भारत का सादी किसे कहा जाता है | who is saadi of india in hindi कव्वाली का जनक कौन थे

By   March 23, 2021

father of qawwali in india in hindi who is saadi of india in hindi भारत का सादी किसे कहा जाता है | कव्वाली का जनक कौन थे  ?
मध्यकालीन भारतीय संगीत एवं प्रदर्शन कला
प्रश्न: सूफी संगीत
उत्तर: सूफी सन्तों ने सामूहिक गायन की परम्परा को स्वीकार कर संगीत को लोकप्रिय बनाया। गजल व कव्वाली की गायन शैली प्रसिद्ध हुई। गजल का संग्रह दीवान कहलाता था। अमीर हसन देहलवी को उसकी गजलों के कारण ‘‘भारत का सादी‘‘ कहा जाता है।
प्रश्न: कब्बाली परंपरा को प्रोत्साहन
उत्तर: कब्बाली एक प्रकार का सूफी भक्ति संगीत है जो कि भारत व पाकिस्तान में समान रूप से लोकप्रिय है। कब्बाली अरबी शब्द ‘कौल‘ से बना है जिसका अर्थ होता है बोलना। इसके गायक कब्बाल कहे जाते हैं। मध्यकालीन साहित्यकार अमीर खुसरों को कब्बाली का जन्मदाता माना जाता है। दक्षिण एशिया से बाहर कब्बाली को लोकप्रिय बनाने में पाकिस्तान के कब्बाल नुसरत फतेह अली खान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में कब्बाली के आयोजन को ‘मेहफिल-ए-शमां‘ औपचारिक नाम दिया गया है।

संगीत एवं प्रदर्शन कला
प्राचीन भारतीय संगीत एवं प्रदर्शन कला
प्रश्न: सैंधवकालीन नृत्य
उत्तर: खुदाई से दो मूर्तियां प्रकाश में आई- एक मोहनजोदड़ो काल की कांसे की मूर्ति और दूसरा हड़प्पा काल (2500-1500 ईसा पूर्व) का एक टूटा हुआ धड़। यह दोनों नृत्य मुद्राओं की सूचक हैं। बाद में नटराज आकृति के अग्रदूत के रूप में इसे पहचाना गया, जिसे आम तौर पर नृत्य करते हुए शिव के रूप में पहचाना जाता है।
प्रश्न: ताण्डव तथा लास्य नृत्य
उत्तर: नाट्यशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार नृत्य दो तरह का होता है; मार्गी (ताण्डव) तथा लास्य। ताण्डव नृत्य भगवान शंकर ने किया था। यह नृत्य अत्यंत पौरुष और शक्ति के साथ किया जाता है। लास्य एक कोमल नृत्य है जिसे भगवान कृष्ण गोपियों के साथ किया करते थे।
प्रश्न: आरम्भिक भारतीय शिलालेखों में अंकित ‘ताण्डव‘ नृत्य की विवेचना कीजिए।
उत्तर: भारत के प्राचीन आध्यात्मिक परिदृश्य में ‘ताण्डव‘ नृत्य का धार्मिक महत्व अधिक है। इस नृत्य को सृष्टि के चक्र से प्रभावित माना जाता है। इस नृत्य में महारुद्र के क्रोधित स्वरूप को दर्शाया गया है। ताण्डव नृत्य में सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह को सैद्धान्तिक आधार दिया गया है।
‘ताण्डव‘ नामकरण ‘तण्डु‘ से हुआ है जो भगवान शंकर का सहायक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तण्डु ने ‘नाट्यशास्त्र‘ के रचनाकार भरतमुनि को ‘ताण्डव‘ नृत्य की जानकारी दी। ताण्डव नृत्य की विभिन्न भंगिमाओं की चर्चा ‘नाट्यशास्त्र‘ के ‘ताण्डव लक्षणम्‘ परिच्छेद में की गई है। ‘भागवत पुराण‘ में कृष्ण द्वारा कालिया नाग को नियंत्रित करने के दौरान ‘ताण्डव‘ नृत्य करने की चर्चा मिलती है। तमिलनाडु के चिदम्बरम मंदिर में शिव का ताण्डव नृत्य मुद्रा में अंकन मिलता है। जैन परम्परा के अनुसार जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की प्रतिष्ठा में इन्द्र द्वारा ‘ताण्डव‘ नृत्य करने की बात की गई है।
प्रश्न: भरत मुनि का नाट्यशास्त्र एक संपूर्ण संगीत शास्त्र है। विवेचना कीजिए।
