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सुश्रुतसंहिता का आयुर्वेद के क्षेत्र में महत्व बताइए। सुश्रुत संहिता के रचनाकार कौन है , सुश्रुत के द्वारा बनाए गए उपकरणों की संख्या कितनी है प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा ?

सुश्रुत संहिता
सुश्रुत संहिता का सम्बन्ध शल्य चिकित्सा और प्रसूति की व्यावहारिक समस्याओं से है। सुश्रुत ने एक मृत मानव शरीर की सहायता से शरीर का विस्तृत अध्ययन किया। वे मुख्य रूप से निम्नलिखित में निपुण थे :
ऽ राइनोप्लास्टी (प्लास्टिक सर्जरी)
ऽ नेत्र विज्ञान (मोतियाबिंद का निष्कासन)
सर्जरी या शल्य चिकित्सा को उन दिनों शास्त्राकर्म कहा जाता था। सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के चरणों का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस क्षेत्र में, सुश्रुत के सबसे महान योगदानों में से एक था राइनोप्लास्टी या काॅस्मेटिक सर्जरी जिसके अंतर्गत प्लास्टिक सर्जरी के माध्यम से एक विकृत नाक को पूर्वावस्था में लाने का प्रयास किया जाता है। आँख से मोतियाबिंद के निष्कासन का कार्य भी सुश्रुत ने बड़ी आसानी से और सरल सर्जिकल औजारों का उपयोग करके किया था। अतः, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में विश्व की तुलना में सर्वोत्तम औषधीय विकास देखने को मिला था।
भारत से बौद्ध भिक्षुओं ने तिब्बत और चीन में आयुर्वेद प्रणाली का प्रसार किया। अरबी भाषा में भी दोनों पुस्तकों का अनुवाद हुआ। 180 ईसा पूर्व से 10 ई. के दौरान भारत में शासन के दौरान हिन्द-यूनानी शासक भी भारतीय चिकित्सा पद्धति से प्रभावित हुए।
मध्य युग में, 13वीं शताब्दी में रचित सारंगधरा संहिता में, प्रयोगशालाओं में चिकित्सा तथा मूत्रा परीक्षा के लिए अफीम के उपयोग पर जोर दिया गया है।
रसचिकित्सा प्रणाली का सम्बन्ध खनिज औषधियों का उपयोग करके रोगों के उपचार से है।
चिकित्सा की यूनानी प्रणाली का आगमन यूनान से भारत में अली-बिन-रब्बान द्वारा रचित पुस्तक पिफरदौस हिकमत के साथ हुआ था।
भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र
वैदिक काल से ही, पृथ्वी पर उपलब्ध सामग्रियों को पंचभूतों में वर्गीकृत किया गया है। इन पंचमहाभूतों की पहचान मानव इंद्रियों की अवधारणा की सहायता से की जाती थीः
ऽ गंध के साथ पृथ्वी (धरती)
ऽ दृष्टि के साथ अग्नि (आग)
ऽ अनुभव के साथ हवा (माया)
ऽ स्वाद के साथ जल (आपा)
ऽ ध्वनि के साथ व्योम (आकाश)
ऐसा माना जाता है कि यह भौतिक संसार इन पांच तत्वों से निर्मित है। बाद में आए बौद्ध दार्शनिकों ने व्योम को एक तत्व के रूप में स्वीकार नहीं किया और उसे जीवन, आनंद और दुःख के साथ प्रतिस्थापित कर दिया। दार्शनिकों का विचार था कि व्योम को छोड़कर, अन्य सभी चार तत्व भौतिक रूप से प्रत्यक्ष हो सकते हैं और इसलिए उनमें पदार्थों के सूक्ष्म कणों का समावेश था। अंतिम सूक्ष्म कण जिन्हें अब और उप-विभाजित नहीं किया जा सकता है उन्हें परमाणु कहा जाता था। पांच अलग-अलग तत्वों के लिए पांच अलग-अलग प्रकार के परमाणु के बारे में बताया गया। अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय दार्शनिकों ने एक परमाणु के विभाजन की कल्पना की थी। 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व के भारतीय दार्शनिक कणाद और पकुधा कात्यायन ने सबसे पहले परमाणुओं की अवधारणा के आधार पर यह स्पष्ट किया कि यह भौतिक संसार इन्हीं परमाणुओं से बना है। कणाद ने व्याख्या की कि यह भौतिक संसार कणों से बना है जिन्हें किसी मानव अंग के माध्यम से नहीं देखा जा सकता है। उन्हें अब और उप-विभाजित नहीं किया जा सकता है और वे अविनाशी हैं जैसा कि आधुनिक परमाणु सिद्धांत में भी यही कहा गया है।

रसायन शास्त्र
भारत में रसायन शास्त्र का विकास, प्रयोगों के माध्यम से कई चरणों में हुआ था। रसायन शास्त्र के अनुप्रयोग के क्षेत्र थेः
