कार्बोहाइड्रेट के प्रकार कितने होते हैं , type of carbohydrate in hindi महत्व का वर्णन कीजिए

जाने कार्बोहाइड्रेट के प्रकार कितने होते हैं , type of carbohydrate in hindi महत्व का वर्णन कीजिए ?

कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates)

कार्बोहाइड्रेट कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन युक्त कार्बनिक पदार्थ है। पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) से कार्बोहाइड्रेट का सर्वप्रथम संश्लेषण पादपों की हरितपर्ण (chlorophyll) युक्त कोशिकाओं में CO2 एवं जल H2O से होता है। कार्बोहाइड्रेट दो शब्दों से मिलकर बना है- कार्बन एवं हाइड्रेट्स (hydrates) तथा इस शब्द का अर्थ है कार्बन के हाइड्रेट अथवा जलायोजित कार्बन से होता है। सभी कार्बोहाइड्रेट में हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का अनुपात 2:1 होता है। सरल कार्बोहाइड्रेट का मूलानुपात सूत्र (emperical formula) Cx (H2O), होता है। उदाहरणतः ग्लूकोस, गैलेक्टोस एवं फ्रक्टोस का सूत्र C6H12O6 है। कुछ जटिल कार्बोहाइड्रेटों में कार्बन हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन के अतिरिक्त नाइट्रोजन, सल्फर अथवा फास्फोरस तत्त्व भी उपस्थित होते हैं। उदाहरण ग्लूकोसेमिन (C6 H13O5 N) एवं इनमें H एवं O का अनुपात भी 2: 1 नहीं होता ।

सभी कार्बोहाइड्रेट में आवश्यक रूप से एल्डिहाइड ( – CHO) तथा कीटोन (-CO) समूह तथा कम से कम एक कार्बन अणु से संलग्न हाइड्रोक्सिल (OH) समूह होते हैं। यह इनकी पहचान है। उदाहरण के रूप में लैक्टिक अम्ल का सूत्र भी C3H6O3 है किन्तु इसमें -CHO अथवा C = 0 समूह नहीं होते बल्कि कार्बोक्सिल ( – COOH) एवं H+ समूह होते हैं। अतः कार्बोहाइड्रेट की परिभाषा इस प्रकार है- पॉलीहाइड्रॉक्सी (Polyhydroxy) एल्डिहाइड अथवा कीटोन, उनके व्युत्पन्न (derivatives) तथा ऐसे पदार्थ जो जलअपघटन के फलस्वरूप उपरोक्त पदार्थ बनाते हैं, कार्बोहाइड्रेट कहलाते हैं।

महत्व (Importance)

विभिन्न पादपों एवं जन्तुओं में पाये जाने वाले मुख्य जैविक अणुओं (biomolecules) के समूहों तथा प्रोटीन, लिपिङ, न्यूक्लिक अम्ल एवं कार्बोहाइड्रेट में से कार्बोहाइड्रेट सर्वाधिक पाया जाने वाला समूह है।

सादपों एवं अन्य प्राणियों में कार्बोहाइड्रेट ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। पादपों में विशेषतः कोशिका भित्ति का अधिकांश भाग इन्हीं से निर्मित होता है। सभी सजीवों में कार्बोहाइड्रेट का उपयोग विभिन्न जैव पदार्थों यथा लिपिड न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन, इत्यादि के संश्लेषण में भी होता है। इनके ऑक्सीकरण के दौरान बने उपउत्पाद (byproducts) अन्य जैव अणुओं के संश्लेषण में उपयोग होते हैं।

नामकरण एवं वर्गीकरण (Nomenclature and Classification)

कार्बोहाइड्रेट को उनकी संरचना एवं संगठन के आधार पर तीन मुख्य समूहों में बांटा जाता है। एकल शर्करा अथवा मोनोसैकराइड (Monosaccharide), ओलिगोसैकराइड (Oligosaccharide), एवं बहुशर्करा अथवा पोलीसैकराइड (polysaccharide)

