निकोल प्रिज्म क्या है , निकॉल प्रिज्म ,संरचना , सिद्धांत ,कार्यविधि  (nicol prism in hindi , working , structure)

(nicol prism in hindi , working , structure) निकोल प्रिज्म क्या है , निकॉल प्रिज्म : निकोल प्रिज्म एक प्रकार की प्रकाशिक युक्ति है जिसका उपयोग कर प्रकाश को समान तीव्रता के दो लम्बवत और ध्रुवित प्रकाश पुंज के रूप में विभक्त करती है।
निकोल प्रिज्म केलसाइट क्रिस्टल का बना हुआ होता है , इसकी सहायता से E-किरण तथा O-किरण को आपस में पृथक किया जाता है।

 

निकोल प्रिज्म का सिद्धांत (principle of nicol prism)

यह द्वि-अपवर्तन द्वारा प्रकाश के ध्रुवण के सिद्धान्त पर कार्य करता है , इस सिद्धांत के अनुसार जब किसी सामान्य प्रकाश या अध्रुवित प्रकाश को किसी विशेष प्रकार के क्रिस्टल जैसे केलसाइट , क्वार्टज़ या टूरमैलीन आदि में से गुजारा जाता है तो प्रकाश समान तीव्रता के के दो लम्बवत और ध्रुवित प्रकाश पुंजों में बंट जाता है।
अर्थात अध्रुवित प्रकाश O-किरण और E-किरण के ध्रुवित प्रकाश में विभक्त हो जाता है।
O-किरण (ordinary ray) , साधारण प्रकाश किरण होती है और यह स्नेल के नियम का पालन करती है।
E-किरण (extraordinary ray) को असाधारण प्रकाश किरण कहते है और यह स्नेल का नियम की पालना नहीं करती है।
O-किरण के लिए अपवर्तनांक का मान 1.688 होता है।
E-किरण के लिए अपवर्तनांक का मान 1.486 होता है।
दोनों के अपवर्तनांक अलग होते है अर्थात दोनों के कम्पन्न की दिशा अलग अलग होती है , लेकिन इससे निकलने के बाद वे समान्तर मार्ग अनुसरण करती है भले ही उनके तल लम्बवत हो।

निकोल प्रिज्म की संरचना (Construction of Nicol Prism)

यह केलसाइट क्रिस्टल की बनी होती है , इसकी लम्बाई का मान इसकी चौड़ाई से लगभग तीन गुना रखा जाता है।
इसके किनारों को इस प्रकार काटा जाता है की वो 68° और 112° हो जाए।
अब चित्रानुसार इनकी सतहों को तिरछा काट दिया जाता है , अब इन दोनों तिरछी काटी हुई सतहों को केनेडा बालसम नामक पदार्थ से पोलिश कर दी जाती है , केनेडा बालसम पदार्थ का अपवर्तनांक 1.55 होती है जो O-किरण और E-किरण के अपवर्तनांक के मध्य होती है।

निकोल प्रिज्म की कार्यविधि (Working of Nicol Prism)

जब कोई सामान्य प्रकाश को इस पर आपतित किया जाता है तो यह दो भागों में बंट जाता है O-किरण और E-किरण।
आगे के सिरे पर केनेडा बालसम के पदार्थ का लेप किया हुआ है जिसका अपवर्तनांक O-किरण और E-किरण के मध्य में होता है अर्थात इसका अपवर्तनांक E-किरण से अधिक होता है और O-किरण से कम होता है।
अत: स्पष्ट है कि केनेडा बालसम पदार्थ O-किरण के लिए विरल माध्यम की तरह व्यवहार करता है और E किरण के लिए सघन माध्यम की तरह व्यवहार करता है।
जब O-किरण केनेडा बालसम की परत में प्रवेश करती है तो प्रकाश सघन से विरल माध्यम में प्रवेश कर रहा है और जब आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक रखा जाए तो O-किरण का पूर्ण आन्तरिक परावर्तन हो जाता है।
केवल E-किरण ही प्रिज्म से बाहर निकलती है जैसा चित्र में दर्शाया है।
इस प्रकार दोनों प्रकार की किरण अलग अलग प्राप्त होती है अर्थात सामान्य प्रकाश E-किरण और O-किरण के रूप में प्राप्त होता है।

ध्रुवित प्रकाश प्राप्त करने की चार विधियाँ (4 methods of producing polarized light in hindi)

