शक्ति की परिभाषा क्या है , इकाई , मात्रक , सूत्र , अवधारणा ,शक्ति किसे कहते है (what is power in hindi)

(what is power in hindi) शक्ति की परिभाषा क्या है , इकाई , मात्रक , सूत्र , अवधारणा ,शक्ति किसे कहते है : किसी वस्तु पर किया गया कार्य उस वस्तु पर आरोपित बल द्वारा विस्थापन उत्पन्न करने को कहा जाता है। किये गये कार्य में समय की कोई भूमिका नहीं है अर्थात जब हम कार्य की गणना करते है तो समय की उसमे कोई भागीदारी नहीं होती है।

जैसे जब एक आदमी किसी पहाड़ पर चढ़ता है और दूसरा आदमी उतनी ही नीचे ऊपर से उतरता है तो हम देखते है कि हो सकता है की दोनों के द्वारा किया गया कार्य का मान समान हो लेकिन दोनों समान समय ले यह आवश्यक नहीं है अर्थात उतरने वाले व्यक्ति को कम समय लगता है तथा चढ़ने वाले व्यक्ति को अधिक समय लगता है।

शक्ति की परिभाषा (definition of power)

कार्य करने की दर को शक्ति कहते है , अर्थात कोई व्यक्ति इकाई समय में कितना कार्य करता है उस इकाई समय में किया गया कार्य का मान उस व्यक्ति की शक्ति कहलाती है।
माना कोई व्यक्ति t समय में W कार्य करता है तो उस व्यक्ति की शक्ति का मान निम्न होगा –
शक्ति (power) = w/t
अत: कार्य व समय के अनुपात को शक्ति कहते है।
शक्ति का SI मात्रक “वाट” (watt) अथवा “जूल/सेकंड” होता है।
किसी मशीन द्वारा स्थानान्तरित की गति शक्ति को ‘हॉर्स पॉवर’ अर्थात अश्वशक्ति के रूप में भी व्यक्त करते है।
1 अश्वशक्ति = 750 वाट

शक्ति का दूसरा सूत्र

शक्ति का सूत्र = कार्य/समय
चूँकि कार्य = बल x विस्थापन
कार्य का मान शक्ति के सूत्र में रखने पर
शक्ति = (बल x विस्थापन)/समय
चूँकि हम जानते है कि –
विस्थापन/समय = वेग
यह मान शक्ति के सूत्र में रखने पर
शक्ति = बल x वेग
यह शक्ति का ही सूत्र ही अर्थात शक्ति का मान इसके द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है जब जरुरत हो।

यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम (law of conservation of mechanical energy in hindi)

(law of conservation of mechanical energy in hindi) यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम : यान्त्रिक ऊर्जा किसी भी वस्तु की इसकी गति अथवा स्थिति के कारण कार्य करने की क्षमता होती है।

यांत्रिक ऊर्जा का मान इन दो ऊर्जाओं के योग के बराबर होती है –

1. स्थितिज ऊर्जा

2. गतिज ऊर्जा

1. स्थितिज ऊर्जा  : किसी भी वस्तु की इसकी स्थिति या विन्यास के कारण कार्य करने की क्षमता को स्थितिज ऊर्जा कहते है।  उदाहरण : जब किसी संपीडित या प्रवर्धित स्प्रिंग को छोड़ा जाता है तो यह कार्य करती है यह कार्य स्प्रिंग में इसकी स्थिति के कारण इसमें निहित स्थितिज ऊर्जा के कारण संपन्न हो पाता है।

2. गतिज ऊर्जा : किसी भी वस्तु की गति के कारण इसमें एक ऊर्जा निहित होती है जिसके कारण यह कार्य कर सकती है , वस्तु में गति के कारण निहित ऊर्जा को गतिज ऊर्जा कहते है।  उदाहरण : हवा की गतिज ऊर्जा के कारण पवन चक्की की ब्लेड्स घुमती है जिससे बिजली उत्पन्न हो पाती है।

यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम (law of conservation of mechanical energy)

