आगमन और निगमन विधि में अन्तर क्या हैं inductive and deductive method of teaching in hindi प्रतिपादक

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inductive and deductive method of teaching in hindi आगमन और निगमन विधि में अन्तर क्या हैं प्रतिपादक ?

प्रश्न 1. आगमन और निगमन विधियों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Distinguish between inductive and deductive methods.
उत्तर-आगमन व निगमन विधि में अन्तर (Comparison of Inductive and Deductive Method) –
आगमन विधि(Inductive Method)  – निगमन विधि(Deductive Method)
1. यह मनोवैज्ञानिक विधि है।           –  यह मनोवैज्ञानिक विधि नहीं है।
2. इस विधि के द्वारा अध्ययन करने में समय कम लगता है।  – इस विधि में समय अधिक लगता है।
3. यह विधि बालको में आधारभूत ज्ञान विकसित करती है। – यह रटने का विरोध करती है। यह विधि रटने पर बल देती है और बालकों को सिद्धान्तों के सही सम्प्रत्य स्पष्ट नहीं हो पाते।
4. यह आविष्कार अनुसंधान विधि पर आधारित है। – यह विधि पहले से ज्ञात नियम व सिद्धान्तों की पुष्टि की विधि है।
5. यह विधि सभी कक्षाओं के लिए उपयोगी है। – यह विधि केवल उच्च कक्षाओं के लिए उपयोगी है।
6. इस विधि में अध्यापक को अत्यधिक परिश्रम करना होता है। जब तक वह उचित उदाहरण प्रस्तुत नहीं करता तब तक विधि प्रभावी नहीं हो पाती है। –  इस विधि में अध्यापक को मात्र सिद्धान्त को पुष्ट करके बताना होता है।
7. इस विधि में छात्र प्रारंभ से अन्त तक सक्रिय रहता है। – इस विधि में छात्र अधिक सक्रिय नहीं रहते हैं।
8. यह विधि रचनात्मक कार्यों में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी है। –  यह विधि प्रखर स्मरण शक्ति वाले छात्रों के लिए उपयोगी है।
9. यह एक रोचक विधि है। –  यह नीरस विधि है।
10. यह विधि विषय के प्रायोगिक व सैद्धान्तिक पक्ष दोनों पर बल देती है। – इस विधि में सैद्धान्तिक पक्ष पर बल दिया गया है।
11. इस विधि में अधिगम मंद गति से परन्तु स्थायी होता है। – इस विधि में अधिगम तीव्र गति से परन्तु स्थायी नहीं रहता है।
प्रश्न 2. अभिक्रमित अनुदेशन से आप क्या समझते हैं ?
What do you mean by programmed learning ?
उत्तर-अभिक्रमित अनुदेशन का अर्थ-इसके प्रणेता बी.एफ. स्कीनर हैं जिन्होंने अपने आपरेन्ट कन्डीशनिंग अधिगम के सिद्धान्त पर उसको विकसित किया। अभिक्रमित अधिगम व्यक्तिगत अनुदेशन की विधि है जिसमें छात्र सक्रिय रह कर अपनी गति से सीखता है एवं उसे तत्काल ज्ञान मिलता है और शिक्षक की आवश्यकता नहीं रहती।
प्रोग्राम क्या है- वास्तव में प्रोग्राम वह पाठयवस्तु है जिसे छात्रों को ग्रहण करना है। और प्रोग्रामिंग उस पाठय वस्तु को क्रमबद्ध करने की विधि है जो कि मनोवैज्ञानिक एवं तार्किक रूप से संगठित रहती है। छात्र “स्थूल से सूक्ष्म की ओर” एवं “मूर्त से अमूर्त” की ओर बढ़ते हैं एवं तथ्यों के आधार पर सामान्यीकरणों का निर्माण करते हैं।
रिचमण्ड के अनुसार, “अभिक्रमित अनुदेशन उन प्रायोगिक प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें शिक्षण कौशल को भावी शिक्षण के सिद्धान्तों व व्यवहारों में बदलने की चेष्टा की जाती है।”
कोरे के अनुसार, “अभिक्रमित अनुदेशन एक ऐसी शिक्षण विधि है जिसमें बालक के वातावरण को सुव्यवस्थित कर पूर्व निश्चित व्यवहारों को उसमें विकसित कर लिया जाता है।‘‘
स्टाफेल के अनुसार, “ज्ञान के छोटे-छोटे भागों को तार्किक क्रम में व्यवस्थित करने को, अभिक्रमित तथा इसकी शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को अभिक्रमित अधिगम कहते हैं।‘‘
सुसन एवं मार्कल के अनुसार, “यह व्यक्तिगत अनुदेशन की एक विधि है जिसमें बालक क्रियाशील रहकर स्वयं सीखने की गति से सीखता है तथा उसके उत्तरों की तत्काल जाँच करता है।‘‘
एविल के अनुसार, “अभिक्रमित अनुदेशन केवल मात्र स्वाध्याय हेतु निर्मित पा वस्तु ही नहीं है अपितु यह एक शिक्षण प्रविधि भी है।”

प्रश्न 13. ऐसा कहा जाता है कि रसायन विज्ञान में वैज्ञानिक अभिवृत्ति के विकास की उपेक्षा की जाती है। ऐसा क्यों? वर्तमान परिस्थितियों में आप इसे विकसित करने के लिए क्या कदम उठायेंगे ?
