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Antibiotic substances in hindi , प्रतिजैविक पदार्थ क्या है टिप्पणी कीजिये उदाहरण लिखिए

पढ़िए Antibiotic substances in hindi , प्रतिजैविक पदार्थ क्या है टिप्पणी कीजिये उदाहरण लिखिए ?

प्रतिजैविक पदार्थ (Antibiotic substances )

प्रतिजैविक पदार्थ से हमारा तात्पर्य उन पदार्थों से है जो किसी जीव द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं और ये पदार्थ दूसरे जीवों के लिये अविषालु (toxic) अर्थात् हानिकारक होते हैं। इन पदार्थों में अतिविशिष्ट स्तर की विशिष्टता पायी जाती है। साधारण भाषा में सूक्ष्मजीवी द्वारा उत्पन्न ऐसे पदार्थ जो अन्य जीवों के लिये घातक अथवा हानिकारक होते हैं। प्रतिजैविक पदार्थों की खोज का श्रेय एलेक्जेन्डर फ्लैमिंग (Alexander Fleming, 1929) को जाता है जिन्होंने अभूतपूर्व प्रतिजैविक औषधि पेनिसिलीन का पता लगाया। फ्लैमिंग ने अपने प्रयोगों द्वारा पाया कि स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (Staphylococcus aureus) की निवह में पेनिसिलीयम नोटेट्म (Penicillium notatum) नामक फफूंद से सम्पर्क में आने पर लयन (lysis) क्रिया आरम्भ हो जाती है, यह फफूंद एक हरे रंग का वर्णक उत्पन्न करती है जो स्टेफिलोकोकस की वृद्धि को नहीं होने देता। फ्लैमिंग ने फफूंद की निवह से विसरण करने वाले इस पदार्थ का नाम पेनेसिलीन रखा। 1940 में फ्लोरे एवं चेन (Florae and Chain) ने पेनिसिलीन पर प्रयोग किये गये और इसे ठोस किन्तु अशुद्ध रूप में प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। 1941 में प्रतिजैविक पदार्थों का अनुसंधान कार्य तीव्र गति से आरम्भ हुआ। 1930 में डूबोस (Dubos) ने मिट्टी से बेसिलस ब्रेविस (Bacillus brevis) का संवर्धन प्राप्त कर प्रेमिसीडीन एवं टायरोसिडीन नामक दो प्रतिजैविक पदार्थ प्राप्त कर ग्रैम ग्राही प्रकार के जीवाणुओं का नाश करने में सफलता प्राप्त की। सेलमैन एवं वाक्समन (Selman and Waksman) वैज्ञानिकों ने 1944 में स्ट्रैप्टोमायसिन नामक प्रतिजैविक पदार्थ स्ट्रेप्टोमायसेस ग्रिस (Streptomyces griseus) से प्राप्त किया। 1945 में गुडसेपे ब्रोट्जू (Guiseppe Brotzu) ने सिफेलोस्पोरियम (Cephalosporium) जाति के सूक्ष्मजीव से अनेकों प्रजातियों के सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने वाले प्रतिजैविक पदार्थ सिफेलोस्पोरिन (Cephalosporin) की खोज की। यह प्रतिजैविक पदार्थ निमोनिया एवं अनेक रोगों के जीवाणुओं को नष्ट करने की महत्वपूर्ण क्षमता रखता है।

कुछ प्रतिजैविक पदार्थ इनके स्रोत एवं जीवाणुओं पर इनके प्रभाव सारणी-1 में दर्शाये गये हैं।

अभी तक लगभग 5000 प्रतिजैविक पदार्थों की खोज की जा चुकी है जिनमें से 100 अनेक अनेक रोगों के उपचार के उपयोग में महत्वपूर्ण पाये गये हैं। अन्य पदार्थ पोषक पर हानिकारक होने के कारण अन्य कार्यों में उपयोगी पाये गये हैं।

