भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार क्या है , British Expansion in India in hindi इतिहास , स्थापना

By   March 23, 2022
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British Expansion in India in hindi इतिहास , स्थापना भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार क्या है ?

भारत में ब्रिटिश विस्तार
(British Expansion in India)
ख्कर्नाटक युद्ध, बंगाल विजय, मैसूर राज्य एवं इसके द्वारा अंग्रेजों के राज्य विस्तार के प्रयास का विरोध,
तीन आंग्ल-मराठा युद्ध, भारत में ब्रिटिश राज्य की आरम्भिक संरचना: रेग्यूलेटिंग एवं पिट का
इण्डिया-एक्ट (The Carnatic wars,Conquest of Bengal, Mysore & its
resistance to British expansion, The three Anglo-Maratha wars,
Early structure of British raj : Regulating & Pitt’s India-Act),

ब्रिटिश विस्तार
आधुनिक भारत का इतिहास (1757-1947 ई.) आर्थिक संक्रमण, सामाजिक बदलाव तथा राजनीतिक परिवर्तनों एवं संघर्षों का लेखा-जोखा कहा जा सकता है, इस काल में हुए विविध परिवर्तन किसी एक घटना विशेष के परिणाम नहीं थे, अपितु एक लम्बे समय में भारतीय समाज, यहाँ की राजनीति तथा साम्राज्यवादी शक्ति के परस्पर दबाव तथा तात्कालिक शासकों की अतिमहत्वाकांक्षा तथा उनके स्वार्थों की परिणति थे, जिनकी शुरूआत मुगल साम्राज्य के पतन के साथ हुई।
हालांकि 15वीं शताब्दी की शुरूआत में ही हिन्दुस्तान में यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों की स्थापना का क्रम प्रारम्भ हो चुका था, यहाँ पर पुर्तगाली, डच, अंग्रेज तथा फ्रांसीसियों ने अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के भरसक प्रयास किए और समय तथा मौका पाकर इन कम्पनियों ने राजनीति में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।
जब 1707 ई. में मुगल शासक औरंगजेब की मृत्यु हो गई तो मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया था, देश में अराजकता तथा अशांति का वातावरण पनपने लगा. इस असंतोष के पनपने का मुख्य कारण यह था कि औरंगजेब के उत्तराधिकारी इतने अयोग्य तथा निर्वल थे कि वे विशाल मुगल साम्राज्य को एकता के एक सूत्र की कड़ी में आबद्ध न कर सके. मुगलों की शासन व्यवस्था में साम्राज्य का आधार केन्द्र होता था तथा सम्राट् प्रशासनिक व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु सम्राट सेना का प्रधान सेनापति तथा न्याय व्यवस्था का भी मुख्य स्रोत होता था। उसके जितने भी मंत्री थे वे सब शासन नीति के निर्माता न होकर केवल सलाहकार की ही भूमिका निभाते थे। औरंगजेब ने अपने साम्राज्य को 20 प्रांतों में बाँट रखा था, जिन्हें ‘सूबा‘ कहा जाता था। इन प्रांतों के ‘सूबेदार‘ तथा दीवान शीर्षस्थ अधिकारी होते थे. करों की वसूली, कृषि विकास के कार्य तथा राजकोष का लेखा-जोखा रखना दीवानों का कार्य था, तो सूबेदार शांति व्यवस्था, न्यायिक कार्य तथा सेना पर नियंत्रण रखने का कार्य सँभालता था. चूंकि मुगलकाल में सेना का संगठन मनसबदारी प्रथा पर आधारित था. अतः मनसबदार के अधिकार में जितनी भी सेना होती थी उसका वेतन उसके मुखिया को एक बार में ही दे दिया जाता था, इसका परिणाम यह हुआ कि सम्राट् की सेवा में रहने वाले सिपाही केवल उन्हीं