WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now

भारतीय थार मरुस्थल की स्थलाकृति क्या है , भारतीय मरुस्थल के निर्माण का मुख्य कारण लिखिए , को समझाइए

भारतीय मरुस्थल के निर्माण का मुख्य कारण लिखिए , को समझाइए भारतीय थार मरुस्थल की स्थलाकृति क्या है ?

भूआकृति
थार मरुस्थल में स्थलरूपों के जनन का भूआकृतिक इतिहास क्वाटरनरी युग से सम्बन्धित समय जलवायु में कई बार आर्द्र एवं शुष्क दशाओं में उतार-चढ़ाव हुआ है। थार मरुस्थल बारे में निम्न प्रकार से वर्णन हैं कि वर्तमान काल से लगभग 40,000 वर्ष पूर्व थार मरुस्थल वर्तमान की तलना में अधिक आर्द्र था जिस समय अरावली श्रेणियों के पश्चिमी ढालों से निकलने वाली नटियर नागौर-जोधपुर-पाली-जालौर-सिरोही मैदान पर व्यवस्थित लूनी अपवाह तंत्र की व्यवस्था कर रखी थी। ली नदी, जो पहले अधिक सक्रिय थी, अब अल्पकालिक सरिता हो गयी है। उस समय हिमालय से निकलने वाली सरस्वती तथा द्रिशादवटी दो प्रमुख नदियाँ थीं जिनके मार्ग में कई बार परिवर्तन हुए हैं। इस आर्द्र अवस्था के बाद शुष्क अवस्था का सूत्रपात हुआ जो आज से लगभग 10,000 वर्ष पूर्व तक बनी रही। इस प्रमुख शुष्क प्रावस्था के समय वर्तमान समय के स्थायी बालुका स्तूपों तथा मरुस्थल के विभिन भागों के विभिन्न प्रकर के स्तूपों एवं रेतीले मैदानों का निर्माण हुआ। आज से लगभग 10,000 से 3,800 वर्ष पूर्व पुनः आर्द्र प्रावस्था का आगमन हुआ जिस कारण जलीय प्रक्रम पुनः सक्रिय हो गये। पूर्व निर्मित बालुका स्तूपों का स्थायित्व हो गया तथा कई आन्तरिक बेसिनों में ताजे जल की झीलों का निर्माण हुआ। आज से लगभग 3,800 वर्ष पूर्व शुष्क प्रावस्था की पुनः स्थापना हो गयी। ताजे जल की अधिकांश झीलें सूख गयों तथा कतिपय झीलें खारे पानी की झील में बदल गयीं। मरुस्थल के द. प. भाग में क्षारीय गतों रन का विकास हुआ। वर्तमान समय में वायूढ़ प्रक्रियाओं द्वारा बरखान एवं अन्य गतिशील वायूढ़ आकृतिया का निर्माण हो रहा है।
सुरेन्द्र सिंह आदि ने भारतीय थार मरुस्थल की स्थलाकतियों को 12 स्थलरूप इकाइयो में विभाजन किया है जो निम्न प्रकार है –
(1) पहाड़ी एवं चट्टानी उच्चभाग यह भाग 15°-35° है, प्रमुख चट्टानें रूपान्तरित, अवसादी, ग्रेनाइट तथा रायोलाइट हैं. अधिकांश जलधारायें अल्पकालिक हैं. अपवाह तंत्र पादपाकार एवं अरीय है। थार मरुस्थल के पूर्वी भाग में अवनलिका अपरदन तथा पश्चिमी भाग में पहाड़ियों की पदस्थला प जमाव सक्रिय हैं।
(2) चट्टानी एवं ग्रैवेली पेडीमेण्ट का ढाल 1°-3° है, गोलाश्म एवं ग्रैवेल की आध कहीं-कहीं पर आधार शैलों का अनावरण हो गया है. प्रमख अपवाह लघ नालों के रूप में है परन्तु कतिपय अवनलिकायें विकसित हुई हैं, अपवाह प्रतिरूप पादपाकार है।