महत्वपूर्ण प्रतिजैविक पेनिसिलीन फफूंद पेनिसिलियम से, स्ट्रेप्टोमायसिन स्ट्रोप्टोमायसेस जीवाणु तथा कुछ अन्य बेसिलस से प्राप्त किये जाते हैं जिनका औद्योगिक उत्पादन किया जाता है। कुछ प्रतिजैविक पदार्थ अनेकों समूह के जीवाणुओं के लिये अविषालु होते हैं, इन्हें विस्तृत प्रतिकिक्कशी (board spectrum) प्रकार के प्रतिजैविक कहते हैं। कुछ प्रतिजैविक कुछ विशिष्ट जाति के जीवों को ही प्रभावित करते हैं, इन्हें विशिष्ट प्रतिजैविक (specific antibiotic) पदार्थ कहते हैं। कुछ जीवाणु जो इन पदार्थों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त कर लेते हैं, प्रतिरोधी विभेद (resistant strain) कहलाते हैं जो इन आविष पदार्थों से अप्रभावित कहते हैं। जीवों पर प्रतिजैविक पदार्थों के प्रभाव का परीक्षण करने की क्रिया को संवेदनशीलता परीक्षण (sensitivity test) कहते हैं।

अनेक प्रतिजैविक पदार्थ एक कोशीय जीवाणुओं के प्राप्त होते हैं जबकि कुछ एक्टिनोमाइसिटिज नामक तन्तुमय जीवाणुओं से प्राप्त किये जाते हैं। पेनिसिलिन व सिफेलोस्पोरिन कवक (fungi) से प्राप्त होते हैं।

प्रतिजैविक पदार्थ जीवाणुओं को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं।

(i) कोशिका भित्ति व प्लाज्मालेमा को निष्क्रिय बनाकर । (ii) जीवाणुओं की कोशिका भित्ति के संश्लेषण को रोककर ।

(iii) जीवाणुओं में प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया का अवरूद्ध कर ।

(iv) जीवाणुओं में न्यूक्लिक अम्ल संश्लेषण की क्रिया को अवरूद्ध कर ।

इन कारणों से जीवाणुओं की वृद्धि रुक जाती है अथवा ये मृत हो जाते हैं, इस प्रकार पोषक को इनसे होने वाले हानिकारक प्रभाव से मुक्ति मिल जाती है।

सारणी- 25.1 प्रतिजैविक पदार्थ, स्त्रोत एवं प्रभाव

क्र.सं.

 

प्रतिजैविक

पदार्थ

स्रोत

 

जीवाणुओं की प्रकृति जिन पर प्रभाव होता है

 

1. स्ट्रेप्टोमाइसिन

 

स्ट्रेप्टोमाइसीज ग्रिमस

 

ग्रैम + Ve व ग्रैम – Ve जीवाणु

 

2. नी ओमाइसिन

 

स्ट्रेप्टोमाइसीज फ्रेडी

 

ग्रैम + Ve व ग्रैम – Ve जीवाणु

 

3. आरिओमाइसिन

 

स्ट्रेप्टोमाइसीज

 

ग्रैम + Ve व ग्रैम – Ve जीवाणु
ऑरिओफेसिएन्स ग्रैम +Ve व ग्रैम – Ve जीवाणु
4. टेरामाइसिन

 

 

स्ट्रे. रिमोसस ग्रैम +Ve एवं रिकेट्सआ
5. क्लोरमफेनीकॉल स्ट्रे. वेनेजुवेला

 

ग्रैम +Ve एवं रिकेट्सआ

 

6. एरिथ्रोमाइसिन

 

स्ट्रे. एरीथिअस

 

ग्रैम +Ve जीवाणु

 

7. केनामाइसिन

 

स्ट्रे. केनामाइसिटिकस

 

ग्रैम + Ve जीवाणु

 

8. प्रेमिसिडिन

 

बेसिलस ब्रेविस ग्रैम +Ve जीवाणु

 

9. बेसिट्रेसि

 

 

बेसिलस सबटिलिस

 

ग्रैम +Ve जीवाणु

 

10. टाइरोसिडिन

 

बे. ब्रेविस

 

ग्रैम + Ve जीवाणु

 

11. पॉलिमिक्सिन

 

बे. पॉलिमिक्सा

 

ग्रैम – Ve जीवाणु

 

12. पेनिसिलिन

 

पेनिसिलियम नाटेट्म

 

