की सहायता से एक जगह से दूसरी जगह तक सूचना को पहुँचाना उपग्रह संचार कहलाता है।
इसी संचार के कारण हम दुनिया के किसी भी कोने में हो रहे मैच का लाइव टेलीकास्ट देख सकते है।
इस उपग्रह संचार व्यवस्था में एक सूक्ष्म मोडुलित तरंगों को उपग्रह की तरफ भेजा जाता है और यह उपग्रह इन तरंगों को ग्राही की तरफ मोड़ देता है और ये तरंगें ग्राही के पास पहुँच जाती है जैसा चित्र में दिखाया गया है –

उपग्रह संचार का उपयोग हम विभिन्न चीजो में करते है अत: इसके अनुप्रयोग कई है जैसे टेलीफोन में , टेलीविजन में , इन्टरनेट में , रेडियो आदि के लिए उपग्रह संचार का ही उपयोग होता है।
आप यकीन नहीं करेंगे इस वक्त हमारे सर के ऊपर 2000 से भी अधिक मानव निर्मित उपग्रह घूम रहे है जो विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए पृथ्वी की कक्षाओं में छोड़े गए है ताकि विभिन्न प्रकार का संचार अधिक अच्छा बनाया जा सके।
जिस उपग्रह के द्वारा संचार संपन्न करवाया जाता है यह पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर रहता है क्यूंकि इस उपग्रह का परिभ्रमण काल भी 24 घंटे ही रहता है जो पृथ्वी के परिभ्रमण काल के बराबर होता है अर्थात यह उपग्रह पृथ्वी के साथ साथ घूमता रहता है या परिक्रमण करता रहता है।
उपग्रह को पृथ्वी सतह से लगभग 36000 किलोमीटर ऊपर रखा जाता है जो आयनमंडल के भी ऊपर होता है। संचार उपग्रह को रेडियो ट्रांसपोंडर भी कहते है।  यह संचार उपग्रह पृथ्वी से आने वाले सूचना तरंगों को प्रवर्धित करता है और पुन: इन सिग्नलों को ग्राही की तरफ भेज देता है।
इस संचार व्यवस्था में दो लिंक होते है –
उप लिंक : जब उपग्रह प्रेषि द्वारा भेजे गये सिग्नल को ग्रहण करता है या प्राप्त करता है तो ये सिग्नल उपग्रह उप लिंक द्वारा प्राप्त करता है।
डाउन लिंक : प्रेषि द्वारा प्राप्त सिग्नलों को उपग्रह प्रवर्धित करता है और डाउन लिंक के द्वारा इन्हें ग्राही को भेज देता है।
याद रखे की एक उपग्रह के द्वारा सम्पूर्ण भू मंडल पर भेजना संभव नहीं है , सम्पूर्ण भू मंडल पर किसी संकेत को भेजने के लिए कम से कम तीन उपग्रहों की आवश्यकता होती है।

वर्तमान समय में उपग्रह संचार के अनुप्रयोग बढ़ते जा रहे है , वर्तमान समय में हम जो जीपीएस का इस्तेमाल करते है यह भी उपग्रह संचार द्वारा ही संभव है तथा उपग्रह संचार द्वारा ही हम मौसम आदि की जानकारी प्राप्त करते है।

आकाशीय तरंग संचरण (sky wave propagation in hindi)

(sky wave propagation in hindi) आकाशीय तरंग संचरण : इस प्रकार के तरंग संचरण में आयन मण्डल की बहुत अधिक महत्वपूर्ण भूमिका है अत: पहले आयन मंडल के बारे में पढ़ते है।
आयनमण्डल : पृथ्वी के चारों ओर के वायुमंडल में लगभग 80 किलोमीटर से लेकर 400 किलोमीटर तक की परत को आयनमंडल कहते है , इसे आयन क्षेत्र या आयनमण्डल इसलिए कहा जाता है क्यूंकि इस क्षेत्र में आवेशित कण पाए जाते है , यहाँ सूर्य से तीव्र पराबैंगनी विकिरणों के कारण वायु का आयनन हो जाता है और आवेशित कं उत्पन्न हो जाते है , आयन मंडल की आकाशीय तरंग संचरण या संचार में महत्वपूर्ण योगदान होता है।

