पूंजीवाद किसे कहते हैं | पूँजीवाद क्या है कार्ल मार्क्स के विचार विशेषताएं अर्थ Capitalism in hindi

By   November 8, 2020

Capitalism in hindi पूंजीवाद किसे कहते हैं | पूँजीवाद क्या है कार्ल मार्क्स के विचार विशेषताएं अर्थ ?

पूँजीवाद के बारे में कार्ल मार्क्स के विचार
खंड 3 में आपने पढ़ा कि कार्ल मार्क्स के अनुसार आर्थिक गतिविधि और आर्थिक ढांचा ही सामाजिक जीवन का आधार है। आर्थिक ढांचे में उत्पादन की एक विशिष्ट प्रणाली तथा उत्पादन के संबंध निहित है। उत्पादन की प्रणाली ऐतिहासिक काल खंडों में समान नहीं होती। यह इतिहास के परिवर्तन के साथ-साथ बदलती है। मार्क्स और एंगल्स ने विश्व इतिहास को विशिष्ट चरणों में विभाजित किया। इनमें से प्रत्येक चरण का आर्थिक स्वरूप अलग-अलग था। इस आर्थिक ढांचे से ही अन्य सामाजिक उपव्यवस्थाओं जैसे राजनैतिक व्यवस्था, धर्म, नैतिक मूल्य और संस्कृति आदि का स्वरूप निर्धारित होता है। इन उप व्यवस्थाओं को अधिसंरचना (ेनचमतेजतनबजनतम) कहा जाता है। मार्क्स और एंगल्स ने इतिहास को निम्न चार चरणों में बांटा है। (प) प्रारंभिक साम्यवादी (बवउउनदंस) चरण (पप) दास-प्रथा पर आधारित प्राचीन चरण (पपप) सामंतवादी चरण (पअ) पूँजीवादी चरण। उत्पादन की विशिष्ट प्रणालियों के अनुसार मानव इतिहास के विभिन्न चरणों का अध्ययन मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत का आधार है।

जैसा कि बताया जा चुका है, इनमें से हर चरण में उत्पादन की एक खास प्रणाली है। प्रत्येक चरण को इतिहास की एक कड़ी माना जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हर चरण के अपने अंतर्विरोध और तनाव होते हैं। इन अंतर्विरोधों के एक सीमा से ज्यादा बढ़ जाने पर व्यवस्था ही बिखर जाती है और पिछले चरण के गर्भ से नया चरण जन्म लेता है।

पूँजीवाद – मानव इतिहास का एक चरण
मार्क्स के ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, पूँजीवादी चरण सामंती व्यवस्था के अंतर्विरोधों का सहज परिणाम है। सामंती व्यवस्था में कृषि दासों का जमीदारों (सवतके) द्वारा शोषण होता था। यह सामंती व्यवस्था जब अपने तनावों से बिखर गई तो जमीदारों के कब्जे से बड़ी संख्या में काश्तकार (जमदंदजे) मुक्त हुए। ये लोग निरंतर बढ़ते हुए नगरों में बसे, इससे वस्तुओं के उत्पादन के लिए बड़ी संख्या में श्रमिक उपलब्ध हुए। नयी मशीनों का विकास, फैक्टरी प्रणाली और बड़े पैमाने पर उत्पादन से नयी आर्थिक प्रणाली पूँजीवाद का जन्म हुआ।

यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि मार्क्स ने पूँजीवाद को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा। मार्क्स ने अपने सिद्धांत में समाज में अलग-अलग व्यक्ति को केन्द्र बिंद नहीं बनाया बल्कि परे समाज के संदर्भ में अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। मार्क्स के अनुसार, पूँजीवाद मानव समाज के विकास का ऐसा चरण है जिसका जन्म उसके पिछले चरण के अंतर्विरोधों के कारण हुआ। इस चरण में भी अपने अंतर्विरोध है, जिनके बारे में आगे चर्चा की जाएगी। पूँजीवाद व्यवस्था में अंतर्निहित अंतर्विरोधों से एक नये चरण के जन्म के लिये योग्य परिस्थितियां बनेंगी। मार्क्स के अनुसार यह आदर्श समाज यानी साम्यवादी (बवउउनदपेज) समाज होगा। इस समाज में पिछले चरणों की तरह अंतर्विरोध और तनाव नहीं होंगे।

