मारस्यूपियल स्तनधारी किसे कहते हैं ? कीटभक्षी स्तनधारी की परिभाषा क्या है काईराप्टेरा (कर-पंखी)

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कीटभक्षी स्तनधारी की परिभाषा क्या है काईराप्टेरा (कर-पंखी) किसे कहते हैं ? 

मारस्यूपियल स्तनधारी
मारस्यूपियल स्तनधारियों में से भीम कंगारू सबसे विख्यात है (आकृति १४१)।
कंगारू की जीवन-प्रणाली कंगारू एक बड़ा प्राणी है। इसकी लंबाई लगभग दो मीटर होती है। उसके शरीर पर भूरे रंग की मोटी फर होती है जिसके लिए उसका शिकार किया जाता है। कंगारू आस्ट्रेलिया में घास और झाड़ी-झुरमुटवाले खुले मैदानों में रहता है।
आराम करते समय कंगारू अपने लंबे पश्चांगों और पूंछ का सहारा लिये बैठता है। छोटे अग्नांग नीचे की ओर झुके रहते हैं। ये घास तोड़कर मुंह तक पहुंचाने के काम आते हैं। कंगारू चरागाहों में अटपटी-सी चाल चलता है। चलते समय वह अपने अग्नांगों का भी उपयोग करता है। वह उछलता हुआ तेज चलता है। पश्चांगों के सहारे हवा में तीर की सी उड़ान भरता हुआ वह लंबी कूद लगाता है। अपने को शत्रुओं से बचाते समय वह कूदकर झुरमुटों और खाइयों को आसानी से पार कर सकता है। पूंछ उसके लिए पतवार का काम देती है।
जनन-क्रिया मादा एक अंधे , केशहीन और अखरोट के आकार के बच्चे को जन्म देती है। यह बच्चा बिल्कुल असहाय होता है। आगे उसका परिवर्द्धन एक विशेष थैली में होता है। यह थैली मां के पेट की त्वचा की एक परत के रूप में होती है। स्तन-ग्रंथियां और चूचियां इस थैली में खुलती हैं। मादा नवजात बच्चे को अपने मुंह से उठाकर इस थैली में रख देती है। बच्चा एक चूची को अपने मुंह में पकड़ लेता है। चूची उसके मुंह में फूल जाती है। इससे ऐसा लगता है कि बच्चा चूची पर लटक रहा हो।
बच्चा इतना दुबला और असहाय होता है कि शुरू शुरू में वह दूध तक नहीं चूस सकता। विशेष पेशियों के संकुचन से उसके मुंह में दूध की जैसे पिचकारी चलती है। बाद में बच्चा चूची से छूट जाता है और फिर खुद ही मां का स्तनपान करने लगता है। वैसे वह थैली में लगभग आठ महीने बिताता है। पर खुद घास चरने लगने पर भी वह खतरे की आहट पाते ही झट थैली में छिप जाता है।
कंगारू की तरह अल्पपरिवर्दि्धत बच्चे जनने और उन्हें थैली में रखनेवाले प्राणी मारस्यूपियल स्तनधारी कहलाते हैं। इस समय मारस्यूपियल केवल आस्ट्रेलिया में पाये जाते हैं और उनका सिर्फ एक प्रकार दक्षिणी अमेरिका में। दूसरे महाद्वीपों में ये बहुत समय पहले रहते थे पर बाद में उनका लोप हो गया।
