सासाराम का मकबरा किसने बनवाया था , शेरशाह सूरी का मकबरा कहाँ स्थित है किसका है द्वारा निर्मित सर्व प्रमुख इमारत कौन सी है

By   April 17, 2022
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जाने – सासाराम का मकबरा किसने बनवाया था , शेरशाह सूरी का मकबरा कहाँ स्थित है किसका है द्वारा निर्मित सर्व प्रमुख इमारत कौन सी है इतिहास क्या है ?
सूरी स्थापत्य (Suri Architecture)
भाग्य अफगान शासक शेरशाह सूरी और उसके पुत्र इस्लामशाह या सलीमशाह की बनवाई हुई इमारतों का स्थापत्य भारतीय में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस काल की कला को मुगल-पूर्वकाल के वास्तुकला के चरमोत्कर्ष तथा नई शैली के शुरादा नमून के तौर पर देखा जाता है। शेरशाह सूरी युग का सबसे बेहतरीन स्थापत्य का नमूना उसका स्वयं का सासाराम (बिहार) में आया हुआ मकबरा है। शेरशाह का मकबरा झील के अन्दर एक ऊँचे टीले पर निर्मित हिन्दू-मुस्लिम वास्तुकला का श्रेष्ठ नमूना मकबरा बाहर से मुस्लिम प्रभाव एवं अन्दर से हिन्दू प्रभाव में निर्मित है। वास्तुविद् इतिहासकार पर्सी ब्राउन ने इसे सम्पूर्ण उत्तर भारत की सर्वाेत्तम कृति कहा है। यह देश में अफगान शासकों के काल की कारीगरी के अंतिम श्रेष्ठ नमूने के तौर पर जाना जाता है। उसने रोहतास में एक किला भी बनवाया। शेरशाह ने दिल्ली पर कब्जा कर ‘शेरगढ़‘ या ‘दिल्ली शेरशाही‘ की नींव डाली। इस नगर के अवशेषों में ‘लाल दरवाज़ा‘ या शेरशाह दरवाजा एवं ‘काबुली या खुनी दरवाजा‘ ही देखने को मिलते हैं। इसका नाम खूनी दरला ना बाद में तब पड़ा जब अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के पुत्रों और पोते को अंग्रेजों ने यहाँ लाकर गोली से मार ‘डान शेरशाह‘ ने ‘दीन पनाह‘ को तुड़वाकर उसके मलवे पर ‘पराने किले‘ का निर्माण करवाया। 1541 ई. में शेरशाह ने इस किले के अन्दर ‘किला-ए-कुहना‘ नाम की शानदार मस्जिद का निर्माण करवाया। इस मस्जिद में प्रवेश के लिए घोड़े की नाल के आकार वाली मेहराब युक्त पाँच दरवाजे हैं। इसकी महत्ता इसलिए है क्योंकि इसके स्थापत्य से लोदी और मुगलों के बीच संक्रमणकाल का भी पता चलता है। इस मस्जिद के परिसर में एक ‘शेरमण्डल‘ नाम का अष्टभुजी दो मंजिला मण्डप और छतरी निर्मित है। इसी शेरमंडल को सीढ़ियों से गिर जाने के कारण हुमायूं की मौत हुई थी। शेरशाह ने रोहतासगढ़ के दुर्ग एवं कन्नौज के स्थान पर ‘शेरसूर‘ नामक नगर बसाया। सन् 1541 ई. में उसने पाटलिपुत्र को ‘पटना‘ के नाम से पुनः स्थापित किया।
शेरशाह के बेटे सलीमशाह ने दिल्ली में यमुना किनारे एक नये नगर को बसाने के लिए रोड़ी से बने एक नये किले की नींव डाली। इसे सलीमगढ़ या नूरगढ़ कहा जाता है। बाद में इसके निकट मुगलों ने लाल किला बनवाया और एक पुल के जरिए उसे लाल किले से जोड़ दिया गया। मुगल काल में इसका प्रयोग बतौर जेलखाना भी हुआ। दिल्ली में हुमायूं के मकबरे के निकट शेरशाह के दरबारी ईसा खां का मकबरा और मस्जिद भी सूर युग की महत्त्वपूर्ण इमारत हैं। यह मस्जिद तीन मेहराब वाली है। इसके निकट उसका मकबरा भी 1547 ईस्वी का बना हुआ है। ये इमारतें सैयद और लोदी काल की इमारतों के जैसी हैं और इसमें पूर्व मुगल स्थापत्य के लक्षण मिलते हैं।

अवध का स्थापत्य (Architecture of Avadlt)
