फिलीपींस देश के बारे में जानकारी philippines information in hindi फिलीपीन्स का इतिहास , जनसंख्या , मुद्रा

By   September 20, 2020

(philippines information in hindi) फिलीपींस देश के बारे में जानकारी फिलीपीन्स का इतिहास , जनसंख्या , मुद्रा भाषा आबादी कहाँ है ?

फिलीपीन्स देश
इकाई की रूपरेखा

उद्देश्य
प्रस्तावना
भूगोल और लोग
इतिहास
स्पेनी औपनिवेशिक शामन: 1565-1898
अमेरिकी आधिपत्य
आजादी के समय: 1 जुलाई 1946
लाॅरेल-लांगले समझौता
फिलीपीन्स में अमेरिकी सैनिक अड्डे
फिलीपीनी विदेश नीति का विकास: 1946-72
फिलीपीन्स का संविधान: 1972-86
मार्कोस शासन: 1972-86
आर्थिक संकट
छात्र आंदोलन
समा प्रस्ताव
कम्युनिस्ट आंदोलन
हूक आंदोलन
रेमोन मैगसासे और हूक आंदोलन का निलंबन
कम्युनिस्ट पार्टी का गठन
मंडिओला पुल की लड़ाई
कम्युनिस्ट आंदोलन और विदेश नीति
मुस्लिम समुदाय
मार्कोस ओर मुस्लिम समुदाय
फिलीपीन्स में इस्लाम का आगमन
स्वातंत्रयोनर संबंध
मोरो राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा
इस्लामी देशों के साथ संबंध-सुधार
अमेरिकी सैनिक अड्डे
भूमिका
संबंधों के बदलते ढरें
सैनिक अड्डों से संबंधित वार्ताएं
मार्कोस की वैधता का सवाल
मार्कोस शासन का अंत
कोरोजोन अक्विनों का शासन काल: 1986-92
मार्कोस की विरासत की समस्याएं
नया संविधान
मौजूदा हालात
तात्कालिक समस्याएं
अमेरिका-फिलीपीन्स संबंधों का भविष्य
सारांश
कुछ उपयोगी पस्तकें
बोध प्रश्नों के उनर

 उद्देश्य
इस इकाई में फिलीपीनी लोग, उनकी कला और संस्कृति, इतिहास, शासन एवं राजनीति के बारे में बताया गया है। इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आप:
ऽ फिलीपीन्स के इतिहास, भूगोल और लोगों के बारे में बता सकते हैं।
ऽ इसकी विदेश नीति की चर्चा कर सकते हैं।
ऽ आजादी के बाद के घटनाक्रमों का विश्लेषण कर सकते हैं।

प्रस्तावना
22 सितंबर 1972 को तत्कालीन राष्ट्रपति मार्कोस द्वारा फिलीपीन्स में मार्शल ला शासन लागू करने के बाद से वहां कई उल्लेखनीय घटनाएं हुईं। 1986 में मार्कोस की पराजय के बाद कोराजोन अक्विनों राष्ट्रपति बनीं और संवैधानिक लोकतंत्र की पुनर्स्थापना की। अमेरिका-फिलीपीन्स संबंधों का गहराई से पुनः मूल्यांकन किया गया। फिलीपीनी विदेश नीति ‘‘पक्षधन‘‘ नीति का एक ऐसा उदाहरण है जिसका विकास फिलीपीनी-अमेरिकी रक्षा और व्यापार के संबंधों के माध्यम से हुआ। ‘40 और ‘60 के दशकों में शीत युद्ध के दौरान पक्षभरता की नीति काफी दृढ़ थी लेकिन समय के साथ उसमें लचीलापन आता गया। विदेश नीति की मौजूदा प्रवृत्तियां एशिया की ‘‘उदीयमान वास्तविकताओं’’ को परिलक्षित करती हैं। नए शक्ति संतुलन के तहत एक ही देश पर निर्भरता की नीति को छोड़कर फिलीपीन्स अब नए सहयोगियों की तलाश कर रहा है।

भूगोल और लोग
फिलीपीन्स के ज्यादातर लोग मलय मूल के हैं लेकिन उनकी संस्कृति चीनी, जापानी एवं अन्य एशियाई संस्कृतियों का सम्मिश्रण है। लगभग 330 साल के स्पेनी शासन के परिणामस्वरूप, फिलीपीन्स एशिया का अकेला देश है जिसकी अधिकांश जनसंख्या एशियाई (रोमन कैथलिक) है। फिलीपीनियों के तौर-तरीकों पर अमेरिकी प्रभाव भी स्पष्ट दिखता है। स्पेनियों को हराकर अमेरिका ने 50 साल तक फिलीपीन्स पर शासन किया था। इसके बावजूद फिलीपीन्स की एशियाई अस्मिता बरकरार है।

इतिहास
स्पेनी औपनिवेशिक शासन: 1565-1898
हाल की ऐतिहासिक खोजों से पता चलता है कि औपनिवेशिक शासन के शिकंजे में फंसने से पहले, फिलीपीन्स सांस्कृतिक रूप से काफी विकसित था। लेकिन पूरे द्वीप समूह को जोड़ने वाला कोई साझा सांस्कृतिक, धार्मिक या राजनैतिक सूत्र नहीं था। स्पेनी उपनिवेशवादियों ने, श्वेत-श्रेष्ठता स्थापित करने और पूरे द्वीप-समूह पर केंद्रीकृत शासन की सुविधा के लिए, एक ‘‘मिली-जुली’’ संस्कृति का विकास किया, जिस पर ईशाइयत का वैचारिक वर्चस्व था। आधुनिक फिलीपीन्स की पश्चिम परंपरा इसी ‘‘मिली-जुली’’ संस्कृति की विरासत है। स्पेनी शासन का सामंती चरित्र शोषण और भ्रष्टाचार पर आधारित था। स्पेनी उपनिवेशवाद, फिलीपीन्स के इतिहास के अपने अयोग्य शासन और लोगों की आर्थिक तंगहाली के लिए जाना जाता है। स्पेनी उपनिवेश के प्रति लोगों में व्याप्त असंतोष और शासन से मोहभंग की अंतिम परिणति, स्पेनी उपनिवेशवाद के अंत में हुई।

अमेरिकी आधिपत्य
स्पेनी उपनिवेश का अंत, अमेरिकी उपनिवेशवाद की शुरुआत में हुआ। इस प्रकार उपनिवेशवाद को, शासन और शोषण के उपयुक्त एक बना-बनाया पश्चिमोन्मुख सांस्कृतिक माहौल मिला। फिलीपीनी जनता में विदेशी शासन के प्रति विश्वास पैदा करने और वैचारिक वर्चस्व सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अमेरिकी महाप्रभुओं ने निःशुल्क राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की शुरुआत की। स्पेनी शासन की भयावह यादों की साया के चलते अमेरिकी आधिपत्य के प्रति लोगों की कटुता उस स्तर तक नहीं थी जितनी कि उसके पूर्ववर्ती शासकों के प्रति राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की आंधी के अमर फिलीपीन्म अछूता नहीं रह सका। 1946 में फिलीपीन्स राजनैतिक अर्थों में अमेरिकी आधिपत्य मे आजाद तो हो गया लेकिन आज भी वैचारिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में अमेरिकी विचारधारा का वर्चस्व कायम है। अपने शासन और शोषण की निरंतरता बनाए रखने के लिए, अमेरिकी शासकों ने, फिलीपीन्स में, व्यापारिक-पंूजीपतियों और सामंती-जमींदारों के गठबंधन पर आधारित, अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त मध्यवर्ग के नेतृत्व में एक ऐसे सामाजिक-राजनैतिक ढांचे की रचना की, जिसका वहां के इतिहास पर दूरगामी प्रभाव देखने को मिलता है। एक आंदोलन का निशाना यही गठबंधन था।

आजादी के समय: 1 जुलाई, 1946
तीसरी दुनिया के अन्य देशों की ही तरह, आजादी के साथ, फिलीपीन्स को भी एक औपनिवेशिक अर्थतंत्र विरासत में मिला। यहां की प्रमुखतः खेतिहर अर्थव्यवस्था अमेरिका पर निर्भर थी। चूंकि चीनी, अबेका और नारियल अमेरिका को निर्यात होने वाली प्रमुख सामग्रियां हैं, इसलिए इन व्यापारिक फसलों के उत्पादन पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा। इस प्रक्रिया में राष्ट्रीय खपत की फसलों की उपेक्षा होने लगी। बंटाईदारी कृषि अर्थ-व्यवस्था की सबसे प्रचलित प्रणाली है।