उत्तर: हमें भरतमुनि का नाट्य-शास्त्र शास्त्रीय नृत्य पर प्राचीन ग्रंथ के रूप में उपलब्ध है, जो नाटक, नृत्य और संगीत की कला की स्रोत पुस्तक है। आमतौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि दूसरी सदी ईसापूर्व दूसरी सदी ईसवी इस कार्य का समय है। नाट्य शास्त्र को पांचवें वेद के रूप में भी जाना जाता है। लेखक के अनुसार उसने इस वेद का विकास ऋग्वेद से शब्द, सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से मुद्राएं और अथर्ववेद से भाव लेकर किया है। यहां एक दंतकथा भी है कि भगवान ब्रह्मा ने स्वयं नाट्य वेद लिखा है, जिसमें 36,000 श्लोक हैं। नाट्य-शास्त्र में सूत्रबद्ध शास्त्रीय परम्परा की शैली में नृत्य और संगीत नाटक के अलंघनीय भाग हैं। नाट्य कला में इसके सभी मौलिक अंशों को रखा जाता है और कलाकार स्वयं नर्तक तथा गायक होता है। प्रस्तुतकर्ता स्वयं तीनों कार्यों को संयोजित करता है। समय के साथ-साथ नृत्य अपने आप नाट्य से अलग हो गया और स्वतंत्र तथा विशिष्ट कला के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
प्राचीन शोध-निबंधों के अनुसार नृत्य में तीन पहलुओं पर विचार किया जाता है- नाट्य, नृत्य और नृत्त। नाट्य में नाटकीय तत्व पर प्रकाश डाला जाता है। कथकली नृत्य-नाटक रूप के अतिरिक्त आज अधिकांश नृत्य-रूपों में इस पहलू को व्यवहार में कम लाया जाता है। नृत्य मौलिक अभिव्यक्ति है और यह विशेष रूप से एक विषय या विचार का प्रतिपादन करने के लिए प्रस्तुत किया जाता है। नृत्त दूसरे रूप से शुद्ध नृत्य है, जहां शरीर की गतिविधियां न तो किसी भाव का वर्णन करती हैं, और न ही वे किसी अर्थ को प्रतिपादित करती हैं। नृत्त और नाटय को प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए एक नर्तकी को नवरसों का संचार करने में प्रवीण होना चाहिए। यह नवरस हैं-श्रृंगार, हास्य, करूणा, वीर, रौद्र, भय, वीभत्स, अद्भुत और शांत। सभी शैलियों द्वारा प्राचीन वर्गीकरण- तांडव और लास्य का अनुकरण किया जाता है। तांडव पुरूषोचित, वीरोचित, निर्भीक और ओजस्वी है। लास्य स्त्रीयोचित, कोमल, लयात्मक और सुंदर है। अभिनय का विस्तारित अर्थ अभिव्यक्ति है। यह आंगिक, शरीर और अंगों वाचिक, और कथन अहार्य, वेशभूषा और अलंकार और सात्विक, भावों और अभिव्यक्तियों के द्वारा सम्पादित किया जाता है।
भरत और नंदीकेश्वर- दो प्रमुख ग्रंथकारों ने नृत्य का कला के रूप में विचार किया है, जिसमें मानव शरीर का उपयोग अभिव्यक्ति के वाहन के रूप में किया जाता है। शरीर (अंग) के प्रमुख मानवीय अंगों की सिर, धड़, ऊपरी और निचले अंगों के रूप में तथा छोटे मानवीय भागों (उपांगों) की ढोड़ी से लेकर भवों तक चेहरे के सभी भागों तथा अन्य छोटे जोडों के रूप में पहचान की जाती है। नाट्य के दो अतिरिक्त पहलू प्रस्तुतीकरण और शैली के प्रकार हैं। यहां प्रस्तुतीकरण के दो प्रकार हैं, जिनके नाम हैं- नाटयधर्मी, जो रंगमंच का औपचारिक प्रस्तुतीकरण है और दूसरा लोकधर्मी कई बार लोक, यर्थाथवादी, प्रकृतिवादी या प्रादेशिक के रूप में अनुवादित। शैली या वृत्ति को चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है- कैसकी, लास्य पहलू के संचार में ज्यादा अनुरूप, दक्ष गीतिकाव्यय अरबती, ओजस्वी पुरूषोचितय सतवती जब रासों का चित्रण किया जाता है तब अक्सर इसका उपयोग किया जाता है और भारती (शाब्दिक अंश)।
