सब्सक्राइब करे youtube चैनल

भक्ति परंपरा क्या है परंपराओं महत्वपूर्ण सवाल Bhakti Tradition in hindi भक्ति परंपरा की विशेषता बताओ ?

भक्ति परंपरा (The Bhakti Tradition)
मध्यकालीन भारत में जातिगत सरंचना ही थी, जिसने मानव के जीवन तथा संबंधों के उस तानेबाने को नियंत्रित किया जिनमें कि वे प्रवेश कर सकते थे। इस तरह से उभरे सामाजिक विभाजन, जैसा कि उल्लेख किया गया, कठोर, गैर-लचीले तथा गैर-बराबरीपूर्ण थे और उन्होंने भयानक असमानताओं को जन्म दिया। मनुष्यों तथा सामाजिक समूहों के बीच सुविधा-प्राप्ति, सुविधाहीनता और असमानताएं पैदा की। यद्यपि यह अत्यधिक पक्षपातपूर्ण व्यवस्था थी, फिर सुविधाहीनता असमानताएँ पैदा की। यद्यपि यह अत्यधिक पक्षपातपूर्ण व्यवस्था थी, फिर भी इसके खिलाफ जो कुछ किया अथवा कहा जा सका, वह बहुत थोड़ा ही था, क्योंकि इसे हिन्दू विचारधारा का समर्थन हासिल था, खासतौर से निम्न जाति और अशुद्ध जन्म तथा व्यवसाय के खिलाफ उच्च एवं शुद्ध जन्म तथा व्यवसाय की धारणा का दूसरे शब्दों में हिन्दू उतना ही अधिक एक सामाजिक व्यवस्था थी, जितनी कि वह एक धर्म था तथा इसने एक ऐसा विचारधारात्मक ढाँचा उपलब्ध कराया, जिसके आधार पर हिन्दू समाज का उदय हुआ।

दूसरे शब्दों में, हिन्दू धर्म, एक धर्म तथा सामाजिक तानाबाना, दोनों ही था, जिसने कि हिन्दुओं के जीवन, वह किस जाति में पैदा हुआ, जोकि उसके कार्यों अथवा कर्म को निर्धारित करती था, ब्राह्मण का एक अंश होना, तथा मोक्ष अथवा अपनी आत्मा की स्वाधीनता अथवा अतरत्व प्राप्त करने का लक्ष्य रखना, आदि जैसे कारकों से ही नियंत्रित रहता था। इसके अलावा यह याद रखना चाहिये कि हिन्दू धर्म कोई ऐसा उद्घाटित धर्म नहीं था, जिसका कि कोई एकमात्र मूलपाठ हो। हिन्दू धर्म के विकास के प्रत्येक चरण के साथ नये धर्मग्रंथ तथा मूलपाठ सम्मिलित होते गये । इस तरह हमें वेद, उपनिषद पुराण तथा भागवत् गीता भी उपलब्ध हो सकी । यद्यपि हमने इस बात पर बल दिया है कि जाति प्रथा एक ऐसी व्यवस्था थी जिसने हिन्दू भारत के जीवन के आधार की रचना की और वह कठोर तथा अपरिवर्तनीय थी, फिर भी धर्म के विकास की अवस्थाओं के दौरान अनेक जाति प्रथा-विरोधी आन्दोलन उभर कर सामने नहीं आये । हम छठी सदी ई. पू. में बौद्ध एवं जैन धर्म की मौजूदगी का उल्लेख पहले ही खंड-5 (इकाई 20, ईएसओ-15) में कर चुके हैं, जिन्होंने जातिगत विभाजनों तथा सामाजिक गैर-बराबरी के विरुद्ध आवाज उठाई थी। यह संघर्ष आगे बढ़ता गया और मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन अथवा एक ही ईश्वर के प्रति पूरे तौर पर समर्पित हो जाने की भावना के उदय के साथ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा जिसके मद्देजर इस इकाई का विशेष रूप से महत्व है।

