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सक्रिय एवं निष्क्रिय प्रतिरक्षा में अंतर क्या है , active and passive immunity in hindi difference

जाने सक्रिय एवं निष्क्रिय प्रतिरक्षा में अंतर क्या है , active and passive immunity in hindi difference ?

स्वभावज (innate) एवं उपार्जित ( acquired ) प्रतिरक्षा में निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं-

सारणी 1.1 : स्वभावज एवं उपार्जित प्रतिरक्षा में अन्तर

प्रतिरक्षा

प्रकारकारण
1. स्वभावजजन्म जात ( inborn) आनुवंशिकता आधारित किन्तु पूर्व अनुभव से स्वतन्त्र पदार्थों इसके लिये रोगाणु से सम्पर्क प्रतिजन की आवश्यकता नहीं होती यह जीवन पर्यन्त बनी रहती है यह संतति को स्थानान्तरित होती है यह जीव की रोग व रोगाणुओं से रक्षा करती है।पर भक्षानुषण कोशिकाओं, लाइसोजाइम इन्टरफेरॉन, श्लेष्मा जैसे या द्वारा उपस्थित
2. उपार्जित(i) सक्रिय (Active) यह जीवन काल | के दौरान विकसित होती है। यह पूर्ण जीवन काल या कुछ समय तक बनी रहती है। इसके लिये रोगाणु से सम्पर्क या प्रतिजन का होना आवश्यक है। यह संतति को स्थानान्तरित नहीं होती किन्तु जन्म | लेने वाले शिशुओं में कुछ समय तक बनी रहती है। यह रोगी को उसी जाति के अन्य रोगाणुओं से सुरक्षा प्रदान करती है।

(ii) कृत्रिम (Artifical)

दीर्घकालिक एवं विशिष्ट प्रतिरक्षा सूक्ष्मजीव या उसके उत्पाद के सम्पर्क से (antibodies) द्वारा उपस्थित। दो उत्पन्न प्रतिरक्षियों प्रकार की । तरल रोधकक्षमता (humoral ग्लोबुलिन द्वारा II कोशिका मध्यवर्ती immunity)-y (गामा ) प्रतिरक्षा (cell mediated immunity) या ऊत्तकीय प्रतिरक्षा immunity) (tissue लिम्फोसाइट्स द्वारा लिम्फोकाइन्स का स्त्रावण किया

जाना

टीके लगाये जाने के बाद देह में उत्पन्न दीर्घकालिक व विशिष्ट प्रतिरक्षा

सारणी 1.2 : सक्रिय एवं अक्रिय प्रकार की रोधकक्षमता की तुलना

क्र.

स.

सामान्य रोधक क्षमताअक्रिय रोधक क्षमता
1.पोषक के प्रतिरक्षी तन्त्र द्वारा उत्पन्न की जाती है।पोषक द्वारा अक्रिय रूप से प्राप्त की जाती है।
2.संक्रमण या इम्यूनोजेन्स के सम्पर्क से उद्दीपन प्राप्त होने पर विकसित होती है।बाहर से तैयार अवस्था में पोषक की देह में निवेशित की जाती है।

3.लम्बी अवधि तक प्रभावी सुरक्षा प्रदान करती है।कम अवधि की तथा कम प्रभावी सुरक्षा प्रदान करती है।

4.रोधक क्षमता को उत्पन्न होने में सुषुप्त काल लिया जाता है।रोधकक्षमता तुरन्त प्रभावी हो जाती है। सुषुप्त काल नहीं पाया जाता ।

5.रोधकक्षमता स्मृति युक्ति होती है द्वितीय उद्दीपन अधिक प्रभावी होता है बूस्टर प्रभाव रखती है।रोधकक्षमता स्मृतिहीन होती है द्वितीय बार दी गयी तैयार अक्रिय रोधकक्षमता की खुराक पूर्व की अपेक्षा कम प्रभावी होती है।