It is said that the development of Science Attitude is neglected in classroom teaching of chemistry.k~ fi~ so why?k~ What steps would you take to develop it under existing conditions in schools ?
उत्तर-रसायन विज्ञान शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना है। रसायन विज्ञान के क्षेत्र में बनी विभिन्न समितियों ने अपने सुझाव इस क्षेत्र में दिए हैं, जो निम्न हैं
1. माध्यामिक शिक्षा आयोग (1953)- माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार माध्यमिक स्तर पर रसायन विज्ञान शिक्षण द्वारा छात्रों को वैज्ञानिक विधि का उपयोग सिखाना चाहिए, जिससे तथ्यों की वैज्ञानिक आधार पर खोज की जा सके।
2. कोठारी शिक्षा आयोग- कोठारी शिक्षा आयोग के अनुसार परम्परागत समाज के मुकाबले आधुनिक समाज की सबसे बड़ी विशेषता इसके द्वारा अपनाया गया विज्ञान शिल्प विज्ञान पर आधारित है। विज्ञान के द्वारा ही उत्पादन आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा है। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का सबसे बड़ा साधन विज्ञान है।
3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) के अनुसार- व्यक्ति की क्षमता, सृजनात्मकता तथा सामाजिक आर्थिक कल्याण पर बल दिया जाना चाहिए, जिसके अन्तर्गत अभिवृत्ति व लोकतान्त्रिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास समाविष्ट होगा। विभिन्न आयोगों, राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की 1971 की चण्डीगढ़ कार्यशाला एवं नेशनल सोसाइटी ऑफ स्टडी ऑफ एजुकेशन में वैज्ञानिक दष्टिकोण की की गई और कहा गया कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले व्यक्तियों में निम्न गुण पाए जाते हैं-
1 व्यापक दृष्टिकोण 2. अन्धविश्वासों से मक्ति 3. सुस्पष्टता
4. जिज्ञासा 5. सत्य के प्रति निष्ठा 6. विनम्रता
7. उदारमिति 8. समस्याओं का क्रमबद्ध समाधान 9. ईमानदारी
वैज्ञानिक दृष्टिकोण की उपेक्षा के कारण- राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान तथा प्रशिक्षण रिट (NCERT), नेशनल सोसाइटी ऑफ स्टडी ऑफ एजुकेशन में विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर कहा कि वर्तमान में विद्यालयों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की उपेक्षा की जा रही है। इसके संभावित कारण निम्न बताए जा सकते हैं-
1. अध्यापकों की अध्यापन के प्रति अरुचि-वर्तमान में अध्यापन कार्य को अधिकांश जन प्राथमिकता से नहीं चुनते हैं। वे केवल इसे जीविकोपार्जन का साधन मानते हैं। अतः के अपने प्रशिक्षण काल में इसे महत्व नहीं देते हैं। परिणामस्वरूप वे अपने सेवाकाल में भी अध्यापन पर ध्यान नहीं देते हैं।
2. शिक्षण प्रशिक्षण संस्थानों का गिरता स्तर- वर्तमान में समूचे देश में शिक्षण प्रशिक्षण संस्थान केवल बी. एड. व एम. एड. की डिग्री देने की औपचारिकता निभा रहे हैं। उनकी आर्थिक स्थितियाँ व उपलब्ध साधन अपर्याप्त हैं। अतः शिक्षक प्रशिक्षक अच्छे अध्यापक तैयार नहीं कर सकते।
3. विद्यालयों में सुविधाओं का अभाव-वर्तमान समय में देश के अधिकांश विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं जैसे-भवन, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, पत्र-पत्रिकाओं का अभाव है। अतः अध्यापक चाहकर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न नहीं कर सकते।
4. दोषपूर्ण पाठ्यक्रम-वर्तमान समय का पाठ्यक्रम अधिकांश दोषों से युक्त है। इसमें सैद्धान्तिक पक्ष पर बल अधिक है। अतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं होता है।
5. दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली- वर्तमान परीक्षा प्रणाली केवल छात्रों में किस सीमा तक पाठ्यक्रम रट रखा है इसकी परीक्षा करता है। अधिक से अधिक रटने वाले छात्र परीक्षा में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। अतः सभी छात्र केवल रटने पर ही ध्यान देते हैं।
