गांधी द्वारा आधुनिक सभ्यता की आलोचना | आधुनिक सभ्यता के संबंध में गाँधी की समीक्षा बताइये लिखिए

By   September 8, 2020

आधुनिक सभ्यता के संबंध में गाँधी की समीक्षा या गांधी द्वारा आधुनिक सभ्यता की आलोचना ?
गाँधी पर पश्चिमी प्रभाव
आधुनिक सभ्यता की जो समीक्षा गाँधी ने की थी वह कुछ पश्चिमी रोमांटिक चिंतकों के लेखन से प्रभावित थी। आधुनिक विज्ञान एवं चिकित्सा-शास्त्र के प्रति गाँधी का जो आलोचनात्मक रवैया था, वह मुख्यतः ऐडवर्ड कारपेन्टर की पुस्तक श्सभ्यता: कारण एवं निवारण’’ से प्रभावित था। इसी प्रकार लियो टौल्सटौय की अवधारणा, ‘‘ईश्वर का साम्राज्य तुम्हारे अन्दर है’’ का भी गाँधी के चिन्तन पर काफी प्रभाव पड़ा। विशेषकर आधुनिक राज्य के दमनकारी चरित्र एवं अहिंसक । प्रतिरोध के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर टौल्सटौय के विचारों का गहन असर है। गाँधी ने यह स्वीकार किया था कि टोल्सटोय को पढ़ने से उन्हें सार्वभौम प्रेम की अनन्त संभावनाओं का अहसास हुआ और अहिंसा में उनका विश्वास दृढ़ हुआ। गाँधी और टौल्सटौय में पत्र-व्यवहार था। गाँधी को लिखे अपने अन्तिम पत्र में टौल्सटौय का मानना था कि दक्षिण अफ्रीका में गाँधी का सत्याग्रह आन्दोलन शोषितों के मुक्ति संघर्ष की एक नयी प्रविधि साबित हुआ। ट्रांसवाल में गाँधी की गतिविधियाँ टौल्सटौय को ‘‘विश्व में महत्वपूर्ण हो रहे सभी कार्यों में सर्वाधिक अनिवार्य’’ जान पड़ी थी।

गाँधी थोरू के लेखन से भी प्रभावित थे। थोरू के निबंध ‘‘आन दी ड्यूटी ऑफ सीविल डीसओबेडियेंस’’ से गाँधी के कुछ विचारों की पुष्टि हुई, राज्य की दमनकारी विशेषताओं एवं व्यक्ति के स्वयं अपने अन्तःकरण के प्रति अपने दायित्व है, इसकी पुष्टि हुई। गाँधी ने लिखा कि .. ‘‘हमें अपने संघर्ष के पक्ष में थोरू और रस्किन से दलीलें मिल सकती हैं’’।

जान रस्किन की ‘‘अन टू दिस लास्ट’’ भी एक ऐसी कृति थी जिससे गाँधी जी को प्रेरणा मिली थी। स्वार्थ के राजनैतिक अर्थतंत्र के तथाकथित विज्ञान की जो नैतिक आलोचना रस्किन ने की थी, उसने गाँधी की जिन्दगी को तत्काल ही रूपांतरित कर दिया। रस्किन की पुस्तक का गाँधी जी ने ‘‘सर्वोदय’’ के नाम से अनुवाद किया। इस पुस्तक से गाँधी को तीन सीखें प्राप्त हुयीं-1) सबों की भलाई में ही एक व्यक्ति की भलाई है. 2) किसी विधि ज्ञाता के काम का भी उतना ही महत्व है जितना कि किसी नाई के काम का और सबों को अपने काम के द्वारा जीवन-यापन करने का समान अधिकार है और 3) श्रम का जीवन, यानी जमीन जोतने वाले का जीवन, कारीगर का जीवन एक सार्थक जीवन है।