घर्षण बल की अनुपस्थिति में अर्थात संरक्षी बल के प्रभाव में किसी भी पिण्ड या निकाय की कुल यांत्रिक ऊर्जा नियत रहती है या संरक्षित रहती है।
यहाँ यांत्रिक ऊर्जा से अभिप्राय है गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा का योग।
अत: किसी पिण्ड या निकाय की गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा का योग नियत बना रहता है इसे ही यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण नियम कहते है।
ऊर्जा संरक्षण नियम के अनुसार “ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है , इसे केवल एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। “
अत: संरक्षी बलों की उपस्थिति में किसी निकाय की कुल ऊर्जा अर्थात यांत्रिक ऊर्जा (गतिज+स्थितिज ऊर्जा) नियत रहती है इसे यान्त्रिक ऊर्जा का संरक्षण का नियम कहते है।
गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा = कुल ऊर्जा (नियत)
अत: जब किसी वस्तु की गतिज ऊर्जा में वृद्धि होती है तो इसकी स्थितिज ऊर्जा कम हो जाती है और जब स्थितिज ऊर्जा अधिक होती है गतिज ऊर्जा का मान कम हो जाता है।

साम्यावस्था किसे कहते है , स्थायी , अस्थायी व उदासीन सन्तुलन परिभाषा क्या है (equilibrium positions in hindi)

(equilibrium positions in hindi) साम्यावस्था किसे कहते है , स्थायी , अस्थायी व उदासीन सन्तुलन परिभाषा क्या है : जब किसी वस्तु पर कुल बल का मान शून्य हो तो वस्तु की इस स्थिति को साम्यावस्था (साम्य अवस्था) कहते है। ऐसा तब भी हो सकता है जब किसी वस्तु पर बहुत सारे बल कार्य कर रहे हो लेकिन वो इस प्रकार से कार्यरत हो कि वो एक दुसरे को निरस्त कर दे और वस्तु पर कुल बल का मान शून्य हो ऐसी स्थिति को भी साम्यावस्था में माना जाता है।

किसी स्प्रिंग की साम्यावस्था वह अवस्था होती है जब उस पर कोई प्रत्यानयन बल कार्य नहीं कर रहा हो अर्थात उसको न तो संपीडित किया हो और न ही उसे खिंचा गया हो।

  • स्थायी साम्यावस्था (stable equilibrium)
  • अस्थायी साम्यावस्था (unstable equilibrium)
  • उदासीन साम्यावस्था (neutral equilibrium)
अब हम इन तीनो को विस्तार से अध्ययन करते है –

स्थायी साम्यावस्था (stable equilibrium)

जब किसी वस्तु को इसकी साम्यावस्था से थोडा विस्थापित किया जाए और वस्तु पर लगने वाला बल इसे पुन: वापस इसकी साम्यावस्था में ले आता है तो ऐसी साम्यावस्था को स्थायी संतुलन या साम्यावस्था कहते है। इस स्थिति में वस्तु की ऊर्जा न्यूनतम होती है।

अस्थायी साम्यावस्था (unstable equilibrium)

जब किसी पिण्ड की इसकी साम्यावस्था से थोडा सा विस्थापित किया जाए और वस्तु पुन: साम्यावस्था बिंदु पर न आकर इससे दूर जाने का प्रयास करे तो ऐसे साम्यावस्था को अस्थायी संतुलन या साम्यावस्था कहते है , इस स्थिति में पिण्ड की या वस्तु की ऊर्जा अधिकतम होती है।

उदासीन साम्यावस्था (neutral equilibrium)

जब किसी पिण्ड को इसकी साम्यावस्था से विस्थापित किया जाए और वस्तु पर नयी स्थिति पर भी किसी प्रकार का कोई बल कार्य न करे अर्थात वस्तु नयी स्थिति पर भी संतुलित अवस्था में रहे वस्तु की ऐसी अवस्था को उदासीन साम्यावस्था कहते है।  इस स्थिति में वस्तु की स्थितिज ऊर्जा पर कोई प्रभाव नही पड़ता है अर्थात समान या नियत बनी रहती है।

उदाहरण (examples)