फिलीपीनी बाजार में कर-मुक्त अमेरिकी सामग्रियों की उपलब्धता देसी उद्योग धंधों के विकास में बाधक बन गई। इसका प्रमुख कारण यह था कि उदीयमान देसी उद्योगों के लिए, कर-मुक्त अमेरिकी उत्पादों के साथ प्रतियोगिता करना संभव नहीं था।

अमेरिकी शासन ने, फिलीपीन्स में किसी सशक्त सैनिक प्रतिष्ठान का गठन नहीं किया था, जिसके परिणामस्वरूप, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने आसानी से उस पर कब्जा कर लिया था। स्वतंत्रता के बाद भी, रक्षा के मामलों में, इसकी अमेरिका पर निर्भरता बनी हुई है।

स्वतंत्रता के बाद फीलीपीन्स के शासकों को लगा कि उनके पास केवल दो विकल्प थेः पहला विकल्प था, अमेरिकी महाप्रभुओं का दामन पकड़ कर राज करना और दूसरा विकल्प था, कम्युनिस्ट ताकतों के समक्ष समर्पण। (उल्लेखनीय है कि उस समय फिलीपीन्स में कम्युनिस्ट आंदोलन उफान पर था और अमेरिकापरस्त, फिलीपीनी शासक वर्ग, ‘‘कम्युनिज्म‘‘ के हौवा से आतंकित होकर तरह-तरह के कम्युनिस्ट विरोधी कुप्रचार में लिप्त थे।) ‘‘आजाद’’ फिलीपीन्स के शासकों ने किसी तीसरे विकल्प-जैसे कि ‘‘निर्गुट आंदोलन’’-पर बिना कोई विचार किए पहला विकल्प ही चना। उन्होंने अमेरिकी महाप्रभुओं के साथ कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये। शासक वर्गों न, दनिया भर में इन समझौतों से होने वाले फायदों का ढोल पीटा। लेकिन इतिहास पर एक दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि इन समझौतों का दूरगामी लक्ष्य, फिलीपीन्स के अर्थतंत्र पर साम्राज्यवादी पकड़ को मजबूत करना था। अमेरिकापरस्ती की नीति अपनाते समय, फिलीपीनी शासकों ने यह तर्क दिया था कि चूंकि फिलीपीनी अर्थव्यवस्था अमेरिका पर आश्रित थी इसलिए अमेरिका से पूर्ण संबंध-विच्छेद से देश में आर्थिक बदहाली फैल जाती।

लॉरेल-लांगले समझौता
प्रत्येक अमेरिकी शामन की समाप्ति के शुरुआती दौर में, अमेरिका-फिलीपीन्स संबंध, 1946 के व्यापार-अधिनियम द्वारा संचालित थे। बाद में, इसकी जगह 6 सितंबर, 1955 को हुए लॉरेल-लांगले समझौते ने ली ली। जुलाई 1974 में इस समझौते की अवधि बीत जाने पर दोनों देशों के बीच विशिष्ट आर्थिक संबंधों के समझौते-जैसे अमेरिकी बाजार में फिलीपीनी माल को वरीयता की सुविधा और ‘‘पार्टी राइट‘‘ के तहत फिलीपीनी प्राकृतिक मंसाधनों के दाहेहन का अमेरिका अधिकार -भी समाप्त हो गए।

 फिलीपीन्स में अमेरिकी सैनिक अड्डे
14 मार्च 1947 को हुए समझौते के तहत अमेरिका को 11 वर्ष की अवधि के लिए। फिलीपीन्म में अपने सैनिक अड्डे बरकरार रखने का अधिकार प्रदान किया गया। इन अड्डों के चलते बहुत से फिलीपीनियों को नौकरी मिली और अमेरिकी सैनिकों को चीजों की आपूर्ति में भी काट लोगों के आय का स्रोत बना। शीतयुद्ध के संदर्भ में, अमेरिका के लिए इन अड्डों का सामरिक महत्व काफी बढ़ गया। समय बीतने के साथ इस समझौते की तमाम शर्तों पर पुनर्विचार की मांग बढ़ने लगी। अमेरिकी सैनिक अड्डे थे-क्लिर्क और मंगली वायुसेना अंड्डे एवं सुबिक नौसैनिक अड्डा। सितंबर, 1971 में सुबिक नौसैनिक अड्डे को अमेरिका ने फिलीपीन्म की मांग पर छोड़ दिया। युवा-वर्ग का एक बड़ा तबका अमेरिका-फिलीपीन्म संबंधों के शोषण के पहलु पर काफी व्याकुल होने लगा था। फिलीपीन्म में अमेरिकी अड्डों की मौजूदगी को उसकी संप्रभुता के लिए खतरनाक माना जाने लगा। अड्डों संबंधित समझौता 1991 में समाप्त हो गया और 1992 तक अमेरिका ने अपनी फौजें वापस बुला लीं।

फिलीपीनी विदेश नीति का विकास  1946-72
इम दौर में फिलीपीन्स की विदेश नीति का निर्धारण, अमेरिकी विदेश नीति की आवश्यकताओं के अनुरूप होता रहा। यह कहना गलत नहीं होगा कि फिलीपीनी विदेश नीति, राष्ट्रीय शासक-अभिजात वर्गों और अमेरिकी हितों के संगम का प्रतिफल रही है। पड़ोस में कम्युनिस्ट चीन की मौजूदगी और देश में तेज होते कम्युनिस्ट आंदोलन के भय से दोनों के ही दिलो-दिमाग पर ‘‘कम्युनिस्ट खतरे‘‘ का भूत सवार था। पड़ोसी देशों-कोरिया और वियतनाम में जनवादी संघर्षों और युद्धों में आतंकित फिलीपीनी शासकों ने अमेरिकी दामन और भी कसकर पकड़ लिया और अमेरिका को भी क्षेत्र में एक विश्वस्त और वफादार सहयोगी की जरूरत ज्यादा महसूस होने लगी थी।

इसके अलावा फिलीपीनी शामक वर्गों का एक प्रभावशाली तबका, जापान से मुक्ति दिलाने और युद्ध के परिणामस्वरूप अस्त-व्यस्त अर्थव्यवस्था को ‘‘संवारने‘‘ में अमेरिकी मदद के लिए अमेरिका के प्रति कृतसता का भी रखता था।

इस दौर में एशिया की गतिविधियों में फिलीपीन्स की हिस्सेदारी अमेरिका के साथ सामान्य पहचान स्थापित करने की आशा और साम्यवाद के विरुद्ध एक मजबूत गठबंधन खड़ा करने की उसकी इच्छा से प्रेरित होती थी। लेकिन समय के साथ, अंतर्राष्ट्रीय स्थिति बदलती गई और फिलीपीन्स की विदेश नीति में भी ‘‘परिवर्तन‘‘ आना शुरू हुआ-विशेष रूप से 1961 के बाद। युद्धोत्तर काल में एक व्यापारिक शक्ति के रूप में जापान के उदय से फिलीपीन्स की अमेरिका पर व्यापारिक निर्भरता घटी। इसके अलावा वियतनाम में अमेरिकी पराजय और शीत युद्ध के अंत का भी फिलीपीनी शासकों के मन पर प्रभाव पड़ा। चीन के साथ अमेरिका के सुधरते संबंधों ने भी फिलीपीनी नेताओं को पुनर्विचार के लिए बाध्य किया। चीनियों को खुश करने के लिए निक्सन की बीजिंग यात्रा, उन्हें अच्छी नहीं लगी थी। इसके बाद फिलीपीन शासन ने चीन एवं अन्य देशों के साथ स्वतंत्र राजनयिक संबंध स्थापित करने शुरू कर दिये।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणी: नीचे दी गई जगह में प्रश्न का उत्तर लिखें और इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से उसकी जांच कर लें।
1) 1946-72 के दौर में फिलीपीनी विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

16.5 फिलीपीन्स का संविधान रू 1972-86
1934 में निर्मित फिलीपीनी संविधान के तहत एक लोकतांत्रिक, निर्वाचित सरकार का प्रावधान था। फिलीपीन्स की राजनैतिक प्रणाली, 1972 में राष्ट्रपति फर्डिनन्ड मार्कोस द्वारा मार्शल ली की घोषणा तक, इसी संविधान के तहत चलता रहा। शक्ति का पृथकीकरण इस संविधान की एक प्रमुख विशिष्टता थी।

शासन के तीनों अंग-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका एक दसरे से स्वतंत्र और स्वायत थे। उनके पारस्परिक संबंधों का समन्वय प्रतिष्ठा की समानता के सिद्धांत पर आधारित था। विधायिका के अधिकार कांग्रेस (संसद) के पास थे, कार्यपालिका के अधिकारों का प्रयोग राष्ट्रपति करता था और सर्वोच्च न्यायालय, न्यायपालिका की सर्वोच्च संस्था, थी।

