भारत में वन्य प्राणी संरक्षण क्या हैं ? Wildlife Conservation in India in hindi भारत में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम कब लागू हुआ

By   June 14, 2021

भारत में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम कब लागू हुआ भारत में वन्य प्राणी संरक्षण क्या हैं ? Wildlife Conservation in India in hindi ?

उत्तर : 1972 में ‘वन्य जीव सुरक्षा कानून‘ बनाया गया।

भारत में वन्य जीव (Wildlife in India)
वनों में रहने वाले पशुओं, पक्षियों तथा कीट-पतंगों को वन्य जीव कहते हैं। भारत जैसे विशाल देश में उच्चावच, जलवायु तथा वनस्पति संबंधी विषमताओं के कारण वन्य जीवों में अत्याधिक विविधता पाई जाती है। भारत में 81,251 वन्य जीवों की प्रजातियां पाई जाती हैं जो विश्व की कुल प्रजातियों का 6.7 प्रतिशत भाग है। भारतीय वन्य जीवों में रीढ़ विहीन (invertebrates) जीवों की 6,500 प्रजातियां, कवचधारी प्रजातियों (mollusc) की 5000 प्रजातियां, मछलियों की 2546 प्रजातियां, पक्षियों की 2,000 प्रजातियां, रेंगने वाले अर्थात सरीसृप जीवों (reptiles) की 458 प्रजातियां, तेंदुए की 4 प्रजातियां तथा 60,000 से अधिक कीट-पतंगों की प्रजातियां हैं।
हाथी भारत के जंगलों में रहने वाला सबसे बड़ा प्राणी है। कुछ सदियों तक भारत के विस्तृत वन क्षेत्र में बड़ी संख्या में हाथी रहते थे। परंतु वनों में ह्रास के कारण इनकी संख्या बहुत कम हो गई है। इस समय हाथियों की संख्या असम तथा पश्चिम बंगाल के जंगलों में 6,000, मध्य भारत के जंगलों में 2000 तथा दक्षिण भारत के तीन राज्यों (कर्नाटक, केरल व तमिलनाडु) में 6000 हैं। एक सींग वाला गैंडा (Rhinoceros) दूसरा बड़ा पशु है। पहले यह उत्तरी भारत के विशाल जंगलों में बड़ी संख्या में पाया जाता था। परंतु अब इसकी संख्या घट कर केवल 1500 रह गई है। इसका वर्तमान निवास क्षेत्र असम तथा पश्चिम बंगाल के जंगलों तक ही सीमित है। जंगली भैंसा असम तथा छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में मिलता है। इसी प्रकार शेर व चीते भी सीमित क्षेत्रों में ही मिलते हैं। बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है। यॉक बर्फ में रहने वाला जानवर है जो हिमालय के ऊंचे भागों में रहता है। इसे सवारी तथा बोझा ढोने के लिए प्रयोग किया जाता है। हिमालय के जंगलों में जंगली भेड़ें और बकरियां भी रहती हैं। हिरण भी भारत के जंगलों में बहुतायत में घूमता था परंतु अब इसकी संख्या कम हो गई है। बंदर भारत के लगभग सभी जंगलों में पाया जाता है परंतु इसके शरीर की बनावट में बहुत अधिक क्षेत्रीय भिन्नताएं पाई जाती हैं। कई इलाकों में लंगूर भी बड़ी संख्या में मिलते हैं। इसी प्रकार से चिंकारा, नीलगाय, जंगली कुत्ता, लोमड़ी, गीदड़ तथा हजारों प्रकार के अन्य पशु भारत के जंगलों में रहते हैं।