उदाहरण के लिए चित्र को ध्यान से देखिये यहाँ स्थिति (a) को स्थायी साम्यावस्था कहते है क्यूंकि थोडा सा विस्थापन करने पर वस्तु पुन: मूल अवस्था में आ जाती है।
स्थिति (b) को उदासीन साम्यावस्था कहा जाता है क्यूंकि वस्तु को विस्थापित करने पर यह न तो मूल अवस्था में जाता है और न इससे दूर जाता है यह अपनी नयी अवस्था में बना रहा है।
स्थिति (c) को अस्थायी साम्यावस्था कहते है क्यूंकि जब वस्तु को विस्थापित किया जाता है तो वस्तु मूल अवस्था से दूर जाता है और वापस मूल अवस्था में नहीं आता है।

स्थितिज ऊर्जा : प्रत्यास्थ ,गुरुत्वाकर्षण (गुरुत्वीय), विद्युत स्थितिज उर्जा (potential energy in hindi)

(potential energy in hindi) स्थितिज ऊर्जा क्या है , परिभाषा , सूत्र , प्रकार , स्थितिज ऊर्जा के उदाहरण : प्रत्येक वस्तु में इसकी स्थिति के कारण एक ऊर्जा निहित रहती है , वस्तु में इसकी स्थिति के कारण निहित इस ऊर्जा को स्थितिज ऊर्जा कहते है। जब कोई वस्तु विराम अवस्था में होती है तो इसमें स्थितिज ऊर्जा विद्यमान रहती है। जैसे किसी झील में भरा हुआ पानी , ड्रम में भरा हुआ तेल , कोयला तथा टेबल पर रखी किताब में स्थितिज ऊर्जा विद्यमान रहती है। जब भी जरुरत पड़ती है इस स्थितिज ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है।
स्थितिज ऊर्जा एक अदिश राशि है अर्थात इस ऊर्जा के लिए केवल परिमाण को दर्शाया जा सकता है लेकिन इसकी दिशा को परिभाषित नही किया जा सकता है।
उदाहरण : किसी पहाड़ी पर रखे पत्थर में इसकी स्थिति के कारण इसमें स्थितिज ऊर्जा निहित रहती है , पत्थर जितनी ऊपर होता है उसमे इस स्थितिज का मान उतना ही होता है , जब एक ही पत्थर को अलग अलग ऊंचाई से किसी चीज पर गिराई जाए या लुढ़काया जाए तो अधिक ऊंचाई वाला पत्थर अधिक घातक होता है क्यूंकि अधिक ऊँचाई पर स्थित पत्थर पर इसकी ऊर्जा अधिक होती है।
जब पत्थर को लुढ़काया जाता है तो पत्थर में निहित स्थितिज ऊर्जा , गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है अत: किसी पिण्ड की स्थितिज ऊर्जा अधिक होगी तो इसकी गतिज ऊर्जा का मान भी अधिक होगा जब इसको लुढ़काया जाए।

इसी प्रकार तीर को धनुष में इसकी स्थिति के कारण इसमें स्थितिज ऊर्जा निहित रहती है , धनुष को जब छोड़ा जाता है तो इसमें विद्यमान स्थितिज ऊर्जा , गतिज उर्जा में परिवर्तित होने लगती है।
धनुष को जितना अधिक खिंचा जाए इसकी स्थितिज ऊर्जा उतनी ही अधिक होती है और जब छोड़ा जायेगा तो उतनी अधिक मात्रा में गतिज ऊर्जा होगी इसलिए जोर से खिंचकर छोड़ने से तीर अधिक दूर जाकर गिरता है।

स्थितिज ऊर्जा के प्रकार (types of potential energy)

स्थितिज उर्जा को तीन भागों में बांटा गया है –
1. प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा (Elastic Potential Energy)
2. गुरुत्वाकर्षण (गुरुत्वीय) स्थितिज ऊर्जा (Gravitational Potential Energy)
3. विद्युत स्थितिज उर्जा (electrical Potential Energy)