संसद (कांग्रेस) में एक सेनेट (उच्च सदन) था और एक प्रतिनिधि सदन होता था।

सेनेट में 24 निर्वाचित सदस्य होते थे और प्रतिनिधि संदन में 124 सदस्य। प्रतिनिधि सदन में स्थानों का आबंटन प्रांतों की आबादी के आधार पर होता था। उच्च सदन में दो वर्ष के अंतराल पर आठ स्थानों के लिए चुनाव होता था तथा प्रतिनिधि सभा की अवधि 4 साल की होती थी।

अमेरिका की तरह अध्यक्षीय व्यवस्था के तहत कार्यपालिका के मखिया के रूप में, प्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से राष्ट्रपति का निर्वाचन 4 साल की अवधि के लिए होता था और कोई भी व्यक्ति दो बार से अधिक चुनाव नहीं लड़ सकता था।

संविधान के अनुसार, ‘‘न्यायिक अधिकार का प्रयोग एक सर्वोच्च न्यायालय एवं कानून द्वारा स्थापित अन्य निचली अदालतों द्वारा किया जा सकेगा।‘‘

1946 से 1972 के दौर में बारी-बारी सत्ता में आने वाली पार्टियां थीं-राष्ट्रवादी पार्टी और उदारवादी पार्टी। आज की स्थिति में कोई भी दल, इतना सशक्त नहीं है।

उपरोक्त सर्वेक्षण से फिलीपीनी राजनीति पर दो स्पष्ट प्रभाव दिखते हैं। एक तरफ, औपनिवेशिक विरासत और अमेरिका के साथ विशेष संबंधों के चलते आधुनिकीकरण (पाश्चात्यकरण) की प्रवृत्ति दिखती है तो दूसरी तरफ अपनी एशियाई अस्मिता को उजागर करने की उनकी आकांक्षा का असर दिखाई देता है।

मार्कोस शासन 1972-86
23 सितंबर, 1972 को राष्ट्रपति फर्डिनन्ड मार्कोस ने फिलीपीन्स में मार्शल लॉ शासन की घोषणा कर दी। मार्शल लॉ लागू करने से पहले वह लगभग दो कार्यकाल की अवधि राष्ट्रपति पद पर बिता चुका था। उसका दूसरा कार्यकाल दिसंबर, 1973 में पूरा होने वाला था और पुराने संविधान के प्रावधानों के तहत, कोई भी व्यक्ति तीसरी बार चुनाव नहीं लड़ सकता था।

आर्थिक संकट
राष्ट्रपति मार्कोस के शासन का दूसरा कार्यकाल खत्म होते-होते देश पर आर्थिक संकट के बादल मंडराने लगे थे। अमीरी-गरीबी के बीच की खाई काफी चैड़ी हो चुकी थी। जैसाकि ऊपर बताया जा चुका है कि फिलीपीन्स एक कृषि-प्रधान देश है और इसकी 74 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है। खाद्यान्न उत्पादन के लिए अब भी खेती के पारंपरिक, पुरातन औजारों का प्रयोग हो रहा था जबकि अमेरिका एवं अन्य पूंजीवाद देशों को निर्यात होने वाली कुछ व्यापारिक फसलों का उत्पादन ‘‘पूंजीवादी खेती’’ के तरीकों से होता था। इस प्रकार प्रमुखतः खेतिहर अर्थव्यवस्था, अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिकी बाजार पर निर्भर हो गई।

सीमित भूमि सुधारों से किसानों को सामंती बंधनों से मुक्ति नहीं मिल सकी। इसके प्रमख कारण थेः सामंती व्यवस्था में कोई प्रभावी परिवर्तन लाने की नौकरशाहों की अनिच्छा, जमींदारों द्वारा खड़े किए गए अवरोध एवं समस्या की व्यापकता।

औद्योगीकरण और अंतर्देशीय व्यापार से चंद लोगों की ही समद्धि बढ़ी। जनसंख्या काफी तेज रफ्तार से बढ़ी और सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गति धीमी थी। सरकारी व्यय, आय से बहुत अधिक था, परिणामस्वरूप राजकोष खाली होने लगा। फिलीपीनी अर्थतंत्र का आधार, विदेशी निवेश भी घटने लगा। आर्थिक बदहाली ने सामाजिक असंतोष और जनांदोलनों को जन्म दिया।

इन सबसे बेखबर शासक परिवार अपने महल में ऐशो-आराम से रह रहा था। जनांदोलनों में देश की बदहाली के लिए मार्कोस और उसकी बीवी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था। दरअसल उसके लंबे शासन के दौरान आम आदमी की हालत बद से बदतर होती गई। इससे निपटने के लिए मार्कोस ने मार्शल लॉ लागू करके लोगों पर तानाशाही लाद दी।

छात्र आंदोलन
समाज के सभी तबकों में मार्कोस शासन के विरुद्ध असंतोष एवं आक्रोश व्याप्त था। प्रबुद्ध तबका भ्रष्टाचार में लिप्त शासन को बदल डालने को बेचैन हो रहा था। मार्कोस-विरोधी अभियान का सबसे मुख्य तबका विद्यार्थियों का था। उन्होंने प्रदर्शनी, जुलूसों, सभाओं, पर्चा एवं पोस्टरों आदि माध्यमों से लोगों में जागृति पैदा की। दूर-दराज के गांवों में जा-जा कर जनमत तैयार किया। सबसे जुझारू युवा संगठन था, कबतांग मकबयान (के.एम.)। के.एम. ने सामंतवाद, तानाशाही और साम्राज्यवाद के खिलाफ नारा बुलंद किया। मार्कोस ने के.एम. पर कम्युनिस्ट आंदोलन के खुले मंच के रूप में काम करने का ‘‘आरोप‘‘ लगाया। इस प्रकार हम देखते हैं कि मार्शल लॉ लागू करने से पहले, सरकार-विरोधी धरनों, प्रदर्शनों, जलसों एवं सभाओं में दिन-ब-दिन तेजी आती गई और मार्कोस-विरोधी आंदोलन पूरे जोश से निर्णायक संघर्ष की तरफ बढ़ता दिखाई देने लगा था। मार्कोस ने 1970 में फिलीपीन्स के एक नए संविधान के निर्माण के लिए संविधान सम्मेलन (कॉन-कॉन) का चुनाव करवाकर स्थिति को और भी विस्फोटक बना दिया। लोगों को मार्कोम की नीयत पर संदेह होने लगा और इस बात पर बहस शुरू हो गई कि सरकार का स्वरूप बदलने से सामाजिक बुराइयां कैसे दूर हो सकती हैं? जनतांत्रिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे मार्कोस की चाल बताया, जिसके माध्यम से वह या तो संविधान में संशोधन करके तीसरी बार गष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनना चाहता था, या फिर अध्यक्षीय प्रणाली को संसदीय प्रणाली में बदल कर श्रीमती अक्विनों को राष्ट्रपति बनाकर खुद प्रधानमंत्री बनना चाहता था।

 समा प्रस्ताव
मार्कोस की सत्ता में बने रहने की चाल का विरोध करने के लिए संविधान सम्मेलन में एक प्रस्ताव पेश किया गया, जिसे ‘‘सभा प्रस्ताव’’ के नाम से जाना जाता है। प्रस्ताव में ऐसे प्रावधान बनाने की बात कही गई थी जिससे मार्कोस किसी भी रूप में फिर से शासनाध्यक्ष न बन सके। सम्मेलन में, यह प्रस्ताव बहुमत ने निरस्त कर दिया। इससे मार्कोस की नीयत पर लोगों का संदेह पक्का हो गया।

मार्कोस के आलोचनों में, भूतपूर्व सेनेटर और उदारवादी पार्टी के महासचिव, बेनिग्नो अक्विनों जूनियर (निनॉय नाम से लोकप्रिय) सबसे अधिक मुख्य थे।

मार्शल लॉ के पूर्वाअभ्यास के तौर पर, 21 अगस्त, 1971 को मार्कोस ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के संवैधानिक प्रावधान को निलंबित कर दिया। अपनी इस कार्यवाही को उचित ठहराने के लिए कम्युनिस्ट आंदोलन से देश को खतरे का तर्क दिया। अपने तर्क की प्रमाणिकता साबित करने के लिए उसने प्लाजा मिरांडा में हुए बम विस्फोट का हवाला दिया। चूंकि मार्कोस पहले भी कई बारे कम्युनिस्ट खतरे का हौवा खड़ा कर चुका था, इसलिए इसे लोगों ने सत्ता में बने रहने की उसकी चाल बताया।

