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विचार पद्धति क्या है | परिभाषा विचार पद्धति किसे कहते है समाजशास्त्र में शोध तकनीक में अंतर thought method in sociology
thought method in sociology in hindi of methodology विचार पद्धति क्या है | परिभाषा विचार पद्धति किसे कहते है समाजशास्त्र में शोध तकनीक में अंतर ?
विचार पद्धति : व्याख्या और महत्व
अब तक आपने मार्क्स, दर्खाइम और वेबर के अनेक विचारों का अध्ययन किया है। मार्क्स द्वारा विकसित ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष और द्वंद्व की अवधारणा से आप परिचित हैं। दर्खाइम और वेबर के महत्वपूर्ण योगदान के बारे में भी आपको जानकारी है। परन्तु इनकी विचार पद्धतियों का व्यवस्थित अध्ययन आपने अब तक नहीं किया है। इसका कारण यह है कि विचार पद्धति जैसी अमूर्त परिकल्पना को समझने के लिये इन विचारकों के व्यावहारिक पहलुओं के प्रति योगदान को समझना आवश्यक है। विचार पद्धति, इस शब्द का प्रयोग हमने बार-बार किया है। अब इसकी व्याख्या करना उचित होगा।
विचार पद्धति की व्याख्या
विचार पद्धति से हमारा तात्पर्य शोध तकनीकी की उस प्रणाली (system) या प्रक्रिया (procedures) से है जिसके द्वारा किसी समस्या या प्रश्न का अध्ययन किया जाता है।
विचार पद्धति तथा शोध तकनीक में अंतर
ध्यान रहे शोध तकनीक (method) और विचार पद्धति (methodology) में अंतर है। शोध तकनीक विचार पद्धति का छोटा-सा हिस्सा मात्र है। विचार पद्धति में अनेक तकनीकों का समन्वय होता है। विभिन्न शोध तकनीकों का उपयोग कर समाजशास्त्रियों द्वारा अपनी विशिष्ट विचार पद्धतियाँ विकसित की जाती है। आइए, उदाहरण द्वारा इस भेद को स्पष्ट करें। खंड 3 . में आपने पढ़ा है कि एमिल दर्खाइम ने किस प्रकार आत्महत्या का अध्ययन किया। आत्महत्या को सामाजिक तथ्य के रूप में देखना दर्खाइम की विचार पद्धति की विशेषता है।
सहगामी भिन्नता (concomitant variations) के माध्यम से आत्महत्या के सामाजिक तथ्य का अध्ययन करना दर्खाइम की शोध तकनीक है।
प्रश्न यह उठता है कि विचार पद्धति का अध्ययन क्यों आवश्यक है? इसका क्या महत्व है? क्या इन विचारकों के ठोस योगदान का अध्ययन पर्याप्त नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर अगले उपभाग में दिया जायेगा।
विचार पद्धति का महत्व
विचार पद्धति का अध्ययन तकनीकों की सूची मात्र बनाना नहीं है। किसी विचारक के समस्त परिप्रेक्ष्य की झलक हमें उसकी विचार पद्धति के अध्ययन द्वारा मिलती है। समाजशास्त्र की विषयवस्तु मानव जीवन और समाज है। मनुष्य की जीवन-पद्धतियों, व्यवहारों और समस्याओं का अध्ययन ही समाजशास्त्रियों का मुख्य काम है। समाजशास्त्रीय विचार पद्धति में सामाजिक दृष्टि, व्यक्ति और समाज के बीच संबंध इत्यादि महत्वपूर्ण पक्ष शामिल हैं। विचार पद्धति के अध्ययन के द्वारा यह भी समझा जा सकता है कि विभिन्न चिंतकों के उद्देश्य और लक्ष्य क्या हैं। समाजशास्त्र की विषयवस्तु समाजशास्त्रियों से अलग नहीं है बल्कि समाजशास्त्री भी उसी समाज का अंग हैं जिसका अध्ययन करना उनका काम है। इसलिये विचार पद्धति का अध्ययन न सिर्फ महत्वपूर्ण है बल्कि रोचक भी है।
आइए, अब कार्ल मार्क्स की विचार पद्धति का अध्ययन करें। खंड 2 में आपने पढ़ा है कि मार्क्स मूलतः “समाजशास्त्री‘‘ नहीं था। वह अर्थशास्त्री, राजनीतिशास्त्री और क्रांतिकारी भी था। दर्खाइम और वेबर की तरह ही मार्क्स ने समाजशास्त्र के लिये विशिष्ट विचार पद्धति विकसित नहीं की परन्तु इसमें संदेह नहीं कि विचार पद्धति की दृष्टि से तथा ठोस काम करने की दृष्टि से भी उसके विचारों का समाजशास्त्र पर गहरा प्रभाव पड़ा है और पड़ रहा है।