(हिन्दू धर्म की काफी आलोचना की गई और उसने अपने विरुद्ध अनेक आन्दोलनों का सामना किया, इस पाठ्यक्रम ईएसओ-15 के खंड 5 में हिन्दू धर्म पर आधारित इकाई 19 देखें जो एक पृष्ठभूमि प्रदान करेगी) इसमें भी भक्ति आन्दोलन का काफी महत्व है। इसकी वजह यह है कि हालांकि भक्ति आन्दोलन हिन्दू धर्म की कुछ मान्यताओं के विरोध में था, फिर भी भावी युगों में हिन्दू धर्म के विकास के दौरान काफी कुछ, जो कि हिन्दू धर्म का हिस्सा बना, भक्ति परंपरा का ही परिणाम था। इस परंपरा का दरअसल उत्तर से दक्षिण भारत तक व्यापक प्रसार था । हम उत्तर व दक्षिण में इसके विकास की रूपरेखा अलग-अलग प्रस्तुत करेंगे।

भक्ति परंपरा: दक्षिण (The Bharti Tradition : South)
अब हम दक्षिण भारत में कृष्ण भक्ति परंपरा के विकास का पता लगायेंगे जोकि आठवीं सदी के आसपास देखने को मिली । आठवीं सदी के दौरान तमिल देश में ऐसे व्यक्तियों का उदय हुआ जो कि स्वयं को अलवर कहते थे, अर्थात वे मनुष्य जिसे ईश्वर से भाव-प्रवणता एवं ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ है तथा उन्होंने ईश्वर के साथ अत्यन्त निकटता वाले व्यक्तिगत संबंध होने का दावा किया था। उन्होंने समाज के सभी तबकों से, अपने आन्दोलनों में साधुओं की भर्ती करके तथा एक भाषा के रूप में संस्कृत को प्रयोग में लाने से इन्कार करते हुए, क्योंकि इसकी प्रकृति ब्राहमणवादी थी, जाति-प्रथा को अस्वीकार कर दिया। इसमें एक महत्वपूर्ण संत हुए, जिनका नाम‘अलवर था जिन्होंने ईश्वर तथा व्यक्ति की आत्मा की एकरूपता की बात कही। उन्होंने यह भी जोर दिया कि लोगों में असीम एवं गूढ़ आध्यात्मिकता ही मात्र ऐसा तरीका है जो अपने इष्टदेवा के प्रति कोई भी व्यक्ति दर्शा सकता है। उनके अन्य अनुयायी भी थे जैसे यमुनाचार्य तथा नाथमुनि, जिनके प्रयासों से भक्ति आन्दोलन का प्रसार तथा विकास हुआ। अलवरों के अलावा दक्षिण भक्ति आन्दोलन की अभिव्यक्ति 13वीं शताब्दी में रामानुज की रचनाओं के जरिए हुई। उसने बुनियादी तौर पर एक निजी देव की उपासना पर बल देने संबंधी योगदान दिया और कृष्ण की भक्ति में भागवत् गीता को एक प्रमुख रचना के रूप में देखा। वह सगुण परंपरा का प्रतिनिधित्व करता था।