ग्रैम +Ve जीवाणु व नाइसेरिया

 

13. सिफेलोस्पोरिन

 

सिफेलोस्पोरियम एकोमोनियम

 

 

ग्रैम + Ve जीवाणु

 

 

(i) कोशिका भित्ति व प्लाज्मा कला को निष्क्रिय बनाने वाले प्रतिजैविक (Antibodies making cell wall and plasmma membrane inactive ) : अनेक प्रतिजैविक जीवाणुओं की प्लाज्मा कला व कोशिका भित्ति को आघात पहुँचाकर निष्क्रिय बना देते हैं अतः इनकी चयनात्मक पारम्यता प्रभावित होती है, इस समूह में पोलीमिक्सिन, नीस्टेटिन एवं एम्फोटेरिसिन प्रतिजैविक आते हैं।

(ii) कोशिका भित्ति के संश्लेषण को संदमित करने वाले प्रतिजैविक (Antibodies inhibiting cell membran synthesis) : पेनिसिलिन, सिफेलोस्पोरिन, बेसिट्रेसिन, वेनकोमाइसिन एवं रिस्टोसिटिन जैविक प्रतिजैविक ग्रैम +ve जीवाणुओं की कोशिका भित्ति के संश्लेषण में संदमन कर इनकी वृद्धि में कमी लाते हैं एवं पोषक को जीवाणुओं से मुक्त कराते हैं।

(iii) प्रोटीन संश्लेषण को संदमन करने वाले प्रतिजैविक (Antibodies inhibiting protein synthesis) : क्लोरमफेनीकॉल, ट्रेटासायक्लिन्स, कार्बोमाइसिन लिनकोमाइसिन, किलन्डेमाइसिन, ओलिएन्टोमाइसिन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, ऐमिकेसिन, जेन्टेमाइसिन, केनेमाइसिन, नीजोमाइसीन एवं टोब्रेमाइसिन आदि प्रतिजैविक सम्मिलित किये गये हैं जो राइबोसोम की 50g या 30s उपइकाई से जुड़कर प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया को प्रभावित करते हैं। पेनिसिलिन अमीनों अम्लों की उपापचय क्रियाओं को तथा स्ट्रेप्टोमाइसिन अमीनों अम्ल तथा शर्कराओं के ऑक्सीकरण की क्रिया में भी बाधा उत्पन्न करते हैं। प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया लम्बी व अनेक पदों में सम्पन्न होती है। ये प्रतिजैविक पदार्थ किसी भी पद को प्रभावित कर प्रोटीन संश्लेषण को संदमित कर जीवाणुओं को नष्ट करने में भूमिका निभाते हैं।

(iv) न्यूक्लिक अम्ल के संश्लेषण को प्रभावित करने वाले प्रतिजैविक (Antibodies affecting syntheis of nucleic acid) : मिटोमाइसिन, एक्टिनोमाइसिन नेडिक्सिक अम्ल गिसिओफुलविन आदि DNA के संश्लेषण को प्रभावित करते हैं जबकि रिफोम्पिसिन RNA के संश्लेषण को प्रभावित करते हैं अतः जीवाणुओं में वृद्धि व विभाजन की क्रिया अवरूद्ध हो जाती है। ये पोषक की कोशिकाओं में भी न्यूक्लिक अम्ल के संश्लेषण को प्रभावित करते हैं अतः इनका उपयोग सीमित तौर पर ही किया जाता है।

आनुवंशिक अभियान्त्रिकी का नये प्रतिजैविक पदार्थों के संश्लेषण में योगदान (Contribution of genetic engineering in synthesis of new antibiotic substances)

प्रतिजैविक पदार्थ बनाने वाली कोशिकाओं के प्रभेदों (strains) में परिवर्तन कर अधिक मात्रा में प्रतिजैविक बनाने वाले जीवाणुओं का उपयोग औद्योगिक स्तर पर उत्पादन हेतु किया जाता है। इन जीवाणुओं के जीनोम में विशिष्ट जीन्स निवेशित कर यह क्रिया कराई जाती है। कोशिका लयन (cell fusion) तकनीक का उपयोग उच्च प्रकृति के प्रभेद प्राप्त करने हेतु किया जाता है। ज्ञात प्रतिजैविकों के अणुओं में नयी मिथाइल इकाईयाँ जोड़कर परिवर्तित प्रकार के नवीन गुणों वाले प्रतिजैविक बनाये जाने लगे हैं।