सरदारों से परिचित थे जिनसे उनको वेतन मिलता था। शुरूआत में मनसबदारों को नकद वेतन दिया जाता था, लेकिन बाद में उन्हें नकद वेतन के स्थान पर जागीरें प्रदान की जाने लगी। ये जागीरें धीरे-धीरे पैतृक सम्पत्ति बन गईं और यह पद भी पैतृक हो गया, योग्यता का कोई मापदण्ड नहीं रहा. इस प्रकार की व्यवस्था से सम्राट के नियंत्रण में सुदृढ़ सेना का अभाव हो गया और मनसवदार ही सामंतों की हैसियत में आ गए। यह सामंती व्यवस्था ही तात्कालिक अव्यवस्था, अराजकता तथा विघटन का मूल कारण थी. सामंतों ने भी बड़े-बड़े सम्राटों की तरह अपने-अपने दरवार, न्यायालय तथा सेनाओं की स्थापना कर ली थी, इस प्रकार की क्रियाविधि से विशाल मुगल साम्राज्य छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्यों में विभाजित हो गया। सामंत लोग निजी स्वार्थों तथा दलबंदियों में इस

प्रकार फंस चुके थे कि उन्होंने राज्य की मूल शक्ति पर ही कुठाराघात करना शुरू कर दिया था, वजीर तथा अन्य अधिकारी एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगे।
इरविन के अनुसार मुगल सामंत चार गुटों में विभक्त हो गए, जो कि निम्नलिखित थे-
1. तूरानी
2. ईरानी
3. अफगानी
4. हिन्दुस्तानी
प्रथम तीन सामंतों का मुगल दरबार में प्रभुत्व था और ये मूलतः विदेशी थे, चैथा दल हिन्दुस्तानी इस कारण से कहलाया, क्योंकि इनमें अधिकतर वे मुसलमान सामंत शामिल थे जो कई पीढ़ियों से भारत में रह रहे थे।
इस प्रकार की विघटित व्यवस्था को देखकर, मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाकर अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों ने क्रमशः बंगाल तथा कर्नाटक में अपनी-अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली. इन दोनों शक्तियों में भारत में सर्वाेच्चता स्थापित करने के लिए संघर्ष शुरू हुआ, जिसमें अंग्रेजों को विजयश्री मिली।
भारत में अंग्रेजों का प्रवेश-16वीं सदी के अन्त में यूरोप के अन्य देशों की तरह ब्रिटेन के लोगों की भी विश्व व्यापार में रुचि बढ़ी। अपने व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने समुद्री रास्तों के जरिये नवीन व्यापारिक देशों की खोज आरम्भ कर दी, फ्रांसिस ड्रेक 1578 ई. में प्रशांत महासागर को पार करके मलक्का (द्वीप समूह) पहुँचा तथा आशा अंतरीप का चक्कर लगाकर 1580 ई. में इंग्लैण्ड लौट गया। 1588 ई. में स्पेनिश आर्मेडा की पराजय से इंग्लैण्ड की समुद्री मार्ग की बाधाएँ दूर हो गईं. महारानी एलिजावेथ ने अपनी व्यापारिक नीतियों का पुनरीक्षण करके 1599 ई. में लॉर्ड मेयर की अध्यक्षता में पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी‘ बनाने की अनुमति प्रदान की, इस कम्पनी की शुरूआत लगभग 217 हिस्सेदारों ने 30133 पौण्ड की राशि लगाकर की। महारानी एलिजावेथ ने 31 दिसम्बर, 1600 ई. को इस कम्पनी को पन्द्रह वर्षों के लिए व्यापार करने के उद्देश्य से एकाधिकार का आज्ञापत्र प्रदान किया।