6.ऋणात्मक प्रावस्था उत्पन्न हो सकती

है ।

ऋणात्मक प्रावस्था उत्पन्न नहीं होती ।
7.रोधकक्षमता हीन व्यक्तियों में प्रभावी नहीं होती

रोधकक्षमता हीन व्यक्तियों में भी प्रभाव होती है ।

8.इसके अन्य विपरीत प्रभाव नही होते हैकभी-कभी एन्टीसीरा देह में प्रतिक्रिया कर जाता है इसे सीरम सिकनेस कहते हैं।

उपार्जित प्रतिरक्षा के विशिष्ट लक्षण (Unique features of acquired immunity)

(i) विशिष्टता (Specificity) : यह प्रत्येक प्रकार के रोगाणु हेतु विशिष्ट होती है। इसमें भिन्न प्रकार की बाह्य कार्यों को पहचानने का गुण होता है या यह इनमें विभेद करने में सक्षम होती है।

(ii) विभिन्नता (Diversity) : उपार्जित प्रतिरक्षा विभिन्न प्रकार के अणुओं, रोगाणुओं या उनके द्वारा स्त्रवित जहरीले पदार्थों के विरुद्ध विकसित हो सकती है।

(iii) स्वयं और पराये के प्रति पहचानने की क्षमता (Discrimination between self and non self) : यह बाह्य अणुओं, सूक्ष्मजीवों (पराये) एवं स्वयं की कोशिकाओं व अणुओं में विभेद करने में सक्षम होती है।

(iv) याद्दाश्त (Memory ) : इसका प्रथम सामना विशिष्ट बाह्य कारकों या सूक्ष्मजीवों और देह के प्रतिरक्षातन्त्र के बीच होता है जो न केवल प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दर्शाते हैं बल्कि इस मुकाबले को याददाश्त भी बनाए रखते हैं। इसी कारण उसी सूक्ष्मजीव के प्रति दूसरा मुकाबला तीव्र व बढ़ी हुई प्रतिक्रिया दर्शाता है।

प्रतिरक्षी तंत्र का उद्भव ( Origin of the immune system)

प्रतिरक्षी तंत्र के अन्तर्गत जटिल विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं की श्रृंखला कारक एवं क्रियाओं को सम्मिलित करते हैं जो प्रतिजन ( antigen ) के देह में प्रवेश करने पर आरम्भ होती है। गर्भ धारण के दो माह के उपरान्त भ्रूण में प्रतिरक्षी तंत्र का विकास आद्य कोशिकाओं (primoridial cells), स्तम्भ कोशिकाओं (stem cells) से होता है जो अस्थि मज्जा में पायी जाती है। ये जटिल विधि द्वारा विभेदित (differentiate) होकर दो प्रकार की कोशिकाओं को जन्म देते हैं। प्रतिरक्षा तन्त्र दो प्रकार की टिलियन (trillion) लिम्फोसाइट्स का बना होता है जिन्हें B लिम्फोसाइट्स व T लिम्फोसाइट्स कहते हैं। दोनों प्रकार की कोशिकाएं प्रारम्भ में भ्रूण में पीतक CNMS कोष की मीसनकाइम कोशिकाओं से व बाद में यकृत व प्लीहा में विकसित होती है। मातृ कोशिकाएं लिम्फोसाइटिक वंश की कोशिकाएं कहलाती हैं। इसके बाद ही ये अस्थि मज्जा में आती हैं। ये वंश कोशिकाएं रूधिरोत्पत्ति की क्रिया हेतु विभाजित होती है। ये लिम्फोब्लास्ट बनाती है। ये छोटी अपरिपक्व लिम्फोसाइट को जन्म देती है।

