बेरोजगारी किसे कहते हैं | बेरोजगारी और नौकरी हीनता में अंतर क्या है unemployment in hindi meaning

By   March 6, 2021

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परिभाषा : जब किसी व्यक्ति के पास अपने जीवन यापन के लिए कोई साधन या नौकरी उपलब्ध नहीं होती है तो इसे बेरोजगारी और उस व्यक्ति को बेरोजगार कहा जाता है |

बेरोजगारी और नौकरी हीनता
बेरोजगारी और नौकरीहीनता का अध्ययन रोजगार के स्वरूप में कैसी वृद्धि हो रही है उस पर विचार करने का एक अन्य तरीका है। यहाँ हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि नौकरीहीनता और बेरोजगारी में थोड़ा अंतर है। बेरोजगारी में जहाँ सभी प्रकार की बेरोजगारी शामिल है, नौकरीहीनता का अभिप्राय नौकरी की समाप्ति है। इसलिए बेरोजगारी में नौकरीहीनता सम्मिलित है किंतु नौकरीहीनता में बेरोजगारी सम्मिलित नहीं है। नौकरीहीनता की स्थिति तब आती है जब कोई क्षेत्र अचानक अपना बाजार खो बैठता है और आयात, अथवा अर्थव्यवस्था में अन्यत्र प्रतिस्पर्धी क्षेत्र के विकास या प्रतिकूल नीतिगत परिवर्तनों के कारण कम प्रतिस्पर्धी रह जाता है।

भारतीय संदर्भ में, नौकरीहीनता के संबंध में स्पष्ट आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। तथापि, फर्मों की स्थापना और उनके बंद होने के संबंध में ए एस आई आँकड़ों का उपयोग करके इसे मापा जा सकता है। राय (2001) ने इस तरह का अनुमान लगाने का प्रयास किया है। उनके अध्ययन के अनुसार, इकाइयों के बंद होने से 1980 और 1990 के बीच 2.14 मिलियन नौकरियाँ छूट गई। इस तथ्य के मद्देनजर कि यह दशक नौकरीविहीन वृद्धि का था, यह आश्चर्यजनक नहीं है। नब्बे के दशक में इस स्थिति में सुधार हुआ है। विशेषकर, 1990 और 1997 के बीच जब निर्गत वृद्धि दर में और वृद्धि हुई और रोजगार में भी वृद्धि होना शुरू हुआ, सिर्फ 0.45 मिलियन नौकरियाँ छूटी। इसके विपरीत, मंदी प्रभावित 1997-98 में अकेले नौकरी छूटने की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई और यह 0.29 मिलियन तक पहुँच गया। यह वर्ष 1990 में 1.4 मिलियन नौकरियाँ छूटने की अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के अनुरूप है। इन आँकड़ों को देखकर, और विशेषकर पिछले कुछ वर्षों में नौकरी छूटने की घटना में हुई आकस्मिक वृद्धि के कारण नौकरीहीनता की प्रवृत्ति पर चिन्ता और बढ़ गई है।

नौकरीहीनता, चूँकि दिवालियापन और उत्पादन इकाई के बंद होने से संबंधित है, संबंधित माप रुग्ण (अर्थात् वित्तीय रूप से संकट में और संभवतया बंद) इकाइयों में कार्यरत कर्मकारों की संख्या है। इन फर्मों में नौकरियाँ (अथवा रोजगार) या तो छूट चुकी हैं अथवा भविष्य में छूट जाने की संभावना है, और उन्हें मोटे तौर पर संकट में नौकरीश् कहा जा सकता है। औद्योगिक और वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (बी आई एफ आर) के अनुसार, सन् 2000 में ‘रुग्ण‘ इकाई के रूप में पंजीकृत इकाइयों की संख्या बढ़कर 3296 हो गई जिसमें 1.88 मिलियन कर्मकार कार्यरत थे, जो कि संगठित उद्योग में श्रमबल का 20 प्रतिशत है। इसलिए औद्योगिक नौकरियों का 20 प्रतिशत वास्तव में संकट में था इससे पता चलता है कि भारतीय उद्योग को प्रतिस्पर्धापूर्ण नए वातावरण में समायोजन करने में कठिनाई हो रही है तथा कई पुराने फर्म वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। तथापि, यह आर्थिक सुधारों के संदर्भ में अस्वाभाविक नहीं है।