 पूँजीवाद की मुख्य विशेषताएं
टॉम बॉटोमोर (1973) ने अपनी पुस्तक डिक्शनरी ऑफ मासिस्ट थॉट में पूँजीवाद की कुछ प्रमुख विशेषताओं की चर्चा की है। उत्पादन की प्रणाली के रूप में मार्क्स ने पूँजीवाद की निम्न विशेषताएं स्पष्ट की हैं।

प) उत्पादन निजी इस्तेमाल की बजाय बिक्री के लिए होता हैः पूँजीवाद गुजारा चलाने भर के साधन जुटाने वाली आर्थिक प्रणाली के विकास की अगली कड़ी है। पूर्व पूँजीवादी आर्थिक प्रणालियों में उत्पादन प्रायः सीधे उपभोग के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, कृषि-केन्द्रित आर्थिक प्रणालियों में किसानों ने अपने इस्तेमाल के लिए ही फसलें उगाई हैं। थोड़ा सा हिस्सा ही बिक्री के लिए बच जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि तकनीकी ज्यादा उन्नत नहीं होती और घर-परिवार के लोग ही सीमित संख्या में काम करते हैं। पूँजीवाद व्यवस्था की स्थिति भिन्न है। इसमें बहुत बड़ी संख्या में श्रमिकों को फैक्टरी में काम करना होता है। उन्हें मशीनों की मदद से और श्रम-विभाजन द्वारा बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करना होता है। यह उत्पादन बाजार में बिक्री के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, साबुन बनाने वाली फैक्टरी में उत्पादकों के अपने इस्तेमाल के लिए साबुन नहीं बनाया जाता बल्कि यह बाजार में बिक्री के लिए बनाया जाता है।

पप) श्रम-शक्ति खरीदी और बेची जाती हैः मार्क्स का कहना है कि पूँजीवादी प्रणाली में श्रमिक को केवल श्रम-शक्ति के रूप में आंका जाता है। पूँजीपति या मालिक उनकी श्रम-शक्ति को मजदूरी देकर खरीदते हैं। श्रमिक अपनी श्रम-शक्ति को बेचने या न बेचने को कानूनी तौर से स्वतंत्र है। मानव इतिहास के प्राचीन चरणों की तरह, श्रमिकों से दासों या कृषि-दासों की तरह जबरन काम नहीं कराया जाता। उनकी आर्थिक जरूरतें ही उन्हें काम करने को विवश करती हैं। उनके सामने दो ही विकल्प हैं – मजदूरी करें या भूखे रहें। अतः भले ही श्रमिक पूँजीपति से अनुबंध करने के लिए कानूनी तौर से स्वतंत्र है पर उनकी दो वक्त की रोजी-रोटी की समस्या उन्हें अपना श्रम बेचने पर मजबूर करती है।

पपप) लेन-देन मुद्रा में होता हैः हमने यह पढ़ा कि उत्पादन बिक्री के लिए होता है और यह बिक्री मुद्रा के जरिए होती है। मुद्रा ही वह सामाजिक संबंध है जिससे पूँजीवादी प्रणाली के विभिन्न तत्व एक-दूसरे से जुड़े हैं। इसीलिए इस प्रणाली में बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।

पअ) पूंजीपति का उत्पादन की प्रक्रिया पर नियंत्रणः यह विशेषता भी मुद्रा संबंध से जुड़ी है। उत्पादन का मूल्य, श्रमिकों की मजदूरी, वित्तीय निवेश की रकम आदि सभी फैसले पूँजीपति ही करता है।

अ) पूँजीपति का वित्तीय निर्णयों पर नियंत्रणः इसका संबंध उत्पादों का नियंत्रण से है। उत्पादकों को मूल्य निर्धारण, श्रमिकों की मजदूरी, वित्तीय निवेश आदि निर्णय पूँजीपति स्वयं लेता है।

