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लिखित संविधान किसे कहते हैं | लिखित संविधान की अवधारणा की परिभाषा क्या है गुण दोष written constitution meaning in hindi
written constitution meaning in hindi लिखित संविधान किसे कहते हैं | लिखित संविधान की अवधारणा की परिभाषा क्या है गुण दोष ?
एक लिखित संविधान की उपादेयता
किसी लिखित संविधान के विषय में चार बातें आती हैं:
संविधान एक निरपेक्ष कानून के रूप में
कोई संविधान अपने प्राधिकारों की व्युत्पत्ति स्वयं से ही करता है। यह, इसीलिए, भविष्योन्मुखी है। सर्वोच्च विधि-संहिताओं के एक निकाय के रूप में संविधान को न सिर्फ अन्य सभी कानूनों के ऊपर बल्कि अन्य सभी प्रथाओं, परम्पराओं व मतों के ऊपर भी वरीयता प्राप्त है। ऐसी प्रथाएँ व परम्पराएँ आदि वहीं तक वैध हैं जहाँ तक वे इस संविधान से विचार वैभिन्न नहीं रखतीं। अन्य शब्दों में, संविधान के किसी भी प्रावधान को इस दलील पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि यह पहले ही से । विरासत में मिली परम्परा, विश्वास व मत से मेल नहीं खाता।
इसका संविदात्मक स्वभाव
इससे अलावा, लोकतांत्रिक संविधान लोगों के बीच अथवा, कम-से-कम, अधिकांश लोगों के बीच एक प्रकार की संविदा है। यह सर्वसम्मति पर आधारित है – यह सर्वसम्मति अनेक व्यक्तियों व समूहों के बीच मोलतोल का परिणाम है। इस प्रकार की संविदा सभी लोगों की पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सकती। लेकिन यह उनमें से अधिकतर को अंशतः अवश्य संतुष्ट करती है। अन्य शब्दों में, यह बहुसंख्यक लोगों का एक प्रकार का सर्वमान्य अल्पतम कार्यक्रम है जो अल्पसंख्यक-हितों को हानि वहीं पहुँचाता।
संविधान का अभिदर्शन
प्रत्येक लोकतांत्रिक संविधान में होता है- एक अभिदर्शन और एक अभिदृष्टि, जिनको कुल मिलाकर स्थिरता के साथ विकास कह सकते हैं । ये दोनों संकल्पनाएँ अंतर्संबंधित हैं। बिना विकास के स्थिरता को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है और स्थिरता के बगैर विकास को उपार्जित नहीं किया जा सकता है।
संविधान और न्याय
विकास और स्थिरता की संकल्पना से ही अभिन्न रूप से जुड़ी है – न्याय की संकल्पना । कोई भी अनुचित प्रणाली लोगों को खुश नहीं कर सकती। और एक अप्रसन्न जनता न तो देश की स्थिरता के लिए और न ही उसके विकास के लिए काम कर सकती है।
संविधान की प्रस्तावना: इसका उद्देश्य
सभी लिखित लोकतांत्रिक संविधानों में एक प्रस्तावना दी गई होती है जो भविष्य के लिए एक अभिदृष्टि प्रस्तुत करती है। ऐसी सभी अभिदृष्टियाँ इस प्रवृत्ति को लिए होती हैं कि पिछली सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था के दोषों व पूर्वाग्रहों को निरस्त करना है और एक ऐसा भविष्य बनाने का वचन देते हैं जो न्यायसंगत, सुखद और गौरवमय हो । लोकतंत्र अनिवार्य रूप से रूपांतरणीय है। सामाजिक रूपांतरण की अभिदृष्टि, जैसा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रतिबिम्बित होती है, नीचे दी गई हैः
‘‘हम भारत के लोग, एतत् द्वारा
अपनी संविधान सभा मेंय आज नवम्बर, 1949 के छब्बीसवें दिवस,
भारत को एक संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणंतत्र के रूप में
गठित करने और इसके सभी नागरिकों हेतु न्याय, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिकय
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, मत और पूजा की स्वतंत्रताय
पद की और अवसर की समानता सुनिश्चित करने, और
इन सभी के बीच …
व्यक्तिजनों के गौरव और देश की एकता और अखण्डता का
आश्वासन देते हुए भाईचारे को प्रोत्साहन देने का
विधिपूर्वक संकल्प करते हुए
इस संविधान को अंगीकार करते हैं, इसका विधिकरण करते हैं और इसे
स्वयं को सौंपते हैं।‘‘
भारतीय अभिवृष्टि