कार्बोहाइड्रेट ( Carbohydrates)

मोनोसैकराइड                       ओलिगोसैकराइड            पॉलीसैकराइड

(Monosaccharides)        (Oligosaccharides)      (Polysaccharide)

एकल शर्करा अणु              दो नौ शर्करा अणु               अनेक शर्करा अणु

मोनोसैकराइड (Monosaccharide)

ये सर्वाधिक सरल प्रकार के कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो सरल शर्कराएँ (simple sugars) होती हैं। इनमें सामान्यतः 3 से

6 / कभी कभी 7) कार्बन युक्त शर्कराएँ शामिल की जाती हैं तथा उपस्थित कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर इनका नामकरण किया जाता है। इनमें एक एल्डिहाइड (CHO) अथवा एक कीटोन (C=O) समूह तथा दो अथवा अ हाइड्रोक्सिल (OH) समूह होते हैं।

तालिका – 1 : विभिन्न प्रकार के मोनोसैकराइड

क्रम संख्या कार्बन अणु के आधार पर नाम

 

मूलानुपाती

सूत्र

-CHO समूह युक्त एल्डो शर्करा -C=O समूह युक्त कीटो शर्करा
1.

2.

3.

4.

5.

ट्राइओज़ (Triose)

टैट्रोज़

पेन्टोज

हैक्सोज

हैप्टोज

 

 

C3H6O3

C4H8O4

C5H10O5

C6H12O6

C7H14O7

 

ग्लिसरैल्डिहाइड

इरिथ्रोज़

राइबोज़

ग्लूकोज, गैलैक्टोज़

ग्लूकोप्टोज़

 

डाइहाइड्रॉक्सी ऐसीटोन

इरिथुलोज़

राइबुलोज़

फ्रक्टोज़

सीडी टुलोज़

 

 

[कीटोन अथवा एल्डिहाइड समूह के आधार पर इन शर्कराओं को एल्डो शर्करा (aldo sugars) अथवा कीटो शर्करा (keto sugars) में बांटा जा सकता है। वर्गीकरण की एक अन्य पद्धति के अनुसार दोनों नामों को मिलाकार एक कर दिया गया है। उदाहरणार्थ-एल्डोट्राइओज़ (aldotriose, C3 H6O3), एल्डोपैन्टोज़ (aldopentose, C5H10O5), कीटोट्राइओज़ (ketotriose), कीटोटैट्रोज़ (ketotetrose), कीटोपैक्टोज़ ( ketopentose) आदि

प्राणियों में पाये जाने वाले मोनोसैकराइड में से पैन्टोज (5c) एवं हैक्सोज शर्कराएँ मुख्य हैं। पैन्टोज शर्कराएँ सामान्यतः मुक्त अवस्था में नहीं पायी जाती। दो मुख्य पैन्टोज शर्करा राइबोज़ एवं डीऑक्सीराइबोज़ शर्करायें क्रमश: RNA एवं DNA के मुख्य घटक के रूप में पायी जाती हैं। इन दोनों शर्कराओं में केवल दूसरे कार्बन परमाणु में संलग्न ऑक्सीजन परमाणु में भिन्नता होती है। डीऑक्सीराइबोज शर्करा में इस परमाणु से OH के स्थान पर H परमाणु संलग्न होता है। इनके अतिरिक्त एरैबिनोज एवं ज़ायलोज भी सामान्यतः पाई जाती है।

प्राकृतिक रूप से पायी जाने वाले हैक्सोज़ शर्कराओं में ग्लूकोज, फ्रक्टोज, गैलेक्टोज़ एवं मैनोज़ मुख्य हैं। ये शर्करायें जीवद्रव्य में मुक्त अवस्था में तथा अनेक जटिल कार्बोहाइड्रेटों के घटक रूप में पायी जाती हैं। इनमें से फ्रक्टोज़ एवं फ्रक्टोज कीटोहैक्सोज़ शर्करा है जबकि शेष तीन एल्डोहैक्सोज़ शर्करायें हैं। ग्लूकोज, मैनोज़ में प्रथम दो कार्बन परमाणुओं में भिन्नता होती है। गैलेक्टोज में चौथा कार्बन परमाणु अन्य तीनों शर्कराओं, से OH समूह की स्थिति के कारण होता है।