सच्ची सभ्यता का अर्थ
सच्ची सभ्यता की परिभाषा गाँधी ने ‘‘हिन्द स्वराज’’ में यूं दी है, ‘‘सभ्यता आचार की वह विधि है, जो व्यक्ति को कर्तव्य का पथ बतलाती है। कर्त्तव्य पालन और नैतिकता का पालन परिवर्तनीय पद हैं। नैतिकता पालन का अर्थ है, भावों और अपने मन के ऊपर काबू प्राप्त करना। ‘‘सभ्यता’’ शब्द के गुतराती पर्याय का अर्थ है, ‘‘भला आचरण’’।

गाँधी आगे स्पष्ट करते हैं कि सचमुच सभ्य आचरण का अर्थ है-1) अपनी आवश्यकताओं को ’कम करना, 2) जीवन क्षय करने वाली प्रतियोगिताओं की अवहेलना करना, 3) ऐसी स्थितियों को रोकना जिसमें लूट, वेश्यावृत्ति जैसी बुराइयाँ पनपती हों, 4) ऋषियों एवं फकीरों को राजा के ऊपर ज्यादा विशेष रियायत प्रदान करना और 5) दानवी शक्तियों को आत्मा की शक्तियों के वश में रखना। दूसरे शब्दों में, अपने राजनैतिक और सामाजिक कार्यकलापों को नैतिकता और नीतिशास्त्र के सिद्धांतों के मेल में रखना और यह सिद्धांत-सत्य और अहिंसा के सिद्धांत हैं।

गाँधी के विभिन्न अवसरों पर यह दुहराया था कि मनुष्य को जो यह नैतिक आचरण करने की शक्ति है, वही उसे पशुओं से उच्च स्थान दिलाती है और इसीलिए मानव सभ्यता की प्रगति को नैतिकता के स्केल से मापना होगा, न कि शुद्ध भौतिकतावाद, उपयोगितावाद या पशु बलों के प्रतिमानों से। निष्कर्षतः गाँधी ने लिखा था कि सच्ची सभ्यता का पथ हिंसा का पथ नहीं है। पृथ्वी के कमजोर प्रजातियों के शोषण का पथ नहीं है। शद्ध स्वार्थ एवं पाश्विक शक्तियों का रास्ता सभ्य आचरण का नहीं, बल्कि ठीक इसके विपरीत आचरण की ओर ले जाता है।

आधुनिक सभ्यता की समीक्षा
गाँधी ने आधुनिक सभ्यता का विरोध इसलिए नहीं किया था कि वह पश्चिमी या वैज्ञानिक थी, बल्कि इसलिए कि वह अपनी प्रकृति में भौतिकतावादी एवं शोषणपरक थी। सन् 1925 में। कलकत्ता के मेकानो क्लब में बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था, ‘‘आप ऐसा एक क्षण के लिए न सोचें कि जो भी पश्चिमी है, मैं उन सबका विरोध करता हूँ। इधर कुछ दिनों से मैं आधुनिक सभ्यता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरित्र पर विचार करता रहा हूँ, लेकिन इसे आप पश्चिमी सभ्यता न कहें। आधुनिक सभ्यता की सर्वमान्य विशेषता है, इस पृथ्वी पर कमजोर प्रजातियों का शोषण, ईश्वर के स्थान पर भौतिकतावाद’’ का प्रतिष्ठापन। मैं इसके लिए ‘‘शैतान’’ शब्द का प्रयोग करता है, जिस सरकार के अन्दर हम लोग काम कर रहे हैं, उसकी प्रणाली को मैं शैतान (पैशाचिक) कहने में भी नहीं हिचकंगा’’।

