आदि ब्रह्म समाज के संस्थापक कौन थे who established adi brahmo samaj in hindi founded aadi

By   September 2, 2021

who established adi brahmo samaj in hindi founded aadi आदि ब्रह्म समाज के संस्थापक कौन थे ?

उत्तर : 1865 में केशव चंद्र सेन ने इसकी स्थापना की थी |

राजा राममोहेहन राय एवं ब्रह्म्रह्म समाज
हिंदू धर्म में प्रथम सुधार आंदोलन ब्रह्म समाज था, जिसके प्रवर्तक राजाराम मोहन राय थे। वह एक बहुत बड़े विद्वान थे। उन्हें अरबी, फारसी, संस्कृत जैसी प्राच्य भाषाएं और अंग्रेजी, फ्रांसीसी, लातीनी, यूनानी और हिब्रू भाषाएं आती थीं। जिस समय पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित हो बंगाली युवक ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हो रहे थे, उस समय राजाराम मोहन राय हिंदू धर्म के रक्षक के रूप् में सामने आए। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया और अपने पक्ष को वेद की उक्तियों से सिद्ध करने का प्रयत्न किया। उन्होंने हिंदू धर्म के सिद्धांतों की पुनव्र्याख्या की और अपनी मानव सेवा के लिए उपनिषदों से पर्याप्त प्रमाण ढूंढे। उन्होंने ईसाई मत और यीशु के देवत्व को अस्वीकार कर दिया, किंतु यूरोपीय मानववाद को अवश्य स्वीकार किया।
सामाजिक क्षेत्र में फैली कुरीतियों सती प्रथा, बहुपत्नी प्रथा, वेश्यागमन, जातिवाद इत्यादि का घोर विरोध किया। विधवा पुनर्विवाह के भी वे प्रबल समर्थक थे। इन्हीं उद्देश्यों को लेकर उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की। उन्होंने कहा कि इस समाज का मूल उद्देश्य उस शाश्वत, सर्वाधार, अपरिवत्र्य, निराकार ईश्वर की पूजा है, जो समस्त विश्व का कर्ता और रक्षक है। वे स्वयं हिंदू रहे और यज्ञोपवीत पहनते रहे। 1833 में इनकी मृत्यु हो गई। आज भी लोग उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता मानते हैं।
राजाराम मोहन राय की मृत्यु के पश्चात् इस आंदोलन को दिशा दी महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर ने। वे इसमें 1842 में शामिल हुए और उन्होंने ब्रह्म धर्म अवलम्बियों को मूर्ति पूजा, तीर्थयात्रा, कर्मकाण्ड और प्रायश्चित इत्यादि से रोका। इनके बाद केशव चंद्र सेन ने अपनी उदार प्रवृत्ति के कारण कमान संभाली, किंतु इसमें फूट पड़नी शुरू हो गई। 1865 में केशव चंद्र सेन को उनकी प्रवृत्तियों के कारण आचार्य की पदवी से निकाल दिया गया। इन्होंने एक नए ब्रह्म समाज का गठन किया, जिसे ‘आदि ब्रह्म समाज’ कहा गया। 1878 में इस समाज में एक और फूट पड़ी। केशव चंद्र ब्रह्मसमाजियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु का प्रचार करते रहै, किंतु जब उन्होंने अपनी 13 वर्षीय बेटी का विवाह कूच बिहार के महाराजा से पूर्ण वैदिक कर्मका.ड से कर दिया तो इनके अनुयायियों ने एक नया समाज बनाया और उसे ‘साधारण ब्रह्म समाज’ का नाम दिया। शनैः-शनैः यह समाज अपना प्रभाव खोने लगा।
रामकृष्ण, विवेकेकानंद एवं हिंदू आध्यात्मिक जागरण
ब्रह्म समाज का उपदेशात्मक युक्तिवाद कई लोगों को प्रिय न लगा। रामकृष्ण परमहंस भी उनमें से एक थे। ये कलकत्ता की एक बस्ती में पुजारी थे। भारतीय विचार एवं संस्कृति में उनकी पूर्ण आस्था थी, परंतु वे सभी धर्मों को सत्य मानते थे। उनके अनुसार कृष्ण, हरि, राम, ईश्वर, अल्लाह सभी प्रभु के भिन्न-भिन्न नाम हैं। वह मूर्ति पूजा में विश्वास रखते थे और उसे शाश्वत्, सर्वशक्तिमान ईश्वर को प्राप्त करने का एक साधन मानते थे। परंतु, वह चिन्ह और कर्मकाण्ड की अपेक्षा आत्मा पर अधिक बल देते थे। वह ईश्वर प्राप्ति के लिए उसके प्रति निःस्वार्थ एवं अनन्य भक्ति में विश्वास करते थे। उन्होंने तांत्रिक, वैष्णव और अद्वैत तीनों साधनाएं की, फिर अंत में ‘निर्विकल्प समाधि’ की स्थिति को प्राप्त किया। इसके बाद वे परमहंस कहलाने लगे।
