मानवीय क्रियाएँ एवं भ-आकृति विज्ञान का उपयोग क्या हैं ? APPLICATION OF GEOMORPHOLOGY TO HUMAN ACTIVITIES

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APPLICATION OF GEOMORPHOLOGY TO HUMAN ACTIVITIES in hindi मानवीय क्रियाएँ एवं भ-आकृति विज्ञान का उपयोग क्या हैं ?

मानवीय क्रियाएँ एवं भ-आकृति विज्ञान का उपयोग
(APPLICATION OF GEOMORPHOLOGY TO HUMAN ACTIVITIES)
भूगोल पृथ्वी का अध्ययन मानव का निवास (Home of man) के रूपा में करता है। अर्थात् भूतल मानव व उसकी क्रियाएँ तथा भूतल पर पाये जाने वाले समस्त प्राकृतिक तत्व उसकी विषय वस्तु है। पृथ्वी का ऊपरी सतह व उस पर मिलने वाले विभिन्न तत्वों (संसाधनों) और उत्पादनों से मानव जीवन चलता है, अतः धरातल की भू-आकृतियाँ ही मानव जीवन को प्रभावित करती है। भू-आकृतियाँ भगोल में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भूगोल धरातल का विश्लेषण वर्तमान के संदर्भ में करता है, जिसके अन्तर्गत भूतकाल में उसको प्रभावित करने वाले कारणों एवं भविष्य के स्वरूपाों का आकलन किया जाता है। भू-आकृति विज्ञान (Geo Morphology) का निर्माण भू (Geo) ़ आकृति (Morpho) ़ विज्ञान (Science) से होता है, जिसका अर्थ है धरातल के विभिन्न रूपाों का वर्णन वैज्ञानिक अर्थात क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त करना धरातल पर ही समस्त मानवीय क्रियायें सम्पन्न होती हैं- चाहे वो खेती करना हो या खनिज खोदना या उद्योगों की स्थापना, परिवहन साधनों का निर्माण, बस्तियों का निर्माण, बाँध बनाकर बिजली उत्पादन इन सभी कार्यों में क्षेत्र की भू-आकृति प्रभाव डालती है। वो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये मैदानों, पहाड़ों, खनिजों, नदियों, झीलों या सागर का विभिन्न उपयोग करता है। नदी के जल से विद्युत बनाता है, सिंचाई कर फसल उगाता है, उसे परिवहन का साधन बनाता है। महासागरों से मछली पकड़ता है, सागरीय लहरों से ऊर्जा उत्पादन करता है, सागरीय तली से खनिज तेल निकालता है। इस प्रकार विभिन्न भू-आकृतियाँ मानव की आवश्यकताओं व विकास का आधार बन जाती हैं।
वर्तमान समय में भू-आकृति विज्ञान का उपयोग मानव के आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास के साथ जुड़ गया है। पृथ्वी के विभिन्न भागों में समस्याओं के निवारण, पर्यावरण संरक्षण, भू-संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग (Optimum Utilçation) करने के लिये भू-आकृतिक सिद्धान्तों, तकनीकों एवं विश्लेषणों का प्रयोग किया जा रहा है। इसे व्यावहारिकी भू-आकृति (Applied Geomorphology) कहा जाता है। मानव को आधुनिक जीवन के क्रिया-कलापों के संचालन में भू-आकृति के अध्ययन व सहयोग की आवश्यकता होती है, जैसे बाँधों के निर्माण के लिये भू-स्खलन का आकलन, पर्वतों की चट्टानों की प्रतिरोधक क्षमता, जल प्रवाह व धरातल की संरचना का विस्तृत अध्ययन के पश्चात् बाँध के स्थान का चयन किया गया। इसी प्रकार राजस्थान में जल संग्रह के लिये उन्हीं