अब हम यहाँ इन तीनो प्रकार की स्थितिज उर्जा को विस्तार से अध्ययन करते है –

1. प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा (Elastic Potential Energy)
कोई भी वस्तु जिसमे प्रत्यास्थ गुण पाया जाता है उसमे इस प्रकार की स्थितिज ऊर्जा पायी जाती है इसका सबसे अच्छा उदाहरण है स्प्रिंग या रबर।
ये सभी वस्तुएँ हुक के नियम का पालन करती है।
जब प्रत्यास्थ वस्तु को खिंचा जाता है या दबाया जाता तो इसमें स्थितिज ऊर्जा के रूप में ऊर्जा संचित हो जाती है। किसी प्रत्यास्थ वस्तु (स्प्रिंग) पर जितना अधिक बल लगाया जाता है उसमे संपीडन उतना ही अधिक उत्पन्न होता है अत: हुक का नियम के अनुसार स्प्रिंग में उत्पन्न संपीडन का मान आरोपित बल के समानुपाती होता है।
हुक के नियम के अनुसार –
F = kx
यहाँ F = आरोपित बल , x = संपीडन या प्रवर्धन , k = समानुपाती नियतांक
जब कोई वस्तु साम्य अवस्था में होती है तो इसमें निहित स्थितिज ऊर्जा का मान शून्य होता है।
जब वस्तु साम्यावस्था में न हो तो वस्तु में संपीडन या प्रवर्धन के कारण निहित स्थितिज ऊर्जा का मान –
W = 1/2 (kx2)

2. गुरुत्वाकर्षण (गुरुत्वीय) स्थितिज ऊर्जा (Gravitational Potential Energy)

ब्रह्माण्ड में स्थित तो पिण्ड आपस एक दुसरे पर आकर्षण का बल लगाते है , इस आकर्षण बल को गुरुत्वाकर्षण बल या गुरुत्वीय बल कहा जाता है।
एक दुसर पर गुरुत्वीय बल लगा रहे दो पिण्डों में इनकी सापेक्ष स्थिति के कारण निकाय में संचित ऊर्जा को गुरुत्वाकर्षण स्थितिज ऊर्जा कहते है। पिण्ड की यह स्थितिज ऊर्जा का मान उनके द्रव्यमान और इनकी ऊंचाई पर निर्भर करता है।
माना दो पिण्ड है जिनका द्रव्यमान m1 और m2 है जो एक दुसरे से r दूरी पर रखे है तो इनमे गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का मान निम्न होगा –
U = -Gm1m2/r
यहाँ G = सार्वत्रिक गुरुत्वीय नियतांक
किसी वस्तु का द्रव्यमान जितना अधिक होता है उनमे निहित गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का मान उतना ही अधिक होता है इसी प्रकार जो पिण्ड जितनी ऊंचाई पर होते है उनमे संचित गुरुत्वाकर्षण स्थितिज ऊर्जा उतनी ही अधिक होती है।

3. विद्युत स्थितिज उर्जा (electrical Potential Energy)

हमने स्थिर वैधुतिकी में पढ़ा था की आवेशित कण एक दुसरे को आकर्षित या प्रतिकर्षित करते है।  आवेशों की उनकी स्थिति के कारण उनमे एक ऊर्जा संचित रहती है जिसे आवेशों की स्थितिज ऊर्जा कहते है।
माना दो आवेश q1 और q2 है जो एक दुसरे से r दूरी पर स्थित है तो उनमे संचित स्थितिज ऊर्जा का मान निम्न होगा –

कार्य – ऊर्जा प्रमेय (Work energy theorem in hindi)

(Work energy theorem in hindi) कार्य – ऊर्जा प्रमेय : कार्य की परिभाषा हमारी दैनिक जीवन की परिभाषा से अलग होती है , जैसे यदि कोई व्यक्ति दो घंटे से बैठे हुए किताब पढ़ रहा है तो दैनिक जीवन में इसे कहते है कि यह दो घन्टे से पढने का कार्य कर रहा है लेकिन भौतिक विज्ञान में व्यक्ति के द्वारा किया गया कार्य शून्य होगा।
भौतिक विज्ञान में जब तक किसी बल द्वारा उसमे विस्थापन का मान शून्य हो तब तक किया गया कार्य का मान भी शून्य होगा , यहाँ किताब पढ़ रहा व्यक्ति अपनी स्थिति में परिवर्तन नहीं करता है अर्थात विस्थापन शून्य रहता है इसलिए यहाँ किया गया कार्य शून्य होगा।
कार्य की परिभाषा : किसी बल द्वारा वस्तु में उत्पन्न विस्थापन तथा आरोपित बल के गुणनफल को कार्य कहा जाता है।
माना एक वस्तु पर F बल आरोपित हो रहा है जिससे वस्तु में s विस्थापन हो रहा है तो बल द्वारा वस्तु पर किया गया कार्य (w) = बल x विस्थापन
W = F x S