औद्योगिक क्षेत्र से बाहर, बेरोजगारी का अर्थव्यवस्था-व्यापी माप राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (एन एस एस ओ) द्वारा एकत्रित पारिवारिक सर्वेक्षण आँकड़ा और राज्य सरकारों द्वारा एकत्रित रोजगार कार्यालय आँकड़ा में से प्राप्त किया जा सकता है। एन एस एस ओ पाँच वर्षों के अंतराल में परिवारों के रोजगार विवरणों के संबंध में आर्थिक सर्वेक्षण करता है। वर्ष 1987-88 और 1993-94 के उनके आँकड़ों के अनुसार इस समयावधि में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में तथा महिलाओं और पुरुषों दोनों में तथा न्यूनाधिक सभी शैक्षणिक स्तरों में बेरोजगारी में गिरावट आई है। यह औद्योगिक रोजगार के दृश्य के अनुरूप ही प्रतीत होता है (अर्थात् नब्बे के दशक में विकास) जैसा कि हमने पहले देखा है। लगभग 30 प्रतिशत वयस्क पुरुषों (15 वर्ष की आयु से अधिक के) बेरोजगार होने की बात कही गई है।
रोजगार कार्यालयों की रिक्ति रजिस्टर में नौकरी खोजने वालों का नाम दर्ज किया जाता है। इस स्रोत के अनुसार सन् 1970 में बेरोजगारों की कुल संख्या 4.06 मिलियन से बढ़कर 1987 में 30.24 मिलियन हो गई है जो कि लगभग सात गुणा वृद्धि है। इस समयावधि में बेराजगारी की वृद्धि दर 1980 के दशक (9.85 प्रतिशत) की तुलना में सत्तर के दशक में अधिक तीव्र (13.86 प्रतिशत) रही। वर्ष 1994 में नौकरी खोजने वालों की संख्या बढ़ कर 45 मिलियन हो गयी।

बोध प्रश्न 5
1) ‘बेरोजगारी‘ और ‘नौकरी हीनता‘ के बीच विभेद कीजिए।
2) नौकरीहीनता की समस्या सामान्यतया कब पैदा होती है?
3) सही के लिए (हाँ) और गलत के लिए (नहीं) लिखिए।
क) एन एस एस ओ आँकड़ा के अनुसार अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी बढ़ रही है। ( )
ख) नौकरी हीनता का माप करना कठिन है। ( )
ग) रुग्ण उद्योगों में कार्यरत कर्मकारों पर नौकरी छूटने का खतरा नहीं होता है। ( )

बोध प्रश्न 6 उत्तरमाला 
1) 1, 2 और 3 के लिए भाग 30.7 देखिए।
2) (क) नहीं (ख) नहीं (ग) हाँ।

विसमुच्चय दृश्य
हमने अब तक औद्योगिक रोजगार का बिल्कुल समुच्च्य चित्र प्रस्तुत किया है। अब हम कुछ विसमुच्च्य श्रेणियों पर चर्चा करेंगे।

विशेष उद्योगः पहले हम उन उद्योगों पर दृष्टि डालते हैं जिनमें रोजगार का सृजन अधिक होता है। तालिका 30.3 से पता चलता है कि 26 औद्योगिक समूहों में से मुख्यतः 8 ही अधिसंख्य कर्मकारों को रोजगार देने का उत्तरदायित्व वहन कर रहे हैं। रोजगार के मामले में कुल मिलाकर उनका हिस्सा आधे से भी ज्यादा है और निर्गत में भी उनका हिस्सा लगभग आधे के बराबर ही है।