इन सभी में से D-फ्रक्टोज शर्करा सबसे अधिक मीठी होती है एवं ताजा फलों में तथा शहद में पायी जाती है। ग्लूकोज़ सबसे अधिक जीवों में पायी जाती है। इसके ऑक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त होती है जो ATP के रूप में विमुक्त होती है। इसके अतिरिक्त ये शर्करा बहुलकों के रूप में पादप कोशिका में पाये जाते हैं।

मोनोसैकराइड के गुण (Properties of monosaccharide)

मोनोसैकराइड के विभिन्न गुणों का तीन बिन्दुओं के अंतर्गत अध्ययन किया जा सकता है। भौतिक गुण, संरचनात्मक गुण एवं रासायनिक गुण।

भौतिक गुण (Physical properties)

  1. मोनोसैकराइड रंगहीन क्रिस्टलीय पदार्थ होते हैं।
  2. ये स्वाद में मीठे होते हैं ।
  3. मोनोसैकराइड जल में विलेय एवं कार्बनिक विलायकों जैसे ईथर में अविलेय किन्तु एल्कोहल में आंशिक रूप से विलेय (sparingly soluble) होते हैं।

संरचनात्मक गुण (Structural properties)

  1. एल्डोस एवं कीटो शर्करा (Aldose and keto sugars) : जैसा कि पूर्व में बताया गया है मोनोसैकराइड शर्कराओं में आवश्यक रूप से एल्डिहाइड (CHO) अथवा कीटोन ( C= O) समूह होते हैं उनके अनुसार शर्करा एल्डो अथवा कीटो शर्करा कहलाती है। उदाहरणतः C6H12O6 फार्मूला युक्त ग्लूकोज शर्करा एल्डोशर्करा है तथा फ्रक्टोज़ कीटो शर्करा होती है।
  2. असममित कार्बन एवं ‘D’ तथा ‘L’ विन्यास (Asymmetric carbon and ‘D’ and ‘L’ configurations) : डाइहाइड्रॉक्सी ऐसीटोन के अतिरिक्त सभी मोनोसैकराइड शर्कराओं में एक अथवा अधिक असममित ( asymmetric) कार्बन परमाणु होते हैं? ‘जब किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन परमाणु से चार भिन्न-भिन्न प्रकार के समूह एकल बंध ( single bond) द्वारा जुड़े हुए होते हैं तो वह कार्बन परमाणु असममित (asymmetric) कहलाता है। ग्लिसरैल्डिहाइड (3C) में एक असममित कार्बन होता है जबकि टेट्रोज़, पेन्टोज़ एवं हैक्सोज़ की एल्डो शर्कराओं में क्रमशः 2, 3 एवं 4 असममित कार्बन परमाणु होते हैं। कीटो हैक्सोज़ शर्करा फ्रक्टोज़ में 3 असममित कार्बन परमाणु होते हैं।

.मोनोसैकराइड का अचक्रीय स्वरूप (acyclic form) को फिशर प्रक्षेप सूत्र (fischer projection formula) द्वारा प्रदर्शित करने पर कार्बन परमाणुओं की गणना ऊपर से नीचे की ओर की जाती है। अर्थात् सर्वाधिक निम्न संख्या वाला कार्बन सबसे ऊपर होता है। चूंकि विभिन्न मोनोसैकराइड में असममित कार्बन परमाणु सामान्यतः दो से अधिक होते हैं अतः इनका D अथवा L-विन्यास कार्बोनाइल कार्बन ( – C = O) परमाणु अथवा D- ग्लिसरैल्डिहाइड से सर्वाधिक दूरी पर स्थित कार्बन परमाणु से संलग्न हाइड्रॉक्सिल (OH) समूह की स्थिति के आधार पर (spatial relationship) पर निश्चित किया जाता है। यदि इस कार्बन से संलग्न OH समूह कार्बोनाइल समूह के दांयी ओर हो तो वह शर्करा D – विन्यासित कहलाती है जबकि बांयी ओर स्थित होने पर वह शर्करा L – विन्यासित कहलाती है।