मार्कोस को सबसे तगड़ा झटका लगा नवंबर, 1971 के सेनेट के चुनावों में, उदारवादी दल के उम्मीदवारों द्वारा उसकी पार्टी के उम्मीदवारों की पराजय से। जैसा कि लोगों को डर था 23 सितंबर 1972 को मार्कोस ने मार्शल लॉ की घोषणा कर दी और अक्विनों समेत तमाम नेताओं को जेल में बंद कर दिया।

मार्शल लॉ लागू करने के बावजूद मार्कोस के कष्टों का अंत नहीं हुआ। उसे परेशान करने वाली समस्याएं प्रमुख रूप से कम्युनिस्टों, मुसलमानों और अमेरिकी सैनिक अड्डों के बारे में थीं।

कम्युनिस्ट आंदोलन
 हूक आंदोलन
लंबे समय से फिलीपीन्स के कम्युनिस्ट हक नाम से जाने जाते हैं। ‘‘हूक’’, 21 मार्च 1942 को जनता की जापान विरोधी सेना के रूप में गठित ‘‘हूक ब लाहाय’’ का संक्षिप्त रूप है। शुरू में हक आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य जापानी आक्रताओं एवं उनके फिलीपीनी सहयोगियों का विरोध और भूमि सुधार तक ही सीमित था। युद्ध के दिनों में हक आंदोलन के सारे नेता कम्युनिस्ट नहीं थे। बहुत से लोगों का विचार था कि आजादी के बाद यह संवैधानिक ढांचे का हिस्सा बन जाएगा। इस बात को लेकर हुक नेताओं और सरकार में कई बार वार्ताएं हुईं लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। इस दौरान आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह कम्युनिस्टों के हाथ में आ गया। बाद में उन पर स्वतंत्र गणतंत्र के शासन के तख्तापलट का आरोप लगाया जाने लगा।

सरकार को हूकों का वास्तविक खतरा 1950 में महसूस हुआ। तत्कालीन राष्ट्रपति एलपिडिओ क्विरिनों के शासन काल में, महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर कई भ्रष्ट लोग बैठे हुए थे। देश में सभी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और अराजकता का बोलबाला था। भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के राष्ट्रीय रोग से सेना भी मुक्त नहीं थी। बढ़ते हुए देशव्यापी असंतोष के वातावरण ने हकों को और भी शक्तिशाली बना दिया। 1949 में चीन में जनवादी गणतंत्र की स्थापना के बाद तो हकों से खतरे के प्रति सरकार ज्यादा ही चिंतित हो गई।

 रेमोन मैगसासे और हूक आंदोलन का निलंबन
हूक आंदोलन का सिलसिलेवार दमन शुरू हुआ 1950 में रेमोन मैगसासे की रक्षामंत्री के पद पर नियुक्ति के बाद। उसने विद्रोह कुचलने के कामयाब तरीके इस्तेमाल किये। हूकों का प्रभावक्षेत्र कम करने के उद्देश्य से वह ग्रामीण क्षेत्र में जाकर लोगों की शिकायतें सुनता था और उनका समाधान प्रस्तुत करता था। जब वह राष्ट्रपति बना तो उसने लोगों की समस्याओं को हल करने की दिशा में कई कदम उठाये एवं सरकार की साफ-सुथरी छवि स्थापित करने में सफल रहा। इससे लोगों में हूक आंदोलन का समर्थन आधार काफी घट गया।

रेमोन के शासन-काल में एक तरह से हूक आंदोलन समाप्त ही हो गया। इसके ज्यादातर नेताओं को या तो गिरफ्तार कर लिया गया या मार डाला गया। पोलिटब्यूरो के बचे हुए एकमात्र सदस्य जैसे लावा की गिरफ्तारी के बाद तो आंदोलन ठंडा ही पड़ गया। 20 जून 1957 को गणतंत्र अधिनियम संख्या 1700, जिसे राजद्रोह विरोधी अधिनियम के नाम से जाना जाता है, के लागू होने के साथ फिलीपीन्स की कम्युनिस्ट पार्टी पर कानूनी पाबंदी लगा दी गई।

सरकारी दमन गस्त हूक, 1962 से 1965 तक नरम पड़े रहे। 1966 के बाद मे, मरकारी बयानों के अनुसार, ‘‘हूक पुनरुत्थान’’ का काल शुरू हुआ। माना जाता है कि सरकारी दमन के प्रतिरोध में हूक गतिविधियों में तेजी आई। दूसरी व्याख्या के अनुसार, हूक आंदोलन, दरअसल हमेशा नियंत्रण में ही रहा, लेकिन हर साल जब कांग्रेम में सैनिक बजट पर विचार होता था तो सैनिक अधिकारी नए सिरे से शुरू हो रहे हक आंदोलन का हौवा खड़ा कर देते थे।

कम्युनिस्ट पार्टी का गठन
1968 में एक भूतपूर्व विश्वविद्यालय शिक्षक जोसे मा सिसोन, जो आमादो ग्बेरेरो नाम से लोकप्रिय हैं, के नेतृत्व में युवा कम्युनिस्टों का एक नया दल अस्तित्व में आया। सिमोन ने 1964 में कबतांग मकबयान नामक संगठन की स्थापना करके युवाओं में राष्ट्र की समस्याओं के प्रति जागरूकता पैदा करने का अभियान शुरू किया। तभी से युवा वर्ग अपने विचारों को मुखतरा प्रदान करने में कभी पीछे नहीं रहा। इस आंदोलन का वैचारिक रुझान अति-वापंथ की तरफ था।

26 दिसंबर 1968 को माओ त्से-तुंग की विचारधारा को आधार बनाकर, सिसोन ने कम्युनिस्ट पार्टी की पुर्नस्र्थापना की। चीनी लाल सेना के ढर्रे पर एक क्रांतिकारी सशस्त्र सेना, नवजनवादी सेना (न्यू पीपुल्स आर्मी-एन.पी.ए.) का भी गठन किया गया। एन.पी.ए. की कमान कर्नल दांते के अधीन थी। दांते के प्रति फिलीपीनी युवाओं में अत्यधिक सम्मान एवं स्नेह की भावना थी। सिसोन द्वारा, 1971 में अमादो खेरेरो के छद्वनाम से लिखी गई पुस्तक वामपंथियों की बाइबिल बन गई। इस पुस्तक में मार्कोस शासन की आलोचनात्मक व्याख्या के साथ फिलीपीन्स के इतिहास की माओवादी व्याख्या है। इस पुस्तक में सिसोन ने मार्कोस को ‘‘अमेरिकी साम्राज्यवादी के मदांध कठपुतली’’ की उपमा दी है जिसने वियतनाम और हिन्द-चीन क्षेत्र के अन्य देशों पर अमेरिकी आक्रमण में भाग लने के लिए भाड़े के फिलीपीनी सैनिक भेजने में, मैकापगाल को भी पीछे छोड़ दिया।

बार-बार कानून-व्यवस्था के नाम पर मार्शल लॉ घोषित करने की उसकी राजनीति पर तीखा प्रहार करते हए, सिसोन ने इस पुस्तक में, देश के आर्थिक-राजनैतिक संकट के लिए मार्कोस के कुशासन को दोषी ठहराया। इस पुस्तक में मार्शल लॉ का विश्लेषण करते हुए कहा गया है, ‘‘क्रांतिकारी जनता के लगड़े विरोध से निपटने के लिए, उसने औपचारिक रूप से मार्शल लॉ घोषित कर दिया। मार्शाल लॉ के चलते पूरे देश में, खासकर ग्रामीण इलाकों में, फासीवादी आतंक व्याप्त हो गया। गांवों में वर्दीधारी सैनिक और उनके सहायक गंडे किसानों को तरह-तरह की यातनाएं देने लगे।’’

यद्यपि लोगों पर इस पुस्तक का काफी वैचारिक प्रभाव पड़ा, लेकिन मार्कोस-विरोधी भावना, लोगों में पहले से ही पनप रही थी। इस पुस्तक ने जनाक्रोश की आग में घी का काम किया।

 मंडिओला पुल की लड़ाई
30 जनवरी, 1970 को लगभग 10,000 मजदूरों और छात्रों के जुलूस ने राष्ट्रपति भवन पर धावा बोल दिया। सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों में दिन भर संघर्ष चला। पुलिस और सेना की गोलीबारी में 4 छात्र मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हो गए। यह घटना ‘‘मंडिओला पुल की लड़ाई’’ नाम से जानी जाती है। जब तक मार्कोस ने मार्शल लॉ घोषित नहीं कर दिया, छात्रों द्वारा विरोध-प्रदर्शन जारी रहे। सिसोन द्वारा प्रेरित छात्र-आंदोलन, फीलीपीनी राजनीति के लिए एक नई एवं अभूतपूर्व घटना थी। लेकिन मार्शल लॉ घोषित होने के बाद इसमें ठहराव आ गया। ज्यादातर छात्रनेताओं को जेल के सीकचों में कैद कर दिया गया और किसी प्रकार के विरोध को कुचलने के लिए, पुलिस और से की ताकत का निरंकुशतापूर्वक इस्तेमाल किया जाने लगा।