सामाजिक संघर्ष बनाम सामाजिक व्यवस्था
समाज के विकास के लिए मार्क्स ने द्वंद्व और संघर्ष की भूमिका पर बल दिया है जबकि दर्खाइम ने सामंजस्य और व्यवस्था पर। जहाँ एक ओर दर्खाइम, संघर्ष या द्वंद्व को रोगात्मक, विकृति या असामान्य मानता है वहीं मार्क्स इसे सामाजिक परिवर्तन का पहिया मानता है। एक और जहां दर्खाइम सामाजिक तथ्यों का अध्ययन सामाजिक व्यवस्था में उसके योगदान की दृष्टि से करता है वहीं मार्क्स सतत समाज में विद्यमान विसंगतियों, अंतर्विरोधों और तत्जन्य तनावों की खोज में रहता है जिससे कि समाज में परिवर्तन होंगे।
ध्यान देने की बात यह है कि दोनों ही चिंतक समाज को अपने आप में एक वास्तविकता मान कर चलते हैं। मार्क्स विभिन्न उपव्यवस्थाओं के अंतर्संबधों को देखकर समाज को एक सम्पूर्ण इकाई की दृष्टि से देखता है, और मानता है कि सम्पूर्ण समाज का एक चरण से दूसरे में परिवर्तन होना ऐतिहासिक गति से सम्बद्ध है। दर्खाइम भी ऐसे समाज की चर्चा करता है जिसका अपना एक अस्तित्व है। दोनों चिंतक वैयक्तिक आचरण और भावनाओं की अपेक्षा सामाजिक सम्पूर्णता पर बल देते हैं, क्योंकि उनके अनुसार वैयक्तिक आचरण और भावनाएँ किसी सामाजिक परिवेश विशेष की उपज होती हैं। अतः मार्क्स और दर्खाइम दोनों को सामाजिक यथार्थवादी कहा जा सकता है।
यह मुद्दा और प्रासंगिक हो जाता है जब उनकी विचार पद्धति की तुलना मैक्स वेबर की विचार पद्धति के साथ की जाती है। वेबर की समाजशास्त्रीय पद्धति एकदम अलग है। वेबर का अध्ययन सामाजिक क्रिया के अध्ययन से शुरू होता है। वह वैयक्तिक-आचरण पर बल देता है जो कि उसके अनुसार व्यक्ति की मनोवृत्ति, मूल्यों और विश्वासों से प्रभावित होता है। अपने आस-पास के संसार को कर्ता जो अर्थ देता है वेबर उसी की व्याख्या करता है। आइए अब उसकी समाजशास्त्रीय पद्धति का थोड़ा विस्तार से अध्ययन करें।
सारांश
इस इकाई में हमने पढ़ा है कि विचार पद्धति क्या है और उसका अध्ययन क्यों आवश्यक है। इसके बाद हमने समाजशास्त्र के तीन संस्थापकों की विचार पद्धतियों और दृष्टिकोणों का विश्लेषण किया और साथ ही उनकी तुलना की।
हमने देखा कि किस प्रकार मार्क्स ने भौतिकवादी पद्धति द्वारा समाज के इतिहास की अवधारणा दी। सामाजिक संस्थाओं के आपसी संबंधों का अध्ययन करते हुए मार्क्स ने समाज की परिवर्तनशील प्रवृत्ति पर जोर दिया। उसके अनुसार सामाजिक संघर्ष ही परिवर्तन का कारण है और यह राजनैतिक रूप से प्रतिबद्ध समाजशास्त्रियों का काम है कि वे भविष्य के वर्ग रहित अर्थात् साम्यवादी समाज की कल्पना और उसका अध्ययन करें।
एमिल दर्खाइम समाजशास्त्र को एक वैध या प्रतिष्ठित विज्ञान के रूप में स्थापित करना चाहता था। उसने समाजशास्त्रीय पद्धतियों में कुछ अनुशासन लाने का प्रयास किया। उसने सामाजिक तथ्यों को समाजशास्त्रीय खोज की उचित विषय वस्तु माना और मनोवैज्ञानिक तथा समाजशास्त्री व्याख्या में अंतर स्पष्ट किया। दर्खाइम ने एक स्पष्ट प्रकार्यात्मक विश्लेषण की पद्धति बतलाई जो कि आज भी प्रयोग में लाई जाती है।
मैक्स वेबर की समाजशास्त्रीय पद्धति ने समाजशास्त्र में अध्ययन का केन्द्र बदल दिया। जब कि दर्खाइम और मार्क्स सामाजिक यथार्थ के रास्ते चले, वेबर ने मनुष्य की अभिप्रेरणा की अंतर्दृष्टि द्वारा समझ पर जोर दिया। उसने तुलनात्मक ऐतिहासिक अध्ययन को अपनाया और सामाजिक तथ्यों के बहुपरतीय और बहु-कारणात्मक विश्लेषण पर जोर दिया।
