जाति किसे कहते हैं | हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था की परिभाषा क्या है अर्थ कितनी है caste in hindi meaning

By   January 30, 2021

caste in hindi meaning and definition in hindu religion जाति किसे कहते हैं | हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था की परिभाषा क्या है अर्थ कितनी है ?

हिन्दू सामाजिक संस्थाएं (Hindu Social Institutions)
रूप और कार्य दोनों ही दृष्टियों से हिन्दू सामाजिक संस्थाएं प्रकृति में नितांत विशिष्ट हैं। ये सामाजिक संस्थाएं निर्धारित प्रतिमानों और धार्मिक आदेशों के अनुसार आदर्श रूप से कार्य करती हैं। आइए ऐसी कुछ संस्थाओं की समीक्षा करें।

 जाति (Caste)
जाति एक वंशानुगत सामाजिक संस्था है जो अंतर्विवाह, श्रेणीबद्धता, व्यवसायगत विशेषज्ञता और शुद्धि-अशुद्धि के सिद्धांत पर आधारित हैं। खान-पान में पूरी सहभागिता केवल जाति के अंदर मिलती है। अंतरजातीय विवाह पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध देखने को मिलते हैं। ऊंची जातियों का निम्न जाति के लोगों के साथ खान-पान, विवाह, यौन संबंधों का न रखना और छुआछत आदि के रूप में ये प्रतिबंध स्पष्ट रूप से व्यक्त होते हैं। इसका प्रत्यक्ष और परोक्ष अर्थ यही है कि निम्न जाति के लोग अशुद्ध होते हैं और उनके छूने मात्र से ऊंची जाति के लोग अशुद्ध हो जाएंगे। इसलिए ऊंची जाति के लोगों को फिर से शुद्ध करने के लिए अनेक निर्धारित अनुष्ठान हैं। वास्तव में, पारंपरिक हिन्दू जीवन, जाति प्रथा में श्रेणीबद्ध व्यवस्था के रूप में व्यवस्थित है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह एक आरोपित प्रास्थिति समूह है। (भारत में जाति प्रथा पर और अधिक जानकारी के लिए आप ई.एस.ओ.-12 का खंड 5 देख सकते हैं)

हिन्दू धर्म का राजनीतिकरण (Politicisation of Hinduism)
हिन्दू धर्म में दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णुता और सत्कार की परंपरा हमेशा से रही है। सहिष्णुता और सत्कार के इन्हीं तत्वों ने भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित करने का मार्ग प्रशस्त किया। यह महत्वपूर्ण है कि उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दू धर्म में वेदों की ओर वापसी और पुनर्जागरण की प्रवृत्तियाँ काम कर रही थीं, और कभी-कभार भारत राष्ट्रवाद को भी हिन्दू मुहावरे में अभिव्यक्ति मिली।

सत्य साई बाबा, समकालीन हिन्दू धर्म के सुप्रसिद्ध देव संत लेकिन भारत में अंग्रेजी राज के दौरान पश्चिमी सभ्यता में पले कुलीनों का एक वर्ग उभरा जो ‘‘(अपने) देश और उसकी परंपरा में न होकर भी स्वाधीनता, जनतंत्र, समतावाद और धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध था। इस कुलीन वर्ग ने ही न केवल भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया, बल्कि पूरे मन से मनुष्य की समानता के सिद्धांत को स्थापित करने का प्रयास भी किया (श्रीनिवास और शाह 1972: 364)।

संविधान में भारत को एक ‘‘प्रभुसत्ता संपन्न धर्मनिरपेक्ष समाजवादी जनतांत्रिक गणराज्य‘‘ घोषित किया गया है, राज्य और समाज के जनतांत्रिक ढंग से कार्य करने की प्रक्रिया में हमारे धार्मिक जीवन का हाल के वर्षों में अत्यधिक राजनीतिकरण हुआ है। इस तरह के राजनीतिकरण की प्रक्रिया में हमारे राज्य और समाज के धर्मनिरपेक्ष आधार को खतरा पैदा हो गया है। स्वांत्रयोत्तर भारत में राजनीतिकरण एक व्यापक प्रक्रिया बनकर उभरी है। धर्म भी इस प्रतिक्रिया से अछूता नहीं है। हाल के वर्षों में हिन्दू धर्म का कुछ राजनीतिक उद्देश्य से राजनीतिकरण कर दिया गया है। सामान्यतयः हिन्दुओं के हितों की रक्षा और एक हिन्दू राष्ट्र का निर्माण हिन्दू धर्म के राजनीतिकरण की इस प्रक्रिया के प्रमुख उद्देश्य रहे हैं।