समावयवता ( Isomerism )

असममित कार्बन परमाणुओं की उपस्थिति के कारण मोनोसैकराइड शर्कराएँ त्रिविम समावयवता प्रदर्शित करती है। समावयवता मुख्यतः दो प्रकार की होती है (i) संरचनात्मक समावयवता (structural isomerism) एवं त्रिविम समावयवता (stereoisomerism)।

संरचनात्मक समावयवता (Structural isomerism )

इस प्रकार की समावयवता युक्त शर्कराओं के आण्विक सूत्र (molecular formula) समान होते हैं किन्तु इनकी संरचना अथवा संरचनात्मक सूत्रों (structural formula) में भिन्नता होती है। उदाहरणतः ग्लूकोज एवं फ्रक्टोज, इनके आण्विक सूत्र C6 H12O6 किन्तु संरचनात्मक सूत्र भिन्न हैं। संरचना में भिन्नता कार्बन श्रृंखला की लम्बाई (length of chain), प्रतिस्थापन समूहों की स्थिति (position of substitution groups ), अभिलक्षकीय समूहों में भिन्नता ( difference in functional groups. आदि के कारण हो सकती है एवं इन के कारण समावयवता क्रमशः श्रृंखला समावयवता (chain isomerism), स्थान पावयवता (position isomerism) अथवा अभिलक्षकीय समावयवता (functional isomerism) कहलाते हैं।

त्रिविम समावयवता (Stereoisomerism)

इस प्रकार की समावयवता में आण्विक सूत्र (molecular formula) तथा संरचनात्मक सूत्र (structural formula) एक समान होते हैं। इनमें अणु के परमाणुओं के त्रिविम विन्यास (space configuration or arrangement of atoms in the space में भिन्नता पाई जाती है, अतः यह समावयवता त्रिविम समावयवता कहलाती है जो दो प्रकार की होती हैं। ज्यामितीय अथवा सिस-ट्रान्स समावयवता (geometrical or cis-trans isomerism ) तथा ध्रुवण समावयवता (optical isomerism) |

(i).ज्यामितीय अथवा सिस-ट्रांस समावयवता (Geometrical or cis-trans isomerism ) : यह द्विबन्ध ( double bond) कार्बन श्रृंखला वाले यौगिकों में परिलक्षित होती है। द्विबन्ध के कारण घूर्णन सम्भव नहीं होता एवं विभिन्न समूहों की इस बंध के दोनों ओर विशिष्ट स्थिति के करण होने वाली समावयवता ज्यामितीय समावयवता कहलाती है। यदि विशिष्ट समूह द्विबन्ध के एक ही ओर स्थित हो तो वह सिस समावयवी (cis isomer) तथा भिन्न-भिन्न दिशा में हो तो ट्रांस समावयवी (trans isomer) कहलाते हैं। उदाहरण फ्यूमेरिक अम्ल एवं मेलिक अम्ल ।

(ii) ध्रुवण समावयवता (Optical isomerism): मोनोसैकराइड में उपस्थित असममित कार्बन परमाणुओं की उपस्थिति के कारण ध्रुवण समावयवता परिलक्षित होती है। यदि प्रकाश की किरणों को निकॉल प्रिज्म (nicol prism) में से गुजारा जाता है तो प्रकाश की किरणों की गति एक ही दिशा में होती है इस प्रकार का प्रकाश धुवित प्रकाश (polarised light) कहलाता है। मोनोसैकराइड एवं अनेक असममित कार्बन युक्त कार्बनिक यौगिक ध्रुवित प्रकाश के तल (plane) को परिवर्तित कर देते हैं अथवा घुमा (rotate) कर देते हैं। इस प्रकार के समावयव (isomerism) अन्य सभी गुणों के समान होते हैं। ध्रुवण समावयवी (optical isomers) एक दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब (mirror image) के समान होते हैं। कार्बोहाइड्रेट में तीन प्रकार के ध्रुवण समावयवी देखे गये हैं।