(4 methods of producing polarized light in hindi) ध्रुवित प्रकाश प्राप्त करने की चार विधियाँ : जैसा कि हम सब जानते है कि सामान्य प्रकाश को अध्रुवित प्रकाश कहते है क्यूंकि सामान्य प्रकाश की विद्युत चुम्बकीय तरंगे एक से अधिक तल में कम्पन्न करती है , जब सामान्य प्रकाश को किसी विशेष विधि द्वारा ध्रुवित प्रकाश में बदला जाता है तो अब यह ध्रुवित प्रकाश केवल एक तल में कम्पन्न करता है अर्थात ध्रुवित प्रकाश की तरंगे केवल एक तल में कम्पन्न करती है।

अध्रुवित प्रकाश को ध्रुवित प्रकाश में बदलने की विधि को ध्रुवण कहते है।

हम यहाँ अध्रुवित प्रकाश (सामान्य प्रकाश) को ध्रुवित प्रकाश में बदलने के चार तरीकों का अध्ययन करेंगे।

1. पोलेरॉइड के द्वारा प्रकाश का ध्रुवण (Polarization by using Polaroid Filter)

यह सबसे अधिक काम में ली जाने वाली विधि है अर्थात इस विधि द्वारा सबसे अधिक अध्रुवित प्रकाश को ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तित किया जाता है , जैसा कि हम जानते है कि अध्रुवित (सामान्य) प्रकाश की तरंगें दो तलों में कम्पन्न करती है।  पोलेरॉइड फ़िल्टर एक तल के कम्पन्न को ब्लाक कर देता है जो पोलेरॉइड के लम्बवत होता है और दुसरे तल की कम्पन्न की तरंगों को गुजरने देता है जो इस पोलेरॉइड के तल के समान्तर होती है।  इस प्रकार इस पोलेरॉइड से निकलने वाली तरंगे केवल तल में कम्पन्न करती है अर्थात अध्रुवित प्रकाश ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है।

2. परावर्तन द्वारा ध्रुवण (Polarization by Reflection)

अधातु की सतह का उपयोग परावर्तन विधि द्वारा ध्रुवण के लिए किया जाता है , इसके अलावा पारदर्शी माध्यम के द्वारा भी ध्रुवण संभव है। जब किसी अधातु सतह पर कोई प्रकाश आपतित होता है और यदि यह एक विशेष कोण पर आपतित हो तो परावर्तन के बाद जो प्रकाश प्राप्त होता है वह ध्रुवित प्रकाश होता है , इस विधि को परावर्तन द्वारा ध्रुवण कहते है।

3. अपवर्तन द्वारा ध्रुवण (Polarization by Refraction)

इस विधि में प्रकाश की अपवर्तन विधि का प्रयोग किया जाता है , जब कोई प्रकाश तरंगें किसी एक सतह से दूसरी सतह में प्रवेश करता है तो प्रकाश अपना मार्ग परिवर्तित कर लेती है इसे प्रकाश का अपवर्तन कहते है। जब प्रकाश की तरंगे किसी विशेष सतहों से अपवर्तित होती है तो निर्गत प्रकाश ध्रुवित प्रकाश होता है।
कुछ विशेष क्रिस्टल होती है जैसे केल्साईट , जब कोई प्रकाश इन पर गिरता है तो इसके कारण प्रकाश में द्वि अपवर्तन की घटना घटित होता है जिससे निर्गत प्रकाश दो भागों में बंट जाता है जो ध्रुवित प्रकाश की तरंगे है।

4. द्विवर्णता विधि (Polarization by dichroism)

यह विधि है जो हमने पोलेरॉइड द्वारा ध्रुवित प्रकाश प्राप्त करने में काम में ली , इसमें विशेष प्रकार के क्रिस्टल का उपयोग किया जाता है जिसमे यह गुण होता है कि यह विशेष प्रकार के प्रकाश को अवशोषित कर लेता है और एक विशेष प्रकार के प्रकाश को इससे गुजरने देता है , यह निर्गत होने वाला प्रकाश ध्रुवित प्रकाश होता है और इस विधि को द्वि वर्णता विधि द्वारा प्रकाश को ध्रुवित करना कहलाता है।

मैलस का नियम क्या है , मेलस का नियम (malus law in hindi)

(malus law in hindi) मैलस का नियम क्या है , मेलस का नियम : जब पूर्ण ध्रुवित प्रकाश को किसी विश्लेषक (analyser) पर डाला जाता है तो विश्लेषक से बाहर निकलने वाले प्रकाश की तीव्रता का मान cos2θ के समानुपाती होता है।  यहाँ θ = विश्लेषक के निर्गत अक्ष और आपतित प्रकाश की अक्ष के मध्य का कोण होता है। माना विश्लेषक पर आपतित पूर्ण ध्रुवित प्रकाश की तीव्रता  मान I0 है। तथा विश्लेषक से बाहर निकलने वाले प्रकाश की तीव्रता I है तो मैलस के नियम के इस विश्लेषक से बाहर निकलने वाले प्रकाश की तीव्रता का मान cos2θ के अनुक्रमानुपाती होगा जिसे निम्न सूत्र द्वरा व्यक्त किया जाता है –
I ∞ cos2θ
I = I0. cos2θ
यहाँ θ = विश्लेषक की ध्रुवण की दिशा और विश्लेषक पर आपतित प्रकाश के विद्युत वेक्टर के मध्य का कोण है।