विज्ञान और यंत्र प्रणाली पर
गाँधी ने कई अवसरों पर स्पष्ट किया था कि वे विज्ञान या यंत्र-प्रणाली के विरुद्ध नहीं हैं। विज्ञान की प्रगति का विरोध करने के बजाय उन्होंने पश्चिम की आधुनिक वैज्ञानिक भावना की प्रशंसा की थी और कहा था कि ‘‘इस संसार को उस सब की बहत जरूरत है, जो पश्चिमी राष्ट्रों ने विज्ञान के क्षेत्र में विकसित की है’’। पश्चिमी, ज्ञानोदयोत्तर (पोस्ट इनलायट्नमेंट) आधुनिकता की सबसे बड़ी गलती गाँधी के अनुसार यह थी कि यह पृथ्वी की कमजोर प्रजातियों के शोषण पर टिकी थी और दूसरे, विज्ञान और मानवतावाद के नाम पर सृष्टि की निम्न श्रेणियों को नष्ट कर रही थी। गाँधी कहते थे कि आधुनिक सभ्यता मनुष्य की एक गलत अवधारणा पर आधारित है, जो मनुष्य को उपयोगिताओं का सीमाहीन उपभोक्ता, शरीर-केन्द्रित एवं भौतिकतावादी बनाती है। मनुष्य की ऐसी अवधारणा उसके आध्यात्मिक या नैतिक मूल्यों पर इन्द्रियगत या भौतिकतावादी जरूरतों को प्रतिष्ठित करती है। यह व्यक्ति को एक पूर्णतया स्वतंत्र, स्वकेन्द्रित अणु के रूप में देखती है, जिसका कोई नैतिक या आध्यात्मिक दायित्व नहीं है।

एक आधुनिक या आधुनिकतावादी व्यक्ति उपयोगी वस्तुओं का अन्नत उपभोक्ता के रूप में, औद्योगिक या यांत्रिक उत्पादन की ऐसी वस्तुओं की शरण लेता है, जो तात्कालीक उपयोग के लिए नहीं होती हैं, बल्कि शहर और गाँव, उपनिवेश और महानगर के बीच विनिमय के लिए होती हैं। हम विनिमय में गाँव और उपनिवेश की कीमत पर शहर और महानगर को फायद मिलता है। गाँधी का कहना था कि ‘‘बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण होने से प्रतियोगिता’’ और ‘‘बाजार’’ स्थापित होंगे, जिसकी अनिवार्य परिणति होगी ग्रामीणों का सक्रिय या निष्क्रय शोषण’’। एक दूसरे अवसर पर गाँधी ने लिखा था, ‘‘यूरोपीय लोग नये उपनिवेशों पर इस प्रकार से झप्पटा मारते हैं. जैसे कौआ माँस के टुकड़े पर मारता है। मैं यह सोचने के
लिये मजबूर हँू कि ऐसा बहुउत्पादन वाले कारखानों की वजह से है’’। ‘‘हिन्द स्वराज’’ में भी उन्होंने लिखा था, ‘‘जब मैंने श्री दत्त लिखित ‘‘भारत का आर्थिक इतिहास’’ पढ़ा तो रो पड़ा और जब भी मैं इसके बारे में सोचता हूँ तो दिल डूबने लगता है। यह यंत्र-प्रणाली ही थी जिसने भारत को दरिद्र बनाया। हम लोगों को मैनचेस्टर ने कितना नुकसान पहुँचाया, इसको मापना असम्भव है। मैनचेस्टर की वजह से ही भारतीय हस्तशिल्प लुप्त हो गया’’।