शताब्दियों के विकास के साथ भारत में नृत्य देश के विभिन्न भागों में विकसित हुआ। इनकी अपनी पृथक शैली ने उस विशेष प्रदेश की संस्कृति को ग्रहण कियाय प्रत्येक ने अपनी विशिष्टता प्राप्त की। अतः ‘कला‘ की अनेक प्रमुख शैलियां बनींय जिन्हें हम आज भरतनाटय, कथकली, कुचीपुड़ी, कथक, मणिपुरी और उड़ीससी के रूप में जानते हैं। यहां आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के नृत्य तथा प्रादेशिक विविधताएं हैं, जो सरल, मौसम के हर्षपूर्ण समारोहों, फसल और एक बच्चे के जन्म के अवसर से सम्बन्धित हैं। पवित्र आत्माओं के आह्वान हौर दुष्ट आत्माओं को शांत करने के लिए भी नृत्य किए जाते हैं। आज यहां आधुनिक प्रयोगात्मक नृत्य के लिए भी एक सम्पूर्ण नव निकाय है।
प्रश्न: मुगलकालीन संगीत कला
उत्तर: अकबर का काल संगीत कला की दृष्टि से सर्वोत्तम काल था। प्रमुख संगीतज्ञ तानसेन था जो ध्रुपदशैली का गायक था। उसे कण्ठाभरणवाणी विलास उपाधि दी गई थी। अन्य गैर-दरबारी संगीतज्ञों में बाजबहादुर, रामदास तथा बैजू बावरा प्रमुख थे। बाद में ध्रुपद का स्थान ख्याल गायन शैली ने लिया। जहांगीर कालीन प्रमुख संगीतज्ञ थे परवेज दाद, मक्खू, खुर्रमदाद, छत्रखाँ, मजहद। शाहजहां कालीन प्रमुख संगीतज्ञ थे – रामदास, लालखाँ, गुण समुन्दर, महापात्र, सुखसेन, दुर्गखां, प. जगन्नाथ तथा प. जनार्दन भट्ट। औरंगजेब ने संगीत कला को प्रोत्साहन नहीं दिया। मुहम्मद शाह रंगीला के समय में संगीत का विशेष विकास हआ। इस समय खुसरो शाह ने तबले का आविष्कार किया तथा कव्वाली की विभिन्न रागों का आविष्कार किया जो आज भी भारतीय संगीत कला की प्रमुख विशेषताएं हैं।
प्रश्न: सल्तनत काल में मुस्लिम शासकों के दरबार में विकसित संगीत कला पर एक लेख लिखिए।
उत्तर: संगीत ग्रंथ ‘घुनियात-उल-मुन्या‘ लिखा गया जिसका शाब्दिक अर्थ ‘इच्छा का आनन्द‘ है। इसकी रचना गुजरात के राज्यपाल मलिक शमसुद्दीन अबू राजा के निर्देश पर हुई। जो फिरोज तुगलक के समय में भी था। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण के महान् संगीतज्ञ ‘गोपाल नायक‘ को अपने दरबार में बुलाया। गयासुद्दीन तुगलक संगीत का विरोधी था। उसने साम्राज्य में संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया। फिरोज तुगलक के समय संगीत के शास्त्रीय ग्रन्थ ‘रागदर्पण‘ का फारसी अनुवाद हुआ। मुहम्मद बिन तुगलक भी संगीत प्रेमी था। उसके दरबार में 1200 गायक थे। लोदी काल में संगीत अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ। लज्जत-ए-सिकन्दरी नामक संगीत के ग्रन्थ की रचना सिकन्दर लोदी के काल में हुई।
प्रश्न: अमीर खुसरो का संगीत कला के विकास में योगदान बताइए।
उत्तर: इस्लाम में संगीत वर्जित है किन्तु सुल्तानों ने संगीत को संरक्षण दिया। तुर्क अपने साथ रबाब व सारंगी जैसे वाद्ययन्त्र लाये। अमीर खुसरो को सितार व तबले के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। मृदंग में परिवर्तन कर तबले का आविष्कार किया गया। सितार भारतीय व इस्लामी वाद्ययन्त्रों के समन्वय का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। सितार में भारतीय वीणा व ईरानी तम्बूरे का समन्वय था। अमीर खुसरो को मध्यकालीन संगीत का संस्थापक माना जाता है। उसने कव्वाली गायन को प्रचलित किया। अमीर खुसरो को तिलक, साजगिरी, सरपदा, औनम, घोर, सनम, जिलाफ आदि रागों को प्रचलित करने के कारण नायक की उपाधि प्रदान की गई।