इस आज्ञापत्र में उल्लेख किया गया कि जहाँ स्पेन एवं पुर्तगाल का किला न हो व्यापार किया जाए, इस आज्ञापत्र के द्वारा युद्ध एवं संधि करने, कानून बनाने तथा अपने एकाधिकार पर आघात करने वालों को दण्ड देने की भी व्यवस्था तय की गई. इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोप के सभी राज्यों के मध्य 16वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक वाणिज्यिक युद्ध चलता रहा. अंग्रेज समुद्री कप्तानों ने उन समुद्रों में अपना हस्तक्षेप शुरू कर दिया जिन पर पुर्तगाली तथा स्पेनवासी अपना दावा जताते थे। अंग्रेजों द्वारा धनसम्पत्ति तथा माल से भरे जहाजों को लूटकर अपने कब्जे में कर लिया जाता था।
अंग्रेजों का पहला जहाजी वेड़ा 1608 ई. में भारत में प्रविष्ट हुआ, इस बेड़े का कप्तान हॉकिन्स था. 1610 ई. में हॉकिन्स ने आगरा में मुगल सम्राट् जहाँगीर से मुलाकात की। कम्पनी की शक्ति से प्रभावित होकर सर टॉमस रो के अनुरोध पर सम्राट ने सन् 1613 ई. में पश्चिमी क्षेत्र में उन्हें बस्तियाँ वसाने की अनुमति दे दी। सर टामस रो को मुगल दरबार में राजदूत नियुक्त किया गया, जो 1615 से 1618 ई. तक मुगल दरवार में रहा। उसके राजदूत होने का व्यापक प्रभाव यह पड़ा कि आगरा, अहमदाबाद, सूरत तथा भड़ींच में अंग्रेजों ने अपनी कम्पनियां स्थापित कर ली, इन्हें व्यापारिक कोठियाँ कहा जाता था। मुख्य बात यह है कि इन फैक्ट्रियों में माल का उत्पादन नहीं किया जाता था। अलग-अलग स्थानों से क्रय किया गया माल इन केन्द्रों पर इकट्ठा किया जाता था. अपनी साम्राज्य शक्ति को बढ़ाते-बढ़ाते अंग्रेजों ने 1668 ई. में बम्बई पर अधिकार कर लिया था। यह माना जाता है कि अंग्रेज शासक चाल्र्स द्वितीय को पुर्तगालियों ने वेंग्राजा की इनफान्टा कैथेरिन के विवाह में दहेज के रूप में वम्बई मिली थी. 1688 ई. में चाल्र्स द्वितीय ने कम्पनी के लिए वम्बई को दस पौण्ड वार्षिक किराये पर दे दिया था। कालांतर में बम्बई सूरत से अधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र वन गया था।
अंग्रेजों ने जब यह देखा कि भारत के पश्चिमी क्षेत्र पर मुगलों तथा मराठों का प्रभाव अधिक है, तो उन्होंने अपनी रणनीति के तहत भारत के पूर्वी समुद्र तट पर अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की कोशिश की, चूंकि पूर्वी प्रदेशों में छोटे-छोटे राज्य थे, किसी बड़ी शक्ति का आधिपत्य नहीं था। अतः अंग्रेजों को यहाँ ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। फ्रांसिस डे ने चंद्रगिरि के शासक से जोकि विघटित विजयनगर साम्राज्य का प्रतिनिधि था, मद्रास को पट्टे पर ले लिया तथा किलेबंदी करवाकर सेंट जॉर्ज का किला बनवाया। दक्षिणी-पूर्वी समुद्र तट पर 1611 ई. में ही मछलीपट्टम (मसूलीपट्टनम) पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया। मद्रास में अंग्रेजों का चूंकि व्यापार अच्छा चला जिसको देखकर कोरोमण्डल तट को प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बनाया गया। 1633 ई. में महानदी के मुहाने पर हरिहरपुर तथा वालासोर (उड़ीसा) में नए केन्द्र स्थापित किए गए। 1651 ई. में हुगली में व्यापारिक कोठी तथा बाद में पटना तथा कासिमवाजार में भी व्यापारिक अड्डों की स्थापना की गई, 1658 ई. में कोरोमण्डल तट एवं बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा की सभी बस्तियों को फोर्ट सेंट जॉर्ज के नियन्त्रण में दे दिया गया।
इसी दौरान वंगाल में मुगल सम्राट शाहजहाँ के पुत्र शुजा ने तीन हजार रुपए वार्षिक कर का प्रावधान रखकर कम्पनी को व्यापारिक मामले में कुछ अधिकार दे दिए थे, एक अन्य आदेशानुसार 1656 ई. में अंग्रेजों को आयातनिर्यात कर में भी छूट मिल गई।