हिन्दू धर्म के राजनीतिकरण पर चर्चा करते समय, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अग्रणी संगठनों की व्यापक चर्चा अनिवार्य है। यहाँ हम संक्षेप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्भव और उसकी गतिविधियों की जानकारी देंगे। संघ की स्थापना 1925-26 में महाराष्ट्र में डॉ. के.बी. हेडगेवार ने की थी। संघ राजनीतिक स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), भारतीय मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद जैसे अपने अग्रणी संगठनों के माध्यम से कार्य करता है। हाल के वर्षों में संघ विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) जैसे व्यापकतर संगठनों का इस्तेमाल करता रहा है। समय बीतने के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक सुनिश्चित विचारधारा और संगठनात्मक शक्ति बना ली है। संघ के दूसरे गुरु, गुरु गोलवलकर ने संघ की जो विचारधारा रखी वह स्पष्ट रूप से हिन्दू संघ देशभक्ति की प्रतीक है। हिन्दु राष्ट्र का निर्माण और हिन्दू राष्ट्र को चहुंमुखी गौरव प्रदान करना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्य उद्देश्य हैं, गोलवलकर जी के अनुसारः

हिन्दुस्तान की गैर-हिन्दू आबादी को अनिवार्य रूप से हिन्दू संस्कृति और भाषाओं को अपना लेना चाहिए, हिन्दू नस्ल और संस्कृति के महिमामंडन के अतिरिक्त और किसी विचार को मन में नहीं लाना चाहिए, अर्थात उन्हें न केवल इस धरती और इसकी युगों पुरानी परंपरा के प्रति अपनी असहिष्णुता और कृतघ्नता की अभिवृत्ति को त्याग देना चाहिए, बल्कि प्रेम और समर्पण के सकारात्मक दृष्टिकोण को भी अपनाना चाहिए। संक्षेप में, उन्हें इस देश में विदेशी बनकर रहना छोड़ देना चाहिए, या वे इस देश में पूर्ण रूप से हिन्दू राष्ट्र के अधीन होकर रहें……………..‘‘विचारधारा के स्तर पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुओं को आर्यों के समान मानता है और इसके वैदिक युग को भारत का स्वर्णिम युग मानता है।

हाल के वर्षों में भारत में हिन्दू कट्टरपंथियों की गतिविधियों में अच्छी खासी वृद्धि देखने में आई है। एम.एम. श्रीनिवास ने हिन्दू धर्म के बदलते पहलुओं पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उनके अनुसारः पिछले कुछ दशकों में हिन्दू धर्म को भारत-पाकिस्तान के बंटवारे जैसे- कुछ ऐतिहासिक महत्व के बदलावों का सामना करना पड़ा है, जबकि इनमें पाकिस्तान एक धर्म प्रधान राज्य है……..। उसी काल में इजाइल में यहूदी राज्य की स्थापना और श्रीलंका और बर्मा में बौद्ध राज्य की स्थापना हुई। इसी दौरान अंटलांटिक तट से लेकर प्रशांत तक के एक विशाल क्षेत्र में मुस्लिम कट्टरपंथ का भी उदय हुआ। हिन्दू धर्म इन तमाम शक्तियों और घटनाओं से कैसा बचा रह जाता। श्रीनिवास के अनुसार, हिन्दू धर्म में कट्टरपंथ का उदय दूसरे धर्मों और पड़ोसी देशों में कट्टरपंथ के विकास के कारण उसके सामने खड़ी होने वाली चुनौतियों के जवाब में हुआ।
हिन्दू धर्म में कट्टरपंथ के उदय के जो भी कारण हो, सच्चाई आज भी यही है कि हिन्दू धर्म के राजनीतिकरण के प्रयास सत्ता हथियाने के लिए जानबूझकर किये गये। ऐसे राजनीतिकरण की प्रक्रिया में हिन्दू धर्म के सहिष्णुता और सामंजस्य के उन आधारों को हाल के वर्षों में खतरा पैदा हो गया है, जिन्होंने एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के जन्म का मार्ग प्रशस्त किया था। लेकिन, इस प्रकार के विकास के प्रति आम हिन्दुओं की प्रतिक्रिया अत्यधिक महत्वपूर्ण है। जनतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से, उन्होंने हिन्दू धर्म की सहिष्णुता और सत्कार की नेक परंपरा और राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष आधार को बनाये रखा है।