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आदि ग्रंथ की रचना किसने की , आदी ग्रन्थ साहिब में किन की वाणी को सम्मिलित नहीं किया गया आदि ग्रंथ का इतिहास क्या है ?

सिक्ख साहित्य
सिक्ख धर्म या सिक्खवाद 15वीं शताब्दी में स्थापित अपेक्षाकृत एक नया धर्म है। यह गुरु नानक की शिक्षाओं पर आधारित है। सिक्ख धर्म की मान्यताएं और दर्शन पवित्रा ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब में लिखी गई हैं। गुरबानी सिक्ख गुरुओं की रचना है। इसमें भजन और गुरु ग्रंथ साहिब है।
सिक्ख धर्म से संबंधित महत्वपूर्ण साहित्यिक रचनाएं हैंः
आदि ग्रंथः 1604 में पांचवे गुरु अर्जुन देव के तत्वावधान में भाई गुरदास द्वारा इसका संकलन किया गया था। इसे गुरुमुखी लिपि में लिखा गया है। यह ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब का पूर्ववर्ती है। इस ग्रंथ में सिक्ख गुरुओं के साथ-साथ भक्ति और सूपफी परंपराओं के 15 भगतों की शिक्षाएं सम्मिलित हैं।
गुरु ग्रंथ साहिबः दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के तत्वाधान में 1678 में आदि ग्रंथ का आगे और विस्तार किया गया। इसका सिक्खों में बहुत सम्मान है। इसे सिक्खों का ग्यारहवां और अंतिम आध्यात्मिक प्राधिकार माना जाता है।
इसे गुरुमुखी लिपि में और ‘संत भाषा’ नामक भाषा में लिखा गया है। संत भाषा में विभिन्न भाषाओं जैसे पंजाबी, अपभ्रंष, हिंदी, ब्रज, संस्कृत, खड़ीबोली और फारसी के शब्द हैं।
इस ग्रंथ में तेरह भक्ति संतों की शिक्षाएं सम्मिलित हैं, जिन्हें ‘भगत’ कहा जाता था, जैसे रामानंद, नामदेव, रविदास, परमानंद, सैन, सूरदास आदि और दो मुस्लिम भगत-कबीर और बाबा फरीद।
दशम ग्रंथः माना जाता है कि गुरु गोबिंद सिंह (दसवें गुरु) द्वारा लिखित भजन इस पुस्तक में संकलित किए गए हैं, हालांकि कई लोग इससे सहमत नहीं हैं। इनमें दंतकथाएं और पौराणिक कहानियाँ हैं। इस ग्रंथ के कुछ भजन ‘नित-नेम’ नामक दैनिक प्रार्थना में अर्पित किए जाने वाले माने जाते हैं।
जनमसखियांः इन ग्रंथों में पहले गुरु, गुरु नानक की पौराणिक और अतिरंजित कहानियां हैं। सबसे लोकप्रिय ग्रंथ ‘भाई बाला जनमसखी’ है। अन्य मेहरबान जनम सखी और आदि जनम सखी हैं।

संस्कृत की भूमिका
ऽ यह विश्व में सबसे पुरानी अभिलिखित भाषाओं में से एक है और इसने वैदिक/भारतीय सभ्यता की निरंतरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ऽ संस्कृत कई इंडो-आर्यन भाषाओं की जननी रही है जिन्होंने इसके व्याकरण आधार और शब्दावली से बहुत कुछ ग्रहण किया है।
ऽ धर्मशास्त्र और मनुस्मृति की भांति संस्कृत में लिखित कई ग्रंथ उन अनेकानेक कानूनों के आधार का निर्माण करते हैं जिनका आज भी हमारे देश में पालन किया जाता है।

द्रविड़ साहित्य
इस खंड में चार प्रमुख द्रविड़ भाषाओंः तमिल, कन्नड़, तेलुगू और मलयालम, का साहित्य सम्मिलित है। इन चारों भाषाओं में तमिल को सबसे पुरानी मानी जाती है और माना जाता है कि संस्कृत के बहुत निकट है विशेष रूप से व्याकरण और शब्दों को उधार लेने के संबंध में। तमिल में सबसे प्रसिद्ध साहित्य शास्त्राीय रचनाएं या संगम साहित्य है।