सार्वजनिक क्षेत्र
पचास के दशक के मध्य दूसरी पंचवर्षीय योजना आरम्भ करने के समय यह बिलकुल स्पष्ट था कि सरकार अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अधिक सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए कृत संकल्प थी। किंतु, मूलतरू इस भूमिका को आधारभूत संरचना रिलवे, सड़क इत्यादि) और कुछ बुनियादी उद्योगों (जैसे इस्पात, पेट्रोलियम उत्पाद) के निर्माण तक ही सीमित रहना था। परंतु, साठ के दशक के उत्तरार्द्ध से अन्य क्षेत्रों में भी इस भूमिका का विस्तार हुआ । जहाँ अनेक नियंत्रणकारी उपाय जैसे लाइसेंस पद्धति, अत्यधिक टैरिफ और आयात पर प्रतिबन्धों ने निजी उद्योग और व्यवसाय की भूमिका को कम किया, उपक्रमों पर सीधे स्वामित्व से सरकारी विनियमन और प्रबन्धन का स्वरूप और अधिक प्रभावी हुआ। यह सरकार की हस्तक्षेपवादी नीति के तहत निर्धारित विभिन्न सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों के भी अनुरूप था। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में और सत्तर के दशक में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की संख्या में भारी वृद्धि (1966 में 77 से 1980 में 180, देखिए तालिका 30.4) हुई। बाद के दशकों में वृद्धि की गति धीमी हुई और अंत्तः 1990 के दशक से सरकार ने ‘राष्ट्रीयकरण‘ की अपनी नीति में परिवर्तन किया तथा ‘निजीकरण‘ की नीति अपना ली। इसका बिल्कुल सीधा अर्थ यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की संख्या में गिरावट आ सकती है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के कई विद्यमान उपक्रमों को निजी क्षेत्र के बोली लगाने वालों के हाथ बेच दिया जाएगा। चूँकि सरकारी स्वामित्व का एक मुख्य उद्देश्य रोजगार का सृजन था, नीति में यह परिवर्तन कुछ चिन्ता पैदा करता है। राष्ट्रीयकरण के आरम्भिक वर्षों में इस क्षेत्र में रोजगार की तेजी से वृद्धि हुई किंतु अस्सी के दशक के बाद, आवश्यकता से अधिक श्रमिकों और उससे संभावित हानि की आशंका से, सरकार ने विभिन्न तरीकों के माध्यम से श्रमबल को युक्तिसंगत बनाने का कार्य शुरू कर दिया।

इसमें रिक्त पदों को नहीं भरना, अनेक पदों को समाप्त करना, कर्मकारों को निर्धारित समय से पूर्व सेवानिवृत्ति लेने इत्यादि के लिए प्रेरित करना सम्मिलित है। परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र में रोजगार की कुल संख्या में हास हुआ। इस चरण को चित्र 30.1 में ग्राफ के माध्यम से दिखाया गया है जहाँ हमने विस्तृत वार्षिक आँकड़ा प्रस्तुत किया है। रोजगार में गिरावट के कारण, किंतु इकाइयों की संख्या यथावत् रहने से वर्ष 1980 में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति उपक्रम 11 हजार रोजगार (अर्थात् सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम का औसत आकार) में गिरावट आई तथा यह 1995 में 8 हजार से कुछ अधिक रह गया। इतना होने पर भी सार्वजनिक क्षेत्र के एक औसत उपक्रम में रोजगार अभी भी अर्थव्यवस्था की एक औसत औद्योगिक इकाई की तुलना में बहुत ज्यादा (लगभग 100 गुणा) है। इसका कारण यह भी है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम मुख्य रूप से बृहत्-पूँजी-सघन बुनियादी वस्तु क्षेत्र में कार्यरत हैं।

लघु उद्योग क्षेत्रः ऐसा प्रतीत होता है कि लघु उद्योगों का कार्य निष्पादन फैक्टरी सेक्टर की तुलना में अधिक अच्छा रहा है। भारत उन गिने-चुने देशों में से एक है जिन्होंने उत्पाद आरक्षण, उत्पाद शुल्क में छूट, राज सहायता प्राप्त (सब्सिडाइज्ड) ऋण इत्यादि के रूप में विशेष लघु उद्योगोन्मुखी नीति का लम्बे समय तक अनुसरण किया है। हालाँकि, विगत दस वर्षों में लघु उद्योगों के लिए आरक्षित उत्पादों की संख्या में भारी कमी आई है फिर भी मोटे तौर पर संवर्द्धनात्मक नीति अभी भी जारी है। किंतु शोधकर्ताओं की दृष्टि में लघु उद्योगों के लिए कोई भी क्रमबद्ध और विश्वसनीय आधारभूत आँकड़ा नहीं है। उद्योग मंत्रालय द्वारा दिए जाने वाले आँकड़े के साथ एक गंभीर समस्या यह है कि लघु उद्योग की परिभाषा में, जो पूँजी के अंकित मूल्य पर आधारित है, बार-बार परिवर्तन होता रहता है । इसके कारण, शोधकर्ता गैर सरकारी सर्वेक्षणों पर अथवा अन्य स्रोतों जैसे जनगणना या राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण आँकड़ा पर निर्भर करते रहे हैं।