इन चिंतकों ने जिन लक्ष्यों और उद्देश्यों के लिए समाज का अध्ययन किया वे अलग-अलग थे। दर्खाइम और वेबर इस बात पर जोर देते थे कि समाजशास्त्र का अध्ययन करते समय एक प्रकार का वैज्ञानिक अलगाव बनाए रखना चाहिए जबकि मार्क्स इस बात में विश्वास करता था कि सिद्धांतों का उपयोग राजनैतिक कार्यों के लिए किया जा सकता है।
शब्दावली
प्रतिमानहीनता (anomie) एक ऐसी स्थिति जिसमें सामाजिक नियम निरर्थक हो जाते हैं। मनुष्य अपने आपको अकेले या समाज से कटे हुए महसूस करते हैं
सामूहिक चेतना समाज के सदस्यों के सामान्य विश्वास, मान्यताएँ और भावनाएँ
(collective conscience)
यांत्रिक एकात्मकता और दर्खाइम के अनुसार यांत्रिक एकात्मकता का आधार है एकरूपता और गहरे सामाजिक बंधन जो कि लघु सावयवी एकात्मकता और पारंपरिक समाजों में देखे जाते हैं। सावयवी एकात्मता अंतर्निभरता और विशेषीकरण पर आधारित है, और आधुनिक, औद्योगिक समाजों में पायी जाती है।
प्रत्यक्षवादी अनुभव पर आधारित। प्रारंभिक समाजशास्त्र पर प्रत्यक्षवादी प्रवृत्ति का गहरा असर रहा।
कुछ उपयोगी पुस्तकें
ऐरों, रेमों, (1970). मेन करेंट्स ऑफ सोशियोलॉजिकल थॉट. भाग 1 और 2, पेंगुइनः लंदन
(मार्क्स, दर्खाइम और वेबर से संबंधित भाग पढ़ें।
कोजर, लुविस, (1971). मास्टर्स ऑफ सोशियोलॉजिकल थॉट आइडियाज इन हिस्टॉरिकल एंड सोशल कॉटेक्स्ट. हरकोर्ट ब्रेस जोवानोविचरू न्यूयार्क (मार्क्स, दर्खाइम और वेबर से संबंधित भाग पढ़ें)
समाजशास्त्रीय पद्धतिः मार्क्स, दर्खाइम और वेबर
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
विचार पद्धतिः व्याख्या और महत्व
विचार पद्धति की व्याख्या
विचार पद्धति तथा शोध तकनीक में अंतर
विचार पद्धति का महत्व
कार्ल मार्क्स की विचार पद्धति
इतिहास का भौतिकवादी विश्लेषण
सामाजिक संघर्ष और परिवर्तन
‘‘प्रैक्सिस” (चतंगपे) की अवधारणा
एमिल दर्खाइम की विचार पद्धति
व्यक्ति और समाज
समाजशास्त्र की विषयवस्तुः सामाजिक तथ्य
समाज का प्रकार्यात्मक विश्लेषण
सामाजिक संघर्ष बनाम सामाजिक व्यवस्था
मैक्स वेबर की विचार पद्धति
“फर्टेहन‘‘ या अंतर्दृष्टि
आदर्श प्ररूप
कार्य कारण संबंध (बंनेंसपजल) और ऐतिहासिक तुलना
समाजशास्त्र में मूल्य
समाजशास्त्रियों की भूमिका
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर
उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ने के बाद आपके लिए संभव होगा
ऽ कार्ल मार्क्स, एमिल दर्खाइम और मैक्स वेबर की विचार पद्धतियों का विवेचन करना
ऽ इनकी समानताओं और भिन्नताओं पर चर्चा करना।
प्रस्तावना
खंड 2, 3 और 4 में आपने मार्क्स, दर्खाइम और वेबर के महत्वपूर्ण योगदान का बारीकी से अध्ययन किया। इस खंड में हमें उनकी विशिष्ट विचारधाराओं का तुलनात्मक अध्ययन करना है। इससे पहले कि हम उन ठोस मुद्दों पर चर्चा करें जिन पर इन तीनों ने कार्य किया, उनकी विचार पद्धतियों का अध्ययन करना जरूरी है।
इस इकाई को चार भागों में विभाजित किया गया है। भाग 18.2 में विचार पद्धति की व्याख्या की गई है और इसके महत्व को बताया गया है। कार्ल मार्क्स की विचार पद्धति के बारे में हमने भाग 18.3 में चर्चा की है। भाग 18.4 में दर्खाइम और अंतिम भाग 18.5 में वेबर की विचार पद्धतियों पर गौर किया गया है।
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