कम्पनी की नीतियोेँ-अपनी स्थापना वर्ष से लेकर 100 वर्षों तक यानी कि (1600 से 1700 ई. तक) यह कम्पनी व्यापारिक संस्थान के रूप में कार्य करती रही। इस समय इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक लाभ कमाना था. 1600 ई. में कम्पनी की हिस्सा पूँजी जो 30133 पौण्ड थी, बढ़कर 1722 ई. में 6 करोड़ पौण्ड हो गई. कम्पनी का शेयर मूल्य 12 से 45 प्रतिशत तक बढ़ चुका था। उदाहरण के लिए हम देख सकते हैं कि 1614 ई. में 25,000 पाउण्ड वजन की काली मिर्च 26042 पौण्ड में खरीदी जाती थी तथा यह इंग्लैण्ड में 208333 पौण्ड में बेची जाती थी, जो रेशमी वस्त्र हिन्दुस्तान में 37499 पौण्ड में क्रय किया जाता था, यूरोप में उसका विक्रय मूल्य 107140 पौण्ड होता था. इस प्रकार के व्यापारिक लाभ से ईस्ट इण्डिया कम्पनी की शक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई। अपनी आर्थिक वृद्धि के फलस्वरूप कम्पनी का यह प्रयास होने लगा कि भारत के अधिकाधिक भाग पर अपना प्रभुत्व जमाकर एक उपनिवेश का निर्माण किया जाए। इस निर्माण के साथ ही साथ कम्पनी ने सैन्य विस्तार की भी योजना बनाई और इस योजना की क्रियान्वति करने के लिए उसने देश में व्याप्त दुव्र्यवस्था का भरपूर लाभ उठाया। अंग्रेजों के प्रमुख अधिकारी जेराल्ड औंगियर, जो सूरत का प्रेसीडेंट और बम्बई का गवर्नर था, उसने कम्पनी की संचालक समिति को पत्र लिखा ‘‘अब समय का तकाजा है कि आप अपने हाथों में तलवार लेकर अपने सामान्य व्यापार का प्रबन्ध करें।‘‘ कुछ ही वर्षों में कम्पनी ने यह सलाह स्वीकार कर ली तथा दिसम्बर 1687 ई. में मद्रास के प्रधान को पत्र लिखकर यह आदेश दिया गया कि ष्आप असैनिक और सैनिक शक्ति का ऐसा शासन कायम कीजिए तथा दोनों की प्राप्ति के लिए इतनी आय पैदा कीजिए तथा बनाए रखिए, जो सदैव के लिए भारत में एक विशाल सुगठित, सुरक्षित अंग्रेजी राज्य की नींव बन सके। इस नई नीति का प्रतिपादक जोशुआ चाइल्ड था। कैप्टेन निकल्सन पुर्तगालियों से सालसेट तथा चटगांव हथियाना चाहता था, परन्तु वह सफल नहीं हो सका. जब वह हुगली पहुंचा तो 1686 ई. में बंगाल के सूवेदार शाइस्तखाँ ने अंग्रेजों को मार भगाया. इसकी प्रतिक्रियास्वरूप जॉन चाइल्ड ने वम्बई और पश्चिमी समुद्र तट के मुगल बन्दरगाहों को घेरकर मुगल जहाजों को पकड़ लिया तथा मक्का जाने वाले हज यात्रियों को पकड़ने के लिए कप्तान को लालसागर की ओर भेजा, परन्तु वहाँ भी उसे मुंह की खानी पड़ी, अंततः जॉन चाइल्ड को हर्जाने के रूप में डेढ़ लाख रुपए अदा करने पडे। इस प्रकार कम्पनी की राज्य विस्तार की पहली योजना धूल-धूसरित हो गई,े इसका प्रभाव यह हुआ कि कम्पनी को अपना ध्यान राज्य विस्तार से हटाकर पचास वर्ष तक व्यापार पर ही केन्द्रित करना पड़ा।
कम्पनी के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना 1715 ई. में मुगल दरबार में एक दूत मण्डल भेजे जाने की धी, जिसका मुख्य उद्देश्य मुगल बादशाह से व्यापार के लिए विशेषाधिकार प्राप्त करना था तथा साथ ही कलकत्ता के आसपास कुछ भू-भाग प्राप्त करने का भी इरादा था. दूत मण्डल में जॉन सुर्मन, एडवर्ड स्टीफेंसन तथा एक सर्जन हैमिल्टन भी था। बादशाह फर्रुखसियर गम्भीर बीमारी से पीड़ित था, जिसको सर्जन ने ठीक कर दिया जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने कई सुविधाएँ प्रदान कर दी, जिनमें मुख्य सुविधाएँ निम्नलिखित थीं-