रूपांतरण की इस प्रकार की अभिदृष्टि लोकप्रचलित आकांक्षाओं में निहित है। वह ऐतिहासिक रूप से विकसित होती है। संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान को अभिदृष्टि उदाहरण के लिए, 1776 के स्वतंत्रता के युद्ध से विकसित हुई जो, घूम-फिरकर, अठारहवीं शताब्दी के उदारवादी लोकतांत्रिक पर्यावरण से उत्पन्न हुई।
साम्राज्यवाद-विरोधी विरासत
भारत में यह अभिदृष्टि उसके अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष से विकसित हुई और विकसित विश्व में उदारवादी लोकतांत्रिक विचार द्वारा पोषित हुई। इसे सबसे पहले उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औपनिवेशिक शासन के आलोचकों तथा दादाभाई नौरोजी, एम.जी. रानाडे और आर.सी. दत्त जैसे लोगों द्वारा अभिव्यक्त किया गया। साम्राज्यवाद का अंत भारत को प्रगति की आधारभूत पूर्व-शर्त के रूप में देखा गया। बीसवीं सदी में ये आलोचक स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में उभरे।
सामाजिक न्याय के लिए आंदोलन
साथ-ही-साथ, इस विस्तृत साम्राज्य-विरोधी संघर्ष के साथ पैदा हुईं सामाजिक न्याय के लिए माँगे। ज्योतिबा फूले ने उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध के राजाराम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और दयानन्द सरस्वती जैसे विचारकों और कार्यकर्ताओं की सामाजिक सुधार कार्यावली को और विस्तार दिया।
राष्ट्रवादी कार्यक्रम
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का जन्म भारतीयों के सभी वर्गों को एकीकृत करने के एक आधुनिक प्रयास के माध्यम से हुआ यद्यपि, मौलिक रूप से, यह आभिजात्यवादी थी। बीसवीं शताब्दी में इसका साम्राज्य-विरोधी सूचीपत्र धीरे-धीरे खोला गया। इसी समय, उसने न केवल साम्प्रदायिक एकता पर बल्कि भारत राष्ट्र में सामाजिक व आर्थिक न्याय की आवश्यकता पर भी जोर दिया। भारतीय राष्ट्रवाद इन सभी दबावों का परिणाम था।
राष्ट्रवादी कार्यक्रम के सारतत्त्व के रूप में अधिकार
उन मौलिक अधिकारों पर किया गया दृढ़ संकल्प जो 1931 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के कराची सत्र में पारित किए गए, स्वतंत्रता आंदोलन के सामाजिक व आर्थिक लक्ष्यों का पहला विस्तीर्ण, यद्यपि संपूर्ण नहीं, कथन था।
समाजवाद का प्रभाव
बोल्शेविक क्रांति (1917) से ही समाजवाद का विचार भारतीयों की अभिकल्पना को आकर्षित कर रहा था। काँग्रेस के भीतर इसके प्रबल समर्थ थे जवाहरलाल नेहरू जिन्होंने, हालाँकि, सोवियत नीति की सत्तावादी प्रवृत्ति को स्वीकृति नहीं दी। गाँधीजी ने वर्ग-संघर्ष के इस समाजवादी सिद्धांत को स्वीकृति नहीं दी लेकिन सामाजिक व आर्थिक न्याय के लिए काम किया।
गरीबी, राहत और योजना
भारत सरकार अधिनियम, 1935 की घटना के बाद, अनेक प्रांतीय सरकारों ने गरीब खेती हारों को राहत देना स्वीकार किया। काँग्रेस अध्यक्ष ने एक राष्ट्रीय योजना आयोग नियुक्त किया। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद काँग्रेस ने जमींदारी उन्मूलन को शामिल कर भूमि-सुधार कार्यक्रम अपनाया।
वामपंथी गुटों की भूमिका
तीस के दशक में काँग्रेस के भीतर और इसके बाहर वामपंथी दलों और गुटों का उदय हुआ। ये समाजवाद और भूमि सुधार के प्रबल समर्थक थे। जबकि बंगाल की कृषक प्रजा पार्टी और ऑल-इण्डिया मुस्लिम लीग का एक वर्ग भी समाजवाद और भूमि सुधार के समर्थक थे।
जाति-उत्पीड़न का विरोध
डॉ. भीमराव अम्बेडकर समाजवाद और भूमि-सुधार में अंशतः विश्वास तो रखते थे लेकिन जाति-प्रथा द्वारा दमित लोगों के कल्याण और प्रगति से ज्यादा वास्ता रखते थे।
संक्षिप्त में, भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक, न्याय के साथ विकास के सिद्धांतों की रूपरेखा सुस्पष्ट हो चुकी थी।
बोध प्रश्न 1
नोट: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) भारत में सामाजिक रूपांतरण को अभिदृष्टि कैसे विकसित हुई?