कार्य – ऊर्जा प्रमेय (Work energy theorem)

जैसा की हमने ऊपर पढ़ा की जब किसी वस्तु पर बल आरोपित किया जाता है तो उसमे विस्थापन उत्पन्न हो जाता है और हम जानते है कि जब वस्तु गति कर रही हो तो उसमे गतिज ऊर्जा विद्यमान रहती है।
अत: बल द्वारा वस्तु पर कार्य किया जा रहा है क्यूंकि बल आरोपित करने से इसमें विस्थापन उत्पन्न हो रहा है तथा विस्थापन हो रहा है इसका मतलब है कि वस्तु गति कर रही है और गतिशील वस्तु में गतिज ऊर्जा विद्यमान रहती है अत: स्वभाविक रूप से इस कार्य और गतिज ऊर्जा में कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य पाया जायेगा।
वस्तु के कार्य और ऊर्जा में सम्बन्ध को ही कार्य-ऊर्जा प्रमेय कहा जाता है।
“वस्तु पर आरोपित सभी बलों द्वारा किया गया कार्य या योग वस्तु की गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। “
वस्तु पर किया गया कार्य का मान वस्तु की गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है इसे ही कार्य-ऊर्जा प्रमेय कहते है।
माना किसी वस्तु पर बल आरोपित करने से इस बल द्वारा वस्तु पर किया गया कार्य का मान W हो तथा इस बल द्वारा या किये गए कार्य के कारण वस्तु की गतिज ऊर्जा में ΔK परिवर्तन हो जाता है तो कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार इनमे निम्न संबंध होगा –
यहाँ W = जूल में किये गए कार्य का मान
ΔK = पिण्ड की गतिज ऊर्जा में परिवर्तन का मान।

यांत्रिक ऊर्जा की परिभाषा क्या है , उदाहरण , सूत्र , प्रकार (mechanical energy in hindi)

(mechanical energy in hindi) यांत्रिक ऊर्जा की परिभाषा क्या है , उदाहरण , सूत्र , प्रकार : हमने यह शब्द भौतिक विज्ञान में बहुत सुना है और उपयोग भी किया होगा लेकिन यह हमेशा गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा के रूप में भ्रमित करता है हम यहाँ इसको सरल शब्दों में विस्तार से अध्ययन करेंगे और इसकी परिभाषा , उदाहरण , प्रकार आदि सभी को पढ़ेंगे।
सबसे पहले हम इसे समझने के लिए पढ़ते है कि कार्य क्या होता है ?
कार्य (work) : जब किसी वस्तु पर बल आरोपित किया जाता है तो वस्तु में विस्थापन उत्पन्न हो जाता है या विकृति उत्पन्न हो जाती है या अन्य कोई परिवर्तन हो जाता है , बल द्वारा वस्तु पर इस परिवर्तन को किया गया कार्य कहते है।
उदाहरण : जब हम किसी दरवाजे पर बल लगाते है तो यह खुल जाता है , लेकिन क्या आप बता सकते है कि हमने दरवाजे पर कौनसा बल आरोपित किया है ? यहाँ हमें यांत्रिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

यांत्रिक ऊर्जा (mechanical energy)

कार्य करने के लिए किसी वस्तु में विद्यमान गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा के योग को यांत्रिक ऊर्जा कहते है। अगर यान्त्रिक ऊर्जा को सरल शब्दों में कहे तो किसी वस्तु में विद्यमान इसकी गति और स्थिति के कारण ऊर्जा को वस्तु की यांत्रिक ऊर्जा कहते है।
यांत्रिक ऊर्जा (Total Mechanical energy) = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा

यांत्रिक ऊर्जा का उदाहरण (examples of Mechanical energy)