(3) सपाट दवे पेडीमेण्ट एवं समढ मैदान का ढाल 0 से 1° है. स्थान पर ही अपक्षयजनित मलबा लघु दुरी तक परिवहन किए गये शुष्क समूढ पदार्थ तथा वायूढ एवं जलीय रेत प्रमुख में कई जलधारायें विकसित हैं परन्तु पश्चिम में इनकी संख्या कम हो जाती है।
(4) रेतीले तरंगित दबे पेडीमण्ट का ढाल 1° से 3° है, वायूढ़ रेतीली गिरिका की प्रधानता है, धरातलीय अपवाह का सर्वथा अभाव है, केवल अरावली श्रेणियों के पश्चिमी भागों में कई जलधाराओं का विकास हुआ है।
(5) चैरस प्राचीन जलोढ़ मैदान एवं तटीय मैदान, ढाल 0°-1°, कालक्रीट के ऊपर बलुई दोमट एवं चिकनी दोमट का जमाव, क्रम संख्या में सरिता जलधारा का विकास. वर्षा के समय जल का चादरी बहाव होता है। पूर्वी भाग में चादरी अपरदन तथा अवनलिका अपरदन, पश्चिमी भाग में न्यून से सामान्य वायूढ़ निक्षेप एवं मध्यवर्ती भाग में क्षारीय/लवणीय प्रकोप की प्रधानता होती है।
(6) रेतीली तरंगित प्राचीन जलोढ़ मैदान, ढाल 1°-3°, वायूढ, रेतीला गिरिका, पतले रैखिक कटक, मोटी रेत की चादर आदि प्रमुख अवसादी रूप है।
(7) बालुकास्तूप पवनमुखी ढाल 2°-5° तथा पवनविमुखी ढाल 18°-32°, स्थायी एवं सक्रिय स्तूप के रूप में वायूढ़ रेत का जमाव, स्थायी स्तूपों में अर्द्ध सघन एवं चूनेदार रेत का जमाव तथा सक्रिय स्तूपों में ढीले तथा चूनाविहीन रेत का जमाव, स्थायी स्तूपों की 10 से 60 मी. ऊँचाई सक्रिय स्तूपों की 2 से 6 मीेटर ऊँचाई, धरातलीय अपवाह का पूर्णतया अभाव, केवल पूर्वी भाग में बालुकास्तूपों के पार्श्व भागों पर नालियों का विकास हुआ है।
(8) अन्तरस्तृप मैदान, ढाल 0-3°, अवसादों में रेत, बलुई दोमट की प्रधानता, धरातलीय अपवाह का अभाव, वायु द्वारा अपरदन एवं जमाव की क्रियायें अधिक सक्रिय हैं।
(9) नवीन जलोढ़ मैदान, ढाल 0-1°, रेत, सिल्ट एवं ग्रैवेल की प्रधानता है, कम संख्या में लघु समानान्तर जलधाराओं का प्रमुख नदियों के किनारों पर विकास, कतिपय परित्यक्त जलधारायें, अवनलिका अपरदन अधिक सक्रिय है।
(10) सरिता संस्तर, ढाल 0-1°, मोटी रेत तथा ग्रैवेल की प्रधानता, उथली एवं चैड़ी घाटियाँ, सरिताओं का गुम्फन एवं विसर्पण हुआ है, आकस्मिक घनघोर वृष्टि के समय जनित प्रबल वाहीजल (runoff) के कारण नदियों के किनारों का अपरदन होता है।
(11) क्षारीय गर्त, 0-1°, वायूढ रेत के साथ मित्रित सिल्ट एवं मृत्तिका की प्रधानता बहुत कम अपवाह, वर्षा के समय चादरी प्रवाह होता है, लवणता प्रकोप की प्रधानता होती है।