गाँधी जी कहते थे कि आधुनिक सभ्यता हमारे ‘‘शारीरिक सुख-साधनों’’ को बेहतर घर, बेहतर वस्त्र, बेहतर यातायात, यांत्रिक उत्पादनों आदि के सहारे बढ़ाने का प्रयत्न करती है, जबकि ये साधन लोगों की जिन्दगी में खुशियाँ लाने में असफल सिद्ध हुये हैं। उलटे इन्होंने बड़े पैमाने पर बड़ी कुशलता से जीवन को नष्ट किया, श्रमिकों को अमानवीय बनाया और नयी-नयी बीमारियाँ फैलायीं। गाँधी लिखते हैं, ‘‘पहले मनुष्य शारीरिक बाध्यताओं की वजह से गुलाम बना था, लेकिन अब गुलाम है पैसे के लोभ की वजह से और विलासिता की वस्तुओं की वजह से, जिसे पैसा खरीद सकता है। अब ऐसी बीमारियाँ पैदा हो गई हैं, जिनके बारे में पहले लोगों ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। …यह सभ्यता न धर्म की परवाह करती है, न नैतिकता की… यह सभ्यता शारीरिक सुख-सुविधाओं को बढ़ाना चाहती है, लेकिन इसमें भी यह बुरी तरह असफल सिद्ध हुई है। किसी भी तरह की नैतिकता और नीति से विच्छिन्न होकर आधुनिक मनुष्य, स्वार्थ, लोभ, प्रतियोगिता, शोषण, पाशविक शक्ति, हिंसा का खुला खेल खेलने के लिए छोड़ दिया गया है। आधुनिक मनुष्य को दूसरे लोगों को जीतने या उसे उपनिवेश बनाने में कोई नैतिक या आध्यात्मिक कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता है। गाँधी के लिए साम्राज्यवाद या फासीवाद आधुनिक सभ्यता के पाशविक चरित्र का सिफ राजनीतक अभिव्यक्ति थी।

राजनीति से नैतिकता का पृथक्करण
गाँधी जी के आक्रमण का यह एक केन्द्रीय लक्ष्य था। आधुनिक या उदारपंथी लोग व्यक्ति के निजी और उसके सार्वजनिक या राजनैतिक जिन्दगी में फर्क करते हैं। ऐसा प्रायः मान लिया जाता है या अपेक्षित होता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में नैतिकता या आध्यात्मिक मूल्यों के सहारे नहीं, बल्कि, व्यावहारिकता और इष्ट साध्यता के सहारे काम किया जाता है। इस प्रकार आधुनिक राजनैतिक संस्थाएँ या राजनैतिक प्रतिनिधि नैतिक रूप से तटस्थ, व्यावहारिक यंत्र भर होते हैं।

गाँधी के अनुसार, नैतिकता और आध्यात्मिकता से विच्छिन्न इस आधुनिक राजनीति को धनी एवं मजबूत लोग राजनीतिक प्रणाली और इसके सरकारी तंत्र को गरीब एवं कमजोर लोगों की कीमत पर अपने फायदे की ओर मोड़ लेते हैं। गाँधी का कहना था कि राज्य की तथाकथित तटस्थता और कानूनी रूप से समानता की वैधानिक कहानी सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को ही बनाए रखती है। इन असमानताओं और सामाजिक विभाजनों को अक्सर राजनीतिज्ञ, नौकरशाह एवं वकील ही बनाते हैं और बढ़ाते हैं। कानून के आधुनिक पेशे की आलोचना करते हुए गाँधी का कहना था कि लोगों के बीच झगड़े सुलझाने के बजाय वकील इन झगड़ों को और बढ़ाते हैं। गाँधी लिखते हैं कि ‘‘मैं यह जानता है कि ये वकील लोगों के बीच झगड़ा होने पर खुश होते हैं। कुछ वकील झगड़ा करवाते भी हैं। इसी प्रकार औपनिवेशिक राज्य जो सामाजिक विभाजन और जातिगत विभेदीकरण के प्रति तटस्थता की वकालत करते हैं, वास्तव में, ऐसे विभाजन एवं विभेदीकरण को मजबूत करते हैं।