  1. वाम धुवण घूर्णक (Laevo-rotatory) समावयव – ये ध्रुवित

प्रकाश के तल के बांयी ओर घूर्णित करते हैं इन्हें शर्करा के नाम से पूर्व ‘P (italics में 1 ) लिख कर अथवा (-) चिन्ह लिख कर दर्शाया जाता है जैसे / – ग्लूकोज़ अथवा (-) ग्लूकोज़ ।

  1. दक्षिण धुवण घूर्णक (Dextro rotatory) समावयव – ये धुवित प्रकाश के तल को दांयी ओर घुमा देते हैं इन्हें शर्करा के नाम के पूर्व ‘d (italics में d) लिखकर अथवा (+) चिन्ह लगाकर दर्शाया जाता है। जैसे -ग्लूकोज़ अथवा (+) ग्लूकोज़ ।
  2. dl-स्वरूप (dl- type or racemic mixture ) – ये धुवित प्रकाश के तल को किसी दिशा में नहीं घुमाते एवं प्रकाश घूर्णन की चित्र-5 : D-विन्यासित ( ) फ्रक्टोज़ 3-असममित कार्बन दर्शाते हुए दृष्टि से निष्क्रिय होते हैं।

शर्करा में असममित कार्बन परमाणु की संख्या ही ध्रुवण समावयवियों की संख्या का आधार होती है। लीबेल वॉन्ट हॉफ (Lebell Vant Hoff) के अनुसार इनकी संभावित संख्या 2″ हो सकती है जबकि n शर्करा में उपस्थित असममित कार्बन परमाणुओं की संख्या होती है। ग्लूकोज़ में इनकी संख्या 4 होती है अतः समावयवियों की संभावित संख्या 24 अर्थात् 16 होती है फ्रक्टोज़ में असममित कार्बन 3 होते हैं अतः समावयवियों की संख्या 23 अर्थात् 8 होगी।

नोट : जैसा कि पूर्व में बताया गया है कि किसी शर्करा का D एवं L विन्यास उसके कार्बोनाइल ( -C=O) बन्ध से दूरस्थ (most distant) असममित कार्बन संलग्न – OH समूह के संदर्भ में होता है एवं ध्रुवण घूर्णक स्वरूप का इससे कोई सम्बन्ध नहीं होता। D-विन्यास शर्करा भी वाम ध्रुवण घूर्णक (/-type, laevo-rotatory) हो सकती है। उदाहरण D-(I)-फ्रक्टोज।

मोनोसैकराइड में वलय संरचना ( Ring structure in monosaccharides)

बहुधा 5 अथवा अधिक कार्बन युक्त शर्करा विलयन अवस्था में कार्बन की सीधी श्रृंखला (straight chain of carbon) युक्त यौगिक के रूप में नहीं रहते बल्कि वलयाकार स्वरूप में बदल जाते हैं। इस वलय संरचना में शर्करा के एसिटलल्डिहाइड (–CHO) अथवा कीटो (-C=O) समूह मुक्त नहीं हाते बल्कि चौथे अथवा पांचवे (4th or 5th) कार्बन पर स्थित – OH समूह के साथ हेमीएसिटल बन्ध (hemiacetal bond) बनाते हैं। ऐल्डिहाइड समूह द्वारा इस बन्ध निर्माण के फलस्वरूप पायरैन (pyran) वलय का निर्माण होता है जबकि कीटो समूह से फ्यूरैन (furan) वलय बनता है। अतः ग्लूकोज़ से पायरैन एवं फ्रक्टोज (कीटो शर्करा) से फ्यूरैन वलय बनता है। पायरैन वलय में 6 सदस्य एवं फ्यूरेन वलय में पांच सदस्य होते हैं।