2) सामाजिक रूपातंरण की अभिदृष्टि पर पहला विस्तीर्ण कथन क्या था?
3) भारतीय अभिकल्पना पर समाजवाद के प्रभाव पर टिप्पणी लिखें।
बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) यह ब्रिटिश शासन के विरोध से उत्पन्न हुई तथा इसको दुनिया के विकसित देशों की। उदारवादी प्रजातांत्रिक सोच द्वारा विकसित किया गया।
2) यह सबसे पहले दादा भाई नौरोजी, एम.जी.रानाडे, एवं आर.सी.दत्त जैसे लोगों द्वारा औपनिवेशिक . शासन की आलोचना में अभिव्यक्त हुआ।
3) इसके प्रभाव से कांग्रेस के अंदर एक समाजवादी गुट का उदय हुआ।
सैद्धांतिक सीमाएँ
इस प्रकार की अभिदृष्टि के साकार होने में, बहरहाल, दो सीमाबंधन हैं।
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का वर्ग-चरित्र
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस जिसका भारतीय संविधान सभा पर प्रभुत्व था, कोई समाजवादी पार्टी नहीं थी। न ही यह जाति-प्रथा के उन्मूलन को समर्पित कोई सामाजिक सुधार वाली पार्टी थी। ऐसे विचार भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के उस प्राथमिक कार्य के सामने गौण थे, जो था राजनीति स्वतंत्रता।
राजनीति पर दवाब
भारतीय संविधान सभा भारत सरकार के लिए एक संविधान तैयार करने में जुटी थी। इस संविधान को, अनिवार्य रूप से, एक राजनीतिक दस्तावेज होना था। वस्तुतः, जब संविधान सभा के दो सदस्यों ने (सय्यद हसरत मोहानी, एक मुस्लिम लीगी, और के.टी. शाह, एक कांग्रेसी) भारतीय संविधान की प्रस्तावना में श्समाजवादश् शब्द को शामिल करने का प्रस्ताव रखा, प्रारूपण समिति ने इसे इस दलील के साथ निरस्त कर दिया कि एक संविधान को किसी सामाजिक धारणा को पोषित करने की आवश्यकता नहीं है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर, अध्यक्ष प्रारूपण समिति, ने यही मत संविधान सभा के मंच पर व्यक्त किया।
कांग्रेस में सर्वसम्मति
संविधान के विषय में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के मुख्य विचारों को संक्षेप में इस प्रकार कहा जा सकता था
अ) एक संसदीय सरकार,
ब) एक राजनैतिक रूप से केन्द्रीकृत लेकिन सांस्कृतिक रूप से वैविध्यपूर्ण संघीय राज्य, और
स) एक सक्रिय सामाजिक व्यवस्था।
संसदीय परम्परा
संसदीय सरकार की परम्परा 1919 में मोन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के पदार्पण साथ ही विकसित होने लगी थी। यद्यपि काँग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया, पर उदारवादियों ने लिया। 1923 में स्वराज्य पार्टी के माध्यम से काँग्रेस द्वारा उनमें एक अपरोक्ष भागीदारी भी हुई फिर भी स्वराज्य पार्टी ने कभी कोई पद स्वीकार नहीं किया। मुस्लिम लीग का भी 1919 सुधारों के साथ इसी प्रकार का अनुभव था। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत काँग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों ने सहज ही पद स्वीकार कर लिए। उस समय तक उदारवादी अपना प्रभाव खो चुके थे और अधिकतर काँग्रेस में शामिल में शामिल हो चुके थे। संविधान सभा में बहुत ही थोड़े सदस्य सरकार की अध्यक्षीय प्रणाली चाहते थे।
संघवाद
किसी संघ का विचार भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा शक्तियों की सुपुर्दगी से भी जन्मा। 1928 का सर्वदलीय सम्मेलन देश के धार्मिक और भाषायी विविधता को नियंत्रित करने के लिए सरकार के संघीय रूप का सुझाव पहले ही दे चुका था। विभाजन ने आर्थिक आधार पर संघवाद के प्रकरण को कमजोर कर दिया। लेकिन काँग्रेस कम-से-कम 1920 से ही भाषायी प्रांतवाद के लिए वचनबद्ध थी। संघवाद का विचार, इसीलिए, नहीं छोड़ा गया था।