कुछ औषधि महत्व के प्रतिजैविक पदार्थ निम्न हैं-

(1) पेनिसिलीन ( Penicillin ) : फ्लैमिंग ( Fleming, 1929 ) ने यह पदार्थ पेनिसिलियम नोटेट्म (penicillium notatum) नामक कवक से प्राप्त कर एच. इन्फ्लुएन्जा की बुद्धि पर नियंत्रण करने में सफलता प्राप्त की। फ्लोरें, चेन (Florae, Chain) एवं इनमें साथियों ने 1940 में इस प्रतिजैविक को सान्द्र व स्थायी अवस्था में प्राप्त करने तथा स्ट्रेप्टोकोकाई एवं स्टेफिलोकोकॉइ के संवर्धनों को नियंत्रित करने का कार्य किया। आजकल पेनिसिलीन का विश्व के अनेक देशों में औद्योगिक स्तर पर उत्पादन किया जाता है।

बड़े पैमाने पर पेनिसिलीन G पे. क्राइसोजिनॅम (P. chrysogenum) से किया जाता है। यह जाति 24°C पर विशिष्ट संवर्धन माध्यम युक्त निग्मन (submerged ) अवस्था में उगाई जाती है। यह पदार्थ कार्बनिक अम्लों का समूह है जो अपेक्षाकृत अस्थायी प्रकृति के होते हैं और खनिज अम्लों. क्षारों, भारी धातुओं, एल्कोहॉल, ऑक्सीकारक पदार्थों एवं उच्च ताप (80°C) के प्रति संवेदनशील होता है। कुछ जीवाणु जैसे कॉलीफार्मस, स्ट्रेप्टोकॅस तथा बे. सबटिलिस एक प्रकार का किण्वक पेनिसिलिनेज (penicillinase) उत्पन्न करते हैं जो पेनिसिलीन G को नष्ट कर देता है।

पेनिसिलीन औषधि सोडियम या पोटेशियम लवणों के रूप में प्राप्त की जाती है जो अत्यन्त घुलनशील एवं स्थायी होते हैं। यह पाऊडर अवस्था में होते हैं व pH 5-7 पर क्रियाशील रहते हैं इसकी शक्तिमत्ता (potency) “X” इकाई प्रति मि. ग्रा. में या “मेगायूनिट में पायी जाती है।

यह स्टे. ऑरियस, स्ट्रेप्टो, हीमोलाइटिकस, स्ट्रेप्टो, विरिडेन्स, न्यूमोकोकस, मैनिन्गोकोकॅस बे. एन्थ्रेसिस, को. डिप्थीरियाई, क्लोस्ट्रीडियम वेलेची, क्लो. टेटनी, एक्टिनोमाइसेस आदि के प्रति संवेदनशील है। किन्तु स्टेफिलो. टाइफी कुछ सालमोनेला समूह के जीवाणु स्ट्रे. फिलिस एवं एच. एन्फ्लूऐन्जा के प्रति कम संवेदनशील है। ई. कोली, प्रोटीयस ट्यूबरकल बेसिलस एवं कुछ वायरस के प्रति भी यह असंवेदनशील है।