वीरशैववाद पर आधारित इकाई 25 में वीरशैववाद तथा भक्ति के पहलुओं पर विचार किया म गया है। इस इकाई में हम इसके पहलुओं का उल्लेख करना चाहेंगे। कुल मिलाकर 12 अलवर हुए और भक्ति परंपरा में उनके योगदान का एक प्रमुख रूप उन भजनों में दिखाई दिया जो कि दैवीय ईश्वर को व्यक्ति की भक्ति को ग्रहण करने वाले के रूप में देखे जाने पर जोर देते थे। दक्षिण भारत में कृष्ण की भक्ति के उदय के अलावा हम वहाँ पर इष्ट देवता के रूप में शिव की पूजा का व्यापक प्रचलन देखते हैं। 12वीं शताब्दी में ही हम वीरशैव अथवा लिंगायतों के बाँधे बाजू वाले पंथ के रूप में इस परंपरा का उदय देखते हैं। इस पंथ का संस्थापक कल्याण रियासत का एक ब्राह्मण प्रधानमंत्री, बसवा था। इस परंपरा ने जाति-प्रथा तथा मूर्ति-पूजा दोनों का ही विरोध किया। मजेदार बात यह है कि हालांकि संस्थापक स्वयं एक ब्राह्मण था लेकिन आंदोलन ब्राह्मणवाद विरोधी चलाया जा रहा था। लिंगायत पहचान के रूप में चाँदी या पीतल में लिपटी लिंग की छवि गले में पहनने से पहचाना जाता था। यह लिंगम सभी लिंगायतों द्वारा पहना जाता था, चाहे उनका लिंग, आयु अथवा जाति कुछ भी क्यों न हो। लिंगम को पहनना उन सभी लोगों की एकरूपता का प्रतीक था जो कि इष्ट देव के रूप में शिव की पूजा करते थे। यह एक ऐसी परंपरा थी जिसने दो ट्रक ढंग से उस असमानता के विचार को अस्तीकार कर दिया, जिसे हिन्दू धर्म ने मानव के बीच में प्रतिपादित किया था। इसके दरवाजे सभी जातियों व तबकों के लिए खुले हुए थे और यह भी सभी को शिव लिंग की पूजा में समानता का दर्जा देता था। एक बार पुनः अलवरों की भाँति ही इस परंपरा का अधिकांश भाग कन्नड़ भाषा के गीतों, भजनों तथा कहावतों अथवा वचनों से मिलकर बना था। ये आवश्यक तौर पर ईश्वर के प्रति निजी समर्पण की भक्ति कविताएं थीं और साफतौर पर इन्होंने वैदिक धर्म की महान परंपरा को अस्वीकार किया। ये परंपरागत विश्वासों तथा मंत्रों का मजाक उड़ाती थी और वर्गीकृत विश्वास प्रणालियों, सामाजिक प्रचलनों, वैदिक अनुष्ठानों इत्यादि पर प्रश्न चिह्न लगाती थी।

कार्यकलाप 1
भारत के उत्तर/दक्षिण में रहने वाले अनेक हिंदू भाइयों से भक्ति परंपरा के बारे में बात कीजिए। यह देखिए कि उनकी प्रतिक्रियाएँ क्या हैं तथा वे दोनों भक्ति परंपराओं के बीच समानताओं तथा भिन्नताओं के बारे में क्या कहते हैं। अपने निष्कर्षों को अपनी नोट बुक के 2 से 5 पृष्ठों तक में लिख लीजिये और यदि संभव हो, तो अध्ययन केन्द्र के अन्य विद्याथियों के साथ उन पर चर्चा कीजिये।

यदि इसे अधिक सरल शब्दों में कहें तो वीरशैववाद तथा लिंगायतवाद एक प्रतिरोध आन्दोलन था और भक्ति व निस्वार्थ रूप में स्वयं को भुला देने के तरीके के जरिये उसने हिन्दू धर्म की रूढ़िवादी तथा बहुदेववादी प्रकृति पर प्रहार किया। इसने न सिर्फ कृष्ण की उपासना पद्धति की भाँति, ईश्वर एवं भक्त की एकरूपता पर बल दिया बल्कि भक्त की मंदिर के साथ एकरूपता पर भी जोर दिया। इससे हमें घंटाकर्ण नामक शैव संत के बारे में एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा देखने को मिलती है जिसने एक उत्कृष्ट देवता के रूप में शिव की सर्वोच्चता का अहसास करने के पश्चात अपने शरीर को शिव की सेवा में प्रस्तुत किया। यह किसी देवता के समक्ष अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का सर्वोच्च बलिदान है। पौराणिक कथा के अनुसार घंटाकर्ण का शरीर एक शिव मंदिर में प्रवेश-द्वार में परिणित हो गया, उसकी बाँहें दरवाजे की चैखटों में बदल गईं तथा उसका सिर मंदिर की घंटी बनगया । समर्पित भक्त की भक्ति का उत्कर्ष इस तरह का था। भक्ति की इस परंपरा की दक्षिण में लोकप्रियता का मुख्य कारण वह सामाजिक बदलाव था जिसे इसने जीवन के सभी क्षेत्रों में समाज के कमजोर तथा गरीब तबकों के सामाजिक उत्थान की दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया था। इसके अलावा चूँकि दक्षिण भारत में भक्ति परंपरा का केन्द्र-बिन्दु जनता की भाषा में भक्ति गीतों का प्रयोग में लाना था, इसने जनता की एकता स्थापित करने में योगदान किया।