कल्याणवाद
भारतीय स्वंतत्रता आन्दोलन एक जन-आंदोलन था और उसे ऐसे जनसमूहों के विशालतम् वर्ग की भागीदारी की आवश्यकता थी जो गरीब, अशिक्षित और पिछड़े लोगों से मिलकर बने हों। जन-कल्याण का विचार, हालाँकि, राजनीतिक नेतृत्व के व्यक्ति-व्यक्ति और वर्ग-वर्ग के अनुसार भिन्न-भिन्न था। यहाँ ही थे वैचारिक भेद ।
सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम का प्रकटन
एक बड़ी आम सोच थी कि आजादी सामाजिक-आर्थिक सम्पन्नता के द्वार खोलेगी। 1946 के शुरू में होने वाले प्रांतीय-सभा चुनावों के लिए जारी काँग्रेस पार्टी के घोषणा-पत्र में यह वायदा किया गया उद्योग एवं कृषि, सामाजिक सेवाओं और जनोपयोगी सेवाओं को अवश्य ही प्रोत्साहित, आधुनिकीकृत एवं तेजी से विस्तीर्ण किया जाना है।
रणनीति
इस उद्देश्य से काँग्रेस ने आवश्यक रणनीति का सुझाव दिया जिसके लक्ष्य थे:
अ) सभी क्षेत्रों में सामाजिक उन्नति की योजना बनाना और समन्वय करना,
ब) धन और सत्ता का संचय कुछ ही हाथों में होने से रोकना,
स) समाज को बढ़ते निहित विद्वेषपूर्ण स्वार्थों से बचाना, और
द) खनिज संसाधनों, परिवहन के साधनों और भूमि, उद्योग व अन्य राष्ट्रीय गतिविधि के विभागों में उत्पादन और वितरण की प्रमुख पद्धतियों का सामाजिक नियंत्रण।
विशिष्ट उद्देश्य
काँग्रेस के घोषणा-पत्र में उल्लिखित विशिष्ट उद्देश्य थे:
अ) राज्य और कृषकवर्ग के मध्य से बिचैलियों को हटाने – न्यायोचित क्षतिपूर्ति के भुगतान पर
के लिए भूमि, प्रणाली के सुधार की तत्काल आवश्यकता।
ब) शिक्षा संबंधी अवसरों और स्वास्थ्य सेवाओं का संवर्धन किए जाने की आवश्यकता।
स) उद्योग में कर्मचारियों की दशा में सुधार और ग्रामीण ऋणग्रस्तता के निराकरण का वायदा।
द) अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मैत्री की ओर पार्टी की आशापूर्ण दृष्टि ।
संविधान के उद्देश्यों पर कांग्रेसी संकल्प
लोकतांत्रिक समाजवाद का पुट लिए यह विशाल लोकोपकारी और कल्याणकारी कार्यक्रम धीरे-धीरे साकार किया गया। कांग्रेसी नेतागण अवगत थे कि संविधान मौलिक रूप से एक राजनीतिक दस्तावेज है। इसलिए उसे सबसे पहले राजनीतिक संरचना की अभ्युक्ति करनी चाहिए। इस संरचना की विस्तीर्णतम रूपरेखा संविधान सभा की बैठक से बीस दिन पूर्व, 20 नवम्बर 1946 को, संविधान के उद्देश्यों पर काँग्रेस के संकल्प में स्पष्ट की गई।
इस संकल्प के अनुसार, काँग्रेस एक ऐसे स्वतंत्र संप्रभु गणतंत्र का समर्थन करती थी जिसमें सभी शक्तियाँ और प्राधिकार जनता से ही व्युत्पन्न हों। इसके अलावा, वह एक ऐसा संविधान चाहती थी जिसमें सामाजिक उद्देश्य भारत के सभी लोगों के लिए स्वतंत्रता, प्रगति और समान अवसर के बलवर्धन हेतु को अर्पित हों। इससे यह प्राचीन देश विश्व में अपना न्यायोचित और सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकेगा और अपना संपूर्ण योगदान विश्व-शांति के प्रोत्साहन और मानवजाति की प्रगति और कल्याण हेतु कर सकेगा।
संविधान सभा के “उद्देश्य संकल्प‘‘
‘‘उद्देश्य संकल्प‘‘ जो 13 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत किए गए, ने सामाजिक रूपांतरण के लक्ष्य को और अधिक स्पष्ट किया। इस संकल्प के अनुसार, संविधान भारत के सभी लोगों को इनका वचन देः
1) न्याय, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक,
2) कानून के सामने पद की और अवसर की समानता,
3) विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, मत, पूजा, व्यवसाय, सम्मिलन और कार्य की स्वतंत्रता, बशर्ते कानून और सार्वजनिक सदाचार के तहत हो, और
4) अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों, तथा पद-दलित व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त सुरक्षा।
अपने क्रियान्वित किए जाने के लिए लगभग तीन वर्षों के भीतर संविधान सभा ने एक ऐसा संविधान निश्चित किया जिसमें सामाजिक रूपांतरण के इन उद्देश्यों को इनमें प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया गया था – प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांत तथा लोगों के पिछड़े व अलाभान्वित वर्गों के लिए अनेक विशेष प्रावधान । यह प्रक्रिया संविधान के बनने पर रुकी नहीं। संशोधन किए गए हैं और इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाये जाने की प्रत्याशा की जाती है।
बोध प्रश्न 2
नोट: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) सामाजिक रूपांतरण की अभिदृष्टि के कार्यान्वयन में सीमाबद्धता की पहचान करें।
2) भारत सरकार अधिनियम, 1935 के साथ संघवाद की संकल्पना का क्या संबंध है?
3) ‘‘उद्देश्य संकल्प‘‘ में कौन-से लक्ष्यों का उल्लेख है?
बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 2
1) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वर्ग चरित्र तथा राजनीति पर दबाव ।
2) यह भारत सरकार के 1935 अधिनियम में निहित सत्ता के विकेन्द्रीकरण से उत्पन्न हुआ।
3) मुख्यतः समाज के सभी वर्गों के लिए न्याय, समानता एवं स्वतन्त्रता।
संरचनात्मक सीमाएँ
कोई संविधान सभा ऐसे रूपांतरण को केवल आकार ही दे सकती है जिसको एक सामाजिक अथवा राजनीतिक क्रांति द्वारा जन्म दिया गया हो। एक संविधान सभा आमूल परिवर्तन नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त, एक उदारवादी लोकतांत्रिक संविधान स्वयं ही मूलभूत सामाजिक रूपांतरण की व्यवस्था नहीं कर सकता। वह मात्र एक लोकतांत्रिक राजनीतिक संरचना की व्यवस्था करता है।
एक समाजवादी राज्य की स्थापना न तो संविधान सभा की शक्तियों में था, न ही उसकी यह मंशा थी। यह तर्क दिया गया कि एक संविधान कोई आर्थिक तंत्र नहीं रखता है। लेकिन यह एक निश्चित सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के निर्माण की अनुमति दे सकता है। वस्तुतः, नेतृत्व द्वारा यह अनुभव किया गया कि संविधान के सामाजिक उद्देश्यों की
6. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. भीमराव
अम्बेडकर व अन्य ने यह चेतावनी दी कि यदि ये उद्देश्य शीघ्र ही पूरे नहीं हुए तो संविधान सभा द्वारा रचित राजनीतिक संरचना स्थिर नहीं रहेगी।
सारांश
संविधान एक सकारात्मक विधि-संहिता है जो भविष्योन्मुखी है। यह देश के भविष्यत् कार्यों का निर्देश देता है और अन्य सभी कानूनों, रिवाजों व विश्वासों से ऊपर है। यह जनसाधारण के बीच एक संविदा है। यह अंशतः प्रत्येक को संतुष्ट करता है। प्रत्येक लोकतांत्रिक संविधान हेतु एक अभिदर्शन है – स्वतंत्रता, विकास और न्याय सुनिश्चित करना। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ऐसे लक्ष्यों के प्रति वचनबद्ध रहा। संविधान का प्राथमिक व्यवसाय राजनीति है। अभी तक, वह प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों के निकाय में एक राजतंत्र हेतु ऐसे लक्ष्य निर्धारण करता है। भारतीय संविधान ने दोनों ही को रखा, जबकि विस्तृत रूप से रखा। इसमें, इनके अलावा, शामिल किया गया राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांतों को।
कुछ उपयोगी पुस्तकें
ऑस्टीन, ग्रैनविल, दि इण्डियन कॉन्स्टीट्यूशन: कॉर्नरस्टोन ऑव ए नेशन, ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, 1966.