व्यापारिक उत्पादन (Commercial production) : द्वितीय विश्वयुद्ध के समय पेनिसिलीन के औद्योगिक उत्पादन की आवश्यकता महसूस की गई। आज यह अरबों डॉलर का व्यापारिक उद्योग है। पे. क्राइसोजिनम के अनेक विभेदों का उपयोग व्यापारिक उत्पादन हेतु किया जाता है। अब ऐसे विभेद प्राप्त कर लिये गये हैं जो वास्तविक विभेदों की अपेक्षा 10,000 गुना अधिक पेनिसिलीन का उत्पादन करते हैं। ये विभेद अनेक उत्परिवर्तनों (mutation) के फलस्वरूप प्राप्त हुए हैं। किण्वन हेतु माध्यम में फीनॉल एथेनाइक एसिड (phenol ethanoic acid) मिलाया जाता है जो पेनिसिलीन-G के पूर्ववर्ती पदार्थ के निर्माण में गति प्रदान करता है। इसके लिये गहरे किण्वनकारी टैंक जिनकी क्षमता हजारों गैलन की होती है का उपयोग करते हैं। मक्का के अतिप्रवण तरल में पोषण ऐगार लवण, लेक्टोस, ग्लूकोज तथा फीनॉल एथेनाइक अम्ल मिला कर रखते हैं। इसमें पे. क्राइसोजिनम कोनिडिया डालकर लगातार वायु प्रवाहित करते हुए हिलाते रहते हैं। लगभग 200 घण्टों में कवक वृद्धि कर किण्वक की क्रिया करते हुए परिपक्व हो जाता है। इसे तरल से पृथक कर लिया जाता है । यह अनेक स्तर पर छाना व धोया जाता है। छनित में पोटेशियम आयन मिला कर पुनः छाना व सुखाया जाता है। इस प्रकार क्रिस्टलीय अवस्था में पेनिसिलिन प्राप्त होती है। बाजार में बेचने हेतु भेजे जाने से पूर्व इसकी शक्तिमता माप कर पेकिट पर अंकित की जाती है।

छनित के कुछ भाग के अतिरिक्त अन्य अवशेषों को फेंकना पड़ता है इनका उचित निस्तारण भी एक समस्या है क्योंकि इसमें अनेकों रोगजनक व हानिकारक सूक्ष्मजीवों के संवर्धन की प्रबल संभावना रहती है।

पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (Polymerase chain reaction) PCR

परिचय (Introduction) : 1985 तक वैज्ञानिकों को डी.एन.ए. की अनेक प्रतिलिपियाँ (copies) प्राप्त करने हेतु इच्छित जीन (प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक ) की वाहक के साथ क्लोनिंग कराने की तकनीक ज्ञात की थी तथा इसे अति आधुनिक तकनीक के रूप में आनुवंशिक अभियान्त्रिकी के प्रयोगों हेतु उपयोग में लाया जाता था।

1973 में नेचर पत्रिका में पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (PCR ) एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि के रूप में प्रकाशित हुयी । “पी.सी.आर यह इतनी प्रभावी तकनीक है कि डी एन ए की मात्र एक रचना से इसकी करोड़ों प्रतिलिपियाँ पूर्ण शुद्ध एवं विशिष्टता के साथ कुछ ही सेकेन्ड्स में प्राप्त की जा सकती अतः इसे जीन मशीन भी कहते हैं।” इस प्रकार कुछ ही वर्षों में डी एन ए की प्रतिलिपियों के प्राप्त करने की पुरानी पात्रे (in vitro) तकनीक को वैज्ञानिकों ने पीसीआर को पूर्ण विश्वास एवं प्रभावी पद्धति होने के कारण विकल्प के रूप में अपना लिया है।

डी.एन.ए. को बढ़ाने ( amplify ) की तकनीक 1985 में सेट्स कार्पोरेशन, सेन फ्रान्सिसकों के अमेरिकी वैज्ञानिक केरी मुलिस (Kary mulis) ने खोज निकाली। इस खोज के महत्व को देखते हुए इसे लोगों की ” इच्छित क्रिया” (peoples choice reaction) के रूप में प्रकाशित किया गया। यह खोज विज्ञान के प्रतिष्ठित अमेरिकन जनरल “साइन्स” में 1989 की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रकाशित हुयी। इसे Taq डी एन ए पालिमरेज (Taq DNA polymerase) के रूप में चुना गया यह एन्जाइम पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया में उपयोग में लाया जाता है।