तमिल (संगम) साहित्य
‘संगम’ का अर्थ भातृत्व होता है और यह साहित्य लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय था। यह साहित्य ऐसी रचनाओं का संग्रह है जिसमें लगभग 2381 कविताएं सम्मिलित हैं, जिसके लिए 473 कवियों को श्रेय दिया जाता है और गुमनाम बने रहने वाले 102 कवियों द्वारा लिखित साहित्य का कोष भी है। कवियों में समाज के विभिन्न वर्गों के पुरुष और महिलाएं सम्मिलित थीं। साहित्यिक परंपरा इतनी अध्कि लोकप्रिय थी कि 300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच की अवधि को प्रायः संगम काल कहा जाता है, जिस अवध् िके दौरान इनमें से अध्कितर की रचना और संकलन किया गया था।
संगम साहित्य की दो प्रमुख शैलियां हैंः
ऽ अहम/अगम यह ‘भीतरी क्षेत्रा’ है और प्रेम, यौन संबंध, आदि जैसे मानवीय पहलुओं की अमूर्त चर्चा पर केंद्रित है
ऽ दूसरी शैली ‘पुरम’ या ‘बाहरी क्षेत्र’ है जिसमें सामाजिक जीवन, नैतिकता, वीरता, रीति-रिवाजों आदि जैसे मानवीय अनुभवों की चर्चा की गई है
यह साहित्य ‘संगम’ नाम धारण करता है क्योंकि पांड्य राज्य ने ऐसी सभाओं का आयोजन किया जिसमें दक्षिण भारत के विभिन्न भागों से कवि, चारण और लेखक समवेत होते थे। इन सभाओं को ‘संगम’ कहा जाता था और इन सभाओं की अवधि में निर्मित साहित्य संगम साहित्य कहलाता है। 600-700 वर्षों की अवध्किे दौरान तीन संगमों का आयोजन किया गया था। हालांकि, पहले दो संगमों का निर्णायक ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं हैं। कई विद्वानों द्वारा पहले और दूसरे संगम किंवदंती और मिथक माने जाते हैं।
तीन प्रमुख संगम आयोजित किए गए थेः

यह देखना भी मजेदार है कि निवर्तमान संगम साहित्य में कविता की लगभग 30, 000 पंक्तियां हैं जो एट्टुटोकोई नामक आठ संग्रहों में व्यवस्थित हैं। आगे ये दो और समूहों में विभाजित हैं पुराना और ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक प्रासंगिक समूह पतिनेन्किल कनक्कू (अठारह निम्न संग्रह) और दूसरा पत्तुपत्तुस (दस गीत) कहलाता है।
अत्यधिक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित तमिल संत तिरूवल्लूर ने संगम साहित्य में ‘कुरल’ का योगदान दिया था। अब इसका कई भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है और यह महाकाव्य, राजनीति-शासन और प्रेम के विषय में चर्चा करने वाले तीन भागों में विभाजित है। संगम साहित्य में योगदान देने वाली एक अन्य प्रसिद्ध महिला संत अव्वइयर हैं।
संगम साहित्य के अतिरिक्त, तमिल में लिखित कई अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ भी हैं। तमिल व्याकरण और कविता की बारीकियों पर प्रकाश डालने के लिए तोलकाप्पिम् की रचना की गई थी। जुड़वां संस्कृत महाकाव्य रामायण और महाभारत की भांति, तमिल में भी छठी शताब्दी ईस्वी में लिखे गए दो प्रमुख ग्रंथ हैं अर्थात्, इलंगो आदिगाल द्वारा लिखा गया शिलप्पादिकारम् (पायल की कहानी) और दूसरा ग्रंथ सत्त्नार द्वारा लिखित मणिमेखलाई (मणिमेखलाई की कहानी) है। ये ग्रंथ तमिल समाज और उन आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों पर केंद्रित हैं जिसका यह अनुभव कर रहा था।
अंतिम मोड़ प्रारंभिक मध्यकाल के दौरान तब आया जब वैष्णव भक्ति भावनाओं ने तमिल साहित्य को रंगना प्रारंभ किया। सातवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच रचित ग्रंथ प्रकृति में अत्यधिक भक्तिमय है। तमिल भाषी क्षेत्रों में, ईश्वर की भक्ति में डूबे बारह अल्वारों या संत कवियों ने अनेक ग्रंथों की रचना की। अल्वार संतों में से एक अंडाल नामक महिला थी। इसे उस समय की स्त्री जाति का आगे की दिशा में कदम माना जाता था। एक अन्य महत्वपूर्ण भक्ति समूह नयनारों या शिव की प्रशंसा में गाने वाले लोगों का था। इनके अतिरिक्त, धर्मनिरपेक्ष तमिल लेखन में पेरियपुराणम और कम्बरामायणम् नामक दो प्रमुख कविताएं बहुत लोकप्रिय थीं।