रक्ताणु उत्पत्ति कोशिकाएँ (Erythropoietic cells) + जो कि लसिका कोशिकाओं में विकसित होती हैं। कुछ लसिका उत्पत्ति कोशिकाएँ थाइमस ( thyms) ग्रंथि में प्रवेश कर जाती हैं। इनमें से कुछ थाइमोसाइट बनाती है। यहाँ से वृद्धि कर परिपक्व होने पर थाइमस आश्रित लसिकाणुओं I लिम्फोसाइट्स (T- lymphocytes) या T- कोशिकाओं को जन्म देती हैं। यह परिवहन तन्त्र में प्रवेश कर जाती है। इसके उपरान्त ये विभिन्न लसीका ऊत्तकों में स्थानान्तरित हो जाती हैं। वे लिम्फोसाइट जो पहले से ही यकृत या अस्थि मज्जा में विकसित हो रही होती है B-लिम्फोसाइट्स कहलाती है। पक्षियों में ये फ्रेब्रिसी प्रपुटी (bursa of fabricius) में प्रवेश करती है। इनमें उत्पन्न लसिकाणु B- लिम्फोसाइट्स (B- lymphocytes) या B – कोशिकाएँ कहलाती है। B – लिम्फोसाइट्स अब विभिन्न लसीका ऊत्तकों में प्रवेश कर बाद में T- लिम्फोसाइट्स की तरह रक्त संवहन तन्त्र में प्रवेश कर जाती है। भ्रूणीय अवस्था में लसीकाणु पीतक थैले ( yolk sac) व यकृत (liver) व अस्थि मज्जा में भी बनती है। B – लसिकाणुओं की सतह पर T लेसिकाणुओं से भिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थ पाये जाते हैं। दोनों प्रकार के लसिकाणु प्रतिरक्षी तंत्र में मुख्य भूमिका रखते हैं। ये लसिका संधियों व लसिका वाहिनियों में रहते हैं किन्तु ये परस्पर अलग-अलग ही बने रहते हैं । व प्रतिजनों का सामना होने पर विशिष्ट क्रियाएँ करते हैं। तरुण प्राणि के टान्सिल ( tonsil) व प्लीहा (splean) में ये अधिक सक्रिय होती है।

T-लसिकाणु B-लसिकाणुओं की अपेक्षा छोटे होते हैं। B- लसिकाणुओं का जीवन काल 5-7 दिन का होता है किन्तु T- लसिकाणु अनेक माह या वर्षों तक जीवित रहती है। देह में 65-80% लसिकाणु T-लसिकाणु प्रकार के व शेष B-लसिकाणु प्रकार के पाये जाते हैं। दोनों प्रकार की लिम्फोसाइट्स बाह्य काम के सम्पर्क में आने पर संवेदित हो जाती है ये विभाजन करती है। लिम्फोसाइट्स विभाजन कर B लिम्फोसाइट्स ही बनाती है और प्रतिरक्षी पदार्थ या प्रतिरक्षी (antibodies) का स्त्रवण करती है। संवेदीकृत T लिम्फोसाइट्स विभाजन कर अपने जैसी T-लिम्फोसाइट्स बनाती जाती हैं। कुछ अपरिपक्व कोशिकाएँ दोनों ही प्रकार की भी परिवहन तंत्र में पायी जाती हैं। लसिकाणु मेक्रोफेजेज (macrophages) के निकट एकत्रित हो जाती है। B – लसिका (आन्त्र) एपेन्डिक्स (appendix ) व (टॉन्सिल्स में बनते हैं। B लसिकाणुओं की सतह पर विशिष्ट प्रकार के रासायनिक पदार्थ जो प्रतिरक्षी क्रियाओं में भाग लेते हैं कुछ जीन्स के नियंत्रण में संश्लेषित किये जाते हैं जिन्हें प्रतिरक्षी अनुक्रिया जीन्स (immune response genes) IR जीन्स कहते हैं। ये विशिष्ट रासायनिक पदार्थ ही एन्टीबॉडीज कहलाते हैं। मनुष्य में IR जीन्स विभिन्न गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं।