पीसीआर की कार्यप्रणाली (Mechanism of PCR) : डी एन ए के प्रतिकृतिकरण के दौरान न्युक्लिओटाइड्स का पॉलिमेराइजेशन होता है। इस क्रिया हेतु डी एन ए का एक सूत्र साँचे (template) का कार्य करता है। डी एन ए पॉलीमरेज एवं आवश्यक प्राइमर्स इस क्रिया में भाग लेते हैं। संजीव कोशिकाओं में इस क्रिया हेतु एक सूत्रीय आर एन ए अणु प्राइमर के रूप मे कार्य करता है जबकि पीसीआर में डी एन ए के सूक्ष्म अणु (जो कि डी एन ए खण्ड के दोनों सिरों के पूरक होते हैं, को बढ़ाया (amplify) जाता है) प्राइमर्स के रूप में जोड़े जाते हैं, जो प्राइमर्स जोड़े जाते हैं वे सामान्यत: संश्लेषित ऑलिगोन्युक्लिओटाइड्स होते हैं। पीसीआर में तीन तापक्रम आधारित चक्र भाग लेते हैं

(i) 90–98° पर लाक्षिक (target) डी एन ए के दोनों सूत्र अलग हो जाते हैं।

(i) 40-60°C पर तापानुशीतन ( annealing) द्वारा लाक्षिक डी. एन.ए के प्रथकित दोनों सूत्रों पर प्राइमर्स संलग्न हो जाते हैं।

(iii) 72°C पर तापस्थिरीय Taq डी. एन. ए. पॉलमरेज एक सूत्रीय लाक्षिक डी. एन. ए. सूत्रों को

प्राइमर्स की उपस्थिति में नये सूत्रों का संश्लेषण आरम्भ कर देता है।

यह त्रि-तापीय चक्र 25-30 बार दोहराया जाता है एवं लाक्षिक डी.एन.ए. की करोडों प्रतिलिपियाँ तैयार हो जाती हैं। यह अभिक्रिया परकिन एल्मर सेट्स यन्त्र (Perkin elmer cetus instrument) अथवा डी एन ए तापीय चक्रक (DNA Thermal Cycler ) मे होती है। इसके लिये इस यन्त्र को निम्नलिखित प्रकार से सेट कया जाता है-

(i) 94°C पर 20 सैकण्ड हेतु (i) 55°C पर 20 सैकण्ड हेतु

(iii) 72°C पर 30 सैकण्ड हेतु

आरम्भ में इस क्रिया हेतु किण्वक डी. एन. ए. पॉलिमरेज इ. कोलाई से प्राप्त किया हुआ काम में लाया जाता था किन्तु यह तापक्रम संवेदी होने के कारण प्रत्येक चक्र के अन्त में नष्ट हो जाया करता था अतः इसके स्थान पर थर्मोफिल्स एक्वेटिकस (Thermophillus aquaticus) जो उष्ण जल के स्त्रोतों में पाया जाता है, से प्राप्त किण्वक डी एन ए पॉलीमरेज काम में लाया जाने लगा है। इसके प्रयोग में उत्पादन में वृद्धि तो हुयी ही है तथा 10kb लम्बाई के डी. एन. ए. अणु प्राप्त किये जा सकते हैं। इसी श्रृंखला में पायरोकॉकस फ्यूरिओसस (Pyrococcus furious) से तथा थर्मोकॉकस लिटोरेलिस (Thermococcus litoralis) से प्राप्त पॉलीमरेज और अधिक प्रभावी पार्थ गये हैं।

पी.सी.आर. हेतु आवश्यक घटक (Components required for PCR) : (i) टेक (Taq) पॉलीमरेज

(i) ऑलिगोन्युक्लिओटाइड प्राइमर्स- दो

(iii) बफरर्स (pH 8.8 का बफर जो 25°C पर एवं pH 7.3 का बफर जो 72°C पर क्रियाशील होते हैं)

(iv) Mg + 2 Taq किण्वक क्रिया हेतु

(v) अआयनिक (non ionic) डिटरजेन्टस Tritonx 100, NP-40 or Tween 80, 0.01% संग्रहित विलयन व क्रियाशील मिश्रण में मिलाये जाते हैं। इनकी उपस्थिति में Taq क्रियाशील बना रहता है।

(vi) अभिक्रिया हेतु मिश्रण में 800 m के d NTPS न्युक्लिओटाइड्स मिलाये जाते हैं। यह मात्रा 50ul तरल से 13ug डी एन ए उत्पन्न किये जाने हेतु आवश्यक होती है। (vii) 2- मरकेप्टोइथेनाल या डाइथाओथेइटॉल (10mM) को PCR मिश्रण में मिलाने से अभिक्रिया के दोरान उपस्थित प्रोटीन स्थिरीकृत बने रहते हैं।