ऽ धातुकर्म (धातुओं को गलाना)
ऽ इत्रों का आसवन
ऽ रंगों और रंजकों का निर्मान
ऽ चीनी का निष्कर्षण
ऽ कागज का उत्पादन
ऽ बारूद का उत्पादन
ऽ तोप का निर्माण, इत्यादि
भारत में, रसायन विद्या को रसायन शास्त्र, रसतंत्र, रस विद्या और रसक्रिया कहा जाता था, जिसका अर्थ तरल पदार्थ का विज्ञान है। रासायनिक प्रयोगशालाओं को रसक्रिया शाला और रसायनशास्त्राी को रसदान्य कहा जाता था।
धातुकर्म का विकास भारत में लौह युग से आरम्भ हुआ। वास्तव में, धातुकर्म में होने वाले विकास में कांस्य युग से लौह युग और वहां से वर्तमान युग तक हुई प्रगति का विशेष योगदान है। धातुओं को गलाने के क्षेत्रा में, भारतीय लोग, अयस्क से धातुओं के निष्कर्षण और उसे ढालने में निपुण थे। संभव है कि भारत ने यह विचार मेसोपोटामिया से ग्रहण किया हो। फारसी सेना में शामिल भारतीय लोहे की नोंक वाले हथियारों का उपयोग करते थे। भारतीय धातुकर्म का सर्वोत्तम साक्ष्य, दिल्ली में महरौली का लौह स्तम्भ और बिहार के सुल्तानगंज में गौतम बुद्ध की एक प्रतिमा है।
हजारों वर्षों से भी पहले बने होने के बावजूद उनमें अभी तक जंग नहीं लगा है।
प्राचीन काल के एक प्रसिद्ध कीमियागर थे नागार्जुन। वह मूल धातु को सोने में रूपांतरित करने में निपुण थे। 931 इसवी में गुजरात में जन्म लेने वाले नागार्जुन को लोगों की मान्यता के अनुसार मूल धातुओं को सोने में रूपांतरित करने और ‘जीवन सुधा’ के प्रदान करने की शक्ति प्राप्त थी।
उन्होंने रसरत्नाकर नामक एक प्रबंध की रचना की जो कि रसायन शास्त्र पर आधारित एक पुस्तक थी और यह उनके और ईश्वर के बीच की वार्ता के रूप में है। यह प्रबंध मुख्य रूप से तरल पदार्थों (मुख्यतः पारा) की तैयारी से संबंधित है। इस पुस्तक में धातुकर्म और कीमियागीरी के सर्वेक्षण पर भी जोर दिया गया है।
पारा से जीवन सुधा तैयार करने के लिए, नागार्जुन ने खनिजों एवं क्षारों के अलावा पशु और वनस्पति उत्पादों का उपयोग किया। उन्होंने सोने में मूल धातुओं के रूपांतरण पर भी चर्चा की। सोने का उत्पादन नहीं किया जा सकता था परन्तु यह विधि सोने जैसी पीली चमक वाली धातुओं का उत्पादन में उपयोगी रही, जिससे नकली आभूषण बनाने में भी सहायता मिलती है।
नागार्जुन ने उत्तरतंत्र की भी रचना की जो कि सुश्रुत संहिता का एक पूरक है और चिकित्सीय औषधियों के निर्माण से संबंधित है। बाद के वर्षों में उन्होंने चार आयुर्वेदिक ग्रंथों की भी रचना की जब उनकी रुचि जैविक रसायन शास्त्र और चिकित्सा की ओर स्थानांतरित हो गई।
रसायन शास्त्र के क्षेत्र में नागार्जुन का योगदान इतना अधिक था कि धातुओं को रूपांतरित करने का विचार, भारतीय पुस्तकों से अरब लोगों द्वारा लिया गया प्रतीत होता है।
इसके अलावा रर्साणव एक संस्कृत पाठ है जो मध्ययुगीन काल (12वीं शताब्दी) में लिखा गया और यह तंत्र विद्या से संबंधित है। यह रसायन शास्त्र के तहत धतु को तैयार कर तंत्र पर काम करता है।
प्राचीन साहित्य का संरक्षण सामान्य रूप से ताड़ के पत्तों पर किया जाता था। हालाँकि, कागज का उपयोग मध्य युग में आरम्भ हुआ। कश्मीर, पटना, मुर्शिदाबाद, अहमदाबाद, औरंगाबाद, मैसूर, इत्यादि कागज उत्पाद के सुप्रसिद्ध केंद्र थे।
कागज बनाने की प्रक्रिया पूरे देश में प्रायः एक समान थी।
मुगलों के आगमन के पश्चात्, भारत में बारूद का निर्माण और तोपों और बंदूकों में उसका उपयोग भी आरम्भ हो गया। विभिन्न प्रकार की बारूद का निर्माण करने के लिए अलग-अलग अनुपात में शोरा, सल्पफर और लकड़ी के कोयले का उपयोग किया जाता था। तुजुक-ए-बाबरी में तोपों के निर्माण का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
आइन-ए-अकबरी में अकबर के ‘इत्र कार्यालय के विनियमन’ का उल्लेख किया गया है। गुलाबों से इत्र की खोज का श्रेय नूरजहाँ की माता को दिया जाता है।