जोसेमा सिसोन और कमांडर दांते समेत कम्युनिस्ट आंदोलन के कई प्रमख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। वैसे सरकारी हलकों में इसे देशव्यापी बताया जा रहा था लेकिन कम्युनिस्ट आंदोलन खासकर लिजोन क्षेत्र में ही ज्यादा प्रभावी था।

कम्युनिस्ट आंदोलन और विदेश नीति
फिलीपीन्स के दृष्टिकोण में कम्युनिस्ट देशों के प्रति परिवर्तन लाने में कम्युनिस्ट आंदोलन ने भूमिका निभाई। क्विरिनो ने जनवादी गणतंत्र चीन को मान्यता देने की इच्छा व्यक्त की थी। लेकिन यह इच्छा कार्यरूप नहीं ले पाई। जैसाकि ऊपर बताया जा चुका है कि 1950 में हक आंदोलन अपने उफान पर था और उस पर पर्याप्त कम्युनिस्ट प्रभाव था। चीन इस आंदोलन को समर्थन प्रदान कर रहा था। पड़ोसी देश, चीन के इसं समर्थन को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया। फिलीपीन्स में रह रहे चीनियों को भी, उनके कम्युनिस्ट समर्थक होने के कारण, संदेह की नजर से देखा जाने लगा और मेगासेसे के राष्ट्रपति बनने के बाद तो चीन के साथ संबंध बनाने का सवाल ही नहीं था। उसके बाद के राष्ट्रध्यक्षों गार्सिया और मेकापगाल ने भी चीन से संबंध स्थापित करने में कोई रुचि नहीं ली। उनके शासनकालों में तो चीन पर फिलीपीनी कम्युनिस्ट विद्रोहियों को आर्थिक सहायता देने का आरोप लगाया गया।

1975 में मार्कोस के सत्ता में आने के बाद से कम्युनिस्ट देशों के प्रतिरूप में कुछ नरमी आई। यद्यपि वह घनघोर कम्युनिस्ट-विरोधी था, फिर भी चीन और सोवियत संघ के संबंधों के विकल्प को उसने खुला रखा। विदेश मंत्रालय की सहमति से फिलीपीनियों को चीन और सोवियत संघ एवं अन्य देशों की यात्रा की भी अनुमति मिलने लगी। इससे पहले इसके बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता था। 1962 में, मैकपगाल ने तो सोवियत संघ और युगोस्लाविया की टीमों को मनीला में हुए चैथे विश्व फुटबाल टूर्नामेंट में भाग लेने की अनुमति नहीं दी थी।

यद्यपि यह प्रचार किया जाता रहा कि हूक आंदोलन के पीछे चीनी घुसपैठियों एवं चीन की कम्युनिस्ट सरकार का हाथ था, धीरे-धीरे वहां की जनता में यह धारणा घर करने लगी कि फिलीपीनी सरकार का चीन-विरोध अमेरिका के प्रति अंधी स्वामिभक्ति का परिणाम है। एक फिलीपीनी लेखक के अनुसार, ‘‘हमने चीन के प्रति अमेरिका के बर्ताव का अंधभक्ति के साथ अनुसरण किया। अमेरिका ने चीन के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए और जवाब में चीन ने भी अमेरिका के साथ कोई संबंध कायम करने की पहल नहीं की। लेकिन हमारी क्या प्रतिक्रिया थी? चूंकि अमेरिका ने अपने यहां के पत्रकारों की चीन यात्रा पर रोक लगा दी, इसलिए हमने भी अपने पत्रकारों को वहां जाने से रोक दिया।’’

राष्ट्रपति के रूप में अपना तीसरा कार्यकाल शुरू करने पर मार्कोस ने सोवियत संघ, चीन एवं अन्य समाजवादी देशों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर लिया था। मार्कोस को ये फैसले अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बदलते समीकरणों की जटिलताओं के चलते करने पड़े। इसके अलावा शीत युद्ध की समाप्ति और वियतनाम में अमेरिकी पराजय ने फिलीपीनी नेताओं के दृष्टीकोण को प्रभावित किया। उन्होंने देखा कि जब अमेरिका स्वयं कम्युनिस्ट देशों से संबंध स्थापित कर रहा है और विश्व-शक्ति के रूप में चीन के उदय के बाद उससे मित्रता को उतावले राष्ट्रपति निक्सन बीजिंग यात्रा पर चले गए, तो वे ही क्यों पीछे रहें?

समाजवादी देशों के साथ संबंध स्थापित करके, मार्कोस, अपने विरुद्ध ‘‘अमेरिकी साम्राज्यवाद की कठपतली’’ बीजिंग यात्रा के दौरान उसका राजकीय स्वागत हुआ और उसने माओ त्से तुंग से भी मुलाकात की। उसने फिलीपीन्स में इस घटना के जिक्र से यह प्रचार किया कि चीन उससे मित्रता को उतावला था। एक वरिष्ठ चीनी नेता की मनीला यात्रा ने इस धारणा की और भी पुष्टि की कि राजनयिक संबंधों के लिए चीन ने एन.पी.ए. को मदद देना बंद कर दिया। इसके बावजूद फिलीपीन्स का कम्युनिस्ट आंदोलन इतना सशक्त हो चुका है कि जब तक लोगों में असंतोष रहेगा, उसका अस्तित्व बना रहेगा। बल-प्रयोग और विदेश संबंधों के जरिए जनाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले आंदोलन को समाप्त नहीं किया जा सकता।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी: नीचे दी गई जगह में प्रश्नों के उत्तर लिखें और इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से उनकी जांच कर लें।
1) फिलीपीन्स में कम्युनिस्ट आंदोलन के उदय पर प्रकाश डालिए।
2) फिलीपीन्स की विदेश नीति पर कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रभावों का वर्णन कीजिए।

मुस्लिम समुदाय
मार्कोस शासन के समक्ष एक बड़ी समस्या मुस्लिम समुदाय को लेकर थी। यद्यपि यह समस्या पहले से मौजूद थी लेकिन मार्शल लॉ की घोषणा के बाद यह समस्या और गहन हो गई। मार्कोस शासन ने लोगों को अपने-अपने हथियार लौटा देने का आदेश दिया और बदले में लोगों ने सेना पर हमला करना शुरू कर दिया।

मार्कोस और मुस्लिम समुदाय
शुरुआत में मार्कोस शासन मुस्लिम समुदाय के प्रति नरमी का व्यवहार अपनाए रहा, और आदेश संख्या 95 के तहत कुछ विद्रोहियों को क्षमादान दिया। भिंडानों की विकास परियोजना के अलावा मार्कोस ने मुसलमानों के लिए कई और सुविधाओं की भी घोषणा की।

मार्कोस ने मीनीला में कुछ वृद्ध मुस्लिम नेताओं के साथ एक बैठक की जिसके बाद उन नेताओं ने मार्शल लॉ का गुणगान शुरू कर दिया। मनीला में मार्कोस की घोषणाओं और इन नेताओं के गुणगान के विपरीत देश के दक्षिणी हिस्से में स्थिति विस्फोटक बनी हुई थी। युवा मुस्लिम विद्रोहियों का नेतृत्व नर मिसुराय जैसे युवा मुसलमानों के हाथ में था। मिसराय की फिलीपीन्स विश्वविद्यालय के दिनों में सिसोन के साथ काफी घनिष्ठता थी। विद्रोहियों ने वृद्ध नेताओं के साथ मार्कोस की बैठक की निंदा की। उनका विद्रोह मार्कोस की तानाशाही के खिलाफ तो था ही, अपने निजी हितों के लिए सामदायिक हितों की बलि देने वाले नेताओं के भी खिलाफ था।
इस खले विद्रोह के जवाब में मार्कोस के सैनिकों ने उनका कत्लेआम शुरू कर दिया। दक्षिणी फिलीपीन्स में ‘‘युद्ध‘‘ के गुरुत्व को देखते हुए 400 वर्ष पानी इस समस्या के इतिहास का संक्षिप्त वर्णन उपयोगी होगा। लियोन मा गरेरो ने कहा था, ‘‘ईशाई और मुसलमान फिलीपीनियों का संघर्ष, दरअसल दो समुदायों का संघर्ष है जिनकी परंपराएं, ऐतिहासिक विरासत और आर्थिक हित अलग-अलग हैं’’।

