लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों को कौन चुनता है | निर्वाचन प्रणाली क्या है चुनाव कैसे होता है

By   December 18, 2021

निर्वाचन प्रणाली क्या है चुनाव कैसे होता है लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों को कौन चुनता है | election procedure of lok sabha and rajya sabha in hindi

निर्वाचन प्रणाली
प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों के निर्वाचन की और इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त तंत्र की आवश्यकता होती है । संविधान में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के लिए उपबंध किया गया है। ऐसे प्रत्येक नागरिक को मतदान करने का पूरा अधिकार है जिसने 18 वर्ष या इससेअधिक की आयु प्राप्त कर ली हो, चाहे उसका धर्म, लिंग या जन्म स्थान कोई भी हो । सबसे महत्व की बात यह है कि निर्वाचन निर्बाध एवं निष्पक्ष हों और ऐसे प्रतीत भी हों । इसीलिए ये एक स्वतंत्र प्राधिकरण के अधीक्षण और निदेश के अधीन कराए जाले हैं। और यह प्राधिकरण निर्वाचन आयोग कहलाता है। भारत जैसे विशाल आकार वाले (लगभग 33 लाख वर्ग किलोमीटर), भारी जनसंख्या वाले (लगभग 90 करोड़) और इतने अधिक मतदाताओं वाले (लगभग 55 करोड़) देश में निर्वाचन कराना एक बहुत बड़ा काम है। संसद के दोनों सदनों के लिए और राज्यों के विधानमंडलों के लिए निर्वाचनों के अतिरिक्त. निर्वाचन आयोग भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के उच्च पदों के लिए भी निर्वाचन करता है।

निर्वाचन आयोग
निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और ऐसे अन्य निर्वाचन आयुक्तों से बनता है जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाएं। अक्तूबर,1993 में एक अध्यादेश के द्वारा दो निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किये गये थे, जिन्हें वही स्थिति तथा हैसियत प्रदान की गई थी, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त को प्राप्त थी। इसके अतिरिक्त, आयोग से अपेक्षा की गई थी कि वह एक निकाय के रूप में कार्य करे तथा जो भी निर्णय ले सर्वसम्मति से ले या यदि ऐसा न हो पाए तो बहुमत के आधार पर ले। इस अध्यादेश को बाद में जिसका स्थान अधिनियम ने ले लिया था, मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा चुनौती दी गई। किंतु उच्चतम न्यायालय ने कानून की मर्यादा बनाये रखी है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कर्तव्यों के महत्व को देखते हुए ऐसे विशिष्ट व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया जाता है जिसे पर्याप्त प्रशासनिक अनुभव हो, विधि का ज्ञान हो और जिसे समाज में भी उच्च स्थान प्राप्त हो । आयोग के सदस्यों की सेवा की शर्तों में और पदावधि में उनकी नियुक्ति के पश्चात उनके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किए जा सकते।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की तरह प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है, अन्यथा नहीं । अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना उसके पद से नहीं हटाया जा सकता। केंद्रीय तथा राज्य सरकारों को आयोग को उतने अधिकारी और कर्मचारीवृंद उपलब्ध कराने होते हैं जितने उसके कर्तव्यों तथा दायित्वों के उचित निर्वहन के लिए आवश्यक हों और निर्वाचन संबंधी कृत्यों का निर्वहन करते हुए ऐसे सब अधिकारी तथा कर्मचारीवृंद निर्वाचन आयोग के प्रति पूर्णतया उत्तरदायी होते हैं।
प्रत्येक राज्य के लिए एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी होता है जिसे निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचक-नामावलियां तैयार करने, उनका पुनरीक्षण करने और उनमें शुद्धियां करने के काम के अधीक्षण के लिए और राज्य में सभी निर्वाचनों का संचालन करने के लिए मनोनीत किया जाता है। इसी प्रकार जिले के लिए एक जिला निर्वाचन अधिकारी होता है जो मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निर्देश के अधीन अपने जिले में निर्वाचनों से संबंधित सारे कार्य का समन्वय तथा अधीक्षण करता है। आमतौर पर जिला कलेक्टरोंया उपायुक्तों को जिला निर्वाचन अधिकारी नामजद किया जाता है । वे मतदान केंद्रों के लिए प्रेजाइडिंग अधिकारी तथा मतदान अधिकारी नियुक्त करते हैं। प्रेजाइडिंग अधिकारी निर्वाचन के दिन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । मतदान केंद्र पर उसका सामान्य कर्तव्य वहां व्यवस्था बनाए रखना और यह देखना होता है कि मतदान निर्बाध और निष्पक्ष हों। मतदान केंद्र पर मतदान अधिकारी का यह कर्तव्य होता है कि वह प्रेजाइडिंग अधिकारी की उसके कृत्यों के निर्वहन में सहायता करे।
निर्वाचन आयोग, राज्य सरकार के परामर्श से, प्रत्येक संसदीय तथा विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए और राज्य सभा में किसी स्थान या किन्हीं स्थानों को भरने के लिए एक रिटर्निंग अधिकारी नियुक्त करता है । रिटर्निंग अधिकारी को ऐसे सब कार्य करने का अधिकार प्राप्त है जो निर्वाचन विधियों के अनुसार निर्वाचन कराने के लिए आवश्यक हों। .