भू-विज्ञान, जल विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में, वाराहमिहिर के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। वे गुप्त काल से संबंधित थे और उनकी गिनती विक्रमादित्य के दरबार के नौ रत्नों में की जाती थी। उनकी भविष्यवाणी इतनी सटीक होती थी कि राजा विक्रमादित्य ने उन्हें ‘वाराह’ की उपाधि से सम्मानित कर दिया था। उनका दावा था कि दीमक और पौधों की उपस्थिति किसी क्षेत्र विशेष में जल की उपस्थिति का संकेत हो सकती है। उन्होंने छः पशुओं और छत्तीस पौधों की एक सूची प्रदान की थी जो जल की उपस्थिति का संकेत दे सकते थे।
उन्होंने अपनी पुस्तक बृहत् संहिता में धरती बादल का सिद्धांत भी प्रतिपादित किया था। उन्होंने कहा कि भूकंप का सम्बन्ध पौधों के प्रभाव, पशुओं के आचरण, भूमिगत जल, समुद्र के भीतर चल रही गतिविधियों और असामान्य रूप से बादल के निर्माण से है। उन्होंने ज्योतिष विद्या या ज्योतिष शास्त्र में भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया था।
जहाज निर्माण और नौपरिवहन
प्राचीन काल में भारतीयों द्वारा समुद्री गतिविधियों के कई सन्दर्भ प्राप्त होते हैं। संस्कृत और पाली साहित्य में जहाज निर्माण और नौपरिवहन गतिविधियों का उल्लेख था। हिन्दू धर्म की धार्मिक लोक कथाओं में, सत्यनारायण पूजा की कथा में एक समुद्री व्यापारी के बारे में बताया गया है जो तूफान में फंस गया था और उसने भगवान प्रार्थना की कि यदि वह बच जाता है तो वह सत्यनारायण भगवान की पूजा करेगा।
युक्ति कल्पतः एक प्रबंध है जिसकी रचना संस्कृति में की गई है जिसका सम्बन्ध प्राचीन काल में जहाज निर्माण में उपयोग की जाने वाली विभिन्न तकनीकों से है। इस पुस्तक में जहाजों के प्रकार, उनके आकार और उन जहाजों के निर्माण में उपयोग होने वाली सामग्रियों के प्रकार के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है। प्राचीन काल में भारतीय निर्माताओं को जहाज निर्माण के लिए उपयोग होने वाली सामग्रियों के बारे में अच्छा ज्ञान था। जहाजों को मुख्य रूप से दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया थाः
ऽ सामान्य (साधारण वर्ग)
ऽ विशेष (विशेष वर्ग)
साधारण वर्ग एक समुद्री यात्रा के लिए होता था और इसमें दो प्रकार के जहाज थेः
ऽ दीर्घ प्रकार के जहाज – लम्बा और संकीर्ण ढांचा
ऽ उन्नत प्रकार के जहाज – अधिक ऊंचा ढांचा
कक्षों की लम्बाई और स्थिति के अनुसार, जहाजों को निम्नलिखित वर्गों में वर्गीकृत किया गया थाः
ऽ सर्वमंदिर: इसमें डेक की एक छोर से दूसरी छोर तक कक्ष होते थे, इनका उपयोग शाही जलयात्रा और घोड़ों के परिवहन के लिए किया जाता था।
ऽ मध्यमंदिरः इसमें डेक के बीच वाले हिस्से में कक्ष होते थे, इनका उपयोग आनंद यात्रा के लिए किया जाता था।
ऽ अग्रमंदिरः इनका उपयोग युद्ध के लिए किया जाता था।
प्राचीन काल में जहाज के विभिन्न हिस्सों के लिए उपयोग किए जाने वाले संस्कृत शब्दों में से कुछ निम्नलिखित हैंः
ऽ जहाज का लंगर – नाव बंधन किला
ऽ पाल – वात वस्त्र
ऽ जहाज की पतवार – जेनी पत्ता या कर्ण
ऽ जहाज का कील – नाव ताला
ऽ जहाज का कम्पास – मत्स्ययंत्र या मछली मशीन (मछली की आकृति में)।

प्राचीन काल में दो प्रसिद्ध भारतीय खेल थे
कलारिपायतः यह केरल का एक मार्शल आर्ट था जो बोधिधर्म नामक ऋषि द्वारा 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में चीन ले जाया गया। जूड़ो और कराटे के वर्तमान रूप की उत्पत्ति इसी कलारिपायत से हुई थी।
शतरंजः इस खेल को ‘चतुरंग’ के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ है-चार शरीर। इसे चैकोर पटल और अक्ष (पासा) की सहायता से खेला जाता था। इसे अष्टपद भी कहा जाता था जिसका अर्थ है- आठ चरणों वाला खेल। चतुरंग का उल्लेख प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत में मिलता है जहाँ इस खेल को कौरवों और पांडवों के बीच खेला गया था।
अभ्यास प्रश्न – प्रारंभिक परीक्षा
1. गणित की किस शाखा को प्राचीन काल में बीजगणित कहा जाता था?