संसद के बारे में
गाँधी ने आधुनिक प्रजातंत्र की केन्द्रीय संस्था, संसद की तुलना बाँझ औरत से की थी जो अपनी इच्छा से काम नहीं करती, बल्कि, सिर्फ बाहरी दबाव में ही काम करती है। इन्होंने इसकी तुलना वेश्या से भी की थी, क्योंकि यह हमेशा मंत्रियों के नियंत्रण में रहती है, जो समय-समय पर बदलते रहते हैं। आगे वे लिखते हैं, ‘‘ऐसा सामान्यतयाः माना जाता है कि संसद सदस्य पाखंडी एवं स्वार्थी होते हैं। सभी अपने छोटे-छोटे हितों की सोचते हैं। सदस्य बिना सोचे ही अपनी पार्टी को संसद में वोट देते हैं। तथाकथित अनुशासन ही उन्हें बाँधे रखता है। अपवाद स्वरूप अगर कोई संसद सदस्य स्वतंत्र वोट करता है, तो उसे विश्वासघाती मान लिया जाता है। ‘‘प्रधानमंत्री संसद के कल्याण से ज्यादा अपनी शक्ति के लिए चिंतित रहता है। उसकी ऊर्जा पार्टी की सफलता प्राप्त कराने में ही लगी रहती है। उसे यह चिन्ता नहीं रहती है कि संसद को सही काम करना चाहिए। ‘‘अगर वे ईमानदार माने जाते हैं तो इसलिए क्योंकि वे वह नहीं लेते जिसे सामान्यतयाः घूस माना जाता है। लेकिन कुछ दूसरी प्रभावी विधियाँ भी हैं। वे अपने हित साधनों के लिए लोगों को पुरस्कार एवं सम्मान के रूप में घूस देते हैं। मैं यह कहने को मजबूर हूँ कि वे न तो सच्चे ईमानदार हैं और न ही उनकी अन्तरात्मा जीवित है’’।

गाँधी के अनुसार, आधुनिक सभ्यता से नैतिकता के विच्छिन्न हो जाने का सबसे बुरा परिणाम आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र में देखा जा सकता है, जो बीमारी दूर करने के बजाय उसे और बढ़ाता है। वे लिखते हैं, ‘‘मैं ज्यादा खाता हूँ। मुझे अपच है। मैं डॉक्टर के पास जाता हूँ। वह मुझे दवाई देता है। मैं ठीक हो जाता हूँ। मैं दुबारा फिर ज्यादा खाता हूँ। मैंने दुबारा उसकी दवाई खायी। अगर

कुछ लोगों द्वारा सत्ता अधिग्रहण कर लेने पर नहीं आएगा, बल्कि, यह तब आएगा, जब पूरी जनता में इतनी ताकत आ जाये कि जब भी कोई सत्ता का दुरुपयोग करे, तो उसका विरोध कर सकें।’’ दूसरे शब्दों में, स्वराज जनता को शिक्षित करके ही लाया जा सकता है। जनता शिक्षित होने पर ही सत्ता को नियंत्रित करने की क्षमता प्राप्त कर सकती है।

आधुनिक सभ्यता और स्वराज पर गाँधी के संशोधित विचार
गाँधी जी ने आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के कुछ मूल्यों एवं संस्थाओं की जो नैतिक भर्त्सना की थी उसका स्वर हिन्द स्वराज के प्रकाशन के एक दशक बाद कुछ कोमल हो गया था। समय के साथ-साथ उनके विचार में भी कुछ तब्दीली आयी। अब वे पहले की तरह आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को पूरी तरह से खारिज करने के बजाय इसकी कुछ संस्थाओं की सीमित प्रशंसा करने लगे, विशेषकर संसदीय प्रजातंत्र, संविधान केन्द्रित सरकार, वैज्ञानिक दृष्टि, तकनीकी आविष्कार की गाँधी प्रशंसा करते थे।