ध्रुवक : किसी सामान्य प्रकाश को ध्रुवित करने के लिए काम में लिया जाने वाला उपकरण या क्रिस्टल , अर्थात इसकी सहायता से सामान्य प्रकाश (अध्रुवित) प्रकाश को पूर्ण ध्रुवित प्रकाश में बदला जाता है।
माना विश्लेषक से निर्गत प्रकाश तथा ध्रुवक से निर्गत प्रकाश के मध्य का कोण θ है जैसा चित्र में दर्शाया गया है –

ध्रुवक से पूर्ण ध्रुवित प्रकाश , विश्लेषक पर आपतित होता है , इस पूर्णत: ध्रुवित प्रकाश में विद्युत क्षेत्र का आयाम का मान E0 है तथा विश्लेषक पर आपतित प्रकाश की तीव्रता I0 है।
तो विश्लेषक से निर्गत प्रकाश की तीव्रता का मान –

I∞ E02
विद्युत क्षेत्र का आयाम का मान E0 के दो घटक होंगे पहले E0 cosθ और E0sinθ लेकिन विश्लेषक केवल  E0 cosθ वाले घटक को ही बाहर निकलने देता है क्यूंकि यह घटक निर्गत अक्ष के समान्तर है।
दुसरे शब्दों में हम यह कह सकते है दूसरा घटक अर्थात E0 cosθ  विश्लेषक द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
अत: विश्लेषक द्वारा निर्गत प्रकाश की तीव्रता को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है –

I ∞ ( E0 x cosθ )2

दोनों तरफ I0 का भाग देने पर तथा हम जानते है कि I∞ E0 होता है अत: समीकरण निम्न प्रकार प्राप्त होगा –

I / I0 = ( E0 x cosθ )2 / E02 = cos2θ
I = I0 x cos2θ

इसे की मेलस का नियम कहते है।
यहाँ दो प्रकार की स्थिति बन सकती है –
1. जब ध्रुवक से निर्गत प्रकाश व विश्लेषक से निकलने वाला प्रकाश समान्तर हो तो इस स्थिति में θ = 0 होगा अत: यह समीकरण निम्न प्रकार प्राप्त होगी
I = I0इस स्थिति में विश्लेषक से निकलने वाला प्रकाश अधिकतम होगा अर्थात निर्गत प्रकाश की तीव्रता का मान अधिकतम होगा।
2. जब ध्रुवक से निर्गत प्रकाश तथा विश्लेषक से निर्गत प्रकाश एक दुसरे के लम्बवत हो अर्थात उनके मध्य का कोण θ = 90 हो तो मैलस का समीकरण निम्न प्रकार प्राप्त होती है –
I = 0
इस स्थिति में निर्गत प्रकाश की तीव्रता शून्य होगी अर्थात प्रकाश विश्लेषक से बाहर नही निकल पाता है।

ब्रूस्टर का नियम , बूस्टर का नियम क्या है (brewster’s law in hindi)

(brewster’s law in hindi) ब्रूस्टर का नियम , बूस्टर का नियम क्या है : स्कॉटलैंड के भौतिक वैज्ञानिक डेविड ब्रूस्टर ने 1811 में प्रकाश के ध्रुवण की मात्रा और आपतन कोण के मध्य एक सम्बन्ध स्थापित किया , चूँकि यह नियम सर डेविड ब्रूस्टर ने दिया था इसलिए इस ध्रुवण की मात्रा और आपतित प्रकाश के कोण के सम्बन्ध को ब्रूस्टर का नियम कहते है।
ब्रूस्टर ने अपने नियम में बताया कि परावर्तित प्रकाश में ध्रुवित प्रकाश की मात्रा , आपतन कोण पर निर्भर करता है अर्थात ध्रुवित प्रकाश की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि डाला गया प्रकाश किस कोण पर आपतित किया गया है।

