भेक का अर्थ क्या है , जल-स्थलचरों की विविधता किसे कहते हैं , Toad in hindi bhek in hindi definition

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Toad in hindi bhek in hindi definition भेक का अर्थ क्या है , किसे कहते हैं ?

जल-स्थलचरों की विविधता
भारतीय मेंढ़क भारतीय मेंढ़क अपने उत्तरी जातवालों से बड़ा होता है। भारतीय सांड-मेंढ़क विशेष बड़ा होता है। यह एक बहुत ही उपयोगी प्राणी है जो दीमक , नन्हे नन्हे बीटल , तितलियां और जवान टिड्डियां खाकर रहता है।
एक और उल्लेखनीय भारतीय मेंढ़क है- राकोफोरस मेकुलेटस या डांड़नुमा टांगों वाला मेंढ़क (प्राकृति ९७ )। उसकी चारों टांगें जालदार होती हैं। इसके अलावा उनके सिरों में चूपक होते हैं। इन चूपकों के सहारे मेंढक आसानी से पेड़ों के तनों पर चढ़ सकता है जहां वह कीड़ों-मकोड़ों का शिकार करता है। पेड़ों पर से कूदते समय उसकी टांगों के चैड़े जाल उसे हवा के बीच से नीचे की ओर
फिसलने में मदद देते हैं। यह क्षमता श्रीलंका, सुमात्रा, बोर्नियो और जावा के डांड़नुमा टांगों वाले मेंढकों में विशेष विकसित होती है।
भेक :  भेक ऊपर ऊपर से मेंढ़क की तरह ही दिखाई देता है (आकृति ६८), पर उसका वासस्थान और जीवन-स्थितियां कुछ भिन्न होती हैं। भेक शाम के समय बाग-बगियों में और अक्सर पानी से बहुत दूर भी पाये जाते हैं। फिर भी वे सूखी हवा नहीं सह पाते और धुपहले दिनों में वे नम स्थानों में छिप जाते हैं। केवल शाम को ही भेक शिकार के लिए बाहर आते हैं। वे डिंभ और वयस्क कीड़े-मकोड़े खाकर जीते हैं।
भेक बहुत ही धीरे धीरे चलते हैं, कभी कभी तो वे जमीन पर सिर्फ रेंगते हैं। वे मेंढ़क की तरह लंबी छलांगें नहीं लगा सकते। मेंढ़क तो छलांग के दौरान में भी कीटों को पकड़ सकता है। इसी कारण भेक की पिछली टांगें मेंढक की टांगों जितनी सुपरिवर्दि्धत नहीं होती।
मस्सों से आवृत त्वचा से रसनेवाला दाहक श्लेष्म धीरे धीरे चलनेवाले भेक की शत्रुओं से रक्षा करता है। इस श्लेष्म का मनुष्य की त्वचा पर कोई असर नहीं पड़ता पर यदि वह आंखों में या होंठों पर गिर जाये तो श्लेष्मिक झिल्लियों में सूजन पैदा हो सकती है।
अन्य जल-स्थलचर प्राणियों की तरह भेक भी पानी में ही बच्चे पैदा कर सकते हैं और इसी लिए वसंत ऋतु में वे पानी में ही रहते हैं। उस समय हमें ताल-तलैयों, झरनों और पोखरों तक में लंबे लंबे श्लेष्मिक धागे दिखाई देते हैं जिनमें अंड-समूह होते हैं।
संसेचन के बाद अंड-समूह बेंगचियों में परिवर्दि्धत होते हैं। गरमियों में उनका परिवर्द्धन पूर्ण होता है और वे नन्हे नन्हे भेकों में परिवर्तित होकर पानी से बाहर निकलते हैं।
हानिकर कीड़ों-मकोड़ों का नाश करके भेक खेती को काफी लाभ पहुंचाता है। भेकों की हानिकरता और विपैले डंक की कहानियां केवल अज्ञान पर आधारित हैं। फलों और सब्जियों के बागवान भेकों को ठीक ही अपने मित्रों में गिनते हैं। वे उन्हें अपने बगीचों में ले जाते हैं और उनकी रक्षा का प्रबंध कर देते हैं।
ट्राइटन जल-स्थलचरों में हम ट्राइटन (आकृति ६६) को भी गिन सकते हैं। वसंत और ग्रीष्म में यह प्राणी जलपौधों से ढंकी हुई छोटी छोटी तलैयों में देखे जा सकते हैं। गरमियों के उत्तरार्द्ध में ट्राइटन पानी से निकलकर जमीन पर आता है और काई में या पेड़ों की जड़ों के नीचे ऐसा सुरक्षित स्थान ढूंढ लेता है जहां जाड़ों के दिन बिता सके । अक्सर ये स्थान पानी से काफी दूर भी होते हैं।