पारसी साहित्य
पारसीवाद, फारसी पैगंबर जोरोस्टर या जरथ्रुस्त की शिक्षाओं से विकसित धर्म को संदर्भित करता है। पारसीवाद का फारस के इतिहास, संस्कृति, और कला और साथ ही साथ अन्य धर्मों के विकास पर प्रभाव पड़ा है। विद्वानों के अनुसार, पारसीवाद स्वर्गदूतों, न्याय के दिन, राक्षसी व्यक्ति, और अच्छाई और बुराई की शक्तियों के बीच लड़ाई में विश्वास करने वाला पहला धर्म था।
ईरान में ससानिद साम्राज्य के शासन के दौरान, यह धर्म सुधारों से गुजरा और बहुत सारे ग्रंथ लिखे गए और उनकी पुनः व्याख्या की गई।
सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ अवेस्ता कहा जाता है, जो धार्मिक मान्यताओं, प्रथाओं और निर्देशों से संबंधित एक समयावधि के दौरान लिखित और संकलित विभिन्न ग्रंथों का संग्रह है। इसे अवेस्ताई भाषा में लिखा गया था जो अब विलुप्त हो गई है। यह संस्कृत के समान थी।
ईरान के ससानियन शासन के दौरान, संभवतः चैथी शताब्दी ईस्वी में अंतिम रूप से इसका संकलन किया गया था।
अवेस्ता में, यस्नों का संग्रह है। इसमें 72 अध्याय हैं और यह बहुत महत्वपूर्ण है। इनमें से, पांच अध्याय ‘गाथा’ जिसमें 17 श्लोक सम्मिलित हैं, सबसे सम्मानित हैं, जिन्हें स्वयं जोरोस्टर द्वारा लिखा माना जाता है। यस्न, इस धर्म की सबसे महत्वपूर्ण धर्मक्रिया है।
अवेस्ता के अन्य भाग विस्पेरद, विस्पेरद, यष्टी, सिरोज, न्यायेशस आदि हैं।
अवेस्ता के अतिरिक्त कुछ अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ हैंः
ऽ डेनकार्डः यह पुस्तकों का संग्रह है और इसमें धर्म के विभिन्न पहलु सम्मिलित हैं। इसे पारसीवाद का विश्वकोश माना जाता है। इसका दैवीय दर्जा नहीं है। इसे 10वीं सदी में लिखा गया था।
ऽ बूंदाहिश्नः इसका शाब्दिक अर्थ ‘आरम्भिक सृजन’ है। यह धर्म में सृजन के सिद्धांत के संबंध में जानकारी देता है। इसमें खगोलीय विचार और सिद्धांत सम्मिलित हैं। ‘अहुर मज्दा’ और ‘अंगरा मेन्यु’ की लड़ाई का भी उल्लेख किया गया है। अधिकांश अध्याय 8वीं और 9वीं सदी में लिखे गए थे।
ऽ मेनोग-ए-खिराद, सद-दर (सौ दरवाजे)
ऽ अरद वीरफ की पुस्तकः यह सासानी युग के दौरान लिखी गई एक भक्त की कहानी है।