अवध प्रांत की राजधानी रहे लखनऊ का स्थापत्य भी विशिष्ट है। इनमें से अधिकांश इमारतें नवाब आसिफउद्दौल 1775-98) के काल में बनीं। अवध की सबसे प्रसिद्ध इमारत बड़ा इमामबाड़ा है। इसके पश्चिमी हिस्से में रूमी दरवाजा बनवाया गया है। यह दरवाजा दोनों तरफ ऊपर से नीचे तक बहुत सुरूचिपूर्ण ढंग से सुसज्जित है। वहाँ बना छोटा इमामबाडा या हुसैनाबाद इमामबाड़ा मुहम्मद अली शाह ने बनवाया। नवाब गाजीउद्दीन हैदर का मकबरा जिसे शाहनजफ इमामबाड़ा भी कहते हैं, फारसी शैली से प्रेरित है। मेजर जनरल क्लाउड मर्टिन (1735-1800) ने ‘कांस्टैंटिया‘ या ‘ला मार्टीनियर- नामक इमारत बनवाई। इसकी उत्तर भारत में यूरोपीय शैली से बनी पहली बड़ी ईमारतों में गिनती होती है। यूरोपीय शैली में बनी एक अन्य इमारत ‘छतर मंजिल‘ है जिसे नवाब नजीरुद्दीन हैदर ने बनवाया। नवाब वाजिद अली शाह ने कैसर बाग का निर्माण करवाया। अवध की इमारतों की एक प्रमुख विशेषता उनके दरवाजों में सजावट के लिए मछली का प्रयोग है। इसके अलावा बारादी, सिकंदर बाग, बनारसी बाग (चिडियाघर), भूलभलैया और कुछ तहखाने भी यहाँ के महत्त्वपूर्ण स्थापत्य का हिस्सा हैं। लखनऊ रेजिडेंसी वर्तमान में एक राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है। यह इमारत अवध प्रांत की राजधानी लखनऊ में रह रहे, ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों का निवास स्थान हुआ करता थी। रेंजीडेन्सी के खंडहर हमें लखनऊ में 1857 के महान विद्रोह की याद दिलाते हैं।

राजस्थान का स्थापत्य (Architecture of Rajasthain)
राजस्थान में कला की दृष्टि से मूल्यवान सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के खंडहर नगरी (चित्तौड़) नामक स्थान में मिलते हैं। इनमें वैष्णव, बौद्ध तथा जैन धर्म का प्रभाव देखा जा सकता है। गुप्तकाल के पश्चात् चित्तौड़ को प्राचीन सूर्य मन्दिर कोटा में भ्रमरमाता का मन्दिर, बाड़ौली का शिव मन्दिर, डूंगरपुर में अमझेरा. उदयपुर में डबोक के मंदिर में शिव, पार्वती, विष्णु, महावीर, भैरव तथा नर्तकियों का मूर्तिशिल्प महत्त्वपूर्ण माना जाता है। सातवीं से दसवीं शताब्दी में अनेक मन्दिर बने। इस काल में बने विशाल मन्दिरों में क्षेत्रीय शैलियों का प्रारुप मिलता है। लगभग आठवीं शताब्दी से राजस्थान में गुर्जर-प्रतिहार अथवा महामारू शैली का विकास हुआ। इस शैली के मन्दिरों में केकीन्द (मेड़ता) का नीलकण्ठेश्वर मन्दिर किराडू को सोमेश्वर मन्दिर प्रमुख है। बाद में जालौर के गुर्जर प्रतिहार, चैहानों; परमारों और गुहिलों ने मन्दिर शिल्प को समृद्ध बनाया। कुछ मन्दिर गुर्जर-प्रतिहार शैली से अलग हैं। इनमें बाड़ौली का मन्दिर, नागदा में सास-बहू का मन्दिर और उदयपुर में जगत अम्बिका मन्दिर, सिरोही जिले में वर्माण का ब्रह्माण्ड स्वामी मन्दिर प्रमुख हैं। दक्षिण राजस्थान के इनः मन्दिरों में क्रमबद्धता एवं एकसूत्रता का अभाव दिखाई देता है। इन मन्दिरों के शिल्प पर गुजरात का प्रभाव स्पष्टतः देखा जा सकता है। इन मन्दिरों में विभिन्न शैलीगत तत्त्वों एवं परस्पर विभिन्नताओं के दर्शन होते हैं। द्यद्यवों से 13वीं सदी के मध्य बने मंन्दिरों का स्थापत्य उत्कर्ष पर पहुंची। इस युग में काफी संख्या में बड़ें और अलंकृत मन्दिर बने, जिन्हें सोलंकी या मारु गुर्जर शैली के तहत रखा गया है। इस शैली में बने मन्दिरों में ओसियाँ का सच्चिया माता मन्दिर, चितौड़ दुर्ग में स्थित समिंधेश्वर मन्दिर आदि प्रमुख हैं। इस शैली में ऊँचे चबूतरे पर बने मंदिरों के द्वार सजावटी, खंभे अलंकृत, पतले, लम्बे