स्थानों का चयन किया गया जहाँ बेण्टोनाइट क्ले पायी जाती है। यह पानी में फूल जाती है तथा पानी के रिसाव में अवरोधक बनती है। भू-आकृति विज्ञान से मानव अपने संसाधनों से परिचित होता है व उनके सही उपयोग के लिये मार्गदर्शन प्राप्त करता है। प्रदेश की भू-आकृति के आधार पर ही खेती की फसलें व विधियाँ तय होती है। नदियों के जल के समुचित उपयोग एवं बाढ़ पर नियन्त्रण नदी के अपवाह बेसिन के अध्ययन के बाद ही संभव है। नर्मदा नदी की बाढ़ा का सहायक नदियों पर छोटे बाँध बनाकर नियंत्रित किया गया। इससे आन्तरिक भागों में सिंचाई की सुविधा प्राप्त हुई व साथ ही साथ नर्मदा को बाढ़ का नियन्त्रण भी हो गया। किसी भी क्षेत्र या प्रदेश में भू-आकृति विज्ञान मानवीय क्रिया-कलापों को दो तरह से प्रभावित करता है –
(i) सामान्य नियमों व सिद्धान्तों के ज्ञान से प्रदेश के भौतिक स्वरूपा एवं स्थिति को समझना।
(ii) प्रदेश के संसाधनों के उपयोग एवं पर्यावरण प्रकोप से उन्हें सुरक्षित करना। दूसरे शब्दों में संसाधना मूल्यांकन एवं नियोजन करना।
भू-आकृति विज्ञान एवं मानव बसाव
मानव अधिवास भू-पृष्ठ पर एक महत्वपूर्ण मानव निर्मित तत्व है, जो मनुष्य की मूल-भूत आवश्यकता की पूर्ति करता है। भू-आकृति विज्ञान एवं अधिवासों के मध्य घनिष्ठ संबंध है। मानव ने अपनी सुरक्षा के लिये प्रारम्भ से ही प्रकृति का सहारा लिया है। पहले गुफाएँ उसका आश्रय थीं, आज गाँव व नगर उसके निवास स्थल हैं। भू-आकृति विज्ञान एवं अधिवास के मध्य संबंध तथा ग्रामीण अधिवास पर भू-आकृति नियंत्रण के अध्ययन को भारत में कई विद्वानों ने किया है, जिनमें प्रमुख हैं. आर.एल.सिंह, बी के. अस्थाना, सुरेन्द्र सिंही आर.के. राय सविन्द्र सिंह ऐवं ओझा आदि।
ग्रामीण अधिवासों की बनावट, आकार, स्थिति, क्षेत्र की भू-आकृति से तय होती है। गाँव के अधिकांश मकान ऊँचे भागों में स्थापित किये जाते हैं, ताकि बाढ़ आदि की प्राकृतिक आपदा से बचा जा सके एवं समतल उपजाऊ भूमि का उपयोग कृषि के लिये किया जाये। गाँवों में सड़कों, पगडंडियों का विकास, जल निकास की व्यवस्था, उस क्षेत्र की भू-आकृति के ज्ञान से ही निर्धारित होती है। क्षेत्र की चट्टानों की संरचना, मिट्टी, धरातल का ढाल बस्ती के मकानों के प्रकार को प्रभावित करता है। इसी प्रकार नगर का फैलाव, आकार तथा भूमि उपयोग भू-आकृति विज्ञान की सहायता से ही नियोजित किया जा सकता है। बढ़ती जनसंख्या एवं तीव्र गति से बढ़ते महानगरों में आने वाली समस्याओं का निदान भू-आकृति विज्ञान से किया जा रहा है। मास्टर प्लान का निर्माण भू-आकृतिक अध्ययन के बाद किया जाता है। इसके लिये धरातल मूल्यांकन, संरचना, जल की उपलब्धता कमजोर या अनुपयुक्त क्षेत्रों की पहचान व भूकंपीय क्षेत्रों की पहचान के आधार पर नगर के विकास की रूपारेखा तय होती है। हर प्रदेश की भौगोलिक स्थिति के अनुसार बस्तियों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उनके समाधान हमें भू-आकृतिक विज्ञान से ही मिलते हैं। जैसे भारत में थार मरुस्थलों में ग्रामीण व नगरीय