कर्नाटक संगीत शैली का इतिहास क्या है ? दूसरा नाम क्या है carnatic music style in hindi

By   December 4, 2021

carnatic music style in hindi कर्नाटक संगीत शैली का इतिहास क्या है ? दूसरा नाम क्या है ?

कर्नाटक संगीत शैली
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दूसरी शैली कर्नाटक शैली मानी जाती है। दक्षिण भारत में पनपी यह शैली 14वीं सदी के शुरुआती वर्षों में विद्यारण्य के समय में परिष्कृत हुई। उनका ‘संगीतसार’ कर्नाटक संगीत का माग्रदर्शक रहा, जिसमें ‘जनक’ और ‘जन्य’ रागों का वर्णन है। 17वीं सदी के मध्य में वेंकटमखिन ने ‘चतुर्दण्डी प्रकाशिका’ लिखी, जो दक्षिण की इस शैली का मूलाधार बनी।
कर्नाटक संगीत में ‘रागम तानम-पल्लवी’ ही गायन में प्रयुक्त होते हैं। रागम आलाप की भांति हैं, जिसमें समय की बंदिश नहीं होती। तानम में लय तो है, किंतु यह भी मुक्त है। पल्लवी में ही बोल और स्वर को तालबद्ध किया जाता है।
कर्नाटक संगीत में ‘कृति’ सर्वाधिक लोकप्रिय रूप है। ‘कृति’ का अर्थ है रचना; कृतनाई का अर्थ है ‘गाना’। यद्यपि अंतर्निमेय रूप से इनका प्रयोग होता है, किंतु इनमें अंतर है ‘कृतनाई’ भक्ति गीत से जुड़ा है, जिसमें काव्य सौंदर्य पर अधिक बल होता है, जबकि ‘कृति’ में संगीत की महत्ता होती है। त्यागराजा, मुथुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री तीन ऐसे नाम हैं, जिन्होंने कर्नाटक संगीत को व्यापक आधार व स्वीकृति प्रदान की है। इनका समय अठारहवीं सदी का अंत एवं उन्नीसवीं सदी का प्रारंभ रहा है। पुरंधरदास (1480-1564) ने कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
वर्णमएक ऐसी स्वरलिपि है, जो किसी भी राग के विशिष्ट पदों व मूर्छना को स्पष्ट करती है और इसे आमतौर पर किसी भी संगीत गोष्ठी में प्रारंभ में गाया जाता है। पदम और जावली प्रेम गीत हैं, यह कृति से अधिक गीतिमय हैं। ‘तिल्लना’ हिंदुस्तानी संगीत के तराना की भांति ही है। इसकी भी गति द्रुत होती है।
हिंदुस्तानी संगीत की भांति कर्नाटक संगीत पर भी भक्ति आंदोलन का प्रभाव पड़ा। सबसे पुराना भजन ‘तेवरम’ है और इसी की आधारशिला पर तमिलभाषी लोगों की संगीत संस्कृति टिकी है। तेवरम गायकों का एक विशेष वग्र था, जो ओडुवर के नाम से जागे गए।