कृत्रिम कायिक प्रवर्धन क्या है ? (artificial vegetative propagation in hindi) प्रकार कायिक प्रवर्धन किसे कहते है

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(artificial vegetative propagation in hindi) कृत्रिम कायिक प्रवर्धन क्या है ? प्रकार कायिक प्रवर्धन किसे कहते है उदाहरण बताइए अर्थ परिभाषा लिखिए |

3. पत्तियों के द्वारा कायिक प्रवर्धन (vegetative propagation by leaves) : पत्तियों के द्वारा सामान्यतया कायिक प्रवर्धन की प्रक्रिया बहुत अधिक नहीं देखि गयी है। फिर भी कुछ पौधों , जैसे पत्थरचिटा की विभिन्न प्रजातियों में पत्तियों के द्वारा कायिक रूप से प्रवर्धित होने की अभूतपूर्व क्षमता होती है। इन पौधों में पूरी तरह साबुत पत्तियों के उपान्तो या किनारों की नुकीली सतह पर पादपक अथवा छोटे पादप उत्पन्न हो जाते है। जब पत्तियाँ मुख्य पादप शरीर पर लगी होती है , तभी इन पादपकों की उत्पत्ति हो जाती है। अंततः ये पादपक जनक पत्ती अथवा पौधे से टूटकर अलग हो जाते है और स्वतंत्र रूप से नीचे पौधे का निर्माण करते है। ब्रायोफिल्लम की कुछ अन्य प्रजातियों में पत्ती के मुख्य पादप शरीर से अलग होने के बाद ही पादपक विकसित होते है। व्यावसायिक स्तर पर पत्तियों के द्वारा कायिक प्रवर्धन विभिन्न आर्थिक महत्व के पौधों जैसे बिगोनिया , स्ट्रेप्टोकार्पस और सेंटपालिया में किया जाता है। इन पौधों की पत्तियों को टुकड़ों में काट लिया जाता है और इनको मिट्टी में रोपकर नए पौधे तैयार कर लिए जाते है। कई बार कुछ अन्य पौधों में पत्तियों के टुकड़ों की अपेक्षा पूरी पत्ती को ही कायिक प्रवर्धन के लिए मिट्टी में रोपा जाता है।

4. पत्र प्रकलिका द्वारा कायिक प्रवर्धन (vegetative propagation by bulbils) : आवृतबीजी पौधों में पुष्प मुख्यतः लैंगिक जनन से सम्बन्धित होते है। फिर भी कुछ पौधों , जैसे – अगेव की कुछ प्रजातियों में पुष्प एक विशेष प्रकार की संरचना पत्र कलिका में रूपांतरित हो जाते है। ये पत्र कलिकाएँ अपनी पत्तियों में प्रचुर मात्रा में खाद्य पदार्थो के संचय के कारण अत्यंत मांसल हो जाती है। परिपक्व हो जाने पर ये पत्र कलिकाएँ जनक पौधे से अलग होकर जमीन पर गिर जाती है और इनसे अपस्थानिक जड़ें उत्पन्न होती है जो भूमि में धँसकर इनको जमीन पर स्थिर कर देती है। कुछ समय बाद ये पत्र कलिकाएँ विकसित होकर नए पौधे का निर्माण करती है। पत्र कलिकाओं द्वारा कायिक प्रजनन की यह प्रक्रिया अनुकूल परिस्थितियों में काफी तेजी से होती है। पत्र कलिकाओं का निर्माण एक अन्य पौधे जटाशंकरी में भी देखा गया है।

प्राकृतिक कायिक जनन का महत्व (importance of natural vegetative propagation)