 भक्ति परंपरा: उत्तर (The Bhakti Tradition : North)
हम यह पाते हैं कि भक्ति परंपरा दक्षिण भारत से मध्य तथा उत्तरी भारत तक फैल गई। इनमें से प्रत्येक ने वैष्णव तथा शैव दोनों भक्ति परंपराओं में अपने स्थानीय पारंपरिक विश्वासों तथा भक्ति के रूपों को भी जोड़ लिया। इस तरह हम मध्य भारत में, खासतौर से मराठी क्षेत्र में, कृष्ण-भक्ति का भारी प्रभाव देखते हैं। यहाँ पर इसके सबसे ज्यादा प्रसिद्ध संत तुकाराम (1598-1649) हुए। वह तथा उनके अनुयायी ‘‘विटोबा‘‘ अथवा ‘‘बिठाला‘‘ स्वरूपों में कृष्ण की पूजा किया करते थे। यहाँ देखने योग्य मुख्य बात यह थी कि ईश्वर के साथ एकरूपता हो जाना अथवा उसके साथ विलय हो जाने के जरिए स्वयं अपने भीतर से मुक्ति की कामना करना। लगभग 15वीं शताब्दी के आसपास ही कहीं जाकर, अलवरों वल्लभाचार्य (1479-1531) के आध्यात्मिक वंशज उत्तर की तरफ अग्रसर हुए तथा उन्होंने मथुरा क्षेत्र में कृष्ण की उपासना पद्धति में नई जान डाल दी। यह आज तक कृष्ण-भक्ति के शायद सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में मौजूद हैं । इस काल में भक्ति से संबंधित तीन प्रमख हस्तियाँ हैं रू सरदास (1485-1563), जिन्होंने कृष्ण में स्वयं अपने विलीन हो जाने की बात कही, मीराबाई (1500-1550) जिन्होंने ‘‘गिरधर गोपाल‘‘ के रूप में कृष्ण की भक्ति करते हुए मेवाड़ की रानी की अपने हैसियत को ठुकरा दिया।

मीराबाई की भक्ति से हम सभी परिचित हैं। यह विश्वास किया जाता है कि उनके समर्पण की तीव्रता इतनी अधिक थी कि कृष्ण ने उनकी आत्मा को स्वयं अपनी आत्मा में विलुप्त कर लिया था। अन्त में हम इस काल में चैतन्य महाप्रभु (1485-1533) द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हैं। मथुरा को भक्ति केन्द्र के रूप में स्थापित करने में चैतन्य ने समर्पण के बारे में ज्ञान होना और सबसे बड़ा दुःख कृष्ण से अलग हो जाने अथवा विरह को बताया है, पुनः उन्होंने यह शिक्षा दी कि प्रत्येक भक्त को कृष्ण के साथ एकाकार होने की अपनी खोज में उसी तरह की प्रवणता वाली भावना को आत्मसात कर लेना चाहिए जो राधा तथा गोपियों की कृष्ण के प्रति थी। हालांकि, आन्दोलन अब सभी सामाजिक समूहों तथा जातियों के लिए खुला था, किन्तु यह जाति-प्रथा से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सका।

बॉक्स 24.01
चैतन्य का जन्म 1485 में बंगाल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह वह समय था जबकि बंगाल लगभग 300 वर्षों तक मुस्लिम नियंत्रण के अधीन रहा था। मुस्लिम शासन के तहत हिन्दू धर्म की हैसियत घटकर एक रूढ़िवादी जीवनशैली तथा पूजा के दर्जे पर आ गई थी। चैतन्य ने बचपन में संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की। जब वे बड़े हुए तो एक स्कूल में अध्यापक बन गये और उस समय वे भक्ति को अस्वीकार करते थे। धर्म में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि वे इस तथ्य को नजरंदाज नहीं कर सकते थे कि उनके सभी 8 बड़े भाई व बहनों की मृत्यु उनके सामने ही हुई थी। गया के एक पूजास्थल में उनकी भेंट संन्यासी ईश्वर पुरी से हुई और इस मुलाकात ने उनके जीवन में बदलाव ला दिया। उन्हें रहस्यवादी दृश्य दिखाई देने लगे जिन्हें वे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते थे। ईश्वर पुरी ने उन्हें एक मंत्र दिया और चैतन्य कृष्ण के उपासक बन गये।