(a) अरिथमेटिक (b) अलजेब्रा
(c) एस्ट्रोनाॅमी (d) ज्योमेट्री
2. निम्नलिखित प्राचीन पाठ्यांशों पर विचार करेंः
i. लीलावती
ii. रसरत्नाकर
iii. युक्ति कल्पतरू
उपर्युक्त में से कौन-सा/से जहाज निर्माण से संबंधित है/हैं?
(a) केवल ;i) ;b) केवल ;iii)
;c) ;i) और ;iii) ;d) ;i) और ;ii)
3. निम्नलिखित में से कौन गणित पर आधारित सबसे पहला प्रबंध है?
;a) सुल्वासूत्रा ;b) आर्यभट्टीयम्
(c) ब्रह्मगुप्त सिद्धांतिका (d) सिद्धांत शिरोमणि
4. प्राचीन काल में युद्ध में निम्नलिखित में से किस/किन पोत(तों) या जहाज(जों) का उपयोग किया जाता था?
(a) सर्वमंदिर (b) मध्यमंदिर
(c) अग्रमंदिर ;d) ;a) एवं ;b) दोनों
5. प्राचीन काल में नौपरिवहन के लिए उपयोग किए जाने वाले जहाज के कम्पास को क्या कहा जाता था?
(a) वात वस्त्र (b) जेनी पत्ता
(c) नाव ताला (d) मत्स्ययंत्र
6. चतुरंग जो कि प्राचीन काल का एक खेल है उसे वर्तमान में किस नाम से खेला जाता है?
(a) जूड़ो (b) कराटे
(c) कुश्ती (d) शतरंज
7. निम्नलिखित में से कौन प्राचीन काल में पेशे से एक कीमियागार या रसायन शास्त्री थे?
(a) अपस्ताम्ब (b) वाराहमिहिर
(c) ब्रह्मगुप्त (d) नागार्जुन
8. रसायन शास्त्रा से संबंधित निम्नलिखित क्षेत्रों पर विचार करेंः
i. धातुकर्म
ii. चीनी का निष्कर्षण
iii. कागज का उत्पादन
iv. इत्रों का आसवन
प्राचीन काल में उपरोक्त में से किसका उपयोग किया जाता था?
;a) ;i) और ;iii) ;b) ;i), ;ii) vkSj ;iv)
;c) ;i), ;ii), ;iii) और ;iv) ;d) ;iii) और ;iv)
9. निम्नलिखित में से कौन-सा/से, प्राचीन काल में चिकित्सीय शिक्षा केंद्र था/थे?
(a) तक्षशिला (b) वाराणसी
;c) ;a) एवं ;b) दोनों ;d) न तो ;a) और न ही ;b)
10. सुश्रुत संहिता जो कि शल्य चिकित्सा से संबंधित है इसमें किसके बारे में विस्तार से बताया गया है?
;a) राइनोप्लास्टी या प्लास्टिक सर्जरी ;b) नेत्रा विज्ञान
;c) ;a) एवं ;b) दोनों ;d) न तो ;a) और न ही ;b)
उत्तर
1. ;b) 2. ;b) 3. ;a) 4. ;c) 5. ;d)
6. ;d) 7. ;d) 8. ;b) 9. ;c) 10. ;c)

पिछले वर्षों के प्रश्न – मुख्य परीक्षा
1. भारतीय रसायन शास्त्रा के इतिहास के अध्ययन में रसार्नव के महत्व पर टिप्पणी करें।

अभ्यास प्रश्न – मुख्य परीक्षा

1. प्राचीन काल में जहाज निर्माण के विकास और नौपरिवहन का संक्षेप में वर्णन करें।
2. प्राचीन और मध्य काल में विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारत अन्य देशों से कापफी आगे रहा है। इस वक्तव्य की गंभीरतापूर्वक जांच करें।
3. प्राचीन काल में वाराहमिहिर द्वारा किसी क्षेत्र विशेष में जल की उपस्थिति की पहचान करने की विधि का उल्लेख किया गया था। इस पर चर्चा करें।