1. कम्पनी को तीस हजार रुपए की निश्चित वार्षिक राशि के भुगतान पर निःशुल्क व्यापार करने का अधिकार मिल गया।
2. दस हजार की राशि का भुगतान करने पर सूरत में व्यापार करने की अनुमति मिल गई।
3. कम्पनी कलकत्ता के पास अतिरिक्त भूमि किराये पर ले सकती थी।
4. जो किराया राशि कम्पनी ने पूर्व में ही दे रखी थी उसी में मद्रास तथा हैदराबाद में भी व्यापार करने का अधिकार पत्र मिल गया।
5. कम्पनी के सिक्कों को मुगल साम्राज्य में प्रचलन की आज्ञा मिल गई।
इस प्रकार के व्यापारिक अधिकारों के मिलने के बाद कम्पनी की तीसरी महत्वपूर्ण नीति थी सामाजिक उद्देश्य के लिए टिकी यूरोपीय शक्तियों का उन्मूलन. भारत में फ्रांसीसियों का आगमन सबसे अंत में हुआ था। फ्रांसीसी शक्ति का विस्तार 18वीं सदी के दूसरे दशक में अधिक हुआ जब मालावार के समुद्री तट पर माही एवं कोरोमण्डल तट पर कराइकेल बन्दरगाह उनके कब्जे में आ गए, इसी समय मॉरीशस द्वीप भी उनके अधिकार में आ गया था, जिससे यूरोप को जाने वाले समुद्री मार्ग पर सफलतापूर्वक नियन्त्रण स्थापित करना सम्भव हो गया। फ्रांसीसियों के आगमन से अंग्रेजों के लिए एक नई समस्या पैदा हो गई। दोनों शक्तियों का उद्देश्य एक ही था- भारत में अपना प्रभुत्व जमाना, भारत की तात्कालिक दुर्बल राज्य शक्ति को देखकर दोनों के मध्य टकराहट होना स्वाभाविक था, दोनों में एकाधिकार प्रवृत्ति भी बढ़ी, दोनों कम्पनियाँ यह चाहती थीं कि भारतीय व्यापार पर – उनका आधिपत्य हो।
कर्नाटक युद्ध- अंग्रेज तथा फ्रांसीसी कम्पनियों का प्रथम युद्ध कर्नाटक में हुआ, जिसकी राजधानी अर्काट थी, तथा कथित कर्नाटक राज्य वर्तमान कर्नाटक प्रांत में स्थित न होकर पूर्वी समुद्री तट पर मद्रास एवं पांडिचेरी के पश्चिममध्य में स्थित राज्य था, जिसे उस समय कर्नाटक कहा गया। 1740 ई. के पश्चात् कर्नाटक में प्रशासनिक अस्थिरता के कारण यह क्षेत्र आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष का केन्द्र बना गया।
कर्नाटक का प्रथम युद्ध-कर्नाटक के प्रथम युद्ध की भूमिका में वाह्य कारण निहित थे, जिनसे दोनों शक्तियों के मध्य टकराव पैदा हुआ, यूरोप में 1740 ई. में ब्रिटेन और फ्रांस एक-दूसरे के विरुद्ध हो गए थे आस्ट्रिया के उत्तराधिकार के क्षेत्र को लेकर. इस प्रतिक्रिया का असर यह हुआ कि भारत में रह रहे ब्रिटेनी तथा फ्रांसीसियों के मध्य भी विरोधाभास शुरू हो गया। यूरोप में युद्ध शुरू होने के बाद अंग्रेजों की सहायता करने के लिए एक जहाजी बेड़ा भारत आया तथा दूसरी ओर फ्रांसीसियों की सहायतार्थ ला-बूझैने के नेतृत्व में मॉरीशस से दो हजार सैनिक भारत में आए। 1742 ई. में इप्ले फ्रांसीसी कम्पनी का गवर्नर बना था। 