आकाशीय तरंग संचरण

जब प्रेषि एंटीना द्वारा विद्युत चुम्बकीय तरंगों को उत्सर्जित करता है तो ये तरंगे आयनमंडल से टकराकर ग्राही एंटीना तक पहुँचती है और तरंगों के इस संचरण को आकाशीय तरंग संचरण कहते है।
यहाँ ध्यान रखे कि तरंगों का संचरण या गति पूर्ण आंतरिक परावर्तन पर आधारित होती है अर्थात इसमें विद्युत चुम्बकीय तरंगे या रेडियो तरंगे आयनमण्डल द्वारा पूर्ण आंतरिक परावर्तन दर्शाती है और इसके कारण इन तरंगों का संचरण होता है। अर्थात पूर्ण आंतरिक परावर्तन के बाद प्रेषि एंटीना से उत्सर्जित तरंगे ग्राही एंटीना तक पहुँचती है।
क्यूंकि आयनमंडल में धनात्मक तथा ऋणात्मक आयन उपस्थित रहते है और इन आयनों का घनत्व ऊंचाई बढ़ने के साथ बढ़ता जाता है जिससे इसका अपवर्तनांक घटता जाता है।
2 मेगाहर्ट्ज़ से कम आवृत्ति की तरंगों को आयनमण्डल अवशोषित कर लेता है तथा 30 मेगा हर्ट्ज़ से अधिक की आवृत्ति वाली तरंगे सीधी निकल जाती है अर्थात वापस पृथ्वी पर लौटकर नहीं आती है इसलिए आकाशीय तरंग संचरण विधि द्वारा 2 मेगा हर्ट्ज़ से 30 मेगाहर्ट्ज़ तक की तरंगों का संचरण भली भाँती किया जाता है।
किसी तरंग की वह अधिकतम आवृत्ति जिसके लिए आयनमण्डल द्वारा पूर्ण आंतरिक परावर्तन संभव हो पाता है उस आवृत्ति को क्रांतिक आवृत्ति कहते है जिसका मान निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जा सकता है –
यहाँ Nmax = आयनमण्डल में इलेक्ट्रॉन की अधिकतम घनत्व है तथा fc = क्रान्तिक आवृति है |

अन्तरिक्ष तरंग या क्षोभमण्डल तरंग संचरण (space wave propagation or tropospheric wave propagation in hindi )

(space wave propagation or tropospheric wave propagation in hindi ) अन्तरिक्ष तरंग या क्षोभमण्डल तरंग संचरण : हमारी पृथ्वी विभिन्न प्रकार की गैसों के आवरण से घिरी हुई है और इस चारों ओर के गैसों के आवरण को हम वायुमंडल कहते है। पृथ्वी के वायुमंडल को चार परतों में विभाजित किया गया है जो निम्न है –
1. क्षोभ मंडल
2. समताप मंडल
3. मीसोस्फीयर
4. योण क्षेत्र
क्षोभ मंडल : पृथ्वी सतह से लगभग 12 किलोमीटर की ऊंचाई तक के गैसों के आवरण को क्षोभ मंडल कहते है , वायुमंडल की इस परत में वाष्प पायी जाती है जिसके कारण बादल बनते है और जो रोजाना अचानक से मौसम परिवर्तित हो जाता है वह भी इस क्षोभ मंडल के कारण ही होता है।

अन्तरिक्ष तरंग या क्षोभमण्डल तरंग संचरण

वे तरंगें जो सीधे प्रेषि एंटीना से ग्राही एंटीना तक पहुँचती है उन्हें अन्तरिक्ष तरंगे कहते है और इस प्रकार जो संचरण संपन्न होता है उन्हें अन्तरिक्ष तरंग या क्षोभमण्डल तरंग संचरण कहते है।
हमने भू पृष्ठीय तरंग संचरण में पढ़ा कि भू पृष्ठीय तरंग संचरण द्वारा उच्च आवृत्ति की तरंगों को संचरित नहीं किया जा सकता है क्यूंकि भू पृष्ठीय तरंग संचरण विधि में अधिक ऊर्जा का हास या हानि होती है।
इसलिए उच्च आवृत्ति की तरंगों को एक स्थान से दुसरे स्थान तक संचरित करने के लिए अन्तरिक्ष तरंग संचरण विधि काम में ली जाती है।
याद रखे की इन तरंगों को योण क्षेत्र (ionosphere) अवशोषित कर लेता है इसलिए इन तरंगों को आकाशीय तरंग संचरण विधि द्वारा भी नहीं भेजा जा सकता है।
इसलिए इस प्रकार की उच्च आवृत्ति की तरंगों को अन्तरिक्ष तरंग या क्षोभ मण्डल तरंग संचरण विधि द्वारा सीधे प्रेषि एंटीना से ग्राही एंटीना तक भेजा जाता है , याद रखिये ये तरंगे सीधी रेखा में गति करती है इसलिए इन तरंगों के संचरण के लिए दोनों एंटीना लाइन ऑफ़ साईट में होने चाहिए अर्थात एक नजर में स्थित हो ताकि संचरण संभव हो सके।
इस विधि द्वारा लगभग 30 हर्ट्ज़ से अधिक आवृत्ति वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगे या रेडियो तरंगे संचरित की जाती है जो कि उच्च आवृति की तरंगे होती है।

उपयोग

अन्तरिक्ष तरंग संचरण के कारण ही टेलीविजन प्रसारण संभव है।
इसी के कारण रडार दूरसंचार और उपग्रह दूर संचार संभव हो पाता है।
यदि किसी प्रेषि एंटीना द्वारा h ऊंचाई से विद्युत चुम्बकीय तरंगों या रेडियो तरंगों को उत्सर्जित किया जाता है इन तरंगों की परास निम्न होगी –
तरंगों की परास = √2hR
यहाँ R = पृथ्वी की त्रिज्या है।