(12) द्वीप, ढाल परिवर्तनशील, टर्शियरी एवं पूर्व टर्शियरी काल की शैलों वाली पहाड़ियों एवं उच्चभाग, बलुई दोमट वाले छिछले जलोढ़ मैदान, कई जलधाराये विकसित हैं, अपवाह प्रतिरूप पादपाकार हैं, अवनलिका अपरदन अधिक सक्रिय है।
(द) पश्चिम तटीय मैदान
पूर्व में पश्चिमी घाट तथा पश्चिम में अरब सागर से आवृत्त भारत का पश्चिमी तटीय मैदान 1400 किमी, की लम्बाई में 8°15‘-20°22‘ उ. अक्षांश तक 10 किमी. से 80 किमी. की चैड़ाई में 64,284 वर्ग किमी. क्षेत्र पर विस्तृत है। इस पश्चिमी तटीय मैदान के अन्तर्गत उत्तर से दक्षिण तक कोंकण तट, कनारा तट तथा मलाबार तट को सम्मिलित किया जाता है। तट को आगे चलकर फिर दो भागों उत्तरी कोंकण तट और दक्षिणी कोंकण तट में विभाजित किया जाता है।
पश्चिमी तटीय मैदान की जलवायु उष्ण कटिबन्धी आर्द्र मानसूनी है, जिसमें वर्षा अरब सागरीय मानसून शाखा से मिलती है। औसत मासिक तापमान 24° से 31° सें. तथा मासिक तापान्तर मात्र 7° सें. रहता है। अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान में ज्यादा अन्तर नहीं होता है। अधिकतम तापमान 32° तो न्यूनतम तापमान 31° होता है। ग्रीष्मकालीन दैनिक तापन्तर 10°-14° से. एवं आर्द्र मानसून काल में 3° से 6° सें. तक रहता है। वार्षिक तापान्तर उत्तर से दक्षिण की ओर कम होता जाता है। औसत वार्षिक वर्षा दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ती जाती है। सामान्यतया कोंकण, कनारा एवं मलाबार तटीय मैदान में औसत वार्षिक वर्षा कमशः 2800 मिमी., 3100 एवं 2400 मिमी. होती है। वर्षा की अधिक मात्रा एवं अत्यधिक वर्षा गहनता के कारण जलीय प्रक्रम अधिक सक्रिय होते है। आर्द्र मौसमी दशाओं के कारण बेसाल्ट-लेटराइट का रासायनिक अपक्षय भी होता है।

अपवाह तंत्र

लघु किन्तु त्वरित वेग वाली अनुवर्ती नदियों द्वारा ही पश्चिमी तटीय मैदान के अपवाह तंत्र की रचना हुई है। तटीय मैदानी की कम चैदाई के कारण ही नदिया लम्बाई में छोटी है। नदियां पूर्व में सहयादि श्रेणियों के पश्चिमी ढालों से निकलकर एक दूसरे के समानान्तर प्रवाहित होती हुई अरब सागर में मिल जाती है। इन नदियों का मार्ग सर्पिलाकार है तथा जलधारा प्रवणता आत तीव्र है। कुछ नदियों ने सहयाद्रि श्रेणियों को काट दिया है। इस तरह के गैप जिनसे होकर नदियाँ पश्चिम की ओर प्रवाहित होती हैं इसे घाट कहते हैं उदाहरणतः पालघाट, भोरघाट, थालघाट आदि।
उत्तरी कोंकण तटीय मैदान की नदियों में वैतरणी, उल्लास, अम्बा आदि प्रमुख हैं। उल्लास की खण्डाला के पास निकलती है तथा पश्चिमी घाट को आर-पार काट कर गहरे गार्ज से होकर भोर पार बाहर निकलकर पश्चिम की ओर तटीय मैदान पर प्रवाहित होती है। मुम्बई के दक्षिण में वशिष्ठी एवं सावित्री दो अन्य प्रमुख नदियाँ हैं। माण्डवी नदी गोवा तट की प्रमुख नदी है। मलाबार तटीय मैदान पर प्रवाहित होने वाली नदियों में पेरियार (जलधार की लम्बाई 230 किमी.), बेयपोर, भारतपूजा तथा पद्मा प्रमुख हैं।