रामकृष्ण परमहंस के शिष्यों में से एक नरेंद्र नाथ दत्त थे, जो बाद में स्वामी विवेकानंद कहलाए। परमहंस की शिक्षाओं को वास्तविक तौर पर इन्होंने ही साकार किया। उन्होंने उनकी शिक्षा को आम भाषा में प्रस्तुत किया। 1893 में अमरीका के शिकागों में हुए ‘धर्म सम्मेलन’ में उनके व्याख्यान ने सबको चकित कर दिया था। साथ ही हिंदू धर्म को एक सामाजिक उद्देश्य भी प्रदान किया। उन्होंने कहा कि वे ऐसे धर्म में विश्वास नहीं करते, जो किसी विधवा के आंसू नहीं पोंछ सकता अथवा किसी अनाथ को रोटी नहीं दे सकता। उन्होंने कहा, ‘‘मैं उसी को महात्मा मानता हूं, जिसका मन निर्धन के लिए रोता है, अन्यथा वह दुरात्मा है। जब तक लाखों लोग भूख और अज्ञानता में रहते हैं, मैं प्रत्येक उस व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूं, जो उनके धन से विद्या प्राप्त करता है और फिर भी उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता।’’
स्वामी विवेकानंद ने परमहंस की मृत्यु के 11 वर्ष पश्चात् 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन समाज सुधार और सेवा के क्षेत्र की अग्रणी संस्थाओं में से एक है। अनेक धर्मार्थ औषधालय, चिकित्सालय, विद्यालय इसके तत्वाधान में चल रहे हैं। विवेकानंद अनन्य देशभक्त थे। भारत के राष्ट्रीय जागरण एवं हिंदू आध्यात्मवाद के उत्थान में उनकी विशेष भूमिका रही है।
प्रार्थना समाज
केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से 1867 में महाराष्ट्र में इसकी स्थापना की गई। महादेव गोविंद रानाडे इसके अगुआ थे।
ब्रह्म समाज और प्रार्थना समाज में मुख्य अंतर यह था कि ब्रह्मसमाजियों ने हिंदू धर्म के कमोबेश बाहर जाकर किसी संगठन की सहायता से हिंदूवाद की आलोचना की थी, जबकि प्रार्थना समाज के अनुयायियों ने हिंदू धर्म में रहकर एक हिंदू के रूप में ही प्रगतिशील सुधारों का समर्थन किया। हिंदुओं की सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं को युक्तिसंगत बनाना उनका मुख्य उद्देश्य था।
आर्य समाज
गुजरात की मौरवी रियासत के एक ब्राह्मण कुल में 1824 में जन्मे मूल शंकर, जो बाद में दयानंद के नाम से विख्यात हुए, ने वैदिक वाङ्मय, न्याय, दर्शन इत्यादि की शिक्षा ली और गृह त्यागकर 15 वर्षों तक घूमते रहे। 1860 में मथुरा में स्वामी विरजागंद जी से विस्तृत रूप में वेदों को समझा और आत्मसात् किया। 1863 में उन्होंने झूठे धर्मों का खण्डन करने के लिए ‘पाखण्ड खण्डिनी पताका’ लहराई। 1875 में उन्होंने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म को उसके शुद्ध रूप में पुनः स्थापित करना था। इन्होंने ‘वेद की ओर चलो’ का मंत्र दिया।
स्वामी दयानंद का कहना था कि अपनी बुद्धि का प्रयोग करो और वैदिक मंत्रों के अर्थों को अपनी तर्क-कसौटी पर कसो, तब जाकर उसे अपनाओ। उन्होंने वेद और उपनिषद् तक के साहित्य को शुद्ध माना, शेष को, विशेषकर पुराणों को, जिनमें मूर्तिपूजा, देवी.देवताओं तथा अवतारवाद का विवरण मिलता है, मनगढ़ंत कथाओं का समुच्चय माना। उन्होंने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद, पशुबलि, श्राद्ध और झूठे कर्मकाण्डों को कभी स्वीकार नहीं किया। वे पहले ऐसे सुधारक थे, जिन्होंने शूद्र तथा स्त्री को वेद पढ़ने और ऊंची शिक्षा प्राप्त करने, यज्ञोपवीत धारण करने एवं बराबरी हेतु आंदोलन चलाया। पुत्री को पुत्र के समान माना। बाल विवाह, शाश्वत वैधव्य, परदा, दहेज सभी बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया।
इनके सभी विचार उनकी पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में संकलित हैं। इन्होंने पाश्चात्य दर्शन, शिक्षा और समाज को पूरी तरह नकार दिया। उनका कहना था कि वेद और उपनिषद से परे कुछ नहीं और जिन रिवाजों, परंपराओं, कर्मकाण्डों की अनुमति वेद में नहीं है, उन्हें त्याग दिया जाए। 1886 में दयानंद ऐंग्लो वैदिक संस्थाएं प्रारंभ हुई। 1892-93 में आर्य समाज दो दलों में बंट गया।
तथापि, आर्य समाज ने धर्म और समाज में फैले अंधकार को दूर करने का प्रयास किया। इतना ही नहीं आर्य समाज ने ‘शुद्धि आंदोलन’, भी चलाया, जिसके अंतग्रत लोगों को अन्य धर्मों से हिंदू धर्म में लाने का प्रयत्न किया गया। स्वामी दयानंद के आर्थिक विचारों में स्वदेशी का विशेष महत्व था।