बाह्यतः ट्राइटन मेंढ़क से एकदम भिन्न लगता है। उसके लंवे-से शरीर के अंत में लंबी पूंछ होती है। पूंछ के किनारे चपटे होते हैं और उनमें तरण-जाल की झालर-सी लगी रहती है। अपनी पूंछ की सहायता से ट्राइटन पानी में तैरता है। जमीन पर ट्राइटन दो जोड़े छोटी छोटी टांगों के सहारे चलता है। मेंढ़क की तरह यह भी. पानी की सतह तक आकर फुफ्फुसों से सांस ले सकता है और त्वचा से भी।
ट्राइटन कीड़ों-मकोड़ों, मकड़ियों, कृमियों आदि विभिन्न छोटे छोटे प्राणियों को खाकर रहता है। इसका जनन अंड-समूहों के रूप में होता है। वह जलपौधों की डंडियों और पत्तियों में हर अंडा अलग अलग से चिपका देता है। अंडे डिंभों में परिवर्दि्धत होते हैं। डिंभों में बाह्य जल-श्वसनिकाएं होती हैं और डिंभ बेंगची की शकल के होते हैं।
श्रीलंका की सांप-मछली भारत और पड़ोसी देशों में एक विशिष्ट प्राणी पाया जाता है जो श्रीलंका की कहलाता है (आकृति १०० )। सांप-मछली नाम से ही इसकी सांप जैसी शकल-सूरत का पता चलता है। इसके जीवन का एक हिस्सा मछली की तरह पानी में बीतता है।
फिर भी सांप-मछली की संरचना और जीवन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वह न मछली है, न सांप और न कृमि ही य पर है एक जल-स्थलचर प्राणी जिसका जीवन जल और थल दोनों के अनुकूल होता है।
वयस्क सांप-मछली झरनों के किनारे घास के नीचे रहती है जहां वह मुख्यतया केंचुओं को खाती है। जनन-क्रिया में मादा पानी के पास ही जमीन के सूराख में कुछ बड़े बड़े अंडे देती है। इसके बाद वह अंडों के चारों ओर गेंडुली मारे रहती है। इस प्रकार वह उन्हें काफी देर तक नम अवस्था में रखती है जो भ्रूणों के परिवर्द्धन के लिए आवश्यक है। भू्रणों के बाह्य जल-श्वसनिकाएं, पूंछ का मीन-पक्ष और प्राथमिक अवस्था की पिछली टांगें होती हैं जो बाद में नष्ट हो जाती हैं । सर्पमीन-से डिंभ जल-प्रवाहों में रहते हैं और शुरू शुरू में वेंगचियों की तरह अपनी जल-श्वसनिकानों से सांस लेते हैं।
जल-स्थलचर वर्ग को विशेषताएं
जल-स्थलचर वर्ग ऐसे रीढ़धारी प्राणियों का वर्ग है जो जमीन पर रहते हैं पर जिनका जनन (अंड-समूहों के रूप में) और परिवर्द्धन पानी में होता है। उनकी टांगें जमीन पर चलने और पानी में तैरने के अनुकूल होती हैं। जल-स्थलचर प्राणी फुफ्फुसों से सांस करते हैं पर इनसे शरीर को काफी ऑक्सीजन की पूर्ति नहीं हो सकती इसलिए उनके एक और श्वसनेंद्रिय होती है। यह है उनकी नंगी, श्लेष्मिक आवरणवाली त्वचा। इनके हृदय के तीन कक्ष होते हैं। रक्त-परिवहन के दो वृत्त होते हैं। इंद्रियों में पहुंचनेवाला रक्त मिश्रित होता है। शरीर का तापमान परिवर्तनशील होता है।
जल-स्थलचर प्राणी सपुच्छ (ट्राइटन), अपुच्छ (मेंढ़क, भेक) और अपाद ( सांप-मछली) में विभाजित किये जाते हैं। ज्ञात जल-स्थलचरों के प्रकारों की संख्या लगभग २,००० तक है ।
जल-स्थलचर प्राणियों की विविधता उनकी विभिन्न जीवन-स्थितियों का परिणाम है। ट्राइटन स्पष्टतया जलगत जीवन के, भेक स्थलचर जीवन के , डांडनुमा टांगों वाला मेंढ़क पेड़ों पर के जीवन के और सांप-मछली भूमिगत जीवन के अनुकूल होती है।
प्रश्न – १. डांडनुमा टांगों वाला मेंढ़क क्यों दिलचस्प होता है ? २. मेंढक और भेक में क्या अंतर है ? ३. मेंढ़क की तुलना में भेक की पिछली टांगें उतनी परिवर्दि्धत नहीं होतीं, इसका क्या कारण है ? ४. भेकों की रक्षा क्यों करनी चाहिए? ५. ट्राइटन को जल-स्थलचर क्यों मानते हैं ? ६. सांप-मछली को जल-स्थलचर क्यों मानते हैं ? ७. जल-स्थलचर वर्ग की विशेषताएं क्या हैं ?