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मछली की जीवन प्रणाली और बाह्य लक्षण क्या है | पर्च की पेशियां, कंकाल और तंत्रिका तंत्र fish life cycle in hindi

fish life cycle in hindi मछली की जीवन प्रणाली और बाह्य लक्षण क्या है | पर्च की पेशियां, कंकाल और तंत्रिका तंत्र के बारे में जानकारी बताइए |

ताजे पानी की पर्च-मछली की जीवन-प्रणाली और बाह्य लक्षण
गति मछलियों की संरचना और जीवन से परिचय प्राप्त करने की दृष्टि से हम ताजे पानी की पर्च-मछली (रंगीन चित्र ४) की जांच करेंगे। पर्च-मछली नदियों और झीलों में रहती है। जीवन के लिए आवश्यक सभी स्थितियां उसे यहां उपलब्ध होती हैं। जैसे – ताजा पानी , भोजन , श्वसन के लिए ऑक्सीजन , जनन के लिए अनुकूल स्थान ।
पर्च-मछली बड़ी तेजी के साथ और अच्छी तरह तैर सकती है। हवा की अपेक्षा पानी में चलना कहीं अधिक कठिन होता है क्योंकि पानी हवा से अधिक सघन होता है।
पर्च-मछली की शरीर-रचना पानी में चलने के अनुकूल होती है। दबे हुए पार्व, आगे की ओर नुकीले और पीछे की ओर क्रमशः कम चैड़े होते हुए लंबे शरीर के कारण वह आसानी से पानी को काटकर आगे बढ़ती है।
मछली के शरीर के तीन हिस्से होते हैं दृ सिर, धड़ और पूंछ। सिर मजबूती के साथ धड़ से जुड़ा हुआ होता है और धड़ का क्रमशः पूंछ में अंत होता है। पूंछ शरीर का गुदा के पीछे स्थित हिस्सा है। पेशीय पूंछ शरीर की कुल लंबाई की एक तिहाई के बराबर होती है। उसके अंत में मीन-पक्ष होता है। मछली धड़ और पूंछ की लहरदार गति के साथ आगे बढ़ती है। मुड़ने जैसी ज्यादा मुश्किल गतियों और पीठ ऊपर किये रहने की स्थिति में दूसरे मीन-पक्ष उसकी सहायता करते हैं। मीन-पक्ष दो प्रकार के होते हैं। सयुग्म और अयुग्म। पूंछवाले मीन-पक्ष के अलावा अयुग्म मीन-पक्षों में दो पृष्ठीय और एक गुदा स्थित मीन-पक्ष गामिल हैं। मयुग्म मीन-पक्षों में वक्षीय और औदरिक मीन-पक्षों का समावेश है।
मीन-पक्ष छोटी छोटी हड्डियों के बने होते हैं जो मीन-पक्ष त्रिज्याएं कहलाती हैं। त्रिज्याओं के बीच त्वचा का पतला परदा होता है। पर्च-मछली के अग्रपृष्ठीय मीन-पक्ष में सख्त और तेज त्रिज्याएं होती हैं। ये उभरकर मछली को अपने शत्रुओं से बचाव करनेवाले साधनों का काम देती हैं।
पर्च-मछली की त्वचा अस्थि शल्कों से ढंकी रहती है। शल्कों के अगले किनारे त्वचा में धंसे रहते हैं जबकि उनके पिछले किनारे खपरैल के खपरों की तरह एक के ऊपर एक चढ़े रहते हैं। शल्क शरीर की रक्षा करते हैं और उपर्युक्त रचना के कारण गति में कोई बाधा नहीं डालते। शल्कों की सतह पर श्लेष्म की एक पतली-सी परत होती है। यह श्लेष्म त्वचा के अंदर स्थित ग्रंथियों से रसता है । श्लेष्म के कारण पानी में शरीर की रगड़ कम हो जाती है।