और गोलाई युक्त हैं और गर्भगृह के रथ आगे बढ़े हुए हैं। हिन्दूओं के अलावा जैन मन्दिरों का स्थापत्य भी महत्त्वपूर्ण है। इन मंदिरों में विशिष्ट तल, विन्यास संयोजन एवं स्वरूप जैन धर्म की पूजा-पद्धति और मान्यताओं के अनुरूप था। जैन मन्दिरों में सर्वाधिक प्रसिद्ध दिलवाड़ा के मन्दिर हैं। इनके अतिरिक्त रणकपुर, ओसियाँ, जैसलमेर, पाली जिले में सेवाड़ी, घाणेराव, नाडौल-नारलाई सिरोही जिले में वर्माण, झालावाड जिले में चाँदखेडी और झालरापाटन, बँदी में केशोरायपाटन, करौली में श्रीमहावीर जी आदि स्थानों के जैन मन्दिर प्रमुख हैं।
राजस्थान के स्थापत्य में दुर्ग या किला निर्माण महत्त्वपूर्ण है। मध्यकाल में राजपूतों के शासनकाल के साथ ही पहाड़ों पर दुर्गाे का निर्माण बड़े पैमाने पर हआ। चारों ओर ऊँची और चैड़ी दीवार से घिरे किले के ऊँचे भाग पर मंदिर एवं राजप्रासाद और विशाल भंडारगृह बनाए जाते थे। दुर्गों के निचले भागों में तालाब व समतल भूमि पर खेती होती थी। दुर्ग स्थापत्य में भारतीय परंपरा का निर्वहन मिलता है। परंपरा के अनुसार अलग-अलग उद्देश्य की पूर्ति के लिए भिन्न प्रकार के दुर्गों का निर्माण होना चाहिये। कौटिल्य ने दुर्गों को छः प्रकारों में बांटते हुए कहा था कि राज्य की रक्षा के लिए जल या औदिक दुर्गों (पानी के मध्य स्थित दुर्ग) पर्वत या गिरी दुर्ग (पहाड़ी पर बना), आपातकालीन स्थिति में शरण लेने के लिए धनु या धन्वन या मरु दुर्ग (रेगिस्तान में बना दुर्ग), वन दुर्गों (जंगल में बना), माही दुर्ग (मिट्टी से बना) और नर दुर्ग (सैन्य क्षमताओं वाला) का निर्माण किया जाय। इसी प्रकार मनुस्मृति तथा मार्कण्डेय पुराण में भी दुर्गों के प्रायः इन्हीं प्रकारों की चर्चा की गई है। राजस्थान के शासकों एवं सामंतों ने इसी दुर्ग परंपरा का निर्वाह किया है। राजपूत काल में दुर्ग स्थापत्य के अलावा राजभवनों का निर्माण भी राजस्थान के स्थापत्य की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। मेनाल, नागदा, आमेर आदि में पूर्व मध्यकालीन कालीन राजभवनों के अवशेष मिलते हैं जिनमें छोटे कमरे, छोटे दरवाजे एवं दालान कमरों को बरामदे से जोड़ने के प्रमाण मिलते हैं तथा खिड़कियों का अभाव दृष्टिगोचर होता है। राजभवन साधारण मकानों के सादगी वाले वृहद रूप मात्र है। राजपूतों का मुगलों से सम्बन्ध होने के बाद इन राजभवनों को भव्य, रोचक तथा क्रमबद्ध बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हुई। इनमें मुगल स्थापत्य की विशेषताएँ जैसे फव्वारे, छोटे बाग, पतले खम्भे, दीवारों पर बेलबूटे, संगमरमर का. काम, आदि दृष्टिगोचर होती हैं। उदयपुर के अमरसिंह के महल, जननिवास, जगमंदिर, जोधपुर. के फूलमहल; आमेर व जयपुर के दीवाने आम व दीवाने खास, तथा बीकानेर के रंगमहल, कर्णमहल, शीशमहल, अनूपमहल आदि में सजपूत तथा मुगल-पद्धति का, समुचित समन्वय है। बूंदी. कोटा तथा जैसलमेर के महलों में मुगल शैली क्रमशः बदलती दिखाई देती है। इसका कारण मुगलों की उत्तरोत्तर घटती शक्ति को माना जाता है। राजस्थान में जयपुर का स्थापत्य विशेष महत्त्व रखता है।