जब हम गेट को धकेलते है तो यह खुल जाता है , यहाँ मैंने अपने अन्दर निहित स्थितिज ऊर्जा को काम में लिया और अपने अन्दर निहित इस ऊर्जा के कारण अपने हाथ को उठाया और गेट को धक्का दिया , मैंने गेट को धक्का देने के लिए भी अपने हाथ से गतिज ऊर्जा का प्रयोग किया।
मेरे द्वारा गेट को स्थितिज ऊर्जा व गतिज ऊर्जा दोनों स्थानान्तरित की गयी जिसके कारण यह गेट खुल जाता है अर्थात मेरे द्वारा गेट को स्थानान्तरित की गयी गतिज व स्थितिज ऊर्जा यान्त्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है अत: हम कहते है कि यांत्रिक ऊर्जा , गतिज उर्जा व स्थितिज ऊर्जा का योग होता है। और इस यांत्रिक ऊर्जा के कारण गेट खुल जाता है।

गतिज ऊर्जा की परिभाषा क्या है , सूत्र , समीकरण , समीकरण , मात्रक , विमा (kinetic energy in hindi)

(kinetic energy in hindi) गतिज ऊर्जा की परिभाषा क्या है , सूत्र , समीकरण , समीकरण , मात्रक , विमा : यह ऊर्जा के एक रूप होता है जो पिण्ड में उसकी गति के कारण निहित रहती है। जब कोई कण या पिण्ड गति करता है या गति कोणीय वेग , रेखीय वेग कुछ भी हो सकता है , इस गति के कारण पिण्ड में एक ऊर्जा निहित रहती है , पिण्ड में उसकी गति के कारण निहित इस ऊर्जा को गतिज ऊर्जा कहते है।
जब कोई पिण्ड विराम अवस्था में रहता है तो इसे गति करवाने के लिए बाह्य बल द्वारा इस पर कार्य करना पड़ता है , गति करवाने के लिए पिण्ड पर किया गया यह कार्य इसमें ऊर्जा के रूप में निहित हो जाती है इसे गतिज उर्जा कहा जाता है।
किसी पिण्ड की गतिज ऊर्जा का मान पिण्ड की गति और इसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है , पिण्ड की गति स्थानान्तरीय गति या घूर्णन गति या कम्पन्न गति कुछ भी हो सकती है अर्थात प्रत्येक गति के कारण वस्तु में एक ऊर्जा निहित होती है जिसको गतिज ऊर्जा कहते है।
यदि किसी पिण्ड में इसकी गति के कारण E मान की गतिज ऊर्जा निहित है तो इस पिण्ड की गति को रोकने के लिए E कार्य ऋणात्मक करना पड़ता है।

गतिज ऊर्जा का सूत्र (formula of kinetic energy)

माना एक वस्तु V वेग से गति कर रही है और इसका द्रव्यमान m है तो इस वस्तु की गति के कारण इसमें निहित गतिज ऊर्जा का मान इसके द्रव्यमान (m) के आधे और वेग (v) के वर्ग के गुणनफल के बराबर होता है।
पिण्ड की गतिज उर्जा को K द्वारा व्यक्त किया जाता है –
यदि कोई वस्तु घूर्णन गति कर रही है और इस वस्तु का जड़त्व आघूर्ण का मान I है तथा इसका कोणीय वेग w है तो इस घूर्णन गति कर रहे वस्तु की गतिज ऊर्जा का मान इसके जडत्व आघूर्ण के आधे और कोणीय वेग के वर्ग के गुणनफल के बराबर होती है।
घूर्णन गति कर रहे वस्तु की गतिज ऊर्जा = 1/22

ऊर्जा संरक्षण का नियम सिद्धांत : ऊर्जा संरक्षण का नियम किसने दिया (conservation of energy in hindi)

(conservation of energy in hindi) ऊर्जा संरक्षण का नियम सिद्धांत : ऊर्जा संरक्षण का नियम किसने दिया : इस नियम के अनुसार ऊर्जा एक संरक्षित राशि है अर्थात ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है , इसे केवल एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है , इसे ही ऊर्जा संरक्षण का नियम कहते है।
संरक्षण शब्द का अभिप्राय होता है एक ऐसे राशि जिसका मान परिवर्तित नही किया जा सकता है। किसी भी निकाय की कुल ऊर्जा का मान नियत रहता है अर्थात किसी घटना के पहले व घटना के बाद निकाय की कुल ऊर्जा का मान नियत रहता है। हालांकि ऊर्जा के एक रूप को दुसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है लेकिन निकाय की कुल ऊर्जा संरक्षित बनी रहती है।
ऊर्जा को एक रूप से दुसरे रूप में निम्न प्रकार बदला जा सकता है –