कृषि विज्ञानियों और उद्यान विज्ञानियों के द्वारा काफी लम्बे समय से प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन की विभिन्न संरचनाओं और विधियों का उपयोग व्यावसायिक स्तर पर कृष्य पौधों की फसलों के तैयार करने के लिए किया जाता रहा है। कायिक प्रवर्धन के लिए चुने गए पौधों के प्रवर्ध तैयार किये जाते है। किसी एक पौधे से प्राप्त पौधों की व्यष्टि अथवा सन्तति जिसके सभी सदस्य आनुवांशिक रूप से समान हो , प्रवर्ध कहलाती है। उदाहरण के तौर पर आलू का प्रवर्धन इनके कंद अथवा कंद के टुकडो से , अदरक और केला का प्रकंद के टुकडो से प्याज का प्रवर्धन शल्क कंद से और पोदीना का प्रवर्धन अंत:भूस्तारी तने के द्वारा किया जाता है।
आलू में प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन के लिए सम्पूर्ण स्तम्भ कंद अथवा इनके छोटे टुकड़े प्रयुक्त किये जाते है। प्रत्येक टुकड़े में कम से कम एक कलिका अथवा आँख अवश्य होती है जिससे मिट्टी में दबाये जाने पर ये पादप में अंकुरित हो सके। अदरक और केले में इनके प्रकंद को छोटे छोटे टुकड़ों के रूप में काट लिया जाता है और ये टुकड़े मिट्टी में रोप दिए जाने पर नए पौधे के रूप में विकसित हो जाते है। कृषि विज्ञानिकों और उद्यान विज्ञानियों द्वारा विभिन्न पौधों की भूमिगत रूपांतरण संरचनाओं को भी प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन के लिए इस्तेमाल किया जाता है , जैसे – ग्लेडिओलस में घनकंद , प्याज और लहसुन में पत्रकंद और पोदीना और गुलदाउदी में अंत:भूस्तारी का उपयोग प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन के लिए किया जाता है।
अनान्नास और साइकस में मांसल पत्रकलिकाओं को मुख्य पादप शरीर से अलग कर लिया जाता है और इनको स्वतंत्र रूप से भूमि अथवा गमलों में रोपण करके इनसे नए पौधे तैयार किये जाते है। इसी प्रकार से डहेलिया और शकरकंद की कंदिल जड़ें अथवा इनके टुकड़ों का उपयोग व्यावसायिक स्तर पर कायिक प्रवर्धन के लिए किया जाता है।

कृत्रिम कायिक प्रवर्धन (artificial vegetative propagation)

कायिक प्रवर्धन की प्राकृतिक विधियों के अतिरिक्त किसानों और उद्यान विज्ञानियों के द्वारा कायिक प्रवर्धन की अनेक कृत्रिम विधियों का विकास किया गया है , जिनके द्वारा आर्थिक महत्व के फल उत्पादक पौधों और सजावटी पौधों की श्रेष्ठ और उन्नत किस्में प्राप्त की गयी है। सर्वप्रचलित कृत्रिम विधियों में कटिंग , प्रत्यारोपण और स्तरण के नाम उल्लेखनीय है। इनके अतिरिक्त आजकल उद्यानविज्ञानियों द्वारा अन्य परिष्कृत विधियों जैसे सूक्ष्म प्रवर्धन अथवा ऊतक संवर्धन तकनीक का उपयोग भी कृत्रिम कायिक प्रवर्धन के लिए बहुतायत से किया जा रहा है। इनमें से कुछ प्रमुख और बहुप्रचलित विधियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार से है –
1. कर्तन (cutting) : समूचे विश्व में किसानों , नर्सरी प्रबंधकों और मालियों के द्वारा इस प्रक्रिया का उपयोग कृत्रिम कायिक प्रवर्धन के लिए बहुतायत से किया जाता है। इस प्रक्रिया में पौधे के या इसकी शाखा के किसी कायिक भाग विशेषकर तने के कटे हुए टुकड़े को जमीन में रोप कर , इससे नया पौधा विकसित किया जाता है। वैसे कायिक प्रवर्धन की इस प्रक्रिया में आवश्यकतानुसार पौधे की किसी भी कायिक संरचना , जैसे – जड़ , तना अथवा पत्ती का उपयोग किया जा सकता है लेकिन इस विधि के द्वारा कायिक प्रवर्धन के लिए अनेक पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है जैसे प्रवर्धन की उपयुक्त लम्बाई , व्यास , आयु और रोपाई के लिए उपयुक्त मौसम आदि महत्वपूर्ण बिंदु है जो कि विधि द्वारा कृत्रिम प्रवर्धन की सफलता को प्रभावित करते है। अत: किसी भी पौधे में कर्तन द्वारा कायिक प्रवर्धन करवाते समय उपर्युक्त सभी कारकों को ध्यान में रखना चाहिए। स्तम्भ का कटिंग अथवा कर्तन द्वारा कायिक प्रवर्धन के प्रमुख उदाहरणों में गन्ना , अंगूर , गुलाब और बोगेनविलिया का उल्लेख किया जा सकता है। परन्तु कर्तन विधि के अंतर्गत सभी पौधों में स्तम्भ कर्तकों अथवा टुकड़ों को जमीन में रोपने पर उनमें अपस्थानिक जड़ें उत्पन्न नहीं होती। अत: इनका कायिक प्रवर्धन भी कर्तन विधि के द्वारा संभव नहीं होता। कुछ अन्य पौधों में कायिक भागों विशेषकर तने के टुकड़ों को जमीन में रोपने पर शुरू में तो जड़ें उत्पन्न नहीं होती लेकिन यदि इनके आधारीय सिरों को कुछ हार्मोन्स जैसे IAA (indole acetic acid) , IBA (indole butyric acid) अथवा NAA (naphthalene acetic acid) के द्वारा उपचारित किया जाए तो इनसे अपस्थानिक जड़े उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार कर्तन द्वारा इनका कायिक प्रवर्धन सफल होता है।