शर्करा के सीधी श्रृंखलाबद्ध स्वरूप को फिशर प्रोजैक्शन सूत्र से तथा वलय संरचना को हावर्थ प्रक्षेप सूत्र (Hawarth projection formula) से निरूपित किया जाता है। इसमें पहले एवं पांचवे कार्बन के बीच में -0 ऑक्सीजन ब्रिज बन जाता है। इसके कारण पहले कार्बन (C1) पर OH समूह बन जाता है तथा C1 भी असममित कार्बन केन्द्र बन जाता है तथा ग्लूकोज़ में 4 के स्थान पर 5 असममित कार्बन बन जाते हैं। नया OH समूह C1 पर a अथवा B- स्थिति में हो सकते हैं अतः वलयाकार ग्लूकोज़ भी Q-ग्लूकोज अथवा B-ग्लूकोज़ स्वरूपों में हो सकते हैं।

हैक्सोज शर्करा के समान पैन्टोज शर्करायें भी वलय रूप में पायी जाती हैं। इस संदर्भ में राइबोज़ शर्करा एवं डऑक्सीराइबोज़ शर्करा जैविक रूप से अत्यन्त महत्वूपर्ण है। ये शर्करायें RN 1 एवं DNA के महत्वूपर्ण घटक हैं ।

हावर्थ (Haworth) प्रोजेक्शन सूत्र में वलय के किनारे जो पाठक के अधिक नजदीक होते हैं, मोटी लाइनों द्वारा तथा दूरस्थ किनारे पतली लाइनों द्वारा दर्शाये जाते हैं।

ग्लाइकोसिडिक बन्ध (Glycosidic linkage)

विभिन्न मोनोसैकराइड अन्य अथवा उसी मोनोसैकराइड से जुड़कर ऑलिगोसैकराइड अथवा पॉलीसैकराइड अणुओं का निर्माण करते हैं। जब किसी शर्करा के कार्बन से संलग्न हाइड्रॉक्सिल समूह (OH) पहली शर्करा के हेमीएसीटल अथवा हेमीकीटल हॉइड्रॉक्सिल (–OH) समूह अर्थात् वलय के पहले कार्बन परमाणु से संलग्न – OH समूह के साथ क्रिया कर बन T बनाते हैं तो वह बन्ध ग्लाइकोसिडिक बन्ध (glycosidic linkage) कहलाता है। ये बन्ध दूसरी शर्करा के वलय के किस कार्बन से जुड़ते हैं इसके आधार पर बन्ध 1 – 4.1 6 अथवा 1 → 2 प्रकार के हो सकते हैं। एक ही मोनोसैकराइड विभिन्न बन्धों से जुड़कर विभिन्न प्रकार के ओलिगोसैकराइड एवं पॉलीसैकराइड का निर्माण कर सकते हैं।

शर्करा प्रथम कार्बन (C1) परमाणु पर त्रिविम विन्यास (steric configuration) के आधार पर ग्लाइकोसिडिक बन्ध दो प्रकार के हो सकते हैं, a-बन्ध अथवा p-बन्ध दो

मंड में ग्लूकोज़ अणु a 1 4 एवं a 1 6 बन्ध से जुड़ते हैं किन्तु सेलुलोज़ का निर्माण अनेक ग्लूकोज़ अणुओं के मध्य B1→4 बन्ध्य निर्माण के कारण होता है। सैलोबायोज (cellobiose) में 3-D ग्लूकोज, B1 4 बन्ध द्वारा जुड़ते हैं जबकि सूक्रोज़ में a-D ग्लूकोज़ एवं B-D फ्रक्टोज़ के मध्य a-1 B2 बन्ध होता है।