सदस्यों का निर्वाचन
लोक सभा के लिए सामान्य निर्वाचन उसकी कार्यावधि समाप्त होने वाली हो या उसके भंग किए जाने पर कराए जाते हैं।
संविधान के अधीन संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संसद के प्रत्येक सदन या किसी राज्य विधानमंडल के सदन या प्रत्येक सदन के लिए निर्वाचनों के संबंध में, निर्वाचन नामावलियां तैयार करने, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करने और ऐसे सदन या सदनों के सम्यक गठन के लिए अन्य सभी आवश्यक विषयों हेतु विधान बना सकती है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 इस उपबंध के अनुसरण में अधिनियमित सबसे अधिक महत्वपूर्ण विधान हैं । निर्वाचनों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 और निर्वाचनों का संचालन नियम, 1961 उन विधानों के उपबंधों के पूरक हैं। नयी उत्पन्न होने वाली स्थितियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिनियमों और नियमों में समय समय पर संशोधन किया जाता है और उन्हें अद्यतन बनाया जाता है।

सदस्यता के लिए अर्हताएं और अनर्हताएं
कोई व्यक्ति संसद का सदस्य बनने के लिए अर्ह तभी होता है जब-
(क) वह भारत का नागरिक हो;
(ख) वह राज्य सभा के स्थान के लिए कम से कम 30 वर्ष की आयु का और लोक सभा के स्थान के लिए कम से कम 25 वर्ष का हो; और
(ग) वह भारत के किसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक हो, परंतु राज्य सभा के मामले में जिस राज्य से या संघ-राज्य क्षेत्र से वह चुना जाना हो उसमें निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हो।
इसके अतिरिक्त, अन्य अर्हताएं संसद, विधि द्वारा, निर्धारित कर सकेगी।
सदस्य बनने के लिए कुछ अनर्हताएं भी हैं। उदाहरणार्थ, कोई व्यक्ति संसद के किसी भी सदन का सदस्य बनने के लिए अनर्ह होगा यदि-
(क) वह सरकार के अधीन ऐसे पद को छोड़कर जिसको धारण करने वाले का अनर्ह न होना संसद ने विधि द्वारा घोषित किया है, कोई लाभ का पद धारण करता
(ख) वह विकृतचित्त हो;
(ग) वह अनुन्मोचित दिवालिया हो;
(घ) वह भारत का नागरिक न हो;
(ङ) वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा अनर्ह कर दिया गया हो;
(च) वह दल बदलने के आधार पर अनर्ह करार दिया गया हो।
मंत्री का पद लाभ का पद नहीं माना जाता। उपरोक्त अपेक्षाओं के अतिरिक्त, निर्वाचन विधियों में कुछ अन्य अनर्हताएं भी निर्धारित की गई हैं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अधीन यदि कोई व्यक्ति अन्य बातों के साथ साथ विभिन्न संप्रदायों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने के लिए कारण दोषसिद्ध किया गया हो या घूस के अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया हो, या अस्पृश्यता का प्रचार करने और उसका पालन करने के कारण दंडित किया गया हो तो वह सदस्य के रूप में चुने जाने से अनर्ह होता है। इसके अतिरिक्त, किसी अपराध के कारण दोषसिद्ध किया गया कोई व्यक्ति जिसे कम से कम दो वर्षों के लिए कारावास का दंड दिया गया हो, वह व्यक्ति अपनी रिहाई के पश्चात पांच वर्षों की अवधि के लिए अनर्ह रहता है। भ्रष्टाचार या राज्य के प्रति गैर वफादारी के लिए बर्खास्त किया गया सरकारी कर्मचारी अपनी बर्खास्तगी की तिथि से पांच वर्षों की अवधि के लिए अनर्ह रहता है।

निर्वाचन रीति
राज्य सभाः राज्य सभा के सदस्य राज्यों तथा संघ-राज्य क्षेत्रों के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे किसी राज्य के मामले में उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं और संघ-राज्य क्षेत्र के मामले में एक निर्वाचक मंडल द्वारा । उनका निर्वाचन अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के द्वारा और आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाता है। इसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदायों तथा दलों के लिए प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करना है।
राज्य सभा में स्थान भरने के प्रयोजन के लिए, राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग द्वारा सुझायी गई तारीख को, अधिसूचना जारी करके, निर्वाचकों से राज्य सभा के सदस्यों को चुनने के लिए कहता है। जिस तिथि को सेवानिवृत्त होने वाले सदस्यों की पदावधि समाप्त होनी हो उससे तीन मास से अधिक समय से पूर्व ऐसी अधिसूचना जारी नहीं की जाती। रिटर्निंग अधिकारी, निर्वाचन आयोग के अनुमोदन से मतदान का स्थान निर्धारित और अधिसूचित करता है।