ब्रूस्टर के नियम के अनुसार एक कोण ऐसा होता है जिस पर परावर्तित प्रकाश पूर्णतया समतल ध्रुवित होता है , एक विशेष कोण पर प्रकाश के कम्पन्न आपतन तल के लम्बवत होते है इसे ध्रुवण कोण कहते है। ध्रुवण कोण को ब्रूस्टर कोण भी कहते है।
ब्रूस्टर ने प्रयोगों के आधार पर एक निष्कर्ष निकाला और बताया कि पारदर्शी माध्यम के अपवर्तनांक का मान ध्रुवण कोण के टेंजेंट (स्पर्शरेखा) के बराबर होता है इसे सूत्र के रूप में निम्न प्रकार लिखा जा सकता है –
अत: ब्रूस्टर के नियम के अनुसार –
μ = tan(i)
यहाँ μ = पारदर्शी माध्यम का अपवर्तनांक
i = ध्रुवण  कोण
स्नेल का नियम हमने पढ़ा था जिसके अनुसार अपवर्तनांक और कोण में निम्न सम्बन्ध होता है –

ब्रूस्टर और स्नेल के नियमों की तुलना करने पर –

समीकरण 1 और समीकरण 2 की तुलना करने पर –

ब्रूस्टर के नियम के उपयोग या अनुप्रयोग (uses of brewster’s law)

ब्रुस्टर के नियम का सबसे अधिक उपयोग सूर्य के चश्मों में किया जाता है , जिन चश्मों को धुप से आखों को बचाने के लिए बनाया जाता है उनमें ब्रूस्टर के नियम का उपयोग किया जाता है जिससे सूर्य से आने वाली प्रकाश की चमक से आँखों को बचाया जा सके।
ठीक इसी प्रकार कैमरा से आने वाली चमक से बचने के लिए भी इसके अन्दर ब्रूस्टर का नियम काम में लिया जाता है जिससे कैमरा की चमक से आँखों को हानि न हो।

पोलेरॉइड क्या है , परिभाषा , उदाहरण , कार्य , उपयोग पोलेरोइड (what is polaroid in hindi)

(what is polaroid in hindi) पोलेरॉइड क्या है , परिभाषा , उदाहरण , कार्य , उपयोग पोलेरोइड : यह एक ऐसा पदार्थ है जिसका उपयोग अध्रुवित प्रकाश को ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है। अत: समतल ध्रुवित प्रकाश उत्पन्न करने के लिए यह सबसे बेहतरीन पदार्थ या विधि है।
समतल ध्रुवित प्रकाश में बदलने के लिए इनमे हरपेथाइट का इस्तेमाल किया जाता है तो आपतित साधारण प्रकाश को पहले दो तरंगों में परिवर्तित करता है पहले बूस्टर O तरंग और दूसरा E तरंग।  साधारण प्रकाश को इन दोनों प्रकार की तरंगों में विभक्त करने के बाड़ा यह इनमे से एक प्रकार की तरंगों को अवशोषित कर लेता है और दूसरी प्रकार की तरंगों को जाने देता है जिससे इस क्रिस्टल से बाहर निकलने वाली तरंगे केवल एक तल में कम्पन्न करती है अर्थात बाहर निकलने वाला प्रकाश समतल ध्रुवित प्रकाश होता है।
पोलेरॉइड एक विशेष प्रकार के कार्बनिक यौगिक हरपेथाइट (कुनैन आयडोसल्फेट) के क्रिस्टल से बना होता है जिनमे यह विशेष गुण होता है कि यह पदार्थ एक विशेष प्रकाश को अवशोषित करते है और अन्य विशेष प्रकाश को इसमें से जाने देते है जिससे इससे प्रकाश के ध्रुवन के लिए फ़िल्टर बनाये जाते है अर्थात इनकी सहायता से अध्रुवित प्रकाश को ध्रुवित प्रकाश में बदला जाता है।

वर्तमान समय में पोलेरॉइड बनाने के लिए पॉलीविनायल अल्कोहल (polyvinyl alcohol) की फिल्म का उपयोग किया जाता है , यह आधुनिक पोलेरॉइड से अधिक उपयोगी है क्यूंकि यह अधिक प्रकाश को इससे पार करने देता है जिससे बाहर निकलने वाला प्रकाश अधिक मात्रा में ध्रुवित प्रकाश होता है।

पोलेरॉइड के उपयोग या अनुप्रयोग (Uses of Polaroid)

