सक्रियता एवं सक्रियता गुणांक , प्रतिलोम परासरण के उपयोग , परासरण दाब एक अणुसंख्यक गुण

 व्युत्क्रम परासरण /प्रतिलोम परासरण (reverse osmosis) : यदि विलयन पर परासरण दाब से अधिक दाब लगाया जाए तो परासरण की प्रक्रिया विपरीत दिशा में होने लगती हैं।  अर्थात विलायक के कण अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा विलयन से शुद्ध विलायक की और गमन करने लगते है।  यही परिघटना व्युत्क्रम परासरण कहलाती हैं।

प्रतिलोम परासरण के उपयोग

1. घरो या अस्पतालों में जल का शुद्धिकरण करने में।
2. समुद्री जल के विलवणीकरण में।
परासरण दाब एक अणुसंख्यक गुण :
तनु विलयनों के लिए वान्टहॉफ समीकरण के अनुसार
π = nRT
यहाँ π = परासरण दाब 
V = विलयन का आयतन 
n = विलेय के मोल 
R = गैस नियतांक 
T = परम ताप 
इस समीकरण को निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है –
π= nRT / v
π= CRT 
यहाँ C = n/v = विलयन की मोल प्रति लीटर अर्थात मोलरता में सांद्रता हैं। 
अतः 
π ∝ मोलरता (M)
अतः परासरण दाब विलयन का अणु संख्यक गुण हैं। 
नोट : उच्च अणुभार वाले बहुलकों जैसे प्रोटीन आदि के अणुभार को ज्ञात करने की सर्वोत्तम विधि परासरण दाब विधि होती है। 

असामान्य मोलर द्रव्यमान या असामान्य अणुभार 

यदि किसी अवाष्पशील विलेय को विलायक में घोलने पर उसका वियोजन या संगुणन होता है तो विलयन में उपस्थित कणों की संख्या बढ़ जाती है या घट जाती है। 
फलस्वरूप अणुसंख्यक गुणों के मान सामान्य से अधिक अथवा कम प्राप्त होते है। 
चूँकि विलेय का मोलर द्रव्यमान अणुसंख्यक गुणों के व्युत्क्रमानुपाती होता है अर्थात 
अणुसंख्यक  1/मोलर द्रव्यमान 
इसलिए विलेय पदार्थ के विलयन में वियोजन की स्थिति में विलेय का मोलर द्रव्यमान सामान्य से कम एवं संगुणन की स्थिति में सामान्य से अधिक प्राप्त होता है। 
1. वियोजन की स्थिति 
2. संगुणन की स्थिति 
नोट :  विलेय पदार्थ का वियोजन होने पर पर अणुसंख्यक गुणों में मान बढ़ते है , परन्तु मोलर द्रव्यमान घटता है। 
जबकि संगुणन होने पर अणुसंख्यक गुणों के मान घटते है एवं मोलर द्रव्यमान बढ़ते है। 
वांट हाफ गुणांक : अणुसंख्यक गुणों के असामान्य मानों की व्याख्या करने के लिए वांटहॉफ ने एक गुणांक दिया जिसे वांटहॉफ गुणांक कहते है। 
अणुसंख्यक गुणों के प्रेक्षित एवं सैद्धांतिक मानों के अनुपात को वांटहॉफ गुणांक कहते है। 
सक्रियता एवं सक्रियता गुणांक (activity, activity coefficient in hindi) : आरेनियस के अनुसार एक एक संयोजी विद्युत अपघट्य AB का वियोजन निम्न प्रकार से होता है –
AB = A+
+ B
साम्य स्थिरांक K = [A+][B] / [AB]
उपरोक्त समीकरण में [A+] , [B] , [AB] आदि क्रमशः [A+] , [B] एवं [AB] के सक्रीय द्रव्यमान है। 
सक्रिय द्रव्यमान से तात्पर्य मोल प्रतिलीटर में सांद्रता से ही होता है। 
k के मान स्थिर नहीं नहीं आते बल्कि सांद्रता में वृद्धि के साथ K के मानों में कुछ वृद्धि हो जाती है। 
K के मानों में वृद्धि का मुख्य कारण धनायनों एवं ऋणायनों के मध्य अंतरआयनिक आकर्षण बल होता है। 
अंतर आयनिक आकर्षण बलों के कारण विद्युत अपघट्यों का विलयन इस प्रकार व्यवहार करता है की मानों सांद्रता वास्तविक सांद्रता से कम हो अर्थात प्रबल विद्युत अपघट्य प्रत्येक अवस्था में पूर्णत: आयनित रहते है , परन्तु ये आयन अंतरायनिक आकर्षण बलों के कारण गति करने अथवा विद्युत धारा ले जाने के लिए स्वतंत्र नहीं होते। 
आयनों का वह अंश या मात्रा जो स्वतंत्र गति कर सकता है एवं विद्युत धारा को ले जाने में समर्थ होता है सक्रीय आयन कहलाते है। 

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