बस्तियाँ बालुका स्तूप के पुनः सक्रिय होने से संकटग्रस्त है। इसका कारण वनस्पति का नाश, अत्यधिक कृषि व पशुचारण है। जयपुर नगर के आस-पास अत्यधिक खनन से बालू का जमाव बस्तियों व सड़कों पर होने लगा है, क्योंकि प्राकृतिक अवरोध खत्म हो गये हैं। इन समस्याओं का निदान क्षेत्र की हवाओं की दिशा व गति, भूमिगत जल स्तर के सुधार, बनस्पति द्वारा बालुका स्तूपों के स्थायीकरण से किया जा सकता है । इसी कार्य में भारत का मरुस्थल नियंत्रण बोर्ड लगा हुआ है। भू-आकृति विज्ञान इस प्रयास में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करता है।
इसी प्रकार मुम्बई नगर की सीवेज समस्या, यातायात समस्या एवं अधिवास समस्या का समाधान वहाँ की भू-आकृति अध्ययन के आधार पर नियम बनाकर ही किया जा सकता है। यह एक टापू पर स्थित है। अतः स्थल की कमी है। इसी कारण यहाँ बहुमंजिली इमारतों की अधिकता है। व्यावसायिक व औद्योगिक नगर होने के कारण इसे जल, विद्युत, श्रम व बाजार सभी की आवश्यकता है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी यह विशेष महत्व रखता है। इसी कारण मुम्बई का प्रसार उपनगरीय नियोजित किया गया। आवागमन के लिये रेल को मुख्य साधन बनाया गया तथा मुख्य भूमि से इसका संबंध जोड़ा गया। इस प्रकार नगर की भू-आकृति उसके स्वरूपा, विकास को निर्धारित करती है।
पर्वतीय क्षेत्रों में छोटी-बस्तियाँ मिलती हैं, जबकि मैदानों व नदी तट पर विशाल नगर व गाँव बसे हुए पाये जाते हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मकान जमीन से ऊँचे उठाकर बनाये जाते हैं। जैसे थाइलैण्ड, बर्मा या असम में। जहाँ भूकम्प अत्यधिक आते हैं वहाँ इमारतों को भूकम्प अवरोधी बनाया जाता है। जापान ने अपना नगरीय व ग्रामीण विकास इस प्रकार किया कि प्रतिदिन चार भूकम्प आने पर भी धन-जन की हानि न हो। यह तभी संभव हुआ जब उस क्षेत्र की भू-आकृति की विशेषताओं को भली प्रकार समझा गया। जहाँ इसकी कमी पायी जाती है, वहाँ बड़े पैमाने पर नुकसान होता है, जैसे फरवरी, 2006 में कश्मीर व पाकिस्तान में आये भूकम्प में हजारों लोग मारे गये व करोड़ों रुपये की क्षति हुई।
मानव बस्तियाँ वहीं अधिक पायी जाती हैं, जहाँ जलवायु व धरातलीय दशायें उपयुक्त हों। दलदली, पर्वतीय, मरुस्थलीय क्षेत्रों में इनकी संख्या कम होती है। मैदानी, तटीय व पठारी क्षेत्र इसके लिये उपयुक्त रहते हैं। इस प्रकार मानव अधिवास पर भू-आकृति का नियन्त्रण रहता है।
जनसंख्या वितरण पर भी भू-आकृति का विशेष प्रभाव देख जाता है। जिन क्षेत्रों ने प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता जैसे उपजाऊ मिट्टी. बडी नदियाँ. उत्तम जल प्रवाह, समतल धरातल पाया जाता है, जैसे- नदी घाटियाँ, तटीय मैदान व पठार सर्वाधिक मानव बसाव वाले क्षेत्र है। भारत में उतर का मैदान, यूरोप का मैदानी क्षेत्र, सयुक्त राज्य का पूर्वी तट व कैलिफोर्निया घाटी सघन बसे इलाके हैं, परन्तु पर्वतीय क्षेत्र शुष्क पठारी क्षेत्र या अत्यधिक ठंडे प्रदेश मानव बसाव में विरल पाये जाते है।