लोक सभा: नयी लोक सभा के लिए निर्वाचन के प्रयोजन से, राष्ट्रपति, राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा, निर्वाचन आयोग द्वारा सुझाई गई तिथि को, सब संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों से कहता है कि वे लोक सभा के लिए सदस्य निर्वाचित करें। अधिसूचना जारी किए जाने के पश्चात निर्वाचन आयोग नामांकनपत्र दायर करने, उनकी छानबीन करने, उन्हें वापस लेने और मतदान के लिए तिथियां निर्धारित करता है। निर्वाचन के लिए प्रत्येक उम्मीदवार को 500 रुपए, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य होने की स्थिति में 250 रुपए उसके नामांकन के विधिमान्यकरण के लिए जमा कराने पड़ते हैं। यदि वह उम्मीदवार अपने निर्वाचित-क्षेत्र में न्यूनतम निर्धारित प्रतिशत मत प्राप्त करने में असफल रहता है तो वह राशि जब्त कर ली जाती है। निर्वाचन के लिए उम्मीदवार व्यक्ति को संविधान की तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूप के अनुसार संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा की शपथ लेनी होती है या प्रतिज्ञान करना होता है। रिटर्निंग अधिकारी, नामांकन पत्र की वैधता की जांच करने के पश्चात वैध रूप से नामांकित उम्मीदवारों की एक सूची प्रकाशित करता है।
लोक सभा के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन होने के कारण भारत के राज्य क्षेत्र को उपयुक्त प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित करना आवश्यक है। इस प्रकार प्रत्येक राज्य को ऐसी रीति से विभिन्न संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में बांय जाता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उसके लिए आवंटित स्थानों की संख्या का अनुपात, जहां तक व्यवहार्य हो, सारे राज्य में बराबर हो । प्रत्येक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र एक सदस्य का निर्वाचन क्षेत्र होता है।
मतदान पूरा हो जाने के पश्चात मतों की गणना ऐसी तिथि को और ऐसे समय पर होती है, जो रिटर्निंग अधिकारी निर्धारित करे। वही परिणाम की घोषणा करता है और निर्वाचन आयोग को और संबद्ध सदन के महासचिव को उसकी सूचना देता है।
यदि यह प्रश्न उत्पन्न हो जाता है कि क्या संसद के किसी सदन का कोई सदस्य संविधान में वर्णित किसी अनर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं तो इस बारे में राष्ट्रपति का फैसला अंतिम होगा। परंतु ऐसे किसी प्रश्न पर फैसला करने से पूर्व उसे इस बारे में निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करनी होती है।

स्थान रिक्त हो जाना यदि एक सदन का कोई सदस्य दूसरे सदन के लिए भी निर्वाचित हो जाता है तो पहले सदन में उसका स्थान उस तिथि से रिक्त हो जाता है जब वह अन्य सदन के लिए निर्वाचित हुआ हो। इसी प्रकार, यदि वह किसी राज्य विधानमंडल के सदस्य के रूप में भी चुन लिया जाता है तो, यदि वह राज्य विधानमंडल में अपने स्थान से, राज्य के राजपत्र में घोषणा के प्रकाशन से 14 दिनों के भीतर, त्यागपत्र नहीं दे देता तो, संसद का सदस्य नहीं रहता। कोई सदस्य राज्य सभा के सभापति को या लोक सभा के अध्यक्ष को, जैसी भी स्थिति हो, त्यागपत्र देकर अपना स्थान रिक्त कर सकता है। यदि कोई सदस्य, सदन की अनुमति के बिना 60 दिन की अवधि तक सदन की किसी भी बैठक में उपस्थित नहीं होता तो वह सदन उसके स्थान को रिक्त घोषित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, किसी सदस्य को सदन में अपना स्थान रिक्त करना पड़ता है यदि (1) वह लाभ का कोई पद धारण करता है; (2) उसे विकृत चित्त वाला व्यक्ति घोषित कर दिया जाता है या अनुन्मोचित दिवालिया घोषित कर दिया जाता है; (3) वह स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है; (4) उसका निर्वाचन न्यायालय द्वारा शन्य घोषित कर दिया जाता है; (5) वह सदन द्वारा निष्कासन का प्रस्ताव स्वीकृत किए जाने पर निष्कासित कर दिया जाता है; या (6) वह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल चुन लिया जाता है।
यदि किसी सदस्य को संविधान की दशम अनुसूची के उपबंधों के अंतर्गत दल-बदल के आधार पर अनर्ह कर दिया गया हो, तो उस स्थिति में भी उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है।

