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berkeley and hartley method in hindi diagram explain बर्कले हार्टले विधि को समझाइए क्या है ?

अर्द्धपारगम्य झिल्ली (Semipermeable Membrane) : अर्द्धपारगम्य का अर्थ है आधों को पार करने देने में योग्य, अतः ऐसी झिल्ली को अर्द्धपारगम्य झिल्ली। कहते हैं जो अपने में से विलायक अणुओं को तो गुजरने दे, लेकिन विलेय अणु उसमें से न गुजर सकें। प्रकृति में जन्तओं तथा वनस्पतियों की कोशिकाओं के आवरण पित्ताशय, आदि अर्द्धपारगम्य झिल्ली के रूप। में कार्य करते हैं। लेकिन ये एकदम पूर्ण (perfect) अर्द्धपारगम्य झिल्ली की भांति कार्य नहीं करते, अतः प्रयोगशाला में परासरण के लिए कृत्रिम अर्द्धपारगम्य झिल्ली को बनाया जाता है।

अर्द्धपारगम्य झिल्ली को बनाना (Preparation of Semipermeable Membrane) : जर्मन रसायनज्ञ ट्रॉबे (Traube) ने पाया कि किसी जिलेटिनी अवक्षेप की परत एक पूर्ण रूप से। अर्द्धपारगम्य झिल्ली का कार्य करती है।

कॉपर फेरोसायनाइड Cu2[Fe(CN)6] के जिलैटिनी अवक्षेप से बनायी गयी झिल्ली सर्वश्रेष्ठ अर्द्धपारगम्य झिल्ली होती है और इसे निम्न प्रकार से बनाया जा सकता है

एक सरन्ध्र पात्र (Porous pot) को पहले अम्ल विलयन, फिर जल, फिर क्षार और अन्त में आसत जल से भली-भांति धोकर फिर आसुत जल में इबोकर कुछ घण्टों के लिए रख दिया जाता है। ऐसा करने से। दाब के साथ जल उसके छिद्रों में घुसकर उसमें विद्यमान वायु को बाहर निकाल देता है। अब इस पात्र को 2.5% कॉपर सल्फेट विलयन से भरकर एक बीकर में रखते हैं जिसमें 2.5% पोटैशियम फेरोसायनाइड विलयन भरा रहता है। एक कॉपर इलेक्ट्रोड को सरन्ध्र पात्र के भीतर व एक प्लैटिनम इलेक्ट्रोड को बाहर के बीकर में डुबो देते हैं और दोनों इलेक्ट्रोडों को बैटरी से जोड़कर इसमें विद्युत् प्रवाहित करते हैं (चित्र 9.14)।

Cu2+ आयन सरन्ध्र पात्र से बाहर कैथोड की तरफ आयेंगे, जबकि फेरोसायनाइड आयन [Fe(CN)6]4 बाहर से सरन्ध्र पात्र में उपस्थित ऐनोड की तरफ आयेंगे। इस प्रकार बीच के छिद्रों में ये

2Cu2+ + [Fe(CN)6]4 +Cu2 [Fe(CN)6]

आयन परस्पर एक-दूसरे के सम्पर्क में आयेंगे और छिद्रों के मध्य एक क्यूपिक फेरोसायनाइड की झिल्ली बन जायेगी

2Cu2+ + [Fe(CN)6]4-→Cu2[Fe(CN)6]

इस प्रकार एक स्थायी एवं दक्ष (perfect) अर्द्धपारगम्य झिल्ली का निर्माण हो जाता है।

परासरण दाब का नियम एवं उसका निर्धारण (OSMOTIC PRESSURE RULE AND ITS DETERMINATION)

जैसा कि हमने ऊपर बताया कि शुद्ध विलायक व उसके विलयन को यदि एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक् किया जाये तो शुद्ध विलायक विलयन में विसरित होने लगता है अर्थात् परासरण की क्रिया चलती रहती है। यह क्रिया तब तक चलती रहती है अर्थात् विलायक का विसरण विलयन की ओर तब तक जारी रहता है जब तक कि विलयन में शुद्ध विलायक के आने के कारण उत्पन्न बालिका pressure उस दाब के बराबर न हो जाये जो शुद्ध विलायक को परासरण के परिणामस्वरूप विलयन की ओर धकेलता है, इस बल का माप (measure) परासरण दाब (osmotic pressure) , परासरण दाब व द्रवस्थैतिक दाब बराबर हो जाते हैं, तो परासरण रुक जाता है। दूसरे शब्दों में, जब परासरण रुक जाये उस समय का द्रवस्थैतिक दाब उस विलयन के परासरण दाब का माप है। अर्थात् किसी विलयन का परासरण दाब

P = h x p ………………..(25)