(viii) इस क्रिया हेतु साँचे के रूप में प्रयुक्त डी. एन. ए. 0.24g से कम मात्रा में आवश्यक परिणाम दे सकता है चाहे यह अशुद्ध रूप में ही प्रयुक्त किया गया हो ।

पीसीआर हेतु स्त्रोत पदार्थ (Source material for PCR) :

जीव की देह से प्राप्त ऊत्तक, रोम, सूखा या गीला रक्त, शुक्राणु या वीर्य मृत पदार्थ की कोशिकाएँ, लार आदि ।

पीसीआर के अनुप्रयोग (Appication of CPR)

(i) जीवाणु या विषाणु को पहचान कर रोग का निदान करना ।

(ii) आनुवंशिक रोगों की पहचान करना ।

(iii) डी एन ए फिंगर प्रिन्टिंग द्वारा कातिल की पहचान करना ।

(iv) शोध कार्यों हेतु ।

(v) आणविक संरचना प्राप्त करने हेतु मानचित्र का बनाया जाना ।

(vi) आण्विक चिन्हकों (molecular markers) का बनाया जाना ।

(vii)आनुवंशिक अभियान्त्रिकी एवं आनुवंशिक उपचार या जीन थैरेपी के प्रयोगों हेतु ।

(viii) बहुरूपता (polymorphism) के अध्ययन हेतु ।

(ix) भोज्य पदार्थों या पेय पदार्थों में रोगाणुओं के निदान हेतु ।

पीसीआर तकनीक का उपयोग कर रोगी की देह में उपस्थित रोगाणुओं अथवा केन्सरे की पहचान व निदान सम्भव है चाहे ये अल्प मात्रा में ही उपस्थित हों। अन्ना विश्वविद्यालय के डॉ. वी. श्रीथरन (V.Sritharan) ने तपेदिक रोग के पहचान की त्वरित तकनीक खोज निकाली है जो PCR पर आधारित है। AIDS विषाणु की पहचान PCR द्वारा रोगी में दक्षता के साथ की जाती है। भ्रूणीय अवस्था में उपस्थित जन्म जात रोगों जैसे सिकल सेल एनेमिया, फिनाइल कीटोन्यूरिया, B- थेलेसेमिया, हीमोफिलिया, टे सेक्स रोग आदि की पहचान सम्भव है। इस तकनीक से भ्रूण के लिंग की पहचान रोपण से पूर्व ही की जा सकती है।

पी सी आर तकनीक के प्रयोग द्वारा विवादित पैतृकता, कातिल की पहचान वीर्य, रोम या रक्त के धब्बों से डी एन ए फिंगर प्रिन्टिंग द्वारा विश्वसनीय रूप से की जाती है।

पीसीआर का उपयोग कर जीवों के आनुवंशिक मानचित्र तैयार करने में सहायक है। पादप प्रजनन हेतु इच्छित लक्षणों वाले समुदाय का चयन सम्भव है।

पीसीआर मशीन जेनेटिक टाइम मशीन के रूप में कार्य करती है यह भूतकाल में हुयी घटनाओं की पहचान ( कातिल की पहचान ) करने में सक्षम है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह बहुउपयोगी साबित होगी।

पीसीआर से किसी DNA खण्ड की असंख्य कापीयाँ कुछ ही मिनटों में बिना किसी अधिक प्रयास के प्राप्त हो जाती है। जबकि पुनर्योगज DNA बनाने हेतु DNA के एक अंश को पृथक करना फिर विषाणु या जीवाणु वाहक के DNA के साथ पुनर्योजित करना । इसे फिर ऐसे जीवाणु में स्थानान्तरित करते हैं जो इसकी प्रजनन के दौरान असंख्य कापियाँ बनाते हैं। यह एक लम्बी एवं जटिल प्रक्रिया है जिसमें श्रम अधिक लगता है समय भी अधिक खर्च होता है । अत: PCR की उपयोगिता पुनर्योगज तकनीक से कई गुना अधिक है।

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