निर्वाचन संबंधी विवाद
निर्वाचनों से विवाद भी उत्पन्न हो जाते हैं। यह उपबंध किया गया है कि संसद के या किसी राज्य विधानमंडल के किसी सदन के लिए हुए किसी निर्वाचन को चुनौती उच्च न्यायालय में पेश की जाने वाली निर्वाचन याचिका के द्वारा ही दी जा सकती है। ऐसी याचिका निर्वाचन में किसी उम्मीदवार द्वारा, या किसी मतदाता द्वारा, पेश की जा सकती है। याचिका ऐसे स्थान भरने के लिए या निर्वाचन के दौरान कोई भ्रष्ट प्रक्रिया अपनाने के कारण जिस पर विधि द्वारा रोक हो, अनर्हता के आधार पर पेश की जा सकती है। यदि सिद्ध हो जाए तो उच्च न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि वह उपरोक्त किसी एक आधार पर सफल उम्मीदवार का निर्वाचन शून्य घोषित कर दे।
यदि किसी याचिका में, याचिकादाता द्वारा इस बात का दावा किया जाता है कि वैध मतों में से अधिकांश मत उसे मिले थे और यदि सफल उम्मीदवार ऐसी भ्रष्ट प्रक्रियाएं न अपनाता जो उसने अपनाईं तो वह निर्वाचन जीत नहीं सकता था तो यदि न्यायालय का समाधान हो जाए तो वह निर्वाचित उम्मीदवार का निर्वाचन शून्य घोषित कर सकता है और याचिकादाता को विधिवत निर्वाचित घोषित कर सकता है ।
प्रभावित पक्ष को उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील करने का अधिकार है।

निर्वाचन सुधार
हाल के वर्षों के दौरान निर्वाचन प्रक्रियाओं में धन, लठैत और माफिया शक्ति के प्रभाव के बारे में व्यापक चिंता व्यक्त की गई है । प्राप्त समाचारों के अनुसार 1991 का दसवां सामान्य निर्वाचन विशेष रूप से क्रूर तथा हिंसापूर्ण था और इस दौरान सभी तरह के अपराध तथा दंगे हुए, हत्याएं हुईं और मार-काट हुई । प्रधानमंत्री ने स्वयं “राजनीति के अपराधीकरण तथा अपराधियों के राजनीतिकरण‘‘ की वर्तमान प्रवृत्ति की निंदा की है। चुनावों की वीडियो तथा अन्य मीडिया कवरेज और बूथों पर कब्जा करने, मतदान में हेराफेरी करने, जाली मतदान करने, किसी अन्य व्यक्ति का रूप लेकर मतदान करने, धार्मिक तथा जातीय पहचानों का दुरुपयोग करने और विभिन्न अन्य भ्रष्ट आचरणों के प्रकरणों ने निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता को अनिवार्य बना दिया है । समय समय पर निर्वाचन आयोग, शिक्षाविदों, आयोगों और समितियों द्वारा विभिन्न सुझाव दिये गये हैं। इनमें से नवीनतम सुझाव गोस्वामी समिति की रिपोर्ट में दिए गए हैं। पिछले कुछ समय से निर्वाचन आयोग निर्वाचन प्रक्रिया को स्वच्छ तथा सुप्रवाही बनाने के विचार से आचार संहिता, विभिन्न नियमों आदि को लागू करने का प्रयास कर रहा है। सरकार भी इस प्रयोजन के लिए एक व्यापक कानून लाने के बारे में विचार करती रही है किंतु सारी की सारी कसरत राजनीतिक विवादों तथा दलगत मतभेदों में उलझकर रह गई है।
संदर्भ
1. अनु. 324 (1), 325 और 326
2. अनु. 324
3. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, धारा 13 क और 19 कक
4. वही, धारा 7
5. वही, धारा 28
6. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 21 और 24
7. अनु. 326, देखिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 16
8. अनु. 327
9. अनु. 84 और प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 3 और 4
10. दसवीं अनुसूची और अनु. 102 (2) और 191 (2)
11. अनु. 102
12. अनु. 80 (4) (5) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 27 क और 27 ख
13. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 12
14. वही, धारा 14
15. वही, धारा 34 और 158
16. अनु. 81 (2) और (3) और 82
17. अनु. 103
18. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 69
19. अनु. 101 (8) और (4)
20. अनु. 59(1), 66(1), 102(1), 158(1) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 100(1)
21. संविधान (52वां) संशोधन अधिनियम, 1985 और लोक सभा (दल-बदल के आधार पर अनर्हता) नियम, 1985
22. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 80 और 80 क
23. वही, धारा 100
24. वही, धारा 101