रंग-रचना पर्च-मछली का रंग ऊपर की ओर गहरा हरा , बगलों में काली आड़ी धारियों सहित हल्का हरा और नीचे की ओर पीला-सा सफेद होता है। इससे मछली को पानी में पहचान लेना मुश्किल होता है। ऊपर की ओर तैरनेवाली मछलियों के लिए उसकी गहरे हरे रंग की पीठ गहरे तल से एकरूप दिखाई देती है जबकि पर्च-मछली के नीचे से तैरनेवाली मछलियां सतह की हल्की पृष्ठभूमि पर पर्च का उदर नहीं पहचान पातीं। पर्च- मछली के शरीर की बगलों पर स्थित काली आड़ी धारियां पानी के उन पौधों की छाया की तरह दिखाई देती हैं जिनके बीच पर्च-मछली आम तौर पर अपने शिकार की घात में छिपी रहती है।
विभिन्न स्थानों की पर्च-मछलियों के रंग अपनी अपनी विशेषताएं लिये होते हैं।
धीरे धीरे बहनेवाली जंगली नदियों में, जिनके तल में काफी धरण और छाड़न होती है और जिनका पानी काला दिखाई देता है, पर्च-मछली का रंग गहरा होता है। जोरों से बहनेवाली और रेतीले तलों वाली नदियों की पर्च-मछली का रंग काफी हल्का होता है। गरज यह कि मछली के रंग परिस्थितियों के । अनुसार भिन्न भिन्न होते हैं।
अपने शरीर के रंगों की कृपा से पर्च-मछली चोरी चोरी अपने शिकार तक पहुंच सकती है और बड़ी बड़ी शिकारभक्षी मछलियों की नजर से बची रह सकती है। इस प्रकार की रंग-रचना संरक्षक रंग-रचना कहलाती है।
वातावरण से संपर्क
पर्च-मछली चलता-फिरता शिकार पकड़कर खाती है। वह पानी में शिकार ढूंढ लेती है। दूसरी मछलियां और जलचर कीट उसका भोजन हैं। दूसरी ओर खुद पर्च-मछली पाइक आदि दूसरे बड़े प्राणियों का शिकार है।
पर्च-मछली को अपना शिकार ढूंढने और शत्रुओं से बचे रहने में उसकी ज्ञानेंद्रियों से सहायता मिलती है। ये इंद्रियां वाह्य परीक्षण में साफ साफ दिखाई देती हैं । सिर के दोनों ओर एक जोड़ा बड़ी बड़ी आंखें होती हैं । स्थलचर प्राणियों के विपरीत पर्च-मछली की आंखों के पलकें नहीं होती और वे समीप-दृष्टि होती हैं। आंखों के आगे घ्राणेंद्रियां होती हैं। ये दो थैलियों के रूप में होती हैं जिनका मुख-गुहा से कोई संबंध नहीं होता। हर थैली दो सूराखों में अर्थात् नथुनों में खुलती है।
पर्च-मछली के जीवन में पार्शि्वक रेखा की इंद्रियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। स्थलचर प्राणियों में ये इंद्रियां नहीं होती। ये इंद्रियां पर्च-मछली की बगलों में बिंदुओं की रेखा के रूप में होती हैं। ये बिंदु लंबी और शरीर की लंबाई में फैली नलिका से संबद्ध छोटी नलिकाओं के मुख होते हैं। लंबाई में फैली नलिका में संवेदक कोशिकाएं होती हैं जो तंत्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क से संबद्ध रहती हैं। पार्शि्वक रेखा की इंद्रियों से जल की तरंगें टकराती हैं। इससे पर्च-मछली को पानी की दिशा , जोर , गहराई और जल में स्थित सख्त चीजों तक पहुंचने के मार्ग का बोध होता है।
इस प्रकार शरीर का आकार और रंग , श्लेष्म से आवृत शल्क , मीन-पक्ष और पार्शि्वक रेखा की इंद्रियां पर्च-मछली को अपने जलगत जीवन के अनुकूल बनानेवाले साधनों का काम देती हैं और जल ही तो पर्च-मछली के लिए रहने का एकमात्र स्थान है।
प्रश्न – १. पर्च-मछली पानी में किस प्रकार चलती है ? २. पर्च-मछली की संरक्षक रंग-रचना की व्याख्या करो। ३. पर्च-मछली किन इंद्रियों के सहारे वातावरण से सतत संपर्क रखती है ? ४. अपने को जलगत जीवन के अनुकूल बनाने के लिए पर्च-मछली के पास कौनसे साधन होते हैं ?