मारस्यूपियल अल्पपरिवर्दि्धत बच्चों को जन्म देते हैं इससे उनके निम्न संगठन का संकेत मिलता है। अंडज स्तनधारियों के साथ मारस्यूपियल भी निम्न स्तनधारियों की श्रेणी में गिने जाते हैं। बाकी सब स्तनधारियों की गिनती उच्च स्तनधारियों में होती है। उच्च स्तनधारी सुपरिवर्दि्धत बच्चों को जन्म देते हैं और ये बच्चे खुद ही माता का स्तनपान कर सकते हैं।
स्तनधारियों का मूल प्लैटीपस और कंगारू की विशेषताओं से हमें स्तनधारियों के मूल का पता लगाने में सहायता मिलती है। स्तनधारियों के अतिविशिष्ट लक्षण हैं मां का दूध पीनेवाले सजीव जात बच्चे । यह स्पष्ट है कि ये लक्षण यकायक नहीं पैदा हुए। अंडज स्तनधारी अपने बच्चों को दूध पिलाते हैं यह सही है, पर वे उरगों जैसे अंडे देते हैं। दूसरी ओर मारस्यूपियल जीवित जात बच्चे देते हैं, पर उनका अच्छा परिवर्द्धन होने तक उन्हें थैली में रखते हैं। सिर्फ उच्चविकसित स्तनधारी ही ऐसे हैं जो सुपरिवर्दि्धत बच्चे जनते हैं। स्तन-ग्रंथियों की संरचना भी क्रमशः अधिकाधिक जटिल होती जाती है। प्लैटीपस के तो चूचियां भी नहीं होती।
अंडज स्तनधारी संरचनात्मक लक्षणों की दृष्टि से भी कुछ हद तक उरगों से मिलते-जुलते होते हैं। प्लैटीपस की जनन तथा मूत्र-वाहिनियां अवस्कर में खुलती हैं। उसकी अंस-मेखला में एक कोराकोयड होता है जो अन्य स्तनधारियों में अल्पविकसित और स्कंधास्थि में मिला हुआ होता है।
एक बात और है। प्लैटीपस के शरीर का तापमान अन्य स्तनधारियों की तुलना में निम्नतर होता है और २४ से ३४ सेंटीग्रेड तक रहता है।
मेसोजोइक युग में रहनेवाले और बाद में लुप्त हो गये उरगों में स्तनधारियों के लक्षण विद्यमान थे। हमारा मतलब यहां साइनोग्नेथस (आकृति १०६) से है। इन प्राणियों के दांत स्तनधारियों की तरह पृथक् कोशिकाओं में गड़े रहते थे और सम्मुख दंतों, सुबा-दांतों और चर्वण-दंतों में विभाजित थे।
आज के विद्यमान प्लैटीपस और लुप्त साइनोग्नेथस की संरचनात्मक विशिष्टताएं इस बात का प्रमाण हैं कि स्तनधारी लुप्त प्राचीन उरगों से उत्पन्न हुए हैं।
प्रश्न – १. कंगारू बच्चे किस तरह देता/है ? २. निम्न और उच्च स्तनधारियों में क्या अंतर है? ३. हम कैसे इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि स्तनधारियों के पुरखे प्राचीन उरग हैं ?

 कीटभक्षी स्तनधारी
कीटभक्षी स्तनधारियों में से एक है छछूंदर (प्राकृति १४२)। हो सकता है कि तुममें से किसी ने खुद छडूंदर को न देखा हो पर चरागाहों में छडूंदर टीले तो सभी ने देखे होंगे। छडूंदर द्वारा उछाली गयी मिट्टी से ये बनते हैं।
छडूंदर अपना अधिकांश जीवन जमीन के नीचे बिताता है और कभी-कभार ही उसकी सतह पर निकल आता है । वह जमीन में कई लंबी लंबी सुरंग बनाता है और वहीं केंचुओं और कीट-डिंभों का शिकार करता है। यह प्राणी जाड़ों में भी सक्रिय रहता है क्योंकि उस समय उसे जमीन की गहरी सतहों में अपना भोजन मिल जाता है।