चैबे, शिबानी किंकर, कॉन्स्टीट्यूशन एसेम्बली ऑव इण्डिया: स्प्रिंगबोर्ड ऑव रिवल्यूशन, नई दिल्ली, पीपल्स पब्लिशिंग हाउस, 1973.
चैबे, शिबानी किंकर, कॉलोनिअलिज्म, फ्रीडम स्ट्रगल एण्ड नैशनलिज्म इन इण्डिया, दिल्ली, बुक लैण्ड, 1996.
सामाजिक रूपांतरण का अवलोकन
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
एक लिखित संविधान की उपादेयता
संविधान एक निरपेक्ष कानून के रूप में
इसका संविदात्मक स्वभाव
संविधान का अभिदर्शन
संविधान और न्याय
संविधान की प्रस्तावना: इसका उद्देश्य
भारतीय अभिदृष्टि
साम्राज्यवाद-विरोधी विरासत
सामाजिक न्याय के लिए आंदोलन
राष्ट्रवादी कार्यक्रम
राष्ट्रवादी कार्यक्रम के सारतत्त्व के रूप में अधिकार
समाजवाद का प्रभाव
गरीबी, राहत और योजना
वामपंथी गुटों की भूमिका
जाति-उत्पीड़न का विरोध
सैद्धांतिक सीमाएँ
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का वर्ग-चरित्र
राजनीति पर दवाब
कांग्रेस में सर्वसम्मति
संसदीय परम्परा
संघवाद
कल्याणवाद
सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम का प्रकटन
रणनीति
विशिष्ट उद्देश्य
संविधान के उद्देश्यों पर कांग्रेसी संकल्प
संविधान सभा के ‘‘उद्देश्य संकल्प‘‘
संरचनात्मक सीमाएँ .
सारांश
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर
उद्देश्य
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेता सामाजिक रूपांतरण का सपना देखते थे। समाज के विभिन्न समूहों का प्रतिनिधित्व करती संविधान सभा ने इस स्वप्न को भारतीय संविधान में शामिल कर दिया। इस इकाई का अध्ययन करने के बाद, आप इस योग्य होंगे कि यह समझ सकेंः
ऽ भारतीय संविधान का दृष्टिकोण और अभिदर्शन,
ऽ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं के विचार व स्वप्न,
ऽ किस तरीके से वे सुस्पष्ट किए गए, और
ऽ सर्वसम्मति के साथ-साथ विवाद का विस्तार जिसने भारतीय संविधान के निर्माता के पीछे काम किया।
प्रस्तावना
इकाई 6 में हमने देखा – स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत में एक संविधान सभा की अवधारणा का कम विकास और यह तरीका जिससे भारत के नेताओं ने एक संविधान रचा। यह संविधान न सिर्फ विश्व का वृहदतम संविधान है, यह एक ऐसे संप्रभु लोकतान्त्रिक गणतंत्र के रूप में भारत के भविष्य हेतु एक महान् दृष्टिकोण भी प्रतिबिम्बित करता है जहाँ न्याय, स्वतंत्रता और समानता देश की एक सुदृढ़ एकता और अखण्डता का निर्माण करेंगे।
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