आधुनिक उदारतावाद द्वारा नागरिक स्वाधीनता की चिरकालिक प्रशंसा
यह जरूर स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिन्द स्वराज लिखने के समय भी गाँधी ने आधुनिक उदारतावाद में नागरिक स्वतंत्रता के लिए जो प्रतिबद्धता थी, उसकी खुल कर प्रशंसा की थी। 1903 में ही गाँधी भारतीयों की नागरिक स्वतंत्रता के लिए दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष कर चुके थे। सन् 1920 तक वे इस सुधारवादी उदारतावाद के लिए गर्व महसूस करते थे, लेकिन इसके बाद अपनी स्वराज की अवधारणा के कारण संविधानवादी सरकार और संसदीय प्रजातंत्र के कटु आलोचक हो गए। उन्होंने तो यहाँ तक कहा था कि वे संविधान बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते हैं, क्योंकि यह आदर्श स्वराज के अनुकूल नहीं है। यद्यपि जवाहरलाल नेहरू एवं चितरंजन दास के प्रभाव में अपने विचारों और आदर्शों को गाँधी ने बाद में संशोधित किया था। अब वे आदर्श स्वराज के लिए संसदीय प्रजातंत्र तथा संविधान केन्द्रित सरकार को महत्वपूर्ण मानने लगे थे। इसी के अनुकूल उन्होंने संविधान सभा को ‘‘रचनात्मक सत्याग्रह’’ घोषित किया था। संसदीय प्रजातंत्र के बारे में उन्होंने हिन्द स्वराज के 1921 वाले संस्करण की भूमिका में लिखा,: ‘‘मैं यहाँ पाठकों को सचेत करना चाहूँगा कि जिस स्वराज की बात इस पुस्तक में की गई है, मुझे पता है, उसके लिए भारत अभी तैयार नहीं है। ऐसा कहना दुर्बलता का सूचक हो सकता है, । लेकिन यह मेरा दृढ़ विश्वास है। जैसे कि इस पुस्तक में तस्वीर खींची गई है, मैं ‘‘स्वशासन‘‘ के लिए काम कर रहा हूँ, लेकिन मेरी सामूहिक गतिविधियाँ भारतीय जनता के इच्छानुसार संसदीय स्वराज प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प है। मैं रेलवे या अस्पताल को नष्ट करने के उद्देश्य से काम नहीं कर रहा हूँ, जबकि ऐसा होने का मैं निश्चित रूप से स्वागत ही करूँगा। न रेलवे न हस्पताल उच्च एवं शुद्ध सभ्यता के प्रतिमान हैं। ये तो अनिवार्यतः अनिष्टकारी हैं। ये राष्ट्र की नैतिकता को एक इंच भी ऊपर नहीं उठाते हैं। मैं कानूनी कचहरियों को भी स्थायी रूप से नष्ट करने के उद्देश्य से काम नहीं कर रहा हूँ, जबकि यह कितना अमानवीय है, यह मुझे पता है। मैं यंत्र-प्रणाली एवं कारखानों को भी नष्ट करने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। इन सबके लिए जिस आदमी एवं त्याग की जरूरत है, अभी जनता उसके लिए तैयार नहीं है।

इन संशोधनों को दुहराते हुए गाँधी जी ने 1924 में लिखा, ‘‘यह याद रखना आवश्यक है कि पुस्तक में जिस भारतीय गृह शासन का चित्रण हुआ है, उसे मैं भारत के लिए आदर्श नहीं मानता । हूँ। मैं भारत के सामने संसदीय यानी प्रजातंत्रीय स्वराज का ढाँचा रख रहा हूँ। मैं सभी कल-कारखानों को नष्ट कर देने की सलाह नहीं देता है, बल्कि चरखा को ही एक महामशीन बना रहा हूँ। भारतीय होमरुल एक आदर्श राज्य का चित्रण करता है ‘‘अगर मैं उन आदर्श स्थितियों तक नहीं पहुँच सकता तो यह मेरी अपनी कमजोरियों हैं‘‘ मैंने जो हस्पताल के लिए कहा है, वह भी सच है, लेकिन फिर भी मैं उनकछ दवाईयों को लेने में संकोच नहीं करूँगा जिससे अपने । शरीर को ज्यादा तरजीह देने की जरूरत न पड़े।