अप) प्रतिस्पर्धाः चूंकि उत्पादन का प्रमुख उद्देश्य बिक्री है, अतःपूँजीपतियों के बीच में प्रतिस्पर्धा होना स्वाभाविक है। किसका उत्पादन बाजार में सबसे ज्यादा बिकेगा? किसे सबसे ज्यादा मुनाफा होगा? इन सवालों से जो स्थिति पैदा होती है उसमें सारे पूँजीपति दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। इसके परिणामस्वरूप नये-नये आविष्कार और नयी तकनीकी का इस्तेमाल होता है। साथ-साथ प्रतिस्पर्धा से एकाधिकार (उवदवचवसल) वाली फर्मे या समान स्वार्थ के लिए मिल जाने वाले व्यापारी समूह (बंतजमसे) ही भी पनप सकते हैं। ऐसी स्थिति में एक उत्पादक या उत्पादकों का समूह अन्य प्रतियोगियों को पछाड़ कर या जबरन हटा कर बाजार पर अपना दबदबा कायम कर लेता है। इससे पूँजी का केंद्रीकरण कुछ गिने-चुने लोगों के हाथों में हो जाता है, अर्थात् पूँजी कुछ ही लोगों के पास रह जाती है।

इस प्रकार मार्क्स के अनुसार पूँजीवाद ऐसी व्यवस्था है जिसमें शोषण, असमानता और वर्गों का ध्रुवीकरण अपने चरम पर होता है। इसका मतलब है कि उत्पादन के साधन के मालिकों (अर्थात् बुर्जुआ वर्ग) और श्रमिकों (अर्थात् सर्वहारा वर्ग) के बीच सामाजिक अंतर बढ़ता है। पूँजीवाद के संबंध में मार्क्स की “वर्ग संघर्ष‘‘ की धारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूँजीवाद की अवधारणा को आत्मसात करने हेतु सोचिए और करिए 1 को पूरा करें।

सोचिए और करिए 1
पूँजीवाद की मुख्य विशेषताओं से संबद्ध उपभाग (21.2.1) को ध्यान से पढ़ें। क्या आपको अपने समाज में ऐसी विशेषताएं नजर आती हैं? एक पृष्ठ में अपने विचार लिखें और संभव हो तो अपने अध्ययन केन्द्र में अन्य विद्यार्थियों के विचारों से इनकी तुलना करें।

पूँजीवाद और वर्ग संघर्ष
मार्क्स के अनुसार, मानव समाज का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। मानव इतिहास के हर चरण में समाज दो वर्गों में बंटा रहा है – साधन संपन्न और अभावग्रस्त । इनमें से साधनसंपन्नों का प्रभुत्व रहता है और अभावग्रस्तों का दमन होता है।

पूँजीवाद के बने रहने के मुख्य आधार हैं – निजी संपत्ति, फैक्टरी प्रणाली के अंतर्गत वस्तुओं का बड़े पैमाने पर मुनाफे के लिए उत्पादन और ऐसा श्रमिक वर्ग जो अपनी श्रम-शक्ति बेचने पर मजबूर है। इन्हीं पूँजीवादी विशेषताओं से समाज में वर्गों के बीच दूरी बढ़ती रहती है और वर्गों का धुवीकरण होता है। जैसे-जैसे पूँजीवाद बढ़ता जाता है, वर्गों के बीच अंतर भी बढ़ता जाता है। बुर्जुआ और सर्वहारा वर्गों के हित भी अलग-अलग होते जाते हैं। सर्वहारा एक जुट हो जाते हैं क्योंकि वे एक सी समस्याओं से जूझ रहे होते हैं, जिनका समाधान भी समान होता है। इसी प्रकार सर्वहारा वर्ग समाज हितों के लिए संघर्षरत वर्ग बन जाता है। मार्क्स के अनुसार, सर्वहारा की क्रांति से इतिहास के नये चरण – “साम्यवाद‘‘ का जन्म होगा। इस व्यवस्था में श्रमिक ही उत्पादन के साधनों के स्वामी होंगे, पूँजीवाद के अंतर्विरोध समाप्त होंगे और एक नयी सामाजिक व्यवस्था स्थापित होगी।