  • पोलेराइड का उपयोग प्रगोशाला में समतल ध्रुवित प्रकाश उत्पन्न करने के लिए बहुत अधिक किया जाता है।
  • इनका बहुत अधिक उपयोग सूर्य वाले चश्मों में प्रकाश को ध्रुवित करने के लिए किया जाता है ताकि आँखों को सुरक्षित रखा जा सके।
  • इसका उपयोग रात में सामने से आने वाले बाहन के कारण उत्पन्न तेज रौशनी से बचने के लिए किया जाता है।
  • 3D (तीन डी) फिल्म बनाने के लिए पोलेरॉइड की कई परतों (फिल्म) का उपयोग किया जाता है।
  • सूक्ष्मदर्शी में पोलेरॉइड लगे होते है जिससे हम इसकी सहायता से अधिक छोटी चीजो को भी आसानी से देख सकते है।
  • पोलेरॉइड का उपयोग कर विभिन्न प्रकार के पदार्थों के प्रकाशीय गुणों का अध्ययन किया जाता है।
  • पोलेरॉइड को ट्रेन और हवाई जहाजों की खिडकियों में किया जाता है जिससे सूर्य से आने वाले प्रकाश की तीव्रता को कण्ट्रोल किया जा सके।
  • पोलेरॉइड की सहायता से अणुओं के आकार व आकृति का भी अध्ययन किया जाता है।

ध्रुवण : प्रकाश का ध्रुवण , अध्रुवित और ध्रुवित प्रकाश , समतल ध्रुवण तल (polarisation of light in hindi)

(polarisation of light in hindi) ध्रुवण : प्रकाश का ध्रुवण , अध्रुवित और ध्रुवित प्रकाश , समतल ध्रुवण तल : प्रकाश तरंग विद्युत चुम्बकीय तरंगे होती है जो विद्युत आवेशो के कम्पन्न से उत्पन्न होती है। सामान्य प्रकाश में विद्युत वेक्टर के कम्पन्न , तरंग की संचरण की दिशा के लम्बवत तल में होते है और ये सभी दिशाओं में समान रूप से होते है अर्थात प्रकाश तरंग यदि एक से अधिक तलों में कम्पन्न या दोलन कर रही हो तो इसे सामान्य प्रकाश या अध्रुवित प्रकाश कहते है।
“जब सामान्य प्रकाश को टूरमैलीन क्रिस्टल से गुजारा जाता है तो बाहर निकलने वाला प्रकाश की तरंगों का कम्पन्न केवल एक ही तल में होते है , जिन प्रकाश तरंगों का कम्पन्न एक ही तल में होता है उस प्रकाश को ध्रुवित प्रकाश कहते है और अध्रुवित प्रकाश से ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तन की घटना को ध्रुवण कहते है।  ”
जब अध्रुवित प्रकाश (सामान्य प्रकाश) को टूरमैलीन क्रिस्टल से गुजारा जाता है तो वे प्रकाश तरंगे ही इससे निकल पाती है जो टूरमैलीन क्रिस्टल की अक्ष के समान्तर होती है जिससे वे तरंगे रुक जाती है जो इस टूरमैलीन क्रिस्टल के तल के लम्बवत होती है और बाहर निकला हुआ प्रकाश एक ही तल में कम्पन्न करता है जिससे यह ध्रुवित हो जाता है।

अधुवित प्रकाश : वह प्रकाश जिसमें विद्युत वेक्टर के कम्पन्न , प्रकाश तरंगों के संचरण की दिशा के लम्बवत होता है और सभी दिशाओं में समान रूप से होता है अर्थात प्रकाश तरंगों का कम्पन्न सभी दिशाओं में सममित रूप से होता है ऐसे प्रकाश को अध्रुवित प्रकाश कहते है।
ध्रुवित प्रकाश : वह प्रकाश जिसकी तरंगों के विद्युत वेक्टर का कम्पन्न संचरण के लम्बवत होता है लेकिन केवल एक ही दिशा में होता है अर्थात वह प्रकाश जिसकी तरंगों का कम्पन्न या दोलन केवल एक ही दिशा में होता है ऐसे प्रकाश को ध्रुवित प्रकाश कहते है।
कम्पन्न तल : किसी समतल ध्रुवित प्रकाश का कम्पन्न ताल वह ताल होता है जिसमे प्रकाश की संचरण की दिशा और प्रकाश के कम्पन्न होते है।
ध्रुवण तल : किसी समतल ध्रुवित प्रकाश का वह ताल ध्रुवण तल होता है जिसमे प्रकाश की संचरण दिशा तो होती है लेकिन इस तल में कोई कम्पन्न नहीं होता है , ऐसे तल को ध्रुवण तल कहते है।

विवर्तन : प्रकार , प्रकाश का फ्रेनल , फ्राउनहोफर विवर्तन क्या है , परिभाषा (what is diffraction in hindi)

