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values system in ethics in hindi मूल्य तंत्र किसे कहते है ? मूल्य व्यवस्था की परिभाषा क्या है नीतिशास्त्र में ?
मूल्यतंत्र (मूल्य व्यवस्था)
नैतिक मूल्यों का संबंध ‘स्व‘ से है। यहां ‘स्व‘ का अर्थ बुद्धि तथा भावना से है जो संयुक्त रूप से ‘आत्मा‘ के अर्थ में समझा जाता है। यह व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है। चूंकि नैतिक मूल्यों की संख्या एक से अधिक है अतः इन्हें समग्र रूप से मूल्य व्यवस्था (मूल्यतंत्र) के रूप में समझा जा सकता है। मूल्य-तंत्र अथवा मूल्यों की व्यवस्था एक स्थायी संगठन के समान होती है जो मानव आस्तित्व के विभिन्न स्तरों या आयामों के साथ व्यक्ति के अनुकूलन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण प्रोत्साहन प्रदान करती व उनका मार्गदर्शन भी करती है। मूल्यों की इस व्यवस्था में किसी दो मूल्यों का महत्ता के बीच सापेक्ष संबंध होता है। उदाहरणस्वरूप ‘ईमानदारी‘ एक व्यक्ति के लिए ‘सफलता‘ के मुकाबले अधिक वांछनीय हो सकती है क्योंकि उसकी नजर में ईमानदारी सफलता से अधिक मूल्यवान है। परन्तु अन्य व्यक्ति इसके ठीक विपरीत भी सोच सकता है।

नीतिशास्त्र और लोक प्रशासन
आज के बदलते सामाजिक आर्थिक व प्रशासनिक सन्दर्भों में नीतिशास्त्र अत्यधिक प्रासंगिक हो गया है तथा इसकी पहुंच अब लोक प्रशासन तक हो चुकी है। वस्तुतः नीतिशास्त्र का मानव अस्तित्व के विभिन्न आयामों से कार्यात्मक संबंध है। प्रस्तुत शीर्षक के अंतर्गत हम नीतिशास्त्र के विभिन्न पक्षों को लोक प्रशासन के संदर्भ में समझेंगे। सामान्य तौर पर कुछ सूत्रों (नियमों) के सहारे इन पक्षों को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। ये हैं:
विवेकपूर्णता एवं वैधता का सूत्रः नियम और कानून इसलिए बनाए जाते हैं ताकि विभिन्न प्रकार की नीतियों एवं इनसे जुड़े निर्णयों का कार्यान्वयन एवं संचालन किया जा सके। अतः एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि वह इन नियमों व कानूनों का अक्षरशः पालन करे।।
उत्तरदायित्व एवं जवाबदेयता का सूत्रः एक प्रशासक से यह उम्मीद की जाती है कि अपने निर्णयों एवं कार्यवाहियों की जवाबदेही लेने से वह न हिचके। स्वविवेक से किए गए निर्णयों एवं कार्यवाहियों के लिए वह स्वयं को ही नैतिक रूप से जिम्मेदार समझे। यही नहीं बल्कि अपने से ऊपर के अधिकारियों के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करे। इसके अलावा उन लोगों के प्रति भी स्वेच्छा से जवाबदेयता स्वीकार करे जो उसके कार्यों एवं निर्णय से लाभान्वित होते हैं।
कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता का सूत्रः एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि वह अपने कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्ध रहे तथा अपने कार्यों का निष्पादन पूरी संलग्नता, बुद्धिमत्ता एवं दक्षता के साथ करे। जैसा कि स्वामी विवेकानन्द ने कहा है, ‘‘प्रत्येक कार्य पवित्र होता है तथा अपने कर्तव्य के प्रति श्रद्धा ही पूजा-अर्चना का सर्वोत्तम रूप है।‘‘ इन विचारों को अपनाने का अर्थ है कि व्यक्ति समयनिष्ठ है, समय का आदर करता है एवं स्वयं के द्वारा किए गए वादों क प्रति भी ईमानदार है। वस्तुतः कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का वहन एक बोझ के समान नहीं होता बल्कि यह तो समाज की सेवा तथा उसके प्रति रचनात्मक योगदान देने का एक अवसर होता है।