छडूंदर के सिर और धड़ को लेकर एक सिलिंडर-सा बनता है जो आगे की ओर तीक्ष्ण होता है। इससे यह प्राणी जमीन के अंदर अधिक स्वतंत्रता से चल सकता है।
छछंूदर अपनी अगली टांगों से मिट्टी खोदता है । ये टांगें छोटी होती हैं पर उनके पंजे काफी चैड़े होते हैं और अन्य प्राणियों की तरह नीचे की ओर नहीं बल्कि बगलों की ओर झुके हुए होते हैं। उनके तलवे पीछे की ओर मुड़े होते हैं। तीक्ष्ण नखरवाली उंगलियां चमड़ीनुमा परदे से जुड़ी रहती हैं। उसका पंजा फावड़े जैसा लगता है। ऐसे पंजे आसानी से मिट्टी हटा सकते हैं। पंजों से उखाड़ी गयी मिट्टी सिर की मदद से बाहर ढकेली जाती है।
छछूंदर के छोटे छोटे बाल इतने घने होते हैं कि उनके बीच मिट्टी नहीं घुस सकती और त्वचा हमेशा साफ रहती है। उसकी फर का स्पर्श मखमल जैसा होता है। उसके बाल आगे और पीछे दोनों ओर लेट सकते हैं जिससे मिट्टी के बीच से गुजरने में उसे सुविधा मिलती है।
छछूंदर के सिर का अंतिम हिस्सा सूंड है। इसमें नथुने होते हैं और उसके दोनों ओर स्पर्शेद्रिय का काम देनेवाले बाल। छछूंदर की ज्ञानेंद्रियों में से घ्राणेंद्रियां और स्पर्शेद्रियां अत्यंत विकसित होती हैं। भूमिगत जीवन के लिए ये अत्यावश्यक हैं क्योंकि वहां घुप्प अंधेरे में छडूंदर को अपना शिकार ढूंढना पड़ता है।
छछूंदर की छोटी छोटी आंखें अल्पविकसित होती हैं और बालों में छिपी रहती हैं। यह प्राणी प्रकाश और अंधेरे का फर्क शायद ही समझ सकता है। उसके कर्ण-पालियां नहीं होतीं। कर्ण-छिद्र बंद हो सकते हैं और इससे उनमें मिट्टी नहीं जा सकती। छछूंदर काफी अच्छी तरह सुन सकता है।
छछंूदर के ऊपरवाले ओंठ से मुंह पर एक चमड़ीनुमा परत लटकती है और इससे मुंह में मिट्टी नहीं जा सकती।
जमीन के नीचे छछंूदर सुरंगों का एक पूरा जाल बनाता है और वहीं घोंसला भी तैयार करता है। वसंत में मादा तीन से लेकर पांच तक नन्हे नन्हे बच्चों को जन्म देती है। ये बच्चे केशहीन और अंधे होते हैं। मां उनको लगभग एक महीने तक अपना दूध पिलाती है।
मनुष्य के लिए छछूंदर कुछ उपकारक है और कुछ हानिकारक भी। कीटों और विशेषकर काकचेफर के डिंभों का संहार करके वह हमारा उपकार करता है। पर साथ साथ वह उपयुक्त केंचुओं को चट कर जाता है, पौधों की जड़ें उखाड़ देता है और अपने टीलों से चरागाह को नुकसान पहुंचाता है।
छछूंदर उनकी काफी कीमती फर के लिए बड़ी संख्या में पकड़े जाते हैं। उनकी फर टोप, कालर , फरकोट इत्यादि में इस्तेमाल की जाती है। कीटभक्षी स्तनधारियों में साही भी शामिल है।
प्रश्न – १. भूमिगत जीवन का छछूंदर पर क्या प्रभाव पड़ा है? । २. छछूंदर से क्या हानि-लाभ है ?