रेंगने वाले जीवों की भी भारत में बहुत विविधता पाई जाती है। भारत में सांप की लगभग 200 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें कोबरा सबसे खतरनाक होता है। किंग कोबरा की लम्बाई पांच मीटर से भी अधिक हो सकती है और यह सबसे लम्बा जहरीला सांप होता है। परन्तु रॉक पाइथॉन (Rock Python) तथा रेटिक्यूलेटिड पाइथान (Pcticulated Python) लगभग सात मीटर लम्बा होता है, और इसका भार लगभग 115 किलोग्राम होता है। बहुत से सांप धरती पर रहते हैं परंतु कुछ सांप जल में निवास करते हैं। जल में निवास करने वाले सापा में कम ही जहरीले होते हैं। जल में रहने वाले अन्य जीवों में मगरमच्छ तथा घड़ियाल प्रमुख हैं।
पक्षियों के मामले में भारत काफी समृद्ध देश है। भारत में पक्षियों की लगभग 2000 प्रजातियां हैं, जो यूरोप की प्रजातियों से तीन गुना अधिक है। यद्यपि बहुत से पक्षी भारत के मूल निवासी हैं तथापि कुछ पक्षी विदेशों से आए हैं। कुछ पक्षी शीत ऋतु में हर साल मध्य एशिया से भरतपुर (राजस्थान) के पक्षी विहार में आते हैं और शीत ऋतु के समाप्त होने पर वापिस चले जाते हैं। भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है जो अपने सुंदर पंखों के लिए विश्व-विख्यात है।
भारत में वन्य प्राणियों का ह्रास
पिछले कुछ दशकों में वन्य प्राणियों की संख्या में चिंताजनक कमी आई है। मानव के अवांछित क्रिया-कलापों के कारण पारिस्थितिक तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिसके परिणामस्वरूप जैव प्रजातियों की संख्या का ह्रास हुआ है। कुछ प्रजातियां संकटापन्न हो गई हैं तथा कुछ प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं।
वन्य प्राणियों की संख्या में कमी होने के अनेक कारण हैं जिनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैंः
i. औद्योगीकरण तथा तकनीकी विकास के कारण वन संसाधनों के दोहन की गति में तेजी आई है।
ii. कृषि, मानवीय बस्तियों, सड़कों, खदानों जलाशयों आदि के लिए भूमि प्राप्त करने हेतु वनों को साफ किया गया है।
iii. चारे, ईंधन और इमारती लकड़ी की मांग बढ़ जाने से वनों पर दबाव बहत बढ़ गया है।
iv. पालतू पशुओं के लिए नए चरागाहों की बढ़ती आवश्यकता से वन्य जीवों तथा उनके आवासों की क्षति हुई।
v. पशुओं से विभिन्न प्रकार के बहुमूल्य अंग (हड्डियां, खाले. अंतड़ियां, दांत आदि) प्राप्त होते हैं जिनका राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार किया जाता है। हालांकि इस प्रकार के अधिकांश व्यापार पर कानूनी प्रतिबंध है फिर भी अवैध रूप से यह व्यवसाय बड़े पैमाने पर हो रहा है।
vi. रजवाड़ों तथा सम्भात वर्ग ने शिकार को क्रीड़ा बनाया और एक ही बार में सैकड़ों वन्य जीवो को शिकार बनाया। व्यापारिक महत्व के लिए अभी भी पशुओं को मारा जा रहा है।
vii. प्रतिवर्ष आग से वनों को हानि होती है और साथ ही वन्य प्राणियों की प्रजातिया भी नष्ट हो जाती है।