  • विद्युत ऊर्जा को मोटर की सहायता से यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है।
  • रासायनिक ऊर्जा को सेल की सहायता से विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है।
  • हीटर की सहायता से वैद्युत ऊर्जा को ऊष्मा ऊर्जा में बदला जा सकता है।
  • जनरेटर की सहायता से यान्त्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा के रूप में बदला जा सकता है।
  • फोटोसेल की मदद से प्रकाश उर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है।
“किसी विलगित निकाय की कुल ऊर्जा का मान नियत रहता है अर्थात किसी विलगित निकाय की कुल ऊर्जा संरक्षित रहता है , ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है , ऊर्जा को केवल एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है इसे ही ऊर्जा का संरक्षण का नियम या सिद्धांत कहलाता है। “
सबसे पहले इस प्रकार की ऊर्जा गतिज ऊर्जा के रूप में पहचानी गयी थी अर्थात यह गुण सबसे पहले गतिज उर्जा के लिए देखा गया था। कुछ प्रत्यास्थ टक्करों में टक्कर से पहले व टक्कर के बाद कणों की गतिज उर्जा का योग समान पाया गया।
इसी प्रकार एक पेंडुलम की गति में भी ऊर्जा का मान संरक्षित रहता है , जब पेंडुलम ऊपर की तरफ गति करता है तो गतिज ऊर्जा , स्थितिज ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होती है और जब पेंडुलम ऊपर जाकर रुक जाता है तो इस स्थिति में गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है और सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा , स्थितिज ऊर्जा के रूप में संरक्षित हो जाती है , जब पेंडुलम निचे की तरफ आने लगता है तो स्थितिज ऊर्जा पुन: गतिज ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होने लगती है और इस प्रकार निकाय की कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है केवल ऊर्जा एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है।

ऊर्जा संरक्षण का नियम किसने दिया

1841 में Julius Robert Mayer (जूलियस रॉबर्ट मेयर) ने ऊर्जा संरक्षण के लिए सबसे पहले अपना सिद्धांत दिया दिया या नियम के बारे में विस्तार से बताया , इसलिए जूलियस रॉबर्ट मेयर को ऊर्जा संरक्षण का जनक कहा जाता है या यह कहा जाता है कि यह नियम इन्होने दिया। 
इन्होने उष्मागतिकी का आविष्कार किया या खोज की और सबसे पहले अपने ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम में यह बताया था की ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है , यही ऊष्मा संरक्षण का नियम है इसलिए इनको ऊर्जा संरक्षण के नियम का आविष्कारक कहा जाता है।

ऊर्जा की परिभाषा क्या है , उदाहरण , प्रकार , मात्रक , इकाई , विमा (what is energy in hindi)

(what is energy in hindi) ऊर्जा की परिभाषा क्या है , उदाहरण , प्रकार , मात्रक , इकाई , विमा : किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता को उस वस्तु की ऊर्जा कहते है।
ऊर्जा भौतिक विज्ञान में बहुत अधिक उपयोग में लाया जाने वाले शब्द है जो किसी वस्तु का वह गुण होता है जिसे किसी एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित करके किसी कार्य को किया जाता है।
ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है अर्थात ऊष्मा संरक्षित रहती है या संरक्षण के नियम की पालना करती है।

ऊर्जा का मात्रक (unit of energy)

ऊर्जा का मापन ‘जूल’ में किया जाता है अर्थात उर्जा का मात्रक जूल होता है।  ऊर्जा के मापन में जूल शब्द महान भौतिकविद जेम्स प्रेस्कॉट जौले (James Prescott Joule) के नाम पर दिया गया था जिन्होंने इस क्षेत्र में काफी योगदान दिया था।