श्रेष्ठता का सूत्रः एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि अपने प्रशासनिक कार्यों व निर्णयों के दौरान वह सर्वोत्तम मानक अपनाएगा तथा सुविधा एव आत्मसंतुष्टि के लालच में किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। वर्तमान में अन्तरराष्ट्रीय परिवेश में तीव्र प्रतिस्पद्र्धा है। अतः एक प्रशासनिक तंत्र के लिए यह आवश्यक है कि वह उत्कृष्ट एवं व्यापक प्रबंध कौशल के सभी शर्तों को पूरा करे।
संयोजन का सूत्रः एक प्रशासक व्यक्ति, संगटन तथा समाज से जुड़े लक्ष्यों में कोई फर्क नहीं करेगा बल्कि उद्देश्य की एकता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। यही नहीं अपने आचरण से भी वह उद्देश्य की एकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखलाएगा तथा हितों के बीच संघर्ष की स्थिति में वह नैतिक मानदंडों के आधार पर नित्य सही चुनाव करेगा।
अनुक्रियाशीलता एवं लचीलापन का सूत्रः एक प्रशासक से यह आशा की जाती है वह प्रशासन के अन्दर व बाहर की चुनौतियों के प्रति प्रभावशाली एवं सकारात्मक रवैया अपनाए एवं बदलते परिवेश के साथ सामंजस्य बिठाने के दौरान नैतिक आदर्शों से न डिगे। नैतिक मानकों से परे जाने की स्थिति में भी एक प्रशासनिक तंत्र में इतना लचीलापन अवश्य होना चाहिए ताकि अवसर आने पर यथा शीघ्र इसे नैतिक मानकों के अनुरूप ढाला जा सके।
उपयोगितावाद का सूत्रः एक प्रशासक से इस बात की आशा की जाती है कि नीतियों एवं निर्णयों के निर्माण एवं कार्यान्वयन के दौरान वह अधिकतम लोगों का अधिक कल्याण सुनिश्चित करे।
करूणा एवं संवेदनशीलता का सूत्रः एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपने स्वविवेक का प्रयोग करते हुए वह गरीब, कमजोर तथा असहायों के प्रति करुणा व संवेदनशीलता का दृष्टिकोण अपनाए और इस दौरान वह प्रचलित नियमों व कानूनों की अवज्ञा भी न करे । कम से कम वह इस बात को अवश्य सुनिश्चित करे कि समाज के कमजोर वर्ग उसके द्वारा दिए लाभों से वंचित न हो सिर्फ इसलिए कि वे कमजोर और पिछड़े हैं। दूसरे शब्दों में, समाज के सबल को सिर्फ इसलिए लाभ न मिले क्योंकि वे समाज के सशक्त व प्रभावशाली तबके से है।
राष्ट्रीय हित का सूत्रः वैसे तो लोक सेवक उदार चरित्र एवं व्यापक दृष्टिकोण वाले समझे जाते हैं परंतु फिर भी इनसे इस बात की आशा की जाती है कि अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखेंगे कि उनके कार्यों से राष्ट्र की शक्ति व प्रतिष्ठा का कोई प्रतिकूल असर न पड़े। इससे राष्ट्र के प्रति उनकी सेवा की गुणवत्ता बढ़ेगी। जापान, कोरिया, जर्मनी तथा चीन की आम जनता तथा लोक सेवक शासकीय कर्तव्यों के निष्पादन के दौरान अपने राष्ट्र की प्रतिष्ठा और गरिमा का हमेशा ध्यान रखते हैं।
न्याय का सूत्रः ऐसा समूह जो शासन से संबंधित नीतियों एवं निर्णयों के निर्माण एवं संचालन के लिए उत्तरदायी हैं, से आशा की जाती है कि वे इस बात को सुनिश्चित करेंगे कि शासन के दौरान समानता, निष्पक्षता, न्यायसंगतता तथा वस्तुनिष्ठता के नियमों का पालन किया जा रहा है तथा किसी व्यक्ति को सिर्फ शक्ति, सत्ता, वर्ग, जाति, लिंग या धन के आधार पर अनावश्यक लाभ तो नहीं मिल रहा है।
पारदर्शिता का सूत्रः एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि उसके द्वारा लिए गए निर्णय एवं उसके कार्यान्वयन में पारदर्शिता हो ताकि वे लोग भी जो इन निर्णयों से लाभान्वित हुए हों, निर्णय के औचित्य का मूल्यांकन कर पाएं तथा यह भी जान पाएं कि आखिर सूचनाओं के वे स्रोत क्या हैं जिनके आधार पर इस तरह के निर्णय लिए जाते है।
ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठता का सूत्रः एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि उसकी प्रशासनिक कार्यवाही ईमानदारी पर आधारित हो तथा अपनी शक्ति, प्रतिष्ठा व स्वविवेक का प्रयोग वह स्वयं के हित में या फिर अन्य लोगों को गैर-जरूरी लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से न करे।