गाँधी राज
आधुनिक सभ्यता और स्वराज के बारे में अधिक सारगर्भित एवं संशोधित विचार गाँधी ने एक पुस्तिका में प्रस्तुत किये थे, जिसमें हिन्द स्वराज को ‘‘गाँधी राज’’ कह कर उपहास किया गया था। उनका कहना था, ‘‘गाँधी राज एक आदर्श स्थिति है लेकिन स्वराज के अन्तर्गत कोई रेलवे, हस्पताल, कल-कारखाने, सेना, कानून, कचहरी न होगा, ऐसा कोई ख्वाब नहीं देखता है। निस्सन्देह मैं ऐसा स्वप्न नहीं देखता हूँ। इसके विपरीत रेलवे तो होगी, लेकिन वह सिर्फ सेना और भारत के आर्थिक शोषण की निमित्त नहीं होगी, बल्कि वह आन्तरिक व्यापार को बढ़ाने की निमित्त बनेगी, वह तीसरे दर्जे के यात्रियों को ज्यादा सुख-विधाएँ प्रदान करेगी। स्वराज के अन्तर्गत कोई बीमारी का अस्तित्व तक नहीं रहेगा, ऐसा कोई नहीं मानता है, इसलिए निस्सन्देह हस्पताल रहेंगे लेकिन यह हस्पताल दुर्घटनाग्रस्त लोगों की सेवा के लिए होंगे, न कि स्वपोषित बीमारियों के लिए। कल-कारखाने चरखे के रूप में होंगे जो निस्सन्देह यंत्र-प्रणाली का एक खूबसूरत नमूना है, लेकिन इसमें मुझे सन्देह नहीं कि स्वराज के अन्तर्गत कई कारखाने विकसित होंगे, पर ये जनता के फायदे के लिए होंगे न कि आजकल के कारखाने की तरह जिसमें सामान्य जनता को कोई भी फायदा नहीं पहुँचता है। मैं नौसेना के बारे में नहीं जानता लेकिन मैं जानता हूँ कि भविष्य में भारतीय सेना दूसरे देशों को पराधीन बनाने के लिए भाड़े के सैनिकों का प्रयोग नहीं करेगी, बल्कि इसकी संख्या में बेतरह कटौती की जाएगी और इसका मुख्य काम भारत को सुरक्षित रखना मात्र होगा। स्वराज के अन्तर्गत कानून और कचहरी भी होंगे, लेकिन ये जनता की स्वतंत्रता के रक्षक होंगे, न कि जैसा कि आज है, नौकरशाहों के हाथ के यंत्र भर जिन्होंने पूरे देश को नपुंसक बना कर छोड़ दिया है। अन्त में यह लोगों के लिए वैकल्पिक होगा कि वे लंगोटी पहनते हैं या नहीं, या वे खुले में सोते हैं या नहीं, लेकिन मैं यह आशा कर सकता हूँ कि यह आज की तरह अनिवार्य नहीं होगा जहाँ लाखों करोड़ों की संख्या में जनता को अपने भूखे-नंगे शरीर को ढंकने के लिए गंदा चिथड़ा एवं सोने के लिए खुले आकाश के अलावा कुछ भी नसीब नहीं। इसलिए यह सही नहीं है कि भारतीय होमरूल में अभिव्यक्त कुछ विचारों को उसे सन्दर्भ से हटाकर इसका उपहास करते हुए लोगों के सामने ऐसे रखा जाये कि जैसे मैं किसी भी व्यक्ति की स्वीकृति के लिए उपदेश दे रहा था।

बोध प्रश्न 5
टिप्पणी: 1) उत्तर के लिए रिक्त स्थानों का प्रयोग करें।
2) अपने उत्तर का परीक्षण इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से करें।
1) गाँधी राज से आप क्या समझते हैं?
2) आधनिक सभ्यता की अपनी आरम्भिक समीक्षा को गाँधी ने क्यों संशोधित किया?