तथापि, यहाँ हम उद्योग मंत्रालय के आँकड़ों का उपयोग करेंगे तथा जनगणना से कुछ अनुमानों का भी संदर्भ लेंगे। आँकड़ों की अनुरूपता की समस्या के साथ-साथ अर्थशास्त्री सामान्यतया इस बात से भी सहमत हैं कि पिछले दो तीन दशकों में शुरू से अंत तक लघु उद्योगों में गतिशीलता और वृद्धि दिखाई पड़ती है। जैसा कि तालिका 30.5 में दर्शाया गया है, इस क्षेत्र में 1995 और 1998 के बीच रोजगार में तीन गुणा वृद्धि हुई है और यह 1.71 करोड़ तक पहुँच गया है जो कि समस्त फैक्टरी सेक्टर रोजगार से काफी अधिक है। इतना ही नहीं, रोजगार में तब भी समरूप वृद्धि हुई जब अस्सी के दशक में बृहत् फैक्टरियों में रोजगार में स्पष्ट गिरावट दर्ज की गई थी। तथापि, रोजगार की वृद्धि दर दिखिए तालिका 30.6) हालाँकि अभी भी महत्त्वपूर्ण रूप से सकारात्मक है, सत्तर के दशक में प्रभावशाली 8.7 प्रतिशत से गिर कर नब्बे के दशक में 4 प्रतिशत के साधारण स्तर तक आ गया है और इसमें निर्गत वृद्धि दरों की अपेक्षा कम वृद्धि के रूप में देखा गया जैसा कि बृहत् फैक्टरियों के मामले में है। समय बीतने के साथ एक छोटी फैक्टरी का औसत आकार (कर्मचारी के मामले में) और छोटा होता जा रहा है।

छोटे फैक्टरियों में रोजगार का वैकल्पिक माप गैर पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र, जिसमें मुख्य रूप से छोटे फैक्टरी (किंतु निश्चित तौर पर पंजीकृत छोटे फैक्टरियों को छोड़ देते हैं, इसमें से कुछ ए एस आई आँकड़ों द्वारा कवर किए जा सकते हैं) सम्मिलित हैं, के रोजगार अनुमानों में पाया जा सकता है। जनगणना आँकड़ों से निकाले गए ऐसे अनुमानों से पता चलता है कि 1981 में इस क्षेत्र में रोजगार 13.58 मिलियन (1.35 करोड़) था जो 1991 में बढ़ कर 15.64 मिलियन हो गया और आरम्भिक रिपोर्टों के अनुसार 2001 में 28.20 मिलियन तक पहुँच गया है – अर्थात् विगत दस वर्षों में इस क्षेत्र में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

बोध प्रश्न 4
1) कुछ उद्योगों का नाम बताएँ जिनमें सत्त् रूप से अधिक रोजगार का सृजन हुआ है।
2) सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (पी एस यू) में रोजगार की प्रवृत्ति क्या रही है, चर्चा कीजिए।
3) रोजगार में, कुल स्तरों और वृद्धि दरों दोनों के संदर्भ में, लघु उद्योगों के योगदान पर चर्चा कीजिए।
4) सही के लिए (हाँ) और गलत के लिए (नहीं) लिखिए।
क) फैक्टरी क्षेत्र की अपेक्षा लघु क्षेत्र में रोजगार की वृद्धि दर कम रही है। ( )
ख) सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में अभी भी रोजगार में वृद्धि हो रही है। ( )
ग) रोजगार में खाद्य और खाद्य उत्पाद उद्योगों का हिस्सा 10 प्रतिशत से कम है। ( )
घ) सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की संख्या में अधिकांश वृद्धि 1960 और 1980 के बीच हुई है। ( )
ड.) वर्ष 1980 तक, सरकार की आर्थिक नीति मुक्त-बाजारोन्मुखी नहीं थी। ( )