1744 ई. में युद्ध हुआ जिसका कारण प्रमुख रूप से यह भी था अंग्रेजी नौसेना ने फ्रांसीसी जहाजों पर कब्जा कर लिया था। इस समस्या से निजात पाने के लिए इप्ले ने मॉरीशस के गवर्नर ला-बूर्डो ने से सहयोग मांगा, मद्रास से कलकत्ता की ओर जाते समय अंग्रेजी बेड़े की अनुपस्थिति में फ्रांसीसी सेनापति ने मद्रास पर हमला कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। इसी बीच एक घटना यह भी घटी कि डूप्ले तथा लावू ने में मतभेद हो गया। मद्रास पर फ्रांसीसियों का कब्जा होने के बाद अंग्रेजों ने कर्नाटक के तात्कालिक नवाब अनवरुद्दीन से सहयोग की पेशकश की, अनवरुद्दीन को अपनी भूमि पर दो विदेशियों का युद्ध होना अच्छा नहीं लगा फलतः उसने इप्ले से मद्रास को छोड़ने का आग्रह किया तथा मद्रास पर कब्जा करने का भी प्रयास किया, परन्तु उसे वांछित परिणाम नहीं मिला। अडियार नदी के तट पर हुए इस युद्ध में डूप्ले को मिली सफलता ने इप्ले तथा ला-बूर्डो ने के मध्य और भी अधिक कड़वाहट पैदा कर दी। उसी समय प्राकृतिक प्रकोप ऐसा हुआ कि भीषण आँधी और तूफान से फ्रांसीसी बेड़े को अत्यधिक क्षति पहुंची तथा ला-बूर्डोने को मॉरीशस लौटना पड़ा।
1748 ई. में एक्सलाशेपेल की संधि के परिणामस्वरूप युद्ध बंद हो गया। संधि का परिणाम यह हुआ कि दोनों कम्पनियों का अपने-अपने केन्द्रों पर पूर्ववत् आधिपत्य हो गया. इस युद्ध का मुख्य परिणाम या निष्कर्ष यह निकला कि यूरोपीय कम्पनियों को भारतीय राजाओं के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का रास्ता साफ हो गया।
प्रथम युद्ध का महत्व-इस युद्ध का सबसे अधिक प्रभाव भारत के ऊपर यह पड़ा कि भारतीय राजनीति का खोखलापन तथा यहाँ की सैनिक दुर्बलताएँ यूरोपीय शक्तियों के समक्ष उजागर हो गई। कर्नाटक का नवाब एक व्यापारिक कम्पनी को युद्ध करने से नहीं रोक पाया तथा नवाव की सेना फ्रांसीसियों की सेना से परास्त हो गई। नवाब की हार के कारण ही फ्रांसीसियों के हौसले बुलन्द हो गये। इस सम्बन्ध में मैसलिन का कहना है कि ‘‘अधीनस्थ की स्थिति से फ्रांसीसी लोग छलांग मारकर प्रायः प्रभु की स्थिति में पहुँच चुके थे‘‘, इसी क्रम में प्रो. डॉडवेल ने अपने विचार रखते हुए कहा है कि ‘‘इसने डूप्ले के प्रयोग और क्लाइव की कृतियों के लिए एक रंगमंच खड़ा कर दिया‘‘।
कर्नाटक का द्वितीय युद्ध-1748 ई. में हैदराबाद के सूबेदार निजाम आसफजोह की मृत्यु के साथ ही साथ कर्नाटक के द्वितीय युद्ध का श्रीगणेश हो चुका था। निजाम आसफजोह का पुत्र नासिरजंग हैदराबाद का निजाम बना, ऐसा करने के कारण निजाम आसफजोह की पुत्री का लड़का मुजफ्फरजंग नासिरजंग का विरोधी बन गया और उसने हैदराबाद का सिंहासन पाने के लिए फ्रांसीसियों का समर्थन प्राप्त किया। दूसरी तरफ कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन के विरोधी स्व. नवाब दोस्त अली के दामाद चंदा साहब को नवाब बनाने की कोशिश में थे। इस प्रकार अनिश्चय की स्थिति का फायदा उठाकर इप्ले अपना प्रभाव क्षेत्र विस्तृत करना चाहता था, उसने तत्काल प्रभाव से इसका लाभ उठाने के लिए योजना बनाई।
अपनी रणनीति के तहत उसने मुजफ्फरजंग तथा चंदा साहब को समर्थन देना तय किया तथा साथ ही दोनों से समझौता भी कर लिया। समझौते के अनुसार मुजफ्फरजंग तथा चंदा साहब को सैनिक सहायता देने का वचन दिया तथा एक फ्रांसीसी सेना की एक टुकड़ी भेजी। इस सेना की मदद से हैदराबाद में अनवरुद्दीन को हराकर मुजफ्फरजंग एवं कर्नाटक में नासिरजंग को हराकर चंदा साहब वहाँ की गद्दी पर आसीन हुए, इस सफलता के मिलने के बाद दोनों ने फ्रांसीसी कम्पनियों को काफी धन दिया। इसके साथ ही मुजफ्फरजंग ने डूप्ले को कृष्णा नदी के दक्षिणी भाग में मुगल प्रदेशों का गवर्नर नियुक्त कर दिया। उत्तरी