 काईराप्टेरा (कर-पंखी स्तनधारी)
काईराप्टेरा या कर-पंखी स्तनधारियों का एक उदाहरण चमगादड़ है। चमगादड़ दूसरे स्तनधारियों से इस माने में भिन्न हैं कि वे उड़ सकते हैं। चमगादड़ का अधिकांश सक्रिय जीवन हवा में बीतता है। वहीं उसे अपना भोजन मिलता है। चमगादड़ कभी जमीन पर नहीं उतर पाते।
चमगादड़ों की संरचना और बरताव हवा में उड़ने के अनुकूल होता है। बहुतायत में पाये जानेवाले विशालकर्णी चमगादड़ (प्राकृति १४३ ) से यह स्पष्ट हो जाता है। हवा में उसका छोटा-सा शरीर उड़न-झिल्लियों से बने बड़े चमड़ीनुमा पंखों के चलने से टिकाया जाता है। ये झिल्लियां अग्रांगों की लंबी अंगुलियों के बीच तनी रहती हैं और अग्रांगों से निकलकर शरीर की बगलों से होती हुई पश्चांगों तक और फिर पूंछ तक पहुंचती हैं । चमगादड़ की हड्डियां पतली और हल्की होती हैं । वक्ष की हड्डी में पक्षियों की तरह एक उरःकूट होता है। उरःकूट में पंखों की गति देनेवाली पेशियां जुड़ी रहती हैं।
दिन के समय विशालकर्णी चमगादड़ अन्य चमगादड़ों की तरह घर की बरसाती, गुफा या खोह जैसे प्राश्रय-स्थानों में अपनी पिछली टांगों की अंगुलियों के सहारे सिर नीचे किये लटका रहता है। चमगादड़ झुटपुटे में शिकार करने निकलते हैं और रात में यह काम जारी रखते हैं। वे विभिन्न उड़ते प्राणियों को मारकर खाते हैं। इनमें तितलियां, बीटल , मच्छर, इत्यादि शामिल हैं। चमगादड़ इन्हें अपने नन्हे तेज दांतों के बीच पीस डालते हैं।
चमगादड़ की दृष्टि विकसित नहीं होती और कीटों को पकड़ते समय वे मुख्यतया अपनी श्रवण-शक्ति का उपयोग करते हैं। विशालकर्णी चमगादड़ बड़े सर्राटे से उड़ता है पर हवा में कभी किसी बाधा से टकराता नहीं। एक प्रयोग में अंधे किये गये एक चमगदड़ को एक ऐसे कमरे में छोड़ा गया जिसमें कई धागे ताने गये थे और उनमें छोटी छोटी घंटियां लगायी गयी थीं। यह प्राणी वहां बिना किसी कठिनाई के उड़ता रहा और उसने एक भी धागे का स्पर्श नहीं किया। ऐसा पाया गया कि चमगादड़ न केवल साधारण ध्वनि दे और ग्रहण कर सकता है बल्कि मनुष्य को न सुनाई देनेवाली सूक्ष्मतम ध्वनियां (नसजतं ेवनदके) भी। चमगादड़ द्वारा छोड़ी गयी सूक्ष्मतम ध्वनियां जब किसी बाधा से टकराती हैं तो वे वहां से परावर्तित होकर वापस आती हैं और चमगादड़ की श्रवणेंद्रियां उन्हें ग्रहण करती हैं। इस प्रकार का संकेत पाकर यह प्राणी अपनी उड़ान की दिशा बदल लेता है और बाधा को टाल देता है।
जाड़ों में कीटों के अभाव के कारण चमगादड़ सुषुप्तावस्था में रहते हैं। वे गोदामों, बरसातियों, गुफाओं, और तहखानों में पूरे जाड़ों-भर उल्टे टंगे रहते हैं। इस समय चमगादड़ की जीवन-प्रक्रियाएं बहुत धीरे चलती हैं। गरमियों में इकट्ठी की गयी चरबी के सहारे ही यह काम चलता है। जाड़ों की आहट पाने के साथ कुछ चमगादड़ दूर दक्षिणी देशों को चले जाते हैं ।
गरमियों के प्रारंभ में विशालकर्णी चमगादड़ की मादा एक-दो बच्चों को जन्म देती है। शुरू शुरू में मां उन्हें अपने साथ ले चलती है। बच्चे उसकी छाती से ऐसी मजबूती से चिपके रहते हैं कि उड़ान के समय भी टस से मस नहीं होते।
चमगादड़ हानिकर कीटों का नाश करके हमारा उपकार करते हैं और इस लिए हमें उनकी रक्षा करनी चाहिए।
प्रश्न – १ . चमगादड़ के पंख पक्षियों के डैनों से किस प्रकार भिन्न हैं ? २. चमगादड़ के कौनसे संरचनात्मक लक्षण उसकी उड़ने की क्षमता से संबंध रखते हैं ? ३. चमगादड़ जाड़ों में सुषुप्तावस्था में क्यों रहते हैं ? ४. चमगादड़ों की रक्षा क्यों करनी चाहिए?
व्यावहारिक अभ्यास – गरमियों में झुटपुटे के समय चमगादड़ों की उड़ान का निरीक्षण करो। इसका निरीक्षण करो कि वे दिन का समय कहां बिताते हैं।