(what is diffraction in hindi) विवर्तन क्या है , परिभाषा , प्रकार , प्रकाश का फ्रेनल , फ्राउनहोफर विवर्तन : जब किसी प्रकाश को छोटे छिद्र या किसी अवरोध पर डाला जाता है तो प्रकाश की तरंगे इस छोटे छिद्र के किनारों पर कुछ मुड़ जाते है , प्रकाश की तरंगों का छिद्र या अवरोध के किनारों से मुड़ने की घटना को प्रकाश का विवर्तन कहते है।

प्रकाश के मुड़ने की मात्रा प्रकाश की तरंग दैर्ध्य और छिद्र या अवरोध के आकार पर निर्भर करता है , यदि इस छिद्र का आकार बहुत अधिक बड़ा हो तो विवर्तन की घटना में प्रकाश के मुड़ने की घटना बहुत कम होती है , इतनी कम की हम उसे पहचान भी नहीं सकते कि यहाँ विवर्तन की घटना घटित हो रही है।
अत: विवर्तन घटना के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त यही है कि विवर्तक वस्तु का आकार तथा प्रकाश की तरंगों की तरंग दैर्ध्य , दोनों समान कोटि की होनी चाहिए।
विवर्तन की घटना प्रकाश और ध्वनि दोनों में होती है लेकिन ध्वनी में यह सामान्य घटना है अर्थात ध्वनि तरंगों की तरंग दैर्ध्य का मान अधिक होता है अत: इसे ध्वनी तरंगों में आसानी से देखा जा सकता है और यह बड़े पैमाने पर होती है लेकिन प्रकाश की तरंगों की तरंग दैर्ध्य का मान कम होता है इसलिए यह आसानी से देखी नहीं जा सकती है , प्रकाश के लिए यह नैनोमीटर कोटि की होती है।
विवर्तन की परिघटना को दो प्रकार से बाँटा गया है –
1. फ्रेनल विवर्तन (fresnel diffraction)
2. फ्राउनहोफर विवर्तन (fraunhofer diffraction)
अब हम यहाँ इन दोनों प्रकार के विवर्तन के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे।

1. फ्रेनल विवर्तन (fresnel diffraction)

फ्रेनल विवर्तन तब उत्पन्न होता है जब प्रकाश को किसी सूक्ष्म छिद्र पर डाला जाता है और प्रकाश स्रोत व पर्दा , विवर्तक वस्तु कुछ दूरी पर स्थित हो।  इसमें लेंस का प्रयोग नही किया जाता है और पैटर्न बनने का आकार स्रोत और छिद्र के आकार और दूरी पर निर्भर करता है।
उदाहरण : चकती द्वारा विवर्तन।

2. फ्राउनहोफर विवर्तन (fraunhofer diffraction)

जब प्रकाश स्रोत या पर्दा दोनों में एक अन्नत दूरी पर स्थित हो या पर्दा व प्रकाश स्रोत दोनों ही अन्नत दूरी पर स्थित हो तो पर्दे पर प्राप्त विवर्तन को फ्राउनहोफर विवर्तन कहते है।
यहाँ एक अथवा दो लेंसों का उपयोग किया जाता है।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि फ्रेनल विवर्तन की तुलना में फ्राउनहोफर विवर्तन को आसानी से अध्ययन किया जा सकता है और देखा जा सकता है।
उदाहरण : एकल रेखाछिद्र पर प्रकाश का विवर्तन , द्वि रेखा छिद्र पर प्रकाश का विवर्तन आदि।

न्यूटन वलय प्रयोग (newton’s ring experiment in hindi)

(newton’s ring experiment in hindi) न्यूटन वलय (रिंग) प्रयोग : व्यतिकरण का यह बहुत ही महत्वपूर्ण अनुप्रयोग है।  न्यूटन के वलय प्रयोग द्वारा किसी एकवर्णी प्रकाश की तरंग दैर्ध्य को आसानी से ज्ञात किया जा सकता है साथ ही इस प्रयोग द्वारा किसी द्रव अपवर्तनांक को भी आसानी से ज्ञात किया जाता है।
न्यूटन वलय कैसे बनती है ?
जब किसी काँच की एक समतल प्लेट पर उत्तल लेंस को इस प्रकार रखा जाए कि समतल कांच पर उत्तल लेंस का वक्रीय सतह टिका हुआ हो तो इस लेंस-काँच सतह संपर्क के कारण इन दोनों के मध्य वायु की एक समतल अवतल फिल्म बन जाती है।  अब यदि इस लेंस पर एकवर्णी प्रकाश डाला जाए तो परावर्तित प्रकाश में वृत्तीय फ्रिन्जे दिखाई देती है इन वृत्तिय फ्रिन्जों को न्यूटन वलय (न्यूटन रिंग) कहते है।