यहाँ तक कि आज भी हम मथुरा, खासतौर से वृन्दावन में, यह पाते हैं कि किस तरह से लोगों के जीवन, घर, तथा मंदिर में एक बालक के रूप में तथा गोपियों के युवा प्रेमी के रूप में कृष्ण की भक्ति से पूरे तौर पर वे सभी बंधे हुए हैं। मथुरा के निकट इस छोटे से नगर में, लोग उस समय सो कर उठते हैं जब मंदिर में कृष्ण सो कर उठते हैं, वे तभी भोजन करते हैं जब वे भोजन कर लेते हैं, तभी सोते हैं जब वे सोते हैं तथा उनका हर पल कृष्ण के ध्यान में इस तरह से समर्पित है कि वे एक दूसरे का अभिवादन भी ‘राधे-राधे‘ कहकर करते हैं। वे उनके जीवन, ईश्वर के जीवन में इस तरह से लीन हो चुके हैं। उत्तर भारत की यही भक्ति सगुण भक्ति के सबसे अच्छे उदाहरण का प्रतिनिधित्व करती है।

भक्ति आन्दोलन, यहाँ से और आगे उत्तर पूर्व की दिशा में फैला और 16वीं शताब्दी में असम तक पहुँच गया जहाँ के मैथी नामक आदिवासी वैष्णव हैं। वैष्णव परंपरा के अलावा उत्तर में पहँचने पर हम शिव भक्ति का भी उत्तर भारत में गहरा प्रभाव देखते हैं। खासतौर पर कश्मीर में। इसके, सबसे महान अनुयायी एवं प्रतिपादक अभिनवगुप्त तथा बाद में कुछ कश्मीरी महिला संतों में से एक लल्ला थी। यद्यपि यहाँ शिव-भक्ति के अनेक अनुयायी थे। किन्तु परंपरा की व्याख्याओं का अनुसरण करना उनके लिए कठिन था, फिर भी उनकी तादात समाप्त नहीं हुई और शिवरात्रि का पर्व कश्मीर में आज भी धूमधाम से मनाया जाता है। इस बात पर पुनः ध्यान दें कि भक्ति परंपरा इतनी लोकप्रिय कैसे बनी। पुनः हिन्दू धर्म के कठोर एवं परंपरावादी चरित्र के चलते, जो कि ईश्वर के समक्ष मानव की गैर-बराबरी पर बल देता था और इस तरह देवताओं तथा धर्म तक सभी मनुष्यों के समान रूप से पहुँचने की इजाजत नहीं देता था, भक्ति परंपरा ने एक विकल्प प्रस्तुत किया। यह समर्पण के जरिये पूजा का एक वैकल्पिक मार्ग था, जो कि समाज के सभी तकबों के लिये खुला हुआ था और उन सभी को ईश्वर के समक्ष समान रूप से पेश करता था तथा देवताओं तक उनकी पहुँच को संभव बनाता था। चूंकि इसने स्थानीय कहावतों, भाषा तथा गीतों का प्रयोग किया, यह जनता के ही बड़े हिस्से तक पहुँच सकी तथा समाज के सभी तबकों को प्रभावित कर सकी। इसने व्यक्ति तथा ईश्वर के बीच के रिश्ते को एक अत्यधिक व्यक्तिगत रिश्ते के तौर पर प्रतिष्ठित किया और बिचैलियों के जरिये पूजा करने की वैदिक पद्धति को अस्वीकार कर दिया। इसके अलावा जाति प्रथा को इसके द्वारा अस्वीकार किया जाना तथा इस प्रथा द्वारा प्रस्तावित असमानताओं को खारिज किया जाना, एक ऐसे मार्ग को प्रशस्त करना था जिसकी अभिलाषा समाज के एक विशाल हिस्से को थी। इस तरह से भक्ति ने दैवीय शक्तियों के साथ संबद्ध होने के एक ऐसे रास्ते को प्रस्तुत किया जो कि व्यक्तिगत, अनोखा तथा संतोषप्रद था।