6. शिक्षा के प्रति सरकार की उपेक्षा-वर्तमान समय में संस्थाएं शिक्षा पर खर्च धन साता करना चाहती हैं। अतः विद्यालयों एवं शिक्षा का स्तर धीरे-धीरे गिरता जा रहा है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के उपाय- नवीन शिक्षण विधियों का प्रयोग-रसायन विज्ञान का शिक्षण परम्परागत शिक्षण लया द्वारा न कराकर नवीन शिक्षण विधियों के आधार पर करवाना चाहिए। इससे शिक्षण प्रभावी, क्रमबद्ध एवं सत्य पर आधारित होगा। छात्रों को अधिक से अधिक तथ्य प्रयोग या प्रदर्शन से समझाने चाहिए एवं छात्रों को भी यथासम्भव निरीक्षण, प्रयोग आदि करने के अवसर देने चाहिए।

2. छात्रों द्वारा पुस्तकालय का उपयोग- छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करनेे लिए उन्हें रसायन विज्ञान से सम्बन्धित साहित्य पुस्तकालय में बैठकर पढ़ने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए। इससे छात्रों में विषय के प्रति रुचि बढ़ेगी। रसायन विज्ञान के अध्यापक को भी पुस्तकालय में विषय से सम्बन्धित महान वैज्ञानिकों की जीवनियाँ, उनके आविष्कारों की कहानियां आदि से सम्बन्धित पुस्तकें मंगानी चाहिए।
3. छात्रों की जिज्ञासाओं को शान्त करना-वैज्ञानिक अभिवृत्ति वाले छात्र में सदैव विज्ञान की दैनिक घटनाओं के सन्दर्भ में अनेक प्रश्न उठते रहते हैं। वे उनके समाधान अधिक से अधिक जानने को उत्सुक रहते हैं। अध्यापकों को चाहिए कि वे इनका उत्तर छात्रों को वैज्ञानिक ढंग से सविस्तार दें।
4. अध्यापक का व्यक्तित्व-उपर्युक्त सभी कार्यों की पूर्ति अध्यापक द्वारा ही हो सकती है। अतः छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में अध्यापक की प्रमुख भूमिका होती है । एक अध्यापक तभी छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर सकता है जब उसका स्वयं का दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो। वह सत्यप्रिय हो, अन्धविश्वासों से मुक्त हो, विनम्र हो, अध्ययनशील हो, विषय का ज्ञाता हो । उपर्युक्त गुणों वाला अध्यापक ही छात्रों में इस प्रकार के गुणों को विकसित कर सकेगा।
5. पुस्तकों में दिए गए अध्यायों का प्रयोग-विज्ञान के क्षेत्र में तरह-तरह की ज्ञानवर्धक पत्रिकाएं प्रकाशित होती रहती हैं। उनमें तरह-तरह के छोटे-छोटे अभ्यास व प्रयोग भी दिए होते हैं। इनके अभ्यास से छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास किया जा सकता है। अध्यापक का कर्तव्य है कि प्रतिदिन ऐसे पत्र पत्रिकाओं की कटिंग को नोटिस बोर्ड पर लगवाने की व्यवस्था करें जिससे अधिक से अधिक छात्र उनका लाभ उठा सकें।
6. पाठ्य सहगामी क्रियाएँ-विज्ञान के क्षेत्र में अनेक रोचक कार्य जैसे-विज्ञान क्लब, विज्ञान मेले. वैज्ञानिक दर्शनीय भ्रमण आदि विज्ञान के क्षेत्र में बालकों की रुचि बढा सकते हैं। विज्ञान के व्याख्यान, वाद-विवाद आदि कार्यक्रमों से बालकों के ज्ञान में वटि के साथ-साथ रुचि भी विकसित होगी। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दिवसों को मनाना वैज्ञानिकले जन्म दिवस मनाना आदि कार्यों से छात्रों में व्यापक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होगा।
7. प्रशिक्षण प्रणालियों में सुधार- (1) वैज्ञानिक अभिवृत्ति के मूल्यांकन व मापन हेतु अभिवृत्ति मापनी (Attitude Scale) का उपयोग किया जाना चाहिए। (2) आन्तरिक मूल्यांकन योजना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी मापन किया जाना चाहिए।
8. शिक्षक प्रशिक्षक संस्थाओं में उचित प्रशिक्षण-इन शिक्षण संस्थान का आयोजन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
9. शिक्षकों व शिक्षाधिकारियों का कर्त्तव्य-रसायन विज्ञान शिक्षक व पर्यो कार्य शिक्षकों व अधिकारियों को जिम्मेदारी के साथ सोचना चाहिए जिससे छात्रों में वैजा दृष्टिकोण का विकास हो सके।
उपर्युक्त बिन्दुओं से स्पष्ट है कि रसायन विज्ञान द्वारा छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है ।