शारदा देवी का जन्म कब और कहाँ हुआ birth of sharda devi when and where in hindi

By   December 15, 2020

birth of sharda devi when and where in hindi शारदा देवी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?

श्री शारदा देवी जन्मदिन समारोह (Birthday Celebration of Shri Sarada Devi)
पवित्र माता श्री शारदा देवी का 139वां जन्मदिन समारोह दिसम्बर, 1991 में मनाया गया था। उनके जन्मदिन समारोह भक्तों को शक्ति प्रदान करते हैं। उनका जन्म 22 दिसम्बर, 1853 को पश्चिम बंगाल में बांकुरा जिले के एक दूरदराज वाले गांव जेराम्बटी में हुआ था। श्री शारदा देवी नारी का एक आदर्श रूप हैं, जिन्होंने जीवन पर्यन्त अपने पति की सेवा की तथा अपने पति की विद्वता के प्रति समर्पित रहते हुए, सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया। जन्मदिवस पर श्रद्धालुओं की बीच खुशी की लहर दौड़ जाती है। श्री रामकृष्ण के साथ उनका विवाह 6 वर्ष की छोटी उम्र में ही हो गया था और वे आगे चलकर रामकृष्ण मिशन जैसे महान संगठन की स्थापना करने व उसे चलाने में स्वामी विवेकानन्द एवं श्री रामकृष्ण के अन्य युवा शिष्यों की प्रेरणा का स्रोत बनी। उनकी शिक्षाओं का सार इन पंक्तियों में हैः

ऽ ‘‘यदि आप जीवन में खुश रहना चाहते हैं तो अन्य लोगों के भीतर कमियाँ ढूंढना बन्द कर दीजिए।‘‘
ऽ ‘‘आप जो भी करें और जहां भी जाएं, यह बात याद रखिए कि स्वर्ग में बैठा पिता, यानि ईश्वर हमेशा आपकी रक्षा करता है।‘‘

कार्यकलाप 2
श्री रामकृष्ण, श्री शारदा देवी और स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिन समारोह, सामान्य जन्मदिन समारोह से किस प्रकार भिन्न हैं? पाठ का अध्ययन कीजिए और इस संदर्भ में अपने निजी गूढ विचारों को अपनी नोटबुक में लिखिए और निकटतम अध्ययन केन्द्र के अन्य विद्यार्थियों से इन लिखित विचारों पर विचार-विमर्श कीजिए।

भक्त सम्मेलन (Bhakta Sammelan)
एक आधुनिक धार्मिक आन्दोलन के रूप में रामकृष्ण मिशन का अध्ययन करते समय, आपके लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि कभी-कभी मिशन भक्त सम्मेलन जैसे धार्मिक सम्मेलन आयोजित करता है। उदाहरण के लिए, इस तरह का एक सम्मेलन 31 दिसम्बर, 1989 को दिल्ली में रामकृष्ण मिशन के परिसर में आयोजित किया गया, जिसमें 336 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।

एक धार्मिक कृत्य होने के अलावा इस तरह के सम्मेलन संन्यासियों एवं गृहस्थों को एक साथ मिलकर आध्यात्मिक अनुशासन का पालन करने का अवसर प्रदान करते हैं, जिसका प्रतिबिंब ताकि रामकृष्ण आन्दोलन पर दिखाई दे तथा आन्दोलन की सही दिशा में प्रगति के लिए, इसे स्थायित्व एवं शक्ति प्रदान करें। फूट का शिकार हुए इस युग के लिए एक आध्यात्मिक शक्ति के स्रोत के रूप में, तथा पीड़ित मानवता, दबे-कुचले, बेसहारा, कुष्ठ रोग का शिकार, बेसहारा महिलाओं व बच्चों, दंगों का शिकार हुए तथा प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त लोगों की सेवा के एक साधन के रूप में, आन्दोलन को जारी रखने के लिए गृहस्थ भक्तों की भूमिका खासतौर पर महत्वपूर्ण है। यदि यह भारत में व्यापक सामाजिक, व्यावसायिक एवं सांगठनिक जीवनमूल्यों को बरकरार रखने में सहायक सिद्ध हो सके, तो हमारी बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है। आधुनिक युग के एक धार्मिक आन्दोलन के रूप में, रामकृष्ण मिशन के समक्ष गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, अस्वस्थता, अज्ञान तथा भ्रष्टाचार की चुनौतियां राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद हैं, जिनके करोड़ों लोग शिकार हैं। विश्व स्तर पर युद्ध के अक्सर सिर पर मंडराने वाले खतरे, पर्यावरण की बिगड़ती हालत, भौतिकवाद की सत्ता की बढ़ती हवस तथा पीड़ित मानवता की शान्ति भंग हो जाना आदि चुनौतियां मौजूद हैं।

मिशन के समक्ष मौजूद चुनौतियां (Challenges that Confront the Mission)
वास्तविक चुनौती इस बात में निहित है कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के जरिये शुरू किया गया आधुनिक धार्मिक आन्दोलन किस तरह से वेदान्त की बुद्धि एवं ज्ञान के जरिये देवत्व, मानवता तथा सेवा के मूल्यों का पुनर्जागरण एवं पुनरुत्थान करके पीड़ित मानवता के सम्मुख मौजूद संकट का सामना करता है,

कथोपनिषद् में कहा गया है,

‘‘उथिस्ठत, जगत प्रत्याः वारानिरोधक‘‘ इसका तात्पर्य यह है: उठो जागो, उपलब्धि हासिल करो, यह कि महान व्यक्ति के पवित्र चरणों में ऐसी सूझबूझ जो कि पूरब एवं पश्चिम की भौतिक एवं आध्यात्मिक तकलीफों को दूर करके अर्पित करें, पीड़ित मानवता की सेवा के जरिये मनुष्य के भीतर देवत्व की पुनः स्थापना करें।

यह उपदेशों से ज्यादा अमल से जुड़ा हुआ प्रश्न है। एक धार्मिक आन्दोलन के रूप में रामकृष्ण मिशन ने उपदेशों एवं अमल को काफी हद तक आपस में मिलाने का काम किया है। विभिन्न धर्म एक ही देवत्व की प्राप्ति के अलग मार्ग हैं तथा देवत्व मानवता की सेवा के जरिए ही अधिक गौरवशाली बनता है।