जहां h = विलयन में चढ़े हुए द्रव की ऊंचाई p = विलयन का घनत्व।

परासरण दाब की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए हम एक सरल-सा प्रयोग करते हैं

एक प्याले में शर्करा विलयन लेते हैं, जिसकी दीवारें -पिस्टन अर्द्धपारगम्य झिल्ली की भांति कार्य करती हों और जिसके ऊपर वजन का ढक्कन एक वायुरुद्ध पिस्टन के रूप में हो। इस प्याले को हम एक शुद्ध जल से भरे हुए बीकर में रखते हैं। परासरण विलयन के प्रभाव से बीकर से विलायक प्याले की ओर प्रसरित होगा जिससे अर्द्धपारगम्य द्रव की सतह ऊंची होने लगेगी और पिस्टन ऊपर की ओर उठेगा, – झिल्ली झिल्ली लेकिन हम उस पिस्टन के ऊपर कुछ वजन रखकर उस सतह को E-विलायक बराबर रखेंगे (चित्र 9.15)। जब पिस्टन पर उपयुक्त वजन रख दिया जाता है तो परासरण द्वारा विलायक के प्याले के भीतर जाने चित्र 9.15. परासरण दाब का पापन की प्रवृत्ति और लगाये गये दाब के कारण विलायक के प्याले के बाहर आने की प्रवृत्ति एकदम बराबर हो जाती है और दोनों पात्रों के द्रव की सतह स्थिर रहती है और परासरण रुक जाता है। अतः परासरण दाब को हम निम्न प्रकार से परिभाषित कर सकते हैं

किसी अर्द्धपारगम्य झिल्ली (Semipermeable membrane) के द्वारा विलायक के विलयन में बहाव या परासरण को रोकने के लिए विलयन पर लगाया जाने वाला अतिरिक्त बल परासरण दाब (osmotic pressure) कहलाता है। परासरण दाव का मापन (Measurement of Osmotic Pressure) परासरण दाब के मापन के लिए निम्न में से किसी भी विधि का प्रयोग किया जा सकता है

(1) फेफर विधि (Pfeffer’s method) — इस विधि में क्यूपिक फेरोसायनाइड से युक्त एक सरन्ध मैनोमीटर पात्र में उस विलयन को ले लेते हैं जिसका परासरण दाब ज्ञात करना है। स्टॉपर से बन्द करके इसकी पार्श्व नली को मैनोमीटर के साथ जोड़ देते हैं और फिर इस उपकरण को शुद्ध जल से भरे हुए एक बीकर में रखते हैं। परासरण के कारण विलायक जल बीकर से सरन्ध पात्र की ओर प्रवेश करता है। सरन्ध पात्र में विलायक अणुओं के आने से द्रव का दाब विलयन बढ़ता है, जिससे मैनोमीटर में पारे का तल ऊपर अर्द्धपारगम्य झिल्ली की ओर चढ़ता है, जब वह स्थिर हो जाये तो उस जल दाब को नोट कर लेते हैं, यही विलयन का परासरण दाब है (चित्र 9.16

(2) मोर्स एवं फ्रेजर विधि (Morse and Frazer’s method) : मोर्स एवं फ्रेजर ने फेफर विधि को । विपरीत कर दिया। इस विधि में एक सरन्ध पात्र में शुद्ध विलायक लेकर उसे कांसे brone के एक सिलिण्डर में मैनोमीटर फिट किया जाता है। इस सिलिण्डर में पदार्थ का विलयन लिया जाता है और इसके दूसरे सिरे पर एक मैनोमीटर फिट किया हुआ रहता है। सरन्ध्र पात्र को एक नली T से जोड़ दिया जाता है जो दोनों सिरों से खुली है। अतः विलायक का दाब 1 वायुमण्डलीय होगा। परासरण के कारण विलायक सरन्ध्र पात्र से सिलिण्डर में आयेगा जिससे विलयन विलयन का दाब बढ़ जायेगा। इस दाब को मैनोमीटर नोट कर लिया जाता है जो कि परासरण दाब को प्रदर्शित करता है। इस विधि द्वारा 270 वायुमण्डल तक के परासरण विलायक दाब को मापा जा सकता है। उपकरण को सरल रेखाचित्र 9.17 द्वारा दर्शाया गया है।