भूरचनाः- भारत के पश्चिमी तटीय मैदान की उत्पत्ति सम्भवतः सागरीय तरंगों द्वारा सहयादि की पदस्थली के अपरदन, अपरदन से प्राप्त अवसादों के निक्षेप तथा नदियों द्वारा सहयाद्रि श्रेणियों के अपरदन तथा निक्षेपण के माध्यम से हुआ है। सागर तल में परिवर्तन एवं विवर्तनिक संचलनों के कारण पश्चिमी तट में निमज्जन एवं उन्मज्जन की क्रियायें हुई हैं। सहयाद्रि या पश्चिमी घाट श्रेणियों का पूर्वी ढाल सोपानी एवं तीव्र है जिस कारण इन्हें स्थानीय स्तर पर घाट कहा जाता है। एक अन्य मत के अनुसार पश्चिमी घाट का पश्चिमी किनारा रिफ्ट घाटी का कगार है। यह विश्वास किया जाता है कि विगत भूगर्भिक काल में एक विस्तृत रिफ्ट घाटी उत्पन्न हुई थी जो बाद में निमज्जन या महाद्वीपय प्रवाह के कारण अदृश्य हो गयी। सागरीय लहरों ने अपरदन द्वारा पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढालों को विस्तृत किया जिस पर सागरीय निक्षेप होने से तटीय मैदानों का निर्माण हुआ।
भूरचना की विशेषता
भूआकृतिक दृष्टि से पश्चिमी तटीय मैदान एक विशिष्ट निम्न स्थलीय भूआकृतिक प्रदेश है जिसमें सागर तल से 150 से 300 मीटर ऊँची पहाड़ियाँ प्रमुख उच्चावच्च हैं। इस तटीय मैदान में निम्न स्थलाकृति तत्व पाये जाते हैं-रेत पुलिन, तटीय बालुकास्तूप, पंक फ्लैट, नदियों, लैगून, कठोर शैलों पर निर्मित अपरदन सतह; अवशिष्ट पहाड़ियाँ आदि पाई जाती हैं। सहयाद्रि श्रेणियों की सागर तल से ऊंचाई 760 से 1220 मीटर है। पश्चिमी घाट उत्तर से दक्षिण तटीय मैदान के समानान्तर फैले हैं जिसे पश्चिम वाहिनी नदियों ने कई जगह काट दिया है। इस तरह के दरों को घाट कहते हैं पश्चिमी तटीय मैदान विभिन्न भागों में स्थलाकृतिक विविधता के कारण इस प्रदेश को तीन उपभआकतिक प्रदेशों में विभाजित किया जाता है, जो निम्न प्रकार है-
(1) कोंकण तट – वास्तव में, महाराष्ट्र के तटीय मैदान का ही नाम कोंकण तट जो मुम्बई एवं गोवा के मध्य 530 किमी. की लम्बाई में विस्तत है। इसकी औसत चैडाई 30-50 किमी. है। कोंकण तटीय हा का मैदान को तटीय रूपों के आधार पर तीन मण्डलों में विभक्त किया जा सकता है -(i) रिवाण्डाडा के उत्तर में स्थित उत्तरी मण्डल, जिसमें सागरीय प्लनेशन सतह में पर्याप्त परिवर्तन हए हैं, (ii) मध्यवर्ती मण्डल जिसमें लटराइट पठार, क्लिफ तथा पलिन प्रमुख आकतियाँ हैं तथा (iii) दक्षिणी मण्डल, जिसमें अनावृत्त सतह, मोनाडनाक, संकरे तटीय मैदान, एस्चुअरी आदि भूआकृतिक आकृतियाँ प्रमुख है।