व्यावहारिक अभ्यास – घर पर एक छोटा-सा मत्स्यालय बना लो , उसमें कुछ मछलियां छोड़ दो और उनका पालन करना सीखो ( मत्स्यालय तैयार करने के विषय में अपने अध्यापक से या तरुण प्रकृतिप्रेमियों से परामर्श प्राप्त करो)।
 पर्च-मछली की पेशियां, कंकाल और तंत्रिका तंत्र
पेशियां पर्च-मछली की त्वचा के नीचे पेशियां होती हैं। पेशियां संकुचित यानी छोटी हो सकती हैं। पेशियों के सिरे हड्डियों से जुड़े रहते हैं। अतः पेशियों के संकुचित होते ही मछली की कुछ इंद्रियों में गति उत्पन्न होती है।
पर्च-मछली की पीठ और पूंछ की पेशियां विशेष सुपरिवर्दि्धत होती हैं। इनके संकुचित होने से मछली का शरीर मुड़ता है और वह आगे की ओर तैरती है। विशेष पेशियों के कारण मीन-पक्षों में गति उत्पन्न होती है। कुछ और पेशियां मुंह को घेरे हुए जबड़ों को गतिशील बनाती हैं।
कंकाल पर्च-मछली के शरीर की बहुत-सी हड्डियों से उसका कंकाल (आकृति ७०) बनता है। कंकाल का आधार कशेरुक दंड है जो शरीर में सिर से लेकर पूंछ के मीन-पक्ष तक फैला रहता है। कशेरुक दंड में बहुत-सी पृथक् हड्डियां होती हैं जो कशेरुक कहलाती हैं। ये मजबूती के साथ एक दूसरी से जुड़ी तो रहती हैं पर होती हैं गतिशील। इस कारण कशेरुक दंड सारे शरीर के लिए आधार का काम देता है और साथ साथ उसमें तैरने के लिए आवश्यक पर्याप्त लचीलापन भी होता है।
हर कशेरुक में हम शरीर और उसके ऊपर मेहराव देख सकते हैं (आकृति ७१)। शरीर आगे और पीछे की ओर कुछ कानकेव होता है। एक के पीछे एक कशेरुक मेहराबों से रीढ़-नलिका बनती है जिसमें रीढ़-रज्जु होती है।
अंड-समूह से जब मछली परिवर्दि्धत होती है उस समय शुरू शुरू में उसके अस्थिमय कशेरुक दंड नहीं होता। पहले पहल एक ठोस धागे के रूप में रज्जु तैयार होती है और उसके बाद ही उसके इर्द-गिर्द कशेरुक परिवर्दि्धत होते हैं। वयस्क पर्चमछली में रज्जु के अवशेष कशेरुकों के बीच जेलीनुमा पारदर्शी गोलियों के रूप में पाये जाते हैं। पसलियां धड़ के कशेरुकों से जुड़ी रहती हैं। वे शरीर-गुहा को घेरे रहती हैं और उसमें स्थित इंद्रियों की रक्षा करती हैं।
सिर की हड्डियों से खोपड़ी बनती है। खोपड़ी में कपाल और मुख-गुहा को घेरी हुई हड्डियां (जबड़े, बाहु की मेहराबें, जल-श्वसनिका के आवरण ) शामिल हैं। कपाल मस्तिष्क को धारण किये हुए होता है।
मीन-पक्ष के कंकाल में बहुत-सी सूक्ष्म हड्डियां होती हैं।
पर्च-मछली का कंकाल उसके शरीर का मुख्य आधार है जो उसे निश्चित आकार देता है और अंदरूनी इंद्रियों की रक्षा करता है। कंकाल और उससे संबद्ध पेशियों को लेकर गति का इंद्रिय-तंत्र बनता है।
तंत्रिका तंत्र इस पुस्तक में पहले हमने जिनका परिचय प्राप्त कर लिया है उन सब प्राणियों की तरह पर्च-मछली का तंत्रिका-तंत्र भी सभी इंद्रियों की गतिविधियों में समन्वय और संबंधित प्राणी का वातावरण से संपर्क सुनिश्चित करता है। तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क, रीढ़-रज्जु और इनसे निकलनेवाली तंत्रिकाएं शामिल है।