(3) बर्कले व हर्टले विधि (Berkeley & Hartley’s method) : बर्कले व हर्टले विधि में उपर्युक्त दोनों विधियों के विपरीत क्रिया होती है। उपर्युक्त दोनों विधियों में विलायक द्वारा विलयन में विसरण के कारण उत्पन्न दाब को मापा जाता है। इसके विपरीत बर्कले व हर्टले विधि में विलयन में विलायक के प्रवेश को रोकने के लिए, विलयन पर दाब लगाया जाता है और इस दाब को मापा जाता है जो कि परासरण दाब के बराबर होता है।। क्यूप्रिक सायनाइड की अर्द्धपारगम्य झिल्ली युक्त एक सरन्ध्र पात्र को विलायक जल से भर दिया जाता है। इसके चारों ओर के जैकेट में वह द्रव भर दिया जाता है जिसका परासरण दाब ज्ञात करना है (चित्र 9.18)। सरन्ध्र पात्र के एक ओर मुड़ी हुई नली युक्त थिसिल कीप B लगी रहती है जिसके द्वारा विलायक की इच्छित मात्रा प्रवेशित करायी जाती है। इसके दूसरी ओर एक मुड़ी हुई नली A लगी रहती है जिसमें विलायक की सतह को निश्चित किया जाता है। नली A में विलायक की सतह गिर जायेगी यदि परासरण द्वारा विलायक बाहरी जैकेट में विसरित होगा। बाहरी जैकेट के एक ओर एक पिस्टन P लगा रहता है। परासरण की क्रिया द्वारा सरन्ध्र पात्र से विलायक बाहरी जैकेट के विलयन में न जा सके और नली A में द्रव की सतह की स्थिति वैसी ही बनी रहे इसके लिए पिस्टन P पर बाहरी दाब लगाना पड़ता है; यही दाब परासरण दाब होता है।

परासरण दाब के नियम (The Laws of Osmotic Pressure)

वाण्ट हॉफ ने तनु विलयनों के परासरण दाब पर विलयन की सान्द्रता व ताप का अध्ययन करके कुछ नियम दिये जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है

  1. परासरण दाब पर सान्द्रता का प्रभाव (Effect of concentration on osmotic pressure)-बर्कले । एवं हर्टले विधि द्वारा इक्षु शर्करा (sucrose) के विभिन्न सान्द्रता वाले जलीय विलयनों के लिए परासरण दाब के मान निम्न सारणी में दिये जा रहे हैं

सारणी 9.4.0°C पर स्यूक्रोस विलयनों के परासरण दाब

सान्द्रता (c) (g dm-3) परासरण दाब p (atm) आयतन (V) जिसमें स्यूक्रोस का 1 पोल हो (dm3) PV (dm3 atm)
2.02

10.0

20.0

45.0

93.7

0.134

0.66

1.32

2.97

6.18

169.30

34.20

17.10

7.60

3.65

22.7

22.6

22.6

22.6

22.5

 

उपर्युक्त सारणी का अवलोकन करने से निम्न निष्कर्ष निकाल सकते हैं

(1) किसी विलयन की सान्द्रता बढ़ने के साथ उसके परासरण दाब के मान में वृद्धि होती जाती है।

अर्थात्  p = c ………….. (26)

P = 1/v ……………..(27)

  • सान्द्रता का मान चाहे कुछ भी हो एक निश्चित ताप पर TXV का गुणनफल एक स्थिरांक होता है। अर्थात् PV = Constant ………………(28)

उपर्युक्त प्रेक्षण गैसों के लिए बॉयल नियम के अनुरूप है। हम जानते हैं कि बॉयल के नियमानुसार स्थिर ताप पर किसी गैस का आयतन उसके दाब के व्युत्क्रमानुपाती होता है, अर्थात्

P – 1/V (स्थिर ताप पर)

अथवा PV = Constant

और विलयनों के लिए हम कह सकते हैं कि स्थिर ताप पर किसी विलयन का वह आयतन जिसमें विलेय का 1 मोल घुला हुआ हो उसके परासरण दाब के व्युत्क्रमानुपाती होता है। अर्थात

1/V (स्थिर ताप पर)

अथवा TV=Constant

इस सम्बन्ध को, बॉयल नियम के साथ समानता होने के कारण, तनु विलयनों के लिए बॉयल-वाण्ट हॉफ का नियम (Boyle-van’t Hoff’s law for dilute solutions) कहते हैं। सारणी 4 से एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है कि TV के गुणनफल का मान 22.6 dm atm है। यह सम्बन्ध ऐवोगैड्रो नियम के अनुरूप है। ऐवोगैड्रो नियम के अनुसार 0°C ताप व 1 वायुमण्डलीय दाब (N.T.P.) पर एक मोल गैस का आयतन 22.4 dm होता है। तनु विलयनों के लिए कहा जा सकता है कि

0°C ताप पर उस विलयन का आयतन 22.6dmहोता है जिसमें विलेय का एक मोल घुला हुआ हो और जिसका परासरण दाब 1 वायुमण्डलीय दाब हो। अर्थात् विलयनों पर ऐवोगैड्रो का नियम (Avogadro’s | law) भी लागू होता है।