 फिलीपीन्स में इस्लाम का आगमन
1380 में इस्लाम सुलू द्वीप से शुरू हुआ और धीरे-धीरे अन्य द्वीपों में भी फैलने लगा। 1542 में स्पेनियों ने विसयास और लुजाने पर कब्जा कर लिया लेकिन मिनांडो द्वीप मुसलमानों के अधीन बना रहा। बाकी द्वीपों के निवासियों को स्पेनी विजेताओं के साथ आए धर्म प्रचारकों ने कैथोलिक ईसाई बना दिया।

इस प्रकार ईसाइयों और मुसलमानों का अलगाव स्पेनी शासन में ही शुरू हो गया था जो अमेरिकी शासन में और भी सुदृढ़ हो गया। अमेरिकियों ने ‘‘बांटो और राज करो’’ की। नीति के तहत मिनांडो पर अलग शासन की स्थापना की। बहुत से फिलीपीनी विद्वानों का मानना है कि वर्तमान संकट अमेरिकी शासन की ही विरासत है।

स्वातंत्रयोत्तर संबंध
स्वतंत्रता के बाद ईसाई वर्चस्व वाले शासन की नीतियों से मुस्लिम समदाय मुख्यधारा से जुड़ने की बजाय दूर होता चला गया। सरकार की पुनर्वास योजना से समस्या और भी गंभीर हो गई। इस योजना के तहत सघन आबादी वाले लजोन और वसायस द्वीपों से ईसाइयों को कम आबादी वाले दक्षिणी हिस्सों में बसाना शुरू किया गया जिसके चलते कई प्रांतों में मुसलमानों की स्थिति अल्पसंख्यकों की हो गई। इससे जमीन के झगड़े तो शुरू ही हुए, साथ ही ईसाई व्यापारियों द्वारा मुसलमानों के शोषण की न समाप्त होने वाली प्रक्रिया भी शुरू हो गई।

इससे स्वाभाविक है कि मुसलमान उपेक्षित और अपनी स्थिति को लेकर भयभीत महसूस करते हुए उनमें फिलीपीन्स से अलग होने की भावना जोर पकड़ने लगी और 1968 में मिनांडो स्वतंत्रता अभियान शुरू किया गया। तब से ईसाइयों और मुसलमानों के बीच संघर्ष जारी है। मुस्लिम विद्रोहियों और सेना के बीच भी संघर्ष शुरू हो गया। मार्शल लॉ की घोषणा के समय तक फिलीपीनी अखबारों में, मुसलमानों के कत्लेआम की खबरें आम बातें थीं।

मोरो राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा
1972 में मुस्लिम विद्रोहियों द्वारा मोरो मुक्ति मोर्चा (एम.एन.एल.एफ.) का गठन किया गया। यह संगठन पी.एल.ओ. के ढर्रे पर बनाया गया। अलगाव की धमकी सही जान पड़ने लगी। समस्या और भी गंभीर तब हो गई जब एम.एन.एल.एफ. को लीबिया से धन और शस्त्र मिलना शुरू हो गया। इस्लामी सम्मेलन ने फिलीपीन्स के विरुद्ध कड़ी कार्यवाई की खुली हिमायत की। लीबिया और मिस्र ने मुसलमानों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए।

जुलाई 1972 को एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल फिलीपीन्स भेजा। प्रतिनिधिमंडल ने राय दी कि मार्कोस को मुसलमानों का नरसंहार तुरंत रोक देना चाहिए। यह समस्या इस्लामी देशों के साथ मार्कोस के संबंधों में बाधा पैदा कर रही थी। खासकर अरब देशों के साथ संबंधों में गिरावट का असर फिलीपीन्स में तेल के आयात पर पड़ सकता था। फिलीपीन्स के तेल की दो-तिहाई जरूरत की आपर्ति सऊदी अरब कुवैत और अबु दाबी से होती हैं। इसके अलावा मार्कोस को आसिअन के दो सदस्य पड़ोसी देशों, मलेशिया के साथ फिलीपीन्स के संबंध बिगड़ने लगे। कहा जाने लगा कि सबाह के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुस्लिम विद्रोहियों के समर्थक थे और उन्हें मलेशिया में प्रशिक्षण दिया जाता था। मलेशियाई हस्तक्षेप को सबाह पर फिलीपीनी दावे को समाप्त करने के दबाव के रूप में देखा जाने लगा और लपुर में सबाह पर फिलीपीनी दावे छोड़ने के सरकारी फैसले की घोषणा की।

इस्लामी देशों के साथ संबंध-सुधार
मलेशिया और इंडोनेशिया के प्रयासों के फलस्वरूप ही इस्लामी सम्मेलन में मार्कोस शासन के विरुद्ध कड़ी निन्दा का प्रस्ताव नहीं पारित हुआ। क्षेत्र की स्थिरता के लिए इन दोनों देशों की सरकारों ने मार्कोस पर मुस्लिम समस्या को हल करने का दबाव डालना शुरू कर दिया। लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि कोई भी समाधान फिलीपीन्स की राष्ट्रीय अखंडता और संप्रभुता के अंतर्गत ही हो।

इस दौरान मार्कोस लीबिया को प्रसन्न करने का प्रयास करता रहा। मार्शलं लॉ की घोषणा के बाद से नूर मिसराय ने लीबिया में शरण ली थी। मार्कोस की बीवी इमेण्डर कर्नल गद्दाफी से बातचीत करने लीबिया गई। उसने गद्दाफी को समझाया कि मार्कोस शासन मुसलमानों का कत्लेआम नहीं कर रहा था और जल्द-से-जल्द समस्या का समाधान करना चाहता था। इसके बाद गद्दाफी ने एम.एन.एल.एफ. और फिलीपीनी सरकार के बीच वार्ता आयोजित की। 24 दिसंबर 1976 को दोनों पक्षों ने युद्ध विराम समझौते पर हस्ताक्षर किया, जिसकी व्याख्या को लेकर जल्दी ही मतभेद उभरने लगे।

फरवरी, 1977 में भिपोली में दुबारा वार्ता आयोजित की गई। इस वार्ता में कोई समझौता नहीं हो सका क्योंकि एम.एन.एल.एफ. अलग राज्य की मांग पर अडग रहा। सरकारी पक्ष का कहना था कि यदि जनमत संग्रह के माध्यम से बहुमत की इच्छा हो तो दक्षिणी क्षेत्रों को मिलाकर एक स्वायत्तशासी प्रान्त बनाया जा सकता था।

17 अप्रैल 1977 को मार्कोस ने एक जनमत संग्रह कराया और जैसा कि अपेक्षित था, परिणाम सरकार के पक्ष में गए। ईसाई मतदाताओं ने स्वायत्तशासी क्षेत्र की स्थापना के विरुद्ध मतदान किया। एम.एन.एल.एफ. ने जनमत संग्रह का बहिष्कार किया था और इस्लामी सम्मेलन ने भी पर्यवेक्षक न भेजकर इससे अपनी असहमति जाहिर की थी। जनमत संग्रह के बावजूद मुस्लिम समस्या जैसे-की-तैसे बनी रही।

तभी से युद्ध विराम का उल्लंघन होने लगा और सशस्त्र संघर्ष फिर से शुरू हो गया। दावा किया गया कि 1972 के बाद से 50,000 नागरिक मौत के घाट उतार दिए गए।

मुस्लिम विद्रोह से मार्कोस को मार्शल लॉ की तानाशाही जारी रखने का एक बहाना मिल गया।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणी: नीचे दी गई जगह में प्रश्न का उत्तर लिखें और इकाई के अंत में दिए उत्तर से उसकी जांच कर लें।
1) मुस्लिम समुदाय के प्रति मार्कोस की नीतियों का वर्णन कीजिए।

अमेरिकी सैनिक अड्डे
भूमिका
फिलीपीनी विदेश नीति के निर्धारण में अमेरिकी सैनिक अड्डों की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण कारक रही है। खासकर अमेरिका के संबंधों में इसकी भूमिका अहम रही है।

हाल के सालों में अन्य देशों के साथ फिलीपीन्स के संबंधों में अमेरिका के साथ ‘‘विशेष संबंधों’’ की निर्धारक भूमिका थी। फिलीपीन्स का रवैया अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय नीति से निर्धारित होता था।

सीटों के सदस्य और अमेरिका के सहयोगी के रूप में, इसने सख्त कम्युनिस्ट विरोधी नीति का अनुसरण किया और अपनी भूमिका पर कई अमेरिकी सैनिक अड्डों की स्थापना की अनुमति दी।