मस्तिष्क कपाल में स्थित होता है। इसकी संरचना काफी जटिल होती है (आकृति ७२ )। हम इसके निम्नलिखित हिस्से देख सकते हैं – अग्रमस्तिष्क , जिसके आगे छोटे घ्राण पिंड होते हैंय अंतर्मस्तिष्क य मध्य मस्तिष्क, जो सुपरिवर्दि्धत होता हैय अनुमस्तिष्कय मेडयूला पावलंगेटा, जो क्रमशः रीढ़-रज्जु में पहुंचता है ।
कशेरुक नलिका में स्थित रीढ़-रज्जु सारे शरीर में एक लंबे धागे के रूप में फैली रहती है।
मस्तिप्क और रीढ़-रज्जु से निकलनेवाली सफेद धागे जैसी अनगिनत तंत्रिकाएं शाखाओं के रूप में ज्ञानेंद्रियों, पेशियों और अन्य इंद्रियों में पहुंचती हैं। तंत्रिकाएं दो प्रकार की होती हैं – संवेदक और प्रेरक। संवेदक तंत्रिकाएं ज्ञानेंद्रियों तथा अन्य इंद्रियों की उत्तेजनाएं मस्तिष्क में पहुंचा देती हैं। प्रेरक तंत्रिकाएं उत्तेजनाओं को उलटी दिशा में यानी मस्तिष्क से इंद्रियों की ओर ले जाती हैं ।
पर्च-मछली का बरताव कई प्रतिवर्ती क्रियाओं का बना रहता है। उदाहरणार्थ, शिकार को देखते ही दृष्टि-तंत्रिकाओं में उत्तेजना उत्पन्न होती है। यह मस्तिष्क में पहुंचती है। यहां से वह प्रेरक तंत्रिकाओं द्वारा पूंछ और धड़ की पेशियों में ले जायी जाती है। इन पेशियों में पहुंचकर उत्तेजना उनमें समन्वित संकुचन उत्पन्न करती है और पर्च-मछली अपने शिकार पर झपट पड़ती है। बड़ी मछली को देखते ही वह फौरन उससे दूर भागती है। भूख की हालत में उत्तेजना अंदरूनी इंद्रियों से मस्तिष्क तक पहुंचती है। इससे प्रेरक प्रतिवर्ती क्रियाएं उत्पन्न होती हैं जिनका लक्ष्य भोजन की खोज होता है।
पर्च-मछली की अधिकांश प्रतिवर्ती क्रियाएं जन्मजात होती हैं और वे अनियमित कहलाती हैं। पर अपने जीवन-काल में पर्च-मछली नयी प्रतिवर्ती क्रियाएं अपना सकती है। इस प्रकार यदि हम उसे हमेशा मत्स्यालय के एक कोने में चारा देते जायें और चारा देते समय दीवाल पर छड़ी से खटखटाते रहें तो कुछ ही अवधि में मछली छड़ी की हर खटखटाहट के साथ उक्त कोने में तैरकर आने की आदी हो जायेगी। इसे अर्जित प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं और यह इसी शर्त पर उत्पन्न होती है कि चारे की खिलाई और छड़ी की खटखटाहट एकसाथ हों। जीवन-काल में और किसी विशेप शर्त पर ही परिवर्दि्धत होनेवाली प्रतिवर्ती क्रियाएं नियमित कहलाती हैं।
नियमित प्रतिवर्ती क्रियाएं अस्थायी होती हैं। यदि कई बार छड़ी की खटखटाहट चारे की खिलाई के साथ न हो तो मछली का तैरकर विशिष्ट कोने में आना बंद होगा य नियमित प्रतिवर्ती क्रिया का लोप होगा।
प्रश्न – १. पर्च-मछली में कौनसी पेशियां अधिक परिवर्दि्धत होती हैं और क्यों? २. उसके कंकाल की संरचना का वर्णन दो। ३. तंत्रिकातंत्र की संरचना का वर्णन दो। ४. नियमित और अनियमित प्रतिवर्ती क्रियाओं में क्या अंतर है ?

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