जयपुर का स्थापत्य पुरातन तथा नूतन को जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इस सुनियोजित नगर की स्थापना कछवाहा राजा जयसिंह द्वितीय ने 1728 ई. में तीन ओर पहाड़ियों पर बने किलों से घिरीे सूखी झील के मैदान में की। गुलाबी पत्थर से बने होने के कारण इसे गुलाबी शहर कहते हैं। दीवारों से घिरे इस नगर में सात द्वार हैं और बाजार सीधी सड़कों के दोनों ओर हैं। चैपड़ के नक्शे के अनुसार ही सड़कें बनवाई गईं। पूर्व से पश्चिम जाने वाली मुख्य सड़क 111 फुट चैड़ी रखी गई जो इतनी ही चैड़ी अन्य सड़क को ईश्वर लाट नामक पीनार के निकट समकोण पर काटती थी। अन्य सड़कें 55 फुट चैड़ी रखी गई। ये मुख्य सड़क को कई स्थानों पर समकोणों पर काटती थीं। कई गलियाँ जो चैड़ाई में इनकी आधी या 27 फुट थी. नगर के भीतरी भागों से आकर मुख्य सड़क में मिलती थीं। एक सात मंजिला राजमहल नगर के केंद्र में बनाया गया था। सवाई जयसिंह ने जयपुर शहर की स्थापना करते हुए चार दीवारी का लगभग सातवाँ हिस्सा अपने निजी निवास के लिये बनवाया। राजपूत और मुगल स्थापत्य में बना महाराजा का यह राजकीय आवास चन्द्र महल के नाम से विख्यात हुआ। चन्द्र महल में प्रवेश करते ही मुबारक महल के नाम से एक चतुष्कोणीय महल बना हुआ है। मुबारक महल में श्वेत संगमरमर से निर्मित राजेन्द्र पोल से दीवाने आम में प्रवेश किया जाता है। मध्य युग में निर्मित यह भवन आकाशीय बिजली से सुरक्षित रखने के लिए तड़ित चालक की व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।
यहाँ बनी जंतर मंतर नामक वेधशाला की नींव महाराजा सवाई जयसिंह ने सन् 1918-में रखी। इस ज्योतिष यंत्रालय में समय की जानकारी सूर्याेदय, सूर्यास्त एव नक्षत्रों संबंधी जानकारी देने वाले यंत्र लगे है जिनमें वृहत सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र कपाली यंत्र, नाडी वलय यंत्र घोटा यंत्र आदि मुख्य हैं। देश में सबसे पहली-वेधशाला दिल्ली में 1724 में बनवाई गई और उसके दस वर्ष बाद जयपुर में सबसे विशाल वेधशाला बनी। यहाँ स्थित सम्राट यंत्र विश्व की सबसे बड़ी सौर घड़ी मानी जाती हैं। जयपुर के बाद उज्जैन, बनारस और मथुरा में वेधशालाएँ बनवायी गई।
जयपुर की एक प्रसिद्ध इमारत ‘हवा महल‘ कई स्तरों पर बना हुआ पाँच मंजिला महल है। इसका निर्माण सवाई प्रताप सिंह ने सन् 1799 में रानियों व राजकुमारियों के लिए विशेष मौकों पर निकलने वाले जुलूस और बाजार आदि को देखने के लिए करवाया। शहर के बीचोबीच बने खूबसूरत भवन में 152 ख़िडकियाँ व जालीदार छन्जे हैं। राजसूत व मुगल कला के इस शानदार नमूने में बने अनगिनत हवादार झरोखों के कारण इसका नाम हवा महल पड़ा। मधुमक्खी के छत्ते जैसे आकार वाला यह महल लाल और गुलाबी बलुआ पत्थर से बनाया गया है, जिसमें सफ़ेद किनारी और मोटिफ के साथ बारीकी से पच्चीकारी की गई है।
जयपुर में इनके अलावा, ईसरलाट, आमेर का किला, अम्बर किला गोविंद देवजी का मंदिर सागौनर, जयगढ़ किला, नाहरगढ़ किला, दरगाह हजरत मौलाना ज़ियाउद्दीन साहबू, पन्ना मीना की बावड़ी माउंट आबू में दिलवाडा जैन मंदिर, अचलगढ़ किला, गुरु शिखर, जैसलमेर में सोनार किला, बादल विलास, जवाहर विलास, लौद्रवा जैन मंदिर।
अलवर में नीमराना फोर्ट पैलेस, भर्तृहरि का मन्दिर।
बीकानेर में जूनागढ़ किला, करणीमाता का मंदिर, बीकानेर का किला, सूरज पोल या सूर्य द्वार, लाल गढ़ महल, जोधपुर में मेहरानगढ़ किला, गांगाणी, जसवंत थाडा, उम्मेद महल।
चित्तौगढ़ में चित्तौड़गढ़ किला, रत्न सिंह महल, जैन कीर्ति स्तम्भ, फतेह प्रकाश महल, कलिका माता का मन्दिर, कुम्भास्वामी मन्दिर, कुम्भा महल, रानी पदिानी का महल, कीर्ति स्तम्भ स्थापत्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।