2. स्तरण (layering in plants)

कृत्रिम कायिक प्रवर्धन की इस प्रक्रिया में मुख्य पादप शरीर से कायिक भाग अथवा तने के हिस्से को अलग करने से पहले ही , इस कायिक भाग अथवा तने में अपस्थानिक जड़ों की उत्पत्ति को अभिप्रेरित किया जाता है , यह प्रक्रिया अनेक विधियों के द्वारा संचालित की जाती है , जिनमें से प्रमुख विधियों निम्नलिखित है –
(i) दब्बा लगाना (mound layering) : कृत्रिम प्रवर्धन की इस प्रक्रिया को अनेक पौधों जैसे चमेली और कामिनी में इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में पौधे के तने की किसी निचली अथवा आधारीय शाखा को आंशिक रूप से पर्णविहीन कर दिया जाता है। इसके बाद इस पर्णरहित शाखा को झुकाकर जमीन के समीप ले आते है और फिर इसे जमीन में घुसाकर इसके चारों तरफ नम अथवा गीली मिट्टी लगा देते है। शाखा को मुख्य तने पर ही बने रहने देते है और इसके मध्य वाले हिस्से की भूमि में गाडा जाता है। इस प्रकार गीली मिट्टी लपेट कर निचली टहनी को गाड़ने की प्रक्रिया को दब्बा लगाना (लेयर) कहते है। कुछ समय के बाद शाखा अथवा तने के इस दबे हुए हिस्से से जमीन के अन्दर ही अपस्थानिक जड़ें फूटने लगती है। ये जड़ें भली भाँती जब विकसित हो जाती है तो इस जड़ युक्त पौधे की आधारीय टहनी या शाखा मुख्य पौधे के रूप में विकसित हो जाती है लेकिन दब्बा लगाते समय यदि टहनी की छाल क्षतिग्रस्त हो जाए तो इससे अपस्थानिक जड़ें जल्दी फूटती है , कई बार यह भी होता है कि उद्यानविज्ञानी अथवा बागवान , अपस्थानिक जड़ों के निर्माण को जल्दी करने अथवा जड़ों को बढ़वार में जान बुझकर शीघ्रता करवाने के लिए टहनी में तिरछा चीरा ऊपर की तरफ लगाते है अथवा ऊपरी छाल को और वलय अथवा झल्ले के रूप में अलग कर देते है या टहनी की मोटाई के आधे भाग में V आकार का कट लगा देते है , उपर्युक्त तीनों प्रक्रियाएँ दब्बे में अपस्थानिक जड़ों के विकास को त्वरित कर देती है। चेरी के पौधे में टहनी अथवा दब्बे से अपस्थानिक जड़ें बिना चीरा लगाये हुए भी जल्दी फूट जाती है।
(ii) गुट्टी अथवा मुकुलन (air layering) : यह कृत्रिम कायिक प्रवर्धन की प्रक्रिया उन पौधों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जिनकी शाखाएँ नीचे जमीन के पास नहीं होती अथवा बहुत ऊपर होती है अथवा जिनको जमीन के पास लाना संभव नहीं होता। अनार , नारंगी , अमरुद और लीची ऐसे ही कुछ पौधों के उदाहरण है। इस प्रक्रिया में कृत्रिम प्रवर्धन के लिए , शाखा अथवा तने में छाल की बाहरी परत अथवा वलय को हटा देते है अथवा ऊपरी किनारे की तरफ एक तिरछा चीरा लगा देते है। अब इस कटे हुए हिस्से के चारों तरफ गीली रुई अथवा गीली मिट्टी अथवा गीली मॉस पादप संहति को लपेट देते है और इसके चारों तरफ गिला कपडा बाँध देते है। इस हिस्से को निरंतर नमी और ठण्डक प्राप्त होती रहे , इसके लिए मिट्टी अथवा रुई के गीलेपन को लगातार बनाये रखा जाता है। अब कुछ सप्ताहों के पश्चात् इस कटें हुए क्षतिग्रस्त भाग से अपस्थानिक जड़ें फूटने लगती है। इसके बाद जड़युक्त शाखा को मुख्य पौधे से अलग करके मिट्टी में रोप दिया जाता है और उचित सार संभाल की जाती है जिससे यह नए पौधे के रूप में विकसित हो जाता है।