मलयालम साहित्य
यह भाषा सामान्यतः केरल और आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है। हालांकि, भाषाविदों का तर्क है कि इस भाषा का उद्भव 11वीं सदी में हुआ, लेकिन चार सौ वर्ष के अंतराल में, इसने समृद्ध साहित्य का कोष विकसित किया जो इसे स्वतंत्रा भाषा कहलाने के लिए पर्याप्त है। मध्यकाल की दो प्रमुख मलयालम रचनाएं कोकासंडिशन और भास कौटिल्य हैं, जो कि अर्थशास्त्रा पर टिप्पणी है। मलयालम में एक और प्रमुख साहित्यिक काम रामचरित्तम है, जोकि 13वीं शताब्दी में छीरामन द्वारा लिखित एक महाकाव्य है। भक्ति आंदोलन के एक मजबूत प्रस्तावक एजु्रथचन को मलयालम साहित्य के पिता के रूप में जाना जाता है।

तेलुगू साहित्य
भाषाविदों का तर्क है कि नन्नयय (11वीं सदी) तेलुगू के पहले कवि थे। तेलुगू में कई महान रचनाएं लिखी गई है, लेकिन तेलुगू साहित्य स्वर्ण युग के रूप में ज्ञात विजयनगर काल के दौरान अपनी परकाष्ठा पर पहुंच गया। इस अवधि की सबसे सफल रचनाओं में से एक राजा बुक्का प्रथम के जाने-माने दरबारी कवि नचना सोमनाथ द्वारा रचित उत्तरहरिवंशम् है। न केवल दरबारी कवि श्रेष्ठंतर साहित्य का निर्माण कर रहे थे बल्कि कृष्णदेवराय (1509-1529) जैसे राजा ने भी अमुक्त माल्यद शीर्षक से असाधारण कविताओं की रचना की थी।
कृष्णदेवराय के शासनकाल के दौरान आठ साहित्यिक हस्तियां उनके दरबार से जुड़ीं थीं। इन्हें अष्ट दिग्गज कहा जाता था। इनमें से कुछ विशेष ध्यान देने योग्य हैंः
कवि रचना का नाम
अल्लासानी पेद्दाना (आंध्र कविता के पितामह के रूप में भी जाने जाते हैं) मनुचरितम
नंदी तिम्मना परिजात अपहरणम्
तेनाली रामकृष्ण (दरबारी विदूषक और कवि थे। कहा जाता है कि, उनका पांडुरंग महात्मय
राजा के साथ अच्छा तालमेल रहा था और तेनाली राम की कहानियां
आधुनिक समय में भी प्रचलित हैं)
रामराज भूषणु ( भट्टमूर्ति के रूप में भी जाने जाते है) वासुचरितम्
नरसाभूपाल्यम्
हरीशचंद्र नलोपाख्यानम्
मद्यागरी मल्लाना राजशेखरचरित
(अवंती के राज्य के राजा राजशेखर
के प्रेम और युद्ध के विषय में)
अयालराजू रामभद्र रामाभ्युवदम्
अकालकथासार

कृष्ण देव राय-महान विद्वान और साहित्य के संरक्षक
ऽ वह कई भाषाओं के विद्वान और संरक्षक थे जिसमें तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत सम्मिलित थी।
ऽ विजयनगर साम्राज्य में कृष्ण देवराय (1509-1592) का शासनकाल तेलुगु साहित्य के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है।
ऽ वह कई प्रकार की भाषाओं में पारंगत थे।
ऽ आठ विद्वान साहित्यिक व्यक्ति उनके दरबार से जुड़े थे और उन्हें अष्टदिग्गज कहा जाता था, सबसे महत्वपूर्ण अल्लासनी पेद्दाना था।
ऽ उन्होंने कन्नड़ कवियों मल्लथनरया, छटु विट्टल-अनंत तिमन्ना कवि को संरक्षण दिया। कन्नड़ संत व्यासतीर्थ उसके राजगुरु थे।
ऽ कृष्णदेव रायना दिनाचरी उन पर कन्नयड़ में एक और रचना है।
ऽ कलिंग अभियान के दौरान जब वह विजयवाड़ा से होकर यात्रा कर रहे थे, तब उन्होंने स्वयं अमुक्त माल्यद की रचना की जो उसके सपनों में विष्णु का उदाहरण बताने वाला ग्रंथ है।
ऽ उन्होंने संस्कृत में ग्रंथ लिखे जिसमें सम्मिलित हैं.मदालसा चरित, सत्यावधु परिणय, रासमंजरी और जम्बावती कल्याण।
ऽ उन्होंने तमिल कवि हरिदास को संरक्षण प्रदान किया।