ऊर्जा के विभिन्न रूप

ऊर्जा कई रूप में हो सकती है जैसे उष्मीय ऊर्जा , प्रकाश ऊर्जा , ध्वनि ऊर्जा , रासायनिक उर्जा , यान्त्रिक उर्जा आदि।
किसी एक वस्तु द्वारा दूसरी वस्तु पर कार करने की क्षमता को ऊर्जा कहा जाता है।
ऊर्जा दो प्रकार की हो सकती है –
1. गतिज ऊर्जा
2. स्थितिज ऊर्जा
1. गतिज ऊर्जा : किसी वस्तु में उसकी गति के कारण उसमे एक ऊर्जा निहित होती है उस ऊर्जा को गतिज ऊर्जा कहते है अर्थात वस्तु की गति के कारण गतिज ऊर्जा होती है।
जब किसी पिण्ड पर बल आरोपित किया जाता है तो बल के कारण वस्तु गति करना शुरू कर देती है अर्थात हमारे द्वारा लगाया गया बल या कार्य वस्तु में स्थानांतरित हो जाता है और इस कार्य के कारण वस्तु गति करने लगती है , जिसके कारण वस्तु में गतिज ऊर्जा निहित हो जाती है।
m द्रव्यमान का पिण्ड यदि v वेग से गति कर रहा हो तो इसमें निहित गतिज ऊर्जा का मान –
2. स्थितिज ऊर्जा :
किसी वस्तु में भविष्य में कार्य करने के लिए एक प्रकार की ऊर्जा निहित रहती है , इस ऊर्जा को स्थितिज उर्जा कहते है।
यह ऊर्जा वस्तु में संचित रहती है जिसका उपयोग वस्तु कार्य करने के लिए कर सकती है।

केन्द्रीय बल या केंद्रीय बल क्या है , परिभाषा , सूत्र , उदाहरण (central force in hindi physics)

(central force in hindi physics) केन्द्रीय बल या केंद्रीय बल क्या है , परिभाषा , सूत्र , उदाहरण : वह बल जिसकी क्रिया रेखा हमेशा किसी स्थिर बिंदु या केंद्र से होकर गुजरती है ऐसे बलों को केन्द्रीय बल कहते है।  इन बलों का का मान केवल केंद्र से या स्थिर बिंदु से दूरी पर निर्भर करता है।
यह बल केंद्र बिंदु व वस्तु को मिलाने वाली रेखा के साथ लगता है अर्थात उस रेखा पर कार्यरत होता है।
दुसरे शब्दों में कहे तो बल जिनकी स्थितिज ऊर्जा का मान स्रोत (स्थिर बिन्दु) से दूरी पर निर्भर करता है तथा ये त्रिज्यात बिंदु के रूप में होते है।
F = F(r)
यहाँ  F(r) , दूरी r का फलन है।
इन बलों के लिए स्थितिज ऊर्जा दूरी r का एक फलन होती है –

गुरुत्वाकर्षण बल और स्थिर विद्युत बल केन्द्रीय बल के उदाहरण है , ये दोनों बल केंद्र से दूरी पर निर्भर करते है तथा इन बलों की स्थितिज ऊर्जा का मान भी दूरी पर निर्भर करता है।
इन दोनों बलों के लिए स्थितिज ऊर्जा निम्न प्रकार निर्भर रहती है –

केन्द्रीय बल के उदाहरण : गुरुत्वीय बल , स्थिर विद्युत बल ,अभिकेन्द्रीय बल , प्रत्यानयन बल आदि केंद्रीय बल के उदाहरण है।
केन्द्रीय बल के गुण निम्न है –
1. ये बल सर्वव्यापी होते है अर्थात प्रत्येक स्थान पर समान रूप से होती है और हर जगह पाए जाते है।
2. ये एक समीकरण के रूप में व्यक्त किये जा सकते है इसलिए इनके साथ व्यवहार अच्छा होता है अर्थात आसानी से समस्याएँ हल की जा सकती है।
3. केन्द्रीय बल केवल r का फलन होता है।
4. ये बल स्थिर बिंदु से दूर या उसकी तरफ कार्यरत होते है।
5. ये बल संरक्षि प्रकृति के होते है अर्थात इन पर संरक्षण का नियम लागू होता है।
6. जब कोई कण केन्द्रिय बल के प्रभाव में गति कर रहा हो तो उस कण में कोणीय संवेग व यांत्रिक ऊर्जा का मान संरक्षित रहते है।
7. यदि किसी कण पर केन्द्रीय बल कार्यरत है तो इसका अभिप्राय है कि उस कण की गति एक तल के रूप हो रही है।