सरकारों के कुछ जिले भी फ्रांसीसियों को दे दिए। मुजफ्फरजंग के अनुरोध पर फ्रांसीसी सेना की एक टुकड़ी दूप्ले ने कप्तान बुस्सी के अधीन हैदराबाद में तैनात कर दी। इस सारे क्रियाकलाप का मुख्य प्रभाव यह हुआ कि कर्नाटक पर फ्रांसीसियों का सीधा नियन्त्रण कायम हो गया, कर्नाटक तथा हैदराबाद पर इप्ले की शक्ति में भी आशातीत वृद्धि हुई, फ्रांसीसियों के बढ़ते प्रभाव से अंग्रेज आशंकित हो उठे। वे उस मौके की तलाश में रहते जिससे फ्रांसीसियों पर अंकुश लगाया जा सके। संयोग से उन्हें एक मौका हाथ भी लग गया, उसी दौरान स्व. नवाव अनवरुद्दीन का पुत्र मुहम्मद अली चंदा साहव के डर से भागकर त्रिचनापल्ली चला गया। उसको वहाँ अंग्रेजों से कुछ सहायता मिलने की अपेक्षा थी, अंग्रेजों ने मौके का फायदा उठाकर मुहम्मद अली को अपने संरक्षण में लेकर फ्रांसीसियों से मुकाबला करने की तैयारी कर ली।
फ्रांसीसियों ने काफी कोशिश की कि त्रिचनापल्ली का दुर्ग उनके कब्जे में आ जाए, परन्तु वे इसमें सफल नहीं हो पाए। इस समय की विषम परिस्थिति में अंग्रेजों को आत्मसमर्पण करने की नौबत आ चुकी थी, परन्तु क्लाइव ने दूरदर्शिता का उदाहरण देते हुए फ्रांसीसियों का ध्यान त्रिचनापल्ली से हटाने के लिए चंदा साहब की राजधानी आर्काट पर घेरा डाल दिया। चंदा साहब को मजबूरन अपनी सेना आर्काट भेजनी पड़ी, यह सेना अंग्रेजों से आर्काट को मुक्त नहीं करा सकी। इस प्रकार इप्ले तथा फ्रांसीसियों की यह अंग्रेजों के हाथों प्रथम पराजय थी। इस पराजय ने इप्ले की महत्वाकांक्षाओं को नष्ट कर दिया, इसी बीच त्रिचनापल्ली पर भी अंग्रेजों का अधिकार हो गया। इसी समय चंदा साहव भागकर तंजीर पहुँचा जहां उसकी हत्या कर दी गई, इस मौके का फायदा उठाकर मुहम्मद अली, जोकि अंग्रेजों का हिमायती भी था कर्नाटक का नवाब बन बैठा, डूप्ले ने अपनी शक्ति तथा प्रभाव को पुनः स्थापित करने की कोशिश की, परन्तु वह सफल नहीं हो सका. इस प्रकार उससे अप्रसन्न होकर 1754 ई. में फ्रांस की सरकार ने उसको वापस बुला लिया। उसके स्थान पर गोडेहू को भेजा गया, जिसने अंग्रेजों से संधि करके द्वितीय कर्नाटक युद्ध के रंगमंच का पटाक्षेप कर दिया।
कर्नाटक के द्वितीय युद्ध का महत्त्व-यदि परिणामों की दृष्टि से देखा जाए तो यह निष्कर्ष सामने आता है कि कर्नाटक का द्वितीय युद्ध प्रथम युद्ध की अपेक्षा कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण रहा। इस युद्ध के परिणामस्वरूप इप्ले तथा फ्रांसीसियों की समस्त आकांक्षाएँ चूर-चूर हो गईं. अंग्रेजों की स्थिति पहले से अधिक सुदृढ़ हो गई। इस युद्ध ने विदेशियों के समक्ष भारत के देशी राजाओं की कलई खोलकर रख दी।
कर्नाटक का तृतीय युद्ध-भले ही कर्नाटक के दूसरे युद्ध में अंग्रेजों के साथ फ्रांसीसियों को अपमानजनक संधि करनी पड़ी थी, परन्तु उनके मनोवल में कहीं कोई कमी नहीं आई धी तथा वे इसका बदला लेने की दृष्टि से मौके की तलाश में भी थे। 1756 ई. में यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध के शुरू होने के साथ ही साथ दोनों शक्तियों का एक बार फिर जवर्दस्त टकराव हुआ। इस समय अर्थात् 1758 ई. तक बंगाल पर अंग्रेजों की विजय (प्लासी का युद्ध) ने उनकी स्थिति और सुदृढ़ कर दी, दूसरी ओर भारत में फ्रांसीसी प्रतिष्ठा को फिर से कायम करने के लिए फ्रांसीसी सरकार ने 1757 ई. में काउंट लैली को भारत भेजा। वह 1758 ई. में भारत पहुँचा, यह सही है कि वह वीर, साहसी तथा कुशल सेनापति था, परन्तु उसके अन्दर एक कमी थी कि वह जिद्दी था और बिना सोचे-विचारे निर्णय लेता था, इसका उसे खामियाजा भी भुगतना पड़ा।