अमेरिका के साथ ‘‘विशेष संबंधों’’ के फलस्वरूप पड़ोसी देशों से इसकी घनिष्ठता नहीं हो सकी। अमेरिका के साथ विभिन्न समझौतों के चलते एशिया में इसकी छवि धूमिल हो गई। अमेरिकी दबाव में वियतनाम में सेना भेजने की इसकी कार्यवाही ने क्षेत्र के देशों के साथ इसकी इच्छा की बारंबार घोषणाओं की कलई खोल दी। इसी के चलते चीन के साथ इसके संबंध नहीं बन सके।

1946 से 1969 तक इसकी विदेश नीति अमेरिकी विदेश नीति की जरूरतों के हिसाब से निर्धारित होती रही। ऐसा इसलिए भी था कि दोनों ही देशों के शासक-अभिजातों के हित एक जैसे थे।

 संबंधों के बदलते ढर्रे
अब फिलीपीन्स अमेरिका के साथ ‘‘विशेष संबंधों’’ में बदलाव की कोशिश कर रहा है। मार्कोस के जमाने में भी एशियाई मामलों में भागीदारी के जरिए इसकी एक एशियाई छवि स्थापित करने की कोशिश की जा रही थी। हिंद-चीन क्षेत्र में अमेरिकी पराजयों से अमेरिका के प्रति इसके विश्वास में कमी आई और अमेरिकी सैनिक अड्डों को देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक माना जाने लगा। इसे एहसास होने लगा था कि सुरक्षा और आर्थिक प्रगति के लिए अमेरिका का पिछलग्गू बने रहना ज्ञानप्रद था। फिलीपीन्स ने आसिअन घोषणा की पुष्टि की थी जिसमें कहा गया है, सभी विदेशी अड्डे अस्थाई हैं और संबद्ध देश की सहमति मे ही वहां बने रह सकते हैं एवं उनका उपयोग देश की विकास की गतिविधियों को बाधित करने के लिए नहीं किया जा सकता।’’ मार्शल की घोषणा के पहले से ही बहुत मे फिलीपीनी युवक-युवतियां अमेरिका के साथ शोषण मे यक्त संबंधों के विरोधी थे। अमेरिकी सैनिक अड्डों की उपस्थिति देश की संप्रभुता के उल्लंघन के रूप में देखी जाने लगी थी।

अमेरिका-विरोधी भावनाएं, 1978 में अपने चरम पर पहुंच गईं जब अमेरिका ने सबाह पर फिलीपीनी दावे का समर्थन नहीं किया। फरवरी 1978 को अपनी घोषणा में अमेरिकी सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि वह 1963 में मबाह को मलेशिया के हिस्से के रूप में स्वीकार करने की व्यवस्था का समर्थक है। इस घोषणा ने क्रोध और आश्चर्य की भावना पैदा की। अमेरिका के साथ रक्षा समझौते समाप्त करने की मांग की जाने लगी। देश में एशियाई राष्ट्रवाद की भावनाओं के विकास ने भी अमेरिका विरोधी माहौल पैदा करने में मदद की।

14 मार्च 1947 के सैनिक अड्डा समझौते के तहत फिलीपीन्स ने अमेरिकी सैनिक अड्डों को 11 साल की अनुमति दी थी। तत्कालीन फिलीपीनी शासन अभिजातों को आर्थिक सहायता और सैनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से ऐसा करना आवश्यक लगा था। बाद में ये अड्डे फिलीपीनियों की आमदनी और रोजगार के स्रोत बन गए।

 सैनिक अड्डों से संबंधित वार्ताएं
अमेरिकी अड्डों से संबंधित वार्ताएं सभी राष्ट्रपतियों के कार्यकालों के दौरान चलीं। कई बार तो लगता था फिलीपीनी शासन अमेरिका से अधिक-से-अधिक सहायता प्राप्त करने के शस्त्र के रूप में सैनिक अड्डों के विषय में वार्ताएं चलाता था। एक प्रसिद्ध फिलीपीनी राजनयिक लियोन या गरेटो के अनुसार, फिलीपीनियों को मालूम है कि उन्हें मिलने वाली ‘‘अमेरिका सहायता-सैनिक सहायता, अनुदान और कर्ज-अन्य ऐशियाई देशों, जो जापान की तरह अमेरिका के शत्रु रहे हैं या वे जो अमेरिकी नीतियों के प्रति उदासीन अथवा गैर प्रतिबद्ध हैं, को मिलने वाली अमेरिकी सहायता से कम हैं।’’

उल्लेखनीय है कि मार्कोस एक तरफ इस तरह की वार्ताओं में कठोर रुख अपनाता था, दूसरी तरफ अमेरिकी सैनिक अड्डों की वांछनीयता पर भी जोर देता था। अमेरिकी आकाओं द्वारा अपने शासन की आलोचना से मार्कोस को काफी कष्ट होता था और अमेरिकी शासन पर एक कठपुतली तानाशाह को प्रत्यक्ष देने का आरोप लगाया था। बहुत से प्रमुख अमेरिकी मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर मार्कोस शासन की आलोचना शुरू कर दी थी, खासकर मानवाधिकारों का ढोल पीटने वाले कार्टर प्रशासन के दौरान। मार्कोस ने अमेरिका पर राष्ट्रीय मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया।

 मार्कोस की वैधता का सवाल
लेकिन फिलीपीनी जनमानस की इच्छा के विरुद्ध वियतनामी जनता पर अमेरिकी आक्रमण में सहायता के लिए फिलीपीनी सैनिक भेजने की उसकी हरकत से मार्कोस की विश्वसनीयता समाप्त हो चली थी। मार्कोस शासन और अमेरिका के बीच एक समझौते के तहत क्लार्थ वायु-सेना और सुबिक नौसेना अड्डों को फिलीपीनी कमांडरों के अधीन कर दिया गया। इसका मतलब यह था कि अड्डों के किराए का निर्धारण और अपराधी मामलों पर विचार का अधिकार इन कमांडरों को मिल गया। समझौते का दूसरा पहलू ज्यादा नाजुक था। ज्यादातर सैन्य अधिकारियों को विदेशी नागरिकों का दर्जा प्राप्त था और तमाम फिलीपीनियों के विरुद्ध वे तमाम तरह की अपराधिक गतिविधियां करते थे। फिलीपीनी सरकार उन पर कोई न्यायिक कार्यवाही नहीं कर पाती थी।

जैसा कि उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है, मार्कोस शासन के तीसरे कार्यकाल में भी ये समस्याएं बरकरार रहीं। पाबंदियों के बावजूद लोगों का असंतोष उभर रहा था। मार्कोसविरोधी प्रदर्शनों की खबरें अक्सर सुनने को मिलती थीं। इन प्रदर्शनों में पादरी और धर्मसंधिनियां भी शामिल होने लगीं।

निर्वाचन प्रक्रिया की खिल्ली उड़ाते हुए उसने 1977 में एक जनमत संग्रह कराया जिसमें मतदाताओं से यह पूछा गया था कि क्या वे चाहते थे कि अंतरिम संसद के तहत, मार्कोस राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों पदों पर बना रहे? जैसाकि पहले से ही सर्वविदित था, ‘‘जनमत’’ ने उसके दोनों पदों पर बने रहने का अनुमोदन किया। इसके बाद 7 जलाई 1978 को उसने संसद का चुनाव कराया। अंतरिम राष्ट्रीय संसद में 200 सदस्य थे। इसके 35 सदस्य मार्कोस द्वारा मनोनीत थे। सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास केंद्रित थीं और संसद उसकी अनुमति के बिना कोई कानून नहीं बना सकती थी और मार्शल लॉ भी जारी रहा।

 मार्कोस शासन का अंत
देश की बिगड़नी आर्थिक स्थिति के परिणामस्वरूप लोगों में असंतोष व्याप्त होने लगा। अगस्त 1983 में भूतपूर्व सांसद बेनिग्नो अक्विनो की हत्या के बाद तो पूरे देश में आक्रोश की लहर फैल गई। देश भर में लोग उसकी पत्नी कोरी जाने (कोरी) अक्विनों के नेतृत्व में एकत्रित होने लगे। कार्डिनल सिन की कैथोलिक चर्च ने भी मार्कोस की तानाशाही एवं दमनकारी सरकार के विरुद्ध जन-उभार का समर्थन किया।

