अजवायन (lovage , bishop’s weed in hindi) , वानस्पतिक नाम : Trachyspermum ammi , कुल

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अजवायन (lovage , bishop’s weed) :

वानस्पतिक नाम : Trachyspermum ammi

कुल : Apiaceae या umbelliferae

उपयोगी भाग :

उत्पत्ति तथा उत्पादक देश :

  • अजवाइन को यूरोप , एशिया तथा उत्तरी अमेरिका का मूल निवासी माना जाता है , अत: इन संभाग के सभी देशो में बोया जाता है |
  • भारत में इसे प्रमुखत: मध्य प्रदेश , गुजरात , महाराष्ट्र , उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में बोया जाता है |

पादप की बाह्य आकारिकी :

  • अजवाइन का पादप दुर्बल , 1 से 1.5 मीटर लम्बे तने युक्त सगंध , शाखित तथा एक वर्षीय पाया जाता है |
  • पत्तियां छोटे खंडो में विभाजित रहती है अर्थात विसयुक्त प्रकार की पायी जाती है |
  • पुष्प क्रम सयुक्त छत्रक प्रकार का पाया जाता है जिस पर सफ़ेद या हल्के बैंगनी रंग के पुष्प पाए जाते है |
  • फल त्रिमोखारक प्रकार का पाया जाता है जो सामान्यत: आकार में छोटा तथा खुरदरी सतह युक्त होता है |
  • अजवाइन में सहगंध तेल पाया जाता है तथा इसकी खेती शीत ऋतू में की जाती है |

अजवाइन का आर्थिक महत्व

  • अजवाइन के फल वातहर , उद्दीपक तथा प्रतिरोधी होती है अत: इन्हें पेट दर्द , जोड़ो के दर्द , दमा , खांसी आदि में उपयोग किया जाता है |
  • फलो में एक विशेष प्रकार का सगन्ध तेल पाया जाता है जिसे – thymol कहते है , इस सगंध तेल को बाम , अमृतधारा , विभिन्न प्रकार की क्रीम , साबुन आदि में निर्माण में उपयोग किया जाता है |
  • अजवाइन के फलों को मसालों के रूप में , बिस्कुट , मट्ठी तथा पकोड़ी के निर्माण में उपयोग किया जाता है |
  • शिशु के जन्म के पश्चात् प्रसूता को अजवाइन के लड्डू खिलाये जाते है |

औषधि उत्पादक पादप :

औषधि उत्पादक पादपो का इतिहास :

  • औषधी के रूप में पादपों का उपयोग उतना ही पुराना है जितनी पुरानी मानव सभ्यता है |
  • प्राचीन सभ्यता में प्रेत आत्माओं को रोगों का कारण माना जाता है अत: रोगों के उपचार हेतु पादपीय उत्पादों को नशीले पदार्थ के रूप में उपयोग किया जाता था |
  • पादपो का औषधिक के रूप में उपयोग विभिन्न प्राचीन ग्रंथो में उल्लेखित है जो निम्न प्रकार है –

(A)   ऋग्वेद (1100 B)

(B)   आयुर्वेद (भारत का प्राचीनतम चिकित्सीय ग्रन्थ)

(C)   भारत के विभिन्न आयुर्वेदिक आचार्यो के द्वारा रचित चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता में औषधीय पादपों का उल्लेख है |

(D)   15 वीं शताब्दी में फ्रांस तथा यूरोप में भी अपनी औषध ग्रंथो में पादपो के चिकित्सीय महत्व को उल्लेखित किया है |

(E)    हिप्पोक्रेटस नामक वैज्ञानिक को father ऑफ़ मेडिसिन के नाम से जाना जाता है |

प्रश्न 1 : पादपो के औषधिय महत्व का प्रमुख कारण स्पष्ट कीजिये |

उत्तर : पादपों के औषधीय महत्व का प्रमुख कारण उनमे पाए जाने वाले विभिन्न रासायनिक पदार्थ है जैसे एल्केलॉईड , ग्लाईकोसाइड , टेनिन , रेजिन , गोंद , श्लेष्मा तथा वाष्पशील तेल है |

प्रश्न 2 : पादपो में पाए जाने वाले चिकित्सकीय महत्व के रसायन , पादपों के किन भागो में पाए जाते है ?

उत्तर : उपरोक्त रसायन प्रमुखत: पादपों के फल में , बीज में , छाल तथा तना , पत्ती आदि में भी इनका संचय पाया जाता है |

  • औषधीय पादप प्रमुखत: जंगली प्रजाति के रूप में स्वत: विकसित होते है परन्तु कुछ पादपों को फसल के रूप में भी विकसित किया जाता है |
  • औषधिय पादपो को प्रमुखत: आयुर्वेदिक , होमोफेथिक तथा यूनानी चिकित्सा तकनीक के अंतर्गत उपयोग किया जाता है |