भारत में वन्य प्राणी संरक्षण
(Wildlife Conservation in India)
भारतीय इतिहास में वन्य जीवों की सुरक्षा एक दीर्घकालिक परंपरा रही है। ईसा से 6000 वर्ष पूर्व आखेट-संग्राहक समाज में प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर विशेष ध्यान दिया मानव समाज की प्रारंभिक अवस्थाओं में लोग कुछ विनाश से बचाने का प्रयास करते रहे हैं। हिन्दू महाकाव्यों, बौद्व, जातकों, पंचतंत्र और जैन धर्मशास्त्रों सहित प्राचीन भारतीय में छोटे-छोटे जीवों के प्रति हिंसा के लिए दंड का पाल यह इस बात का पुष्ट प्रमाण है कि भारत की प्राचीन संस्कृति में वन्य जीवों को कितना सम्मान दिया जाता था। आज भी कुछ समदाय वन्य जीवों के संरक्षण के लिए पूरी तरह समर्पित है। राजस्थान के बिश्नोई पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए 29 सिद्धांतों का पालन करते हैं। महाराष्ट्र का मोरे समुदाय मोरों (मयूरों) और चूहों की सुरक्षा में अब भी विश्वास करता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कुछ प्रतिबंधों का वर्णन मिलता है।
तेजी से नष्ट होती जा रही वन्य जीवों की प्रजातियों को बचाने का भारत सरकार ने निर्णय कर लिया है। 1972 में ‘वन्य जीव सुरक्षा कानून‘ बनाया गया। इस कानून से वन्य जीवों की साक्षा को कानूनी रूप मिल गया है। जम्मू कश्मीर को छोड़कर सभी राज्या ने इस कानून को स्वीकार कर लिया है। जम्मू-कश्मीर में इसी तरह का अपना कानून पहले से है। इस अधिनियम के दो मुख्य उद्देश्य हैं, अधिनियम के तहत अनुसूची में सूचीबद्ध संकटापन्न प्रजातियों को सुरक्षा प्रदान करना तथा नेशनल पार्क, पशु विहार जैसे संरक्षित क्षेत्रों को कानूनी सहायत प्रदान करना। इस अधिनियम को 1991 में पूर्णतया संशोधित कर दिया गया जिसके तहत कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। इसमें कुछ पौधों की प्रजातियों को बचाने तथा संकटापन्न प्रजातियों के संरक्षण का प्रावधान है।
देश में 92 नेशनल पार्क और 492 वन्य प्राणी अभय वन हैं और ये 1.57 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर फैले हैं।
प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) 1973 में शुरू किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में बाघों की जनसंख्या को उचित स्तर पर बनाए रखना है ताकि वैज्ञानिक, सौन्दर्यात्मक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिकी मूल्य बनाए रखे जा सकें। इससे प्राकृतिक धरोहर को भी संरक्षण मिलेगा, जिसका लोगों को शिक्षा और मनोरंजन के रूप में लाभ होगा। प्रारंभ में यह योजना नौ बाघ निचयों (आरक्षित क्षेत्रों) में शुरू की गई थी और ये 16,339 वर्ग किलोमीटर पर फैली थी। अब यह योजना 27 बाघ निचयों में चल रही है और इनका क्षेत्रफल 37.761 वर्ग किलोमीटर है और 17 राज्यों में व्याप्त है। देश में बाघों की संख्या 1972 में 1,827 से बढ़कर 2001-02 में 3,642 हो गई। अभयारण्य प्रबंधन में संख्यात्मक मानकों को सुनिश्चित करने के साथ-साथ बाघ संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 4 सितम्बर, 2006 से राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया गया। वन्य-जीवों के अवैध व्यापार को नियंत्रित करने के बहुविषयी बाघ तथा अन्य संकटग्रस्त प्रजाति अपराध नियंत्रण ब्यौरों की स्थापना 6 जून, 2007 को की गई। बाघों की संख्या का सही अनुमान लगाने के लिए नई विधि अपनाई गई, जिसके अनुसार 93697 वर्ग किमी. क्षेत्र बाघों के लिए सुरक्षित रखा गया। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार बाघों की संख्या 1165 बताई गई है जो बहुत ही कम है।
प्रोजेक्ट ऐलीफेन्ट (Project Elephant) को फरवरी 1992 में लागू किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य हाथियों की संख्या को उनके प्राकृतिक पर्यावरण में लंबी अवधि तक निश्चित करना था। इस समय ये प्रोजेक्ट 13 राज्यों में चल रहा है। इन राज्यों के नाम आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मेघालय, नागालैंड, उड़ीसा, तमिलनाडु, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल हैं। वर्ष 2007 में हाथियों की गणना से यह स्पष्ट हुआ कि 2002 की तुलना में 2007 में हाथियों की संख्या में वृद्धि हुई। तीन हाथी अभ्यारण्यों की अनुमति दी गई। इनमें से दो छत्तीसगढ़ (लेमस और बादलखोड) तथा एक अरुणाचल प्रदेश (देवमाली) में है।
मगरमच्छ प्रजनन परियोजना 1975 में शुरू की गई थी। इसके अतिरिक्त हंगुल परियोजना और हिमालय कस्तूरी मृग परियोजना भी चलाई जा रही है। राष्ट्रीय उद्यान, एक या अनेक परितंत्रों वाला वृहत् क्षेत्र होता है। यह क्षेत्र मानव के शोषण और अधिग्रहण के द्वारा परिवर्तित नहीं हुआ है। विशिष्ट वैज्ञानिक शिक्षा और मनोरंजन के लिए इसके पेड़-पौधों और जीव जंतुओं की प्रजातियों, भू-आकृतिक स्थलों और आवासों को संरक्षित किया गया है। राष्ट्रीय उद्यान के समान वन्य जीव अभयारण्य भी वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए स्थापित राष्ट्रीय उद्यानों में संपूर्ण वन्य जीवों ( पारितंत्र) का है। वन्य जीव अभयारण्य वे स्थान या क्षेत्र हैं, जहां व पक्षी अपने प्राकृतिक पर्यावरण में रखे जाते हैं। बाघ आरक्षित क्षेत्र भारत में अभयारण्यों का एक विशिष्ट वर्ग है।
अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान में बहुत सूक्ष्म अंतर है। अभयारण्य में अनुमति के बिना शिकार करना मना है, लेकिन चराई और गौ-पशुओं का आना-जाना नियमित होता है। राष्ट्रीय उद्यानों में शिकार और चराई पूर्णतया वर्जित होते हैं। अभयारण्यों में मानवीय क्रियाकलापों की अब है लेकिन राष्ट्रीय उद्यानों में मानवीय हस्तक्षेप पूर्णतया वर्जित
चित्र 2.11 में राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य के वितरण को दर्शन गया है।