जिनके हमें प्रवेश करने पर ये लसिका तंत्र या रक्त परिवहन तंत्र में प्रवेश करते हैं। प्रतिजन्स मेक्रोफेजेज, मोनोसाइट्स या बहुरूपी केन्द्रकीय कोशिकाओं (polymorphonuclear cells) द्वारा निगल लिये जाते हैं। यह क्रिया भक्षाणुशन (phagocytosis) कहलाती है। प्रतिजन्स में स्थित निर्धारक बिन्दु (determinants) परिरक्षित होते हैं व लसिका ऊत्तकों में लाये जाते हैं। यह कार्य मेक्रोफैजेज द्वारा किया जाता है, ये T या B लसिकाणुओं के सम्पर्क में आते हैं। लक्षिकाणु मेक्रोफेजेज को घेर लेते हैं। लसिकाणुओं की सतह पर स्थित गाह्यस्थलों (receptor site ) व प्रतिजेनिक निर्धारक बिन्दुओं पर अन्योन्यक्रिया होती है। किस प्रकार के लिम्फोसाइट (T या B) का उद्दीपन हुआ है इस आधार पर दो प्रकार की रोधकक्षमता सम्भव है।

तरल प्रकार की रोधक क्षमता (Humoral immunity)

B-कोशिकाओं के कार्य (Functions of B – Lymphocytes) – B- लिम्फोसाइट के बाह्य प्रतिजन के सम्पर्क में आने पर RNS का संश्लेषण आरम्भ होता है। यह क्रिया उस समय आरम्भ होती है। जब प्रतिजेनिक निर्धारक बिन्दु मेक्रोफेजेज से निकल कर B – लसिकाणुओं को उद्दीप्त करते हैं। सहायक T-लसिकाणु (helper T lymphocyte) इसमें सहायक होते हैं। B लसिकाणु देह के परिवहन तंत्र में प्रवेश नहीं करती वरन् लसिका ऊत्तकों में ही रहकर, वृद्धि पर प्लाज्मा कोशिकाओं का क्लोन (clone) बनाती हैं। ये कोशिकाएँ B लसिकाणुओं से 2-3 गुना बड़ी होती है। इनमें प्रतिरक्षी पदार्थों का संश्लेषण होता है जो कि प्रोटीन प्रकृति के होते हैं। ये क्रिया I जीन्स के निर्देशन में संचालित होती है ये प्रोटीन प्रोटीन प्रकृति के पदार्थ या प्रतिरक्षी ही परिवहन तंत्र में प्रवेश करती है। तथा (प्रति सेकण्ड इनके कई हजार अणु बनते हैं। यह क्रिया अर्थात् प्रतिजन एवं प्रतिरक्षी में अन्योन्य क्रिया क्योंकि रक्त या तरल माध्यम में होती है अतः तरल प्रकार की रोधक क्षमता (humoral immunity) कहलाती है। प्लाज्मा कोशिकाएँ 2-3 या अधिक दिन तक प्रतिरक्षी स्त्रावित करती रहती हैं। प्लाज्मा कोशिकाओं के एक समूह के बाद दूसरा समूह (clone) जिन्हें स्मृति कोशिकाएँ कहते हैं यह करती क्रिया रहती है। स्मृति कोशिकाएँ लसिका ऊत्तक में लम्बे समय तक बनी रहती हैं एवं प्रतिजन के पुनः प्रवेश करने पर प्रतिरक्षी बनाने लगती हैं।

रक्त सीरम में उपस्थित प्रोटीन्स में लगभग 17% प्रोटीन प्रतिरक्षी अणु होते हैं। एक जीवाणु हजारों प्रतिजन उत्पन्न कर सकता है जिनके प्रभाव से उतनी ही विशिष्ट प्रकार की प्रतिरक्षी संश्लेषित की जाती है। इन प्रतिरक्षी को ही प्रतिरक्षी ग्लोबूलिन (immunoglobulin) Ig कहते हैं। प्रतिरक्षी अणु प्रोटीन के ग्लोबूलिन समूह के समान रचना रखते हैं अतः इन्हें यह नाम दिया गया है।