जहाँ तक सागर तल में परिवर्तन का प्रश्न है, सुलभ साक्ष्यों के अनुसार तटीय भाग में निमज्जन एवं आंशिक उन्मज्जन के संकेत पाए गए हैं। तटीय स्थलाकृतियों खासकर नदियों की एस्चुअरी को देखने से ज्ञात होता है कि तटीय भाग का जलमज्जन हआ है तथा बाद में सागरीय जल आंशिक रूप् में निवर्तन हुआ है। जलमग्न घाटियाँ इस तरह के निमज्जन के स्पष्ट प्रमाण हैं। अधिकाश नदियों की निचली घाटियाँ जलमग्न तथा नावगम्य हैं। इनमें 40 से 50 किमी. तक के आन्तरिक भाग में ज्वारीय जल पहुंचता है। आंशिक निमज्जन के कारण कतिपय जलमग्न घाटियों के कुछ भागों का अनावरण हो गया है। कोंकण तट की आकृतियों में ज्वारीय चबूतरे क्रीक, पुलिन, तटीय वेदिकायें, परित्यक्त क्लिफ, खाड़ियाँ आदि प्रमुख है।
(2) कर्नाटक (कनारा) तटीय मैदान- कर्नाटक तट कर्नाटक प्रान्त के तटीय भाग को प्रदर्शित जाता है। भआकृति दृष्टि से कर्नाटक तट को दो उप प्रदेशों में विभाजित किया जाता है- उत्तरी कनारा तट प्रदेश एवं (ii) दक्षिणी कनारा तट प्रदेश।
(3) मालाबार तट- यह केरल के तटीय भाग को प्रदर्शित करता है तथा 100 किमी की चैडाई के कन्याकमारी तक 550 किमी. की लम्बाई में विस्तृत है। तटीय मैदान उत्तर तथा दक्षिण में संकरा किन्तु मध्य में चैड़ा है। प्रमुख नदियों (बेयपोर, पोन्नई, पेरियार, पद्मा-अचंकोविल आदि की घाटियों में तटीय मैदान की अधिकतम चैड़ाई पायी जाती है।
महत्वपूर्ण प्रश्न
दीर्घउत्तरीय प्रश्न
1. भारत की भूआकारिकी के प्रदेशों का वर्णन कीजिए।
2. गंगा के विशाल मैदान का वर्णन कीजिए।
3. थार के मरुस्थल की विस्तृत जानकारी दीजिए।
4. पश्चिमी तटीय मैदान का वर्णन कीजिए।
लघुउत्तरीय प्रश्न
1. हिमालय प्रदेश के विविध क्षेत्रों की जानकारी लिखो।
2. हिमालयीन अपवाह तंत्र का वर्णन कीजिए।
3. हिमालयीन भूआकृति प्रक्रम की विशेषताएँ लिखिए।
4. हिमाद्री पर टिप्पणी लिखिए।
5. चम्बल घाटी पर टिप्पणी लिखिए।
6. मालाबार तट का वर्णन कीजिए।
बहुविकल्पीय प्रश्न
1. वृहदस्तरीय स्थानिक मापक पर वृहद प्रदेशों का भूआकारिकी अध्ययन का-
(अ) मेगा भूआकारिकी (ब) भूआकारिकी (स) मापक (क्) इनमें से कोई नहीं
2. हिमालय के अन्तर्गत आने वाली श्रेणियाँ-
(अ) शिवालिक (ब) हिमाचल (स) हिमाद्री (द) सभी
3. गंगा नदी का उद्गम स्त्रोत-
(अ) यमोत्री (ब) गंगोत्री (स) अमरकंटक (द) नीलघाटी
4. छोटा नागपुर का पठार विशेषतः किस राज्य में है-
(अ) झारखंड (ब) पंजाब (स) महाराष्ट्र (द) गुजरात
5. यमुना की प्रमुख सहायक नदी-
(अ) तापी (ब) वैनगंगा (स) चम्बल (द) चिनाव
उत्तर- 1. (अ),, 2. (द), 3. (ब), 4. (अ), 5. (स)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *