बिजोलिया किसान आंदोलन क्या था | बिजौलिया किसान आन्दोलन कब समाप्त हुआ bijoliya farmer movement in hindi

By   January 12, 2021

bijoliya farmer movement in hindi बिजोलिया किसान आंदोलन क्या था | बिजौलिया किसान आन्दोलन कब समाप्त हुआ कब शुरू हुआ किसके नेतृत्व में हुआ नेता कौन था नाम ?

प्रश्न : राजस्थान में बिजौलिया किसान आन्दोलन के घटनाक्रम और उसकी एतिहासिकता पर प्रकाश डालिए ?

उत्तर : ब्रिटिश आधिपत्य के बाद अत्यधिक ऊँची लगान दरें , राजशाही-समान्तशाही के बढ़ते खर्चों का किसानों पर बोझ , किसानों से लाग-बाग़ , बेगार में जबरदस्ती और बढ़ोतरी , किसानों का कर चुकाने की स्थिति में न होना , साथ ही नकद और कठोर वसूली तथा उन्हें पैतृक भूमि से बार बार वंचित करना , सामन्तो के जुल्मों और अत्याचारों ने कृषकों के इस असंतोष और पीड़ा को बढाया। उसे आन्दोलन करने पर मजबूर किया जिसका प्रथम प्रस्फुटन बिजौलिया में दिखाई दिया।
बिजोलिया (भीलवाड़ा) मेवाड़ राज्य का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था। यहाँ का कृषक आन्दोलन भारत का प्रथम संगठित अहिंसात्मक सफल आंदोलन था जो 44 वर्षो (1897-1941 ईस्वीं) तक चला। 1897 ईस्वीं में शोषण और अत्याचारों के विरोध में किसानों के प्रमुख नानजी और ठाकरी पटेल महाराणा से मिले परन्तु इसका कोई परिणाम न निकला। तब साधु सीताराम दास और माणिक्य लाल वर्मा इनके नेतृत्व में सामने आये। ठाकुर ने 1903 ईस्वीं में चंवरी कर और 1906 ईस्वीं में तलवार बंधाई कर प्रजा पर तथा लगाया तो किसानों ने अपनी लडकियों का विवाह और कृषि करना ही स्थगित कर दिया। तब मजबूर होकर राव ने इन लाग-बाग़ को वापिस ले लिया। यह किसानों की अहिंसात्मक आंदोलन के रूप में प्रथम ऐतिहासिक विजय थी।
1915 ईस्वीं में पथिक जी ने बिजौलिया आन्दोलन की बागडोर संभाली। उन्होंने अपने सहयोगियों माणिक्य लाल वर्मा , साधू सीताराम दास , रामनारायण चौधरी , विमला देवी , अंजना देवी आदि के सहयोग से इसे एक व्यवस्थित रूप दिया। सरकारी दमनचक्र , जुल्मी यातनाएँ और बीच बीच में समझौते और संघर्ष का दौर चलता रहा परन्तु सक्रीय कार्यकर्ता और कृषक जूझते रहे। अन्तत: 1941 ईस्वीं में मेवाड़ , सरकार ने किसानों की सभी जायज मांगे स्वीकार कर और उनकी भूमि लौटा कर इस आन्दोलन का पटाक्षेप किया।
यह बिजौलिया के किसानों की शानदार विजय थी। इसने यह सिद्ध कर दिया कि अहिंसात्मक तरीके से शोषण और जुल्मों के विरुद्ध सफल आन्दोलन किया जा सकता है तथा अपनी मांगे मनवाई जा सकती है। इसने न केवल राजस्थान अपितु सम्पूर्ण देश के कृषकों को अपने प्रति किये जा रहे शोषण और जुल्मों के खिलाफ आंदोलन करने की एक ऐतिहासिक परम्परा और प्रेरणा दी। इसकी सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि उनकी जायज मांगों के सामने राजशाही को घुटने टेकने पड़ेंगे। इसने समस्त देश के किसानों में राजनितिक चेतना उत्पन्न करने में असाधारण भूमिका का निर्वाह किया तथा ये ही किसान आगे जाकर गाँधी जी के सत्याग्रह तथा असहयोग आंदोलन के अभिन्न अंग बने।
प्रश्न : स्वतंत्रता पूर्व राजस्थान में हुए कृषक आन्दोलनों की विवेचना कीजिये। 
उत्तर : राजस्थान में ब्रिटिश आधिपत्य के बाद अत्यधिक ऊँची लगान दरें , राजशाही के बढ़ते खर्चों का किसानों पर बोझ , लाग-बाग, लाटा कूंता और बैठ बेगार में बढ़ोतरी और जबरदस्ती , किसानों का कर चुकाने की स्थिति में न होने पर भी नकद और कठोर वसूली , पैतृक भूमि से उन्हें बार बार वंचित करना और सामन्ती अत्याचारों और जुल्मों ने कृषक असंतोष और पीड़ा में अत्यधिक वृद्धि की और उसे आन्दोलन करने पर मजबूर किया। उसे सिर्फ एक कुशल नेतृत्व की आवश्यकता थी जो राजनितिक कार्यकर्ताओं (क्रांतिकारियों) ने प्रदान कर आन्दोलन का बिगुल बजा दिया। राजस्थान में कृषकों का यह आन्दोलन बिजौलिया (भीलवाड़ा) से प्रारंभ हुआ तथा बेगूं , बूंदी , अलवर , सीकर आदि सर्वत्र फ़ैल गया जिसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक बिजोलिया कृषक आन्दोलन रहा।
बिजौलिया (भीलवाड़ा) किसान आन्दोलन भारत का प्रथम संगठित अहिंसात्मक सफल आन्दोलन था जो 44 वर्षो (1897-1941) तक चला। विजयसिंह पथिक के नेतृत्व में बिजोलिया के किसानों ने संगठित होकर 1915 ईस्वीं में शोषण और सामन्ती जुल्मों के विरुद्ध अपना आन्दोलन शुरू किया।
जिसमें माणिक्यलाल वर्मा , रामनारायण चौधरी जैसे अनेक नेताओं ने सक्रीय भूमिका निभाई। सरकारी दमनचक्र , जुल्मी यातनाओं को सहते हुए नेता और कृषक अपने अधिकारों के समर्थन और अत्याचारों और शोषण के विरोध में जूझते रहे। अन्तत: 1941 ईस्वीं में मेवाड़ सरकार को झुकना पड़ा तथा किसानों की मांगे मान ली गयी। यह बिजौलिया के किसानों की शानदार ऐतिहासिक विजय थी जो अन्य आंदोलनों का प्रेरणा स्रोत बनी।
बिजौलिया आन्दोलन से प्रेरणा पाकर बेगूं के किसानों ने रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में 1921 ईस्वीं में आन्दोलन शुरू किया। जिसे बेरहमी से दबाया गया।
अलवर के किसानों ने भी अत्यधिक कर वृद्धि और जंगली सुअरों की समस्याओं के विरुद्ध आंदोलन किया तो 1925 ईस्वीं में नीमूचणा हत्याकांड हुआ परन्तु आंदोलन सफल रहा। इसी प्रकार बूंदी के किसानों ने पं. कालीचरण शर्मा के नेतृत्व में , सीकर के जाटों ने ‘राजस्थान क्षेत्रीय जाट सभा’ के नेतृत्व में , शेखावाटी आंदोलन ‘कालीचरण शर्मा’ के नेतृत्व में आन्दोलन किया। इनके अलावा मारवाड़ , बीकानेर , भरतपुर , मातृकुण्डियाँ , मेवात आदि सभी स्थानों पर कृषक आन्दोलन हुआ। चांडावल (1945 ईस्वीं) तथा डाबडा (1947 ईस्वीं) कृषक हत्याकांड तो कंपकपाने वाली घटनाएँ रही , अंततः किसान विजयी हुए।
इन किसानों आन्दोलनों ने यह सिद्ध कर दिया कि अहिंसात्मक तरीके से भी शोषण और जुल्मों से सफल संघर्ष किया जा सकता है। इन आन्दोलनों की सफलता इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि समान्तशाही को उनकी मांगों के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे। इन आंदोलनों ने न केवल राजस्थान की जनता में वरन सम्पूर्ण देश की जनता में राजनितिक जागृति उत्पन्न करने में असाधारण भूमिका निभाई। ये जागृत किसान ही आगे जाकर सत्याग्रह तथा असहयोग आन्दोलन के अभिन्न अंग बने।