संक्षेप में, कार्ल मार्क्स पूँजीवाद को मानव इतिहास की ऐसी स्थिति मानता है जो पिछली स्थिति के अंतर्विरोधों से पनपी है। पूँजीवाद के भी अपने अंतर्विरोध हैं। इस ऐतिहासिक चरण में वर्ग संघर्ष सबसे तीव्र होता है, क्योंकि उत्पादन के साधन कुछ ही हाथों में केंद्रित होते हैं। श्रमिकों को मात्र श्रम-शक्ति के रूप में आंका जाता है जिसे मजदूरी द्वारा खरीदा-बेचा जा सकता है। इस प्रणाली की असमानताओं से वर्गों का धु्रवीकरण होता है। सर्वहारा वर्ग को अहसास होता है कि उसके समान हित और समान समस्याएं है। वह इन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता है। सर्वहारा अपने हितों के लिए संघर्षरत वर्ग बन जाते हैं। इनकी मुक्ति क्रांति से होगी। सर्वहारा की क्रांति से एक नयी सामाजिक व्यवस्था साम्यवाद का जन्म होगा जिसमें उत्पादन के साधनों पर श्रमिकों का ही स्वामित्व होगा।

अगले भाग में पूँजीवाद के बारे में वेबर के विचारों पर चर्चा की जाएगी। अगले भाग (21.3) पर जाने से पहले बोध प्रश्न 1 को पूरा करें।

बोध प्रश्न 1
प) निम्नलिखित वाक्यों में से सही या गलत बताइए।
क) मार्क्स के अनुसार, प्रारंभिक साम्यवाद चरण के बाद पूँजीवादी व्यवस्था का जन्म होता है। सही/गलत
ख) केवल पूंजीवाद चरण के ही अपने अंतर्विरोध होते हैं। सही/गलत
ग) पूँजीवादी आर्थिक प्रणाली रोजी-रोटी के साधन भर जुटाने वाली आर्थिक प्रणाली है। सही/गलत
घ) पूँजीवादी प्रणाली में श्रमिक दास और कृषि दासों की तरह ही काम करने पर विवश होते है। सही/गलत
च) पूँजीवाद के बढ़ने के साथ-साथ वर्गों के बीच संबंध घनिष्ठ होते जाते हैं। सही/गलत
पप) निम्नलिखित प्रश्नों का तीन पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
क) कार्ल मार्क्स ने “सर्वहारा क्रांति” का समर्थन क्यों किया?
ख) पूँजीवादी चरण में बक आर वित्तीय संस्थाएं महत्वपूर्ण क्यों हो जाती है?
ग) पूँजीवाद में वर्गों का धु्रवीकरण क्यों होता है?

बोध प्रश्न 1 उत्तर
प) क) गलत
ख) गलत
ग) गलत
घ) गलत
च) गलत
पप) क) मार्क्स के अनुसार सर्वहारा की क्रांति से नयी सामाजिक व्यवस्था “साम्यवाद‘‘ का जन्म होगा। श्रमिक उत्पादन के साधनों के स्वामी और नियंत्रक होंगे। इस प्रकार, पिछले चरणों के अंतर्विरोध दूर हो जाएंगे।
ख) पूँजीवादी चरण में वस्तुओं का विनिमय मुद्रा में होता है। पूँजीवादी प्रणाली में मुद्रा ही समाज को बांधने वाली शक्ति है। इसलिए बैंको तथा वित्तीय संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
ग) पूँजीवादी व्यवस्था में बहुत अधिक असमानता होती है। पूँजीपति उत्पादन के साधनों के स्वामी और नियंत्रक होते हैं जबकि श्रमिक अपनी श्रम-शक्ति बेचने को मजबूर होते हैं। इन दो वर्गों के बीच अंतर बढ़ता जाता है और धु्रवीकरण की स्थिति आ जाती है।