जहाँ समतल कांच और उत्तल लेंस एक दुसरे के संपर्क में होते है वहां जो वायु की पतली परत बनती है उसकी मोटाई लगभग शून्य मानी जाती है अर्थात बहुत ही ज्यादा अल्प होती है। इस सम्पर्क बिंदु को चित्र में O द्वारा व्यक्त किया गया है।

न्यूटन वलयों में केंद्र में जो फ्रिंज होता है वह अदिप्त बिंदु होता है और इस अदीप्त बिंदु के एकांतर क्रम में दीप्त और अदीप्त वृत्ताकार फ्रिन्जे प्राप्त होती है।

लेंस और कांच के संपर्क बिंदु पर जब एकवर्णी प्रकाश डाला जाता है तो यह प्रकाश संपर्क बिंदु पर बनी वायु की फिल्म की उपरी सतह से प्रकाश कुछ परावर्तित हो जाता है तथा कुछ प्रकाश इस वायु की फिल्म की निचली सतह से परावर्तित हो जाती है। दोनों प्रकाश के परावर्तन में 180 डिग्री का कलांतर होता है क्यूंकि समतल कांच का अपवर्तनांक अधिक होता है।
इसके कारण दो प्रकार का व्यतिकरण होता है एक सुपोषी व्यतिकरण और दूसरा कुपोषी व्यतिकरण।
इसके कारण दीप्त और अदीप्त वलय (रिंग) प्राप्त होती है।
माना एक रिंग की त्रिज्या r है तथा वायु फिल्म की मोटाई t है तो r और t में निम्न सम्बन्ध होगा –

न्यूटन वलयों में से m वीं अदिप्त फ्रिन्ज या वलय की त्रिज्या निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात की जा सकती है –

यहाँ m = 0 , 1 , 2  आदि , जब m = 0 होगा तब अदीप्त वलय की त्रिज्या r = 0 होगी।  इसे सम्पर्क बिंदु कहते है।
न्यूटन वलयों में m वीं दीप्त रिंग की त्रिज्या ज्ञात करने का सूत्र

फ्रेनल द्विप्रिज्म प्रयोग (fresnel biprism experiment in hindi)

(fresnel biprism experiment in hindi) फ्रेनल द्विप्रिज्म प्रयोग : यह एक ऐसा उपकरण है जिसकी सहायता से एक वर्णी प्रकाश की सहायता से विवर्तन उत्पन्न करना है तथा उस प्रकाश की तरंग की तरंग दैर्ध्य का मान ज्ञात करना है।
अर्थात इस फ्रेनल द्विप्रिज्म की सहायता से मात्र एक प्रकाश स्रोत से ही प्रकाश का व्यतिकरण उत्पन्न किया जाता है , सामान्यतया प्रकाश का व्यतिकरण प्राप्त करने के लिए दो प्रकाश स्रोत की आवश्यकता होती है लेकिन इस प्रिज्म से एक ही स्रोत से प्रकाश का व्यतिकरण उत्पन्न किया जा सकता है।
अत: फ्रेनल द्विप्रिज्म ऐसा उपकरण है जिसकी सहायता से विवर्तन के कारण उत्पन्न फ्रिन्ज उत्पन्न की जा सकती है और इसके लिए केवल एक प्रकाश की आवश्यकता होती है और इसकी सहायता से स्रोत से उत्पन्न प्रकाश की तरंगों की तरंग दैर्ध्य ज्ञात की जा सकती है।
अत: फ्रेनल द्विप्रिज्म से जैसे ही एक प्रकाश स्रोत की प्रकाश तरंगें जाती है इस से दो कला सम्बद्ध स्रोत बन जाते है।
फ्रेनल द्विप्रिज्म : यह एक ऐसी प्रकाशीय युक्ति है जिसकी सहायता से प्रकाश के अपवर्तन द्वारा दो कला सम्बन्ध स्रोत प्राप्त किये जा सकते है।