प्रश्न: जौनपुर दरबार में संगीत कला के विकास पर एक लेख लिखिए।
उत्तर: जौनपर के शर्की सुल्तान हुसैन शाह ने ख्याल राग को भारतीय संगीत में शमिल किया। हुसैन शाह के काल में कई विद्वानों ने मिलकर संगीत शिरोमणि नामक एक श्रेष्ठ ग्रंथ की रचना की। जौनपुर में एक मुस्लिम विद्वान ने 1375 ई. में संगीत कला के एक अच्छे ग्रंथ ‘गुलयान-उल-मुनियास‘ की रचना की जो किसी मुस्लिम विद्वान द्वारा भारतीय संगीत पर प्रथम रचना है। हुसैन शाह शर्की ने रागों को बढ़ावा देते हुए ख्याल को फलावंती ख्याल के रूप में प्रस्तुत किया और कुछ नये राग जैसे राग-जौनपुर तोड़ी, सिन्धु भरैवी, सिन्दुरा तथा रसूली तोड़ी आदि का भी आविष्कार किया। इब्राहीम शाह शर्की (1402-40 ई.) के संरक्षण में संगीत शिरोमणि नामक ग्रन्थ की रचना हुई। जौनपुर का सूफी सन्त पीर बोधन भी महान संगीतज्ञ था। मालवा का शासक बाजबहादुर व उसकी पत्नी रूपमती भी संगीत प्रेमी थे।
प्रश्न: मध्यकालीन हिन्दू शासकों के दरबार में विकसित संगीत कला का विवरण दीजिए।
उत्तर: संगीत के क्षेत्र में सबसे पुराना ग्रन्थ ‘संगीत रत्नाकार‘ के नाम से जाना जाता है। इसकी रचना 1210-47 ई. के बीच में शारंगदेव (देवगिरी के यादव वंश के राजा के दरबारी संगीतज्ञ) के द्वारा की गई। संगीत रत्नाकर पर कल्लीनाथ (विजय नगर के मल्लिकार्जुन का दरबारी) की टीका भी संस्कृत में उपलब्ध है। केशव और सिंह भूपाल ने भी ‘संगीत रत्नाकर‘ पर टीकाएँ लिखी। 15वीं शताब्दी में गुजरात से दो अन्य रचनाएँ मिलीं। पहली रचना का नाम संगीत सुधारक है, जो सौराष्ट्र के शासक हरिपाल देव को समर्पित है। सर्वप्रथम इसी समय संगीत विद्या का विभाजन हिन्दुस्तानी व कर्नाटक शैली में हुआ।
ग्वालियर के राजा मानसिंह ने मान कौतूहल नामक संगीत ग्रंथ की रचना करवाई। उसके समय में ध्रुपद का सृजन हुआ। मान कौतूहल में मुस्लिम संगीत पद्धतियाँ भी शामिल की गई। भारतीय शास्त्रीय गायन की ध्रुपद शैली गैर इस्लामी प्रकृति की थी। मानसिंह ने जैनुल अबीदीन के पास संगीत की दो दुर्लभ पुस्तकें भेजी। तिरहुत के विद्यापति महान् संगीतज्ञ थे। उन्होंने कजरी नामक काव्य संगीत लिखा। चण्डीदास (बंगाल) ने राधा-कृष्ण के प्रेम पर अनेक लोकप्रिय गीतों की रचना की। 15वीं शताब्दी के मूल ग्रन्थों में लोचन कवि द्वारा रचित ‘रागतरंगिनी‘ का महत्वपूर्ण स्थान है। इसे लोचन कवि को समर्पित किया गया है। इसकी विशेषता रागों के नये प्रकार की विचार पद्धति में निहित है। विजयनगर दरबार में संगीत को संरक्षण – विजयनगर दक्षिण में संगीत का प्रमुख केन्द्र था। सबसे प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय संगीत शैली का ग्रंथ रमामात्य द्वारा लिखित ‘‘स्वरमेल कलानिधि‘‘ है।
भक्ति संगीत-बंगाल में चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तन शैली को जन्म दिया। यह उत्तरी भारत में काफी लोकप्रिय हुई। असम का संगीतकार शंकर बहुत विख्यात हुआ। बिहार के संगीतज्ञ ‘चिन्तामणि‘ को ‘बिहारी बुलबुल‘ की उपाधि दी गई।