उसने आते ही सेंट डेविड के किले पर अपना आधिपत्य जमा लिया तत्पश्चात् उसने तंजौर के शासक के पास अपनी सेना भेजी, उस पर फ्रांसीसी कम्पनी के करीब 60-70 लाख रुपये बकाया थे, जिन्हें वह वसूलना चाहता था। अपने मकसद में सिद्धि पाने के लिहाज से उसने तंजौर पर आक्रमण कर दिया, परन्तु अंग्रेजों के हस्तक्षेप के कारण उसका मिशन पूरा नहीं हो सका। इस पराजय से क्षुब्ध होकर उसने अंग्रेजों के गढ़ मद्रास पर आक्रमण करने की योजना बनाई. अपनी सहायता के लिए उसने हैदराबाद से दुसी को भी बुला लिया, अपनी योजना के अनुसार 1758 ई. में फ्रांसीसी सेना ने मद्रास को घेर लिया। इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए क्लाइव ने कर्नल फोर्ड को मद्रास भेजा जिसने मछलीपट्टम (मसूलीपट्टनम) पर अपना अधिकार कर लिया।
उधर अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम से मिलकर अपनी स्थिति और मजबूत कर ली तथा इसी समय के मध्य एक और जहाजी बेड़ा अंग्रेजों की सहायता के लिए आ गया जिसका परिणाम यह हुआ कि लैली को उल्टे पैर लौटना पड़ा। इस स्थिति से लैली के मन में निराशा घर कर गई। उसकी हालत कमजोर हो गई, क्योंकि न तो उसके पास पर्याप्त साधन ही थे और न ही गृह सरकार से उसे पर्याप्त सहायता मिल सकी थी। फिर भी वह अंग्रेजों के विरुद्ध छुटपुट युद्ध करता रहा, इन युद्धों के चलते 1760 ई. में एक निर्णायक युद्ध हुआ जिसे वांडीवाश के युद्ध के नाम से जाना जाता था, जिसमें अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने फ्रांसीसियों को बुरी तरह पराजित करके बुसी को गिरफ्तार कर लिया। लैली ने हताश होकर मैसूर के शासक हैदरअली से अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता करने की गुहार की, परन्तु हैदरअली वादा करके ऐन वक्त पर मुकर गया। अंग्रेजों ने मद्रास का बदला लेने की गरज से पांडिचेरी पर घेरा डाल दिया। हालांकि लैली ने अंग्रेजों का डटकर मुकावला तो किया, परन्तु अन्त में उसे हथियार डालने पड़े और उसने 1761 ई. में समर्पण कर दिया। परिणाम यह हुआ कि पांडिचेरी पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया, इसके बाद उन्होंने माही तथा जिंजी पर भी अधिकार कर लिया।
तृतीय युद्ध के परिणाम-तीसरा युद्ध फ्रांसीसियों की सत्ता समूल नष्ट करने के रूप में जाना जाता है। चूंकि लैली अपनी क्रियाविधि से कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं कर सका था। अतः फ्रांसीसी सरकार ने उसे वापस बुलाकर 1763 ई. में मृत्युदंड की सजा दे दी। इस युद्ध के कारण भारत में अंग्रेज सर्वाेच्च शासक के रूप में प्रतिष्ठित हुए, सप्तवर्षीय युद्ध की समाप्ति पर दोनों पक्षों में संधि हो गई जिसके अनुसार फ्रांसीसियों को पांडिचेरी पुनः मिल गया (पेरिस की संधि के अनुसार); परन्तु उन्हें इसकी किलेबंदी का अधिकार नहीं दिया गया था। बंगाल से भी फ्रांसीसियों का पत्ता साफ हो गया। कहने का तात्पर्य यह है कि अब अंग्रेज ही सर्वाेच्च तथा सर्वाधिक सत्तासीन माने गए।