फ्रेनल द्विप्रिज्म बनाने के लिए दो प्रिज्म के आधार-आधार को जोड़कर बनाया जाता है जिनका अपवर्तक कोण का मान बहुत अल्प 0.5 डिग्री हो। अत: इस फ्रेनल प्रिज्म में दो कोण आधे आधे डिग्री के होते है जो न्यूनकोण है तथा एक कोण 179 डिग्री का है जो अधिकोण है।
चित्रानुसार जब फ्रेनल द्विप्रिज्म के सामने एकवर्णी प्रकाश स्रोत रखा जाता है तो इसके कारण दो आभासी कला सम्बद्ध स्रोत प्राप्त होते है , चित्र में एकवर्णी स्रोत को S द्वारा व्यक्त किया है और जो आभासी कला सम्बन्ध स्रोत उत्पन्न हो रहे है उन्हें S1 और S2 द्वारा व्यक्त किया गया है।
अब जो तरंगे इन आभासी कला सम्बद्ध स्रोतों S1 और S2 से उत्पन्न हो रही है वे आपस में व्यतिकरण होते है और इस व्यतिकरण के कारण स्क्रीन पर फ्रिंज उत्पन्न होते है।
माना स्क्रीन MN और स्रोत S के मध्य की दूरी D है।
प्रिज्म का अपवर्तनांक μ है।
द्विप्रिज्म का अपवर्तक कोण का मान α है।
दोनों कला सम्बंद्ध स्रोतों अर्थात  S1 और S2 के मध्य की दूरी d है।
तो
फ्रिन्ज की चौड़ाई β निम्न होगी –

एकवर्णी प्रकाश की तरंग दैर्ध्य का मान निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जा सकता है  –

कला सम्बन्ध स्रोत और कला असम्बन्ध स्रोत ,सम्बद्ध ,असम्बद्ध (coherent and incoherent sources in hindi)

(coherent and incoherent sources in hindi) कला सम्बन्ध स्रोत और कला असम्बन्ध स्रोत : जब दो प्रकाश स्रोत समान आवृत्ति की तरंग उत्पन्न करे और दोनों तरंगों के मध्य समय के साथ समान कलान्तर रहे अर्थात कलांतर का मान समय के साथ परिवर्तित न हो तो ऐसे स्रोत जिनसे ये तरंगे उत्पन्न हो रही है उन्हें कला सम्बंध स्रोत कहते है।
यदि दो प्रकाश स्रोत असमान आवृति की तरंग उत्पन्न करे अर्थात दोनों स्रोत की तरंगों की आवृत्ति अलग अलग हो तथा दोनों तरंगों के मध्य कलान्तर का मान परिवर्तित हो अर्थात असमान कलांतर वाली तरंगे उत्पन्न करने वाले स्रोत कला असम्बन्ध स्रोत कहलाते है।
जब हम स्कैन करने वाली मशीन से उत्पन्न लाइट अर्थात लेजर से उत्पन्न प्रकाश को देखते है कि यह बहुत ही तीव्र प्रकृति का होता है , यह कला सम्बन्ध प्रकाश का उदाहरण है। कला सम्बंध प्रकाश में फोटोन की आवृत्ति का मान समान होता है और ये तरंगे समान कला में होते है इसलिए जिन स्रोतों से ये तरंगे उत्पन्न होती है उन्हें कला सम्बन्ध स्रोत कहते है।
अब गौर करते है एक फ़्लैश लाइट पर , फ़्लैश लाइट में प्रकाश इतना तीव्र नहीं होता है और इसमें उत्पन्न प्रकाश के फोटोन की आवृत्ति का मान समान नही होता है अर्थात अलग अलग होता है तथा तरंगे एक दूसरे के साथ समान कला में नही होते है , जिन स्रोत से इस प्रकार का प्रकाश उत्पन्न किया जाता है उन्हें कला असम्बन्ध स्रोत कहलाता है।
उदाहरण :

चित्र में एक उदाहरण दिखाया गया है जिसमे एक लेजर द्वारा उत्पन्न प्रकाश दिखाया गया है तथा दूसरी तरफ एक फ्लेशलाइट दिखाई गयी है , इसमें लेसर एक कला सम्बन्ध स्रोत है तथा फ्लेशलाइट एक कला असम्बन्ध स्रोत कहलाते है।
इसमें हम स्पष्ट रूप से देख सकते है कि फ्लेश लाइट का प्रकाश तीव्र है तथा यह अधिक दूरी तक गति करने में सक्षम होता है तथा फ्लेश लाइट में प्रकाश कम तीव्र होता है और यह अधिक दूरी तक गति नहीं कर सकता है यहाँ फ़्लैश लाइट स्रोत एक असम्बन्ध स्रोत कहलाता है।
लेज़र स्रोत में समान आवृत्ति की तरंगे उत्पन्न होती है तथा समय के साथ इन तरंगों में समान कलांतर पाया जाता है इसलिए इस स्रोत को कला सम्बद्ध स्रोत कहते है।
फ़्लैशलाइट स्रोत में असमान आवृत्ति की तरंगे उत्पन्न होती है और इनमें इन तरंगों में कलांतर परिवर्तित होता रहता है इसलिए इस स्रोत को कला असम्बद्ध स्रोत कहते है।