अमेरिकी दबाव में जब 7 फरवरी 1986 को चुनाव हुए तो अन्य तानाशाहों की तरह उसे भी उम्मीद थी कि अमेरिकी महाप्रभुओं की कृपा से वह चुनावों में सफलतापूर्वक हेरा-फेरी कर सकेगा। लेकिन इस बार अमेरिकी महाप्रभुओं ने भी अपना दामन झाड़ लिया और जनाक्रोश की आंधी में मार्कोस की सारी हेरा-फेरी धरी रह गई। जनता ने कोरी अक्विनों को राष्ट्रपति चुना। जनाक्रोश की आंधी से बचाने के लिए अमेरिकी आकाओं ने मार्कोस को महल से निकालकर फिलीपीनी जनता से दूर ले जाने के लिए वायुसेना का हेलीकाप्टर भेजा जो इस पराजित तानाशाह और उसके परिवार को उड़ाकर हवाई ले गया। वह अपने पीछे छोड़ गया एक ध्वस्त राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और राजमहल में अपनी बीवी की फिजलखर्ची और ऐययाशी की निशानियां। अखबारों के छापा कि मार्कोस देश को इतना कंगाल और बेहाल करके गया है जितना कि दूसरे विश्वयुद्ध की विनाशकारी गतिविधियों के बाद भी नहीं हुआ था। फिलीपीनी जनता की सफलता इतिहास में तानाशाहों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणादायी घटना बन गई।

कोराजोन अक्विनों का शासन काल: 1986-92
मार्कोस द्वारा ध्वस्त अर्थतंत्र को दुरुस्त करने और राष्ट्र में स्थायित्व लाने के लिए, नवनिर्वाचित कोराजोन अक्विनों ने प्रतिबद्धता से प्रयास करना प्रारंभ किया। इसके लिए उसे व्यापक जनसमर्थन भी मिला। राजनैतिक बंदियों की रिहाई का आदेश जारी किया गया, मार्कोस की राजाज्ञाओं को निरस्त किया गया और लोगों की स्वतंत्रता और अधिकारों को बहाल कर दिया गया। लेकिन अपने पूरे शासन काल में उसे विरोधियों द्वारा खड़ी की गई बाधाओं का सामना करना पड़ा जिससे राष्ट्र-निर्माण में दिक्कतें आईं। उसे 20 साल के मार्कोस शासन का भ्रष्ट प्रशासन और अर्थतंत्र विरासत में मिले थे। विरासत में मिले दक्षिणी फिलीपीन्स के विद्रोह को शांत करने के लिए भी उसे हर संभव प्रयास करना पड़ा।

मार्कोस की विरासत की समस्याएं
अक्विनों प्रशासन के लिए, मार्कोस की विरासत की सबसे चिंताजनक बात, नए राजनैतिक माहौल में सेना की भूमिका को लेकर थी। 1972 से पहले भी फिलीपीनी राजनीति में सेना की प्रमुख भूमिका थी लेकिन मार्शल लॉ की घोषणा के बाद तो वह वहां के राजनैतिक मामलों में खुलेआम हस्तक्षेप करने लगी। आज भी बहुत से ऐसे सैनिक हैं जो मार्कोस शासन काल की ‘‘मधुर‘‘ यादों से आत्मविभोर हो उठते हैं। फरवरी, 1986 में अक्विनों द्वारा सत्ता संभालने के बाद तख्तापलट के छः प्रयास हुए।

अक्विनों शासन को मार्कोस की विरासत के रूप में एक शक्तिशाली कम्युनिस्ट आंदोलन भी मिला। भूमि सुधार के कानून बनाकर मार्कोस ने कुलीन तंत्र को समाप्त करने का शगूफा छोड़ा था। भूमि सुधार के कानून सरकारी फाइलों में पड़े रह गये। इतना ही नहीं मार्कोस के वफादार जमींदारों का एक नया वर्ग भी पैदा हो गया। लोगों का असंतोष और शोषण व्यापक होता गया और मार्कोस की तानाशाही और सामंती शोषण से त्रस्त जनता का एक बड़ा हिस्सा कम्युनिस्ट विद्रोहियों के पीछे एकत्रित हो गया।

नया संविधान
फरवरी, 1987 में एक जनमत संग्रह के व्यापक जनसमर्थन के माध्यम से फिलीपीन्म में एक नया संविधान लागू किया गया। मार्कोस शासन की पीड़ा से मुक्ति के उल्लास में लोग परिवर्तन के लिए उतावले थे। वे जनतांत्रिक परंपराओं के नष्ट होने से भी आहत थे। नया संविधान दरअसल 1935 के ही संविधान का संशोधित रूप है। इस संविधान में मानवाधिकारों की गारंटी का प्रावधान है और राष्ट्रपति के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है। जैसे कि अब कोई भी व्यक्ति छः वर्ष के एक कार्यकाल तक ही राष्ट्रपति पद पर रह सकता है।

बोध प्रश्न 4
टिप्पणी: नीचे दी गई जगह में प्रश्न का उत्तर लिखें और इकाई के अत में दिए गए उत्तर से उसकी जांच कर लें।
1) अमेरिका-फिलीपीन्स संबंधों के निर्धारण में अमेरिकी सैनिक अड्डों की भूमिका का वर्णन कीजिए।

मौजूदा हालात
फिलीपीन्स के मौजूदा हालात वहां के लोगों की एशियाई अस्मिता की इच्छा और अमेरिकी महाप्रभुओं की छत्रछाया के मोह के अंतद्वंद्वों को परिलक्षित करते हैं। इस अंतर्द्वद्ध का इतिहास तो पराना है लेकिन हाल के सालों में इस अंतर्विरोध के समाधान के प्रयास तेज हुए हैं और एशियाई पहचान पर जोर दिया जाने लगा है।

 तात्कालिक समस्याएं
फिलीपीनी सरकार के समक्ष सबसे प्रमख तात्कालिक समस्या लोगों के जीवन स्तर मे सुधार लाने की है। यह दरअसल लगभग सभी एशियाई देशों की सामान समस्या है। इसलिए सभी अपने क्षेत्र को तनाव एवं आपसी टकरावों से मुक्त रखना चाहते है। साथ ही फिलीपीन्स को यह भी एहसास है कि क्षेत्रीय सहयोग की संभावनाए अनन्त है। फिलीपीन्स शासन कम्युनिस्ट-विरोधी रुझान के संगठनों के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग में योगदान का पक्षधर है। आसियन (दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र परिषद) जिसके अन्य सदस्य थाइलेड, मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर और बु्रनेई हैं, का घोषित उद्देश्य, ‘‘क्षेत्र में शांति, स्वतंत्रता और निष्पक्षता’’ की स्थापना करना है। इसके सदस्य राष्ट्रों की सरकारों के बीच क्षेत्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श होता रहता है जिससे विशिष्ट समस्याओं को मदद तो मिलती ही है उनके बीच भाईचारा भी बढ़ता है। वैसे अधिकतर अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर यह संगठन अमेरिकी खंभे की पक्षधरता करता रहा है।

अमेरिका-फिलीपीन्स संबंधों का भविष्य
निकट भविष्य में अमेरिका-फिलीपीन्स संबंधों में किसी मूलभूत परिवर्तन की संभावना नहीं दिखती। सैनिक अड्डों के समझौते की समाप्ति के बावजूद शासक वर्ग के सदस्यो के आर्थिक हित अमेरिका के साथ जुड़े हुए हैं। इसलिए वे आसानी से अमेरिकी दबाव स्वीकार कर लेते हैं। फिलीपीनी अभिजात वर्ग के स्वार्थ, कम्युनिस्ट विरोध एवं अमेरिकी ‘‘कृपा के प्रति उसकी ‘‘कृतज्ञता‘‘ दोनों देशों के बीच मैत्री पूर्ण संबंधों का प्रमुख आधार है।

बोध प्रश्न 5
टिप्पणी: नीचे दी गई जगह में प्रश्न का उत्तर लिखें और इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से उसकी जांच कर लें।
1) फिलीपीनी सरकार और राजनीति की प्रवृत्तियों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

 सारांश
इस इकाई में फिलीपीन्स के इतिहास, भूगोल एवं लोगों के बारे में बताया गया। आपने यहां के राजनैतिक घटनाओं के बारे में भी पढ़ा। इसके अध्ययन के बाद आप फिलीपीनी राजनीति एवं वहां के लोगों के बारे में काफी कुछ जान जाएंगे।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
अबएवा, जोसे वेलोसो आदि (सं.) फाउंडेशन्स एंड डाइनॉमिक्स ऑफ फिलीपीनी गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स, मनीला, 1969.
अगोनसिल्लो, तेवडोरो ए. एवं अन्य, हिस्ट्री ऑफ फिलीपीनों पिपुल, क्वेजोन सिटी, 1970.
अगोनिसल्लो तेवडोरो ए., दि फेटफुल ईयर्स: जैपानिज एडवेन्चर इन फिलीपीन्स क्वेजोन, 1965.
ग्युरेरो, लिओन मा, प्रिजनर्स ऑफ हिस्ट्री, नई दिल्ली, 1972 ,
कौल, मनमोहिनी, दि फिलीपीन्स एंड साउथ ईस्ट एशिया, नई दिल्ली, 1978