theory of spontaneous generation in hindi was given by स्वत जनन का सिद्धांत क्या है किसने दिया

पढ़िए theory of spontaneous generation in hindi was given by स्वत जनन का सिद्धांत क्या है किसने दिया ?

स्वतः जनन का सिद्धान्त (Theory of spontaneous generation)

जैसा कि पूर्व में वर्णित किया जा चुका हैं आदिकाल में पादरियों व दार्शनिकों के विचारों की मान्यताओं को अधिक महत्त्व दिया जाता था। अरस्तु (Aristotle 384-322 B.C.) जैसे दार्शनिक का भी यही मत था कि जीव मिट्टी से उत्पन्न होते हैं। सेमसन (Samson) व वर्जिल ने भी अवैजिक वस्तुओं से जीवों के उत्पन्न होने के मत का समर्थन किया। पवित्र बाइबल में भी मधु से मधुमक्खियों के उत्पन्न होने की बात का उल्लेख मिलता है।

शताब्दियों तक लोगों की धारणायें इसी प्रकार की बनी रहों कि मैगट अर्थात् मक्खी के लार्वा मांस से गर्मी व हवा की उपस्थिति में उत्पन्न होते हैं। मेंढक, टोड, मक्खियां व चूहे उपजाऊ भूमि, अपघटित होती प्राणियों की काय से या कचरे के ढेर से बरसात में उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार के मत को अजीवात् जनन (abiogenesis) या स्वतः जनन (spontaneous generation) का नाम दिया गया। इस मत के समर्थकों में वान हेल्मॉन्ट (Van Helmont 1577-1644) प्रमुख थे। इनकी मान्यता थी कि चूहे संग्रहित गेहूँ, पनीर व अनुपयोगी कपड़ों आदि से उत्पन्न होते हैं, इन्होंने प्रयोगों के द्वारा इसे प्रमाणित करने का कार्य भी किया। इस मत को सही सिद्ध करने हेतु जॉन नीडह्य (John Needam) नामक पादरी ने लीवनहॉक द्वारा वर्णित जन्तुओं द्वारा रोग उत्पन्न करने की संभावना को ध्यान में रख कर किये गये प्रयोगों द्वारा कुछ उत्साह वर्धक परिणाम सामने आये। नीडह्य ने अपने कार्यों के परिणाम रायल सोसायटी ऑफ लन्दन को प्रेषित किये जिनमें इन सूक्ष्म कार्यों (minute bodies) के उत्पन्न होने की क्रिया का वर्णन था। नीडह्य ने मांस के अनछने सूप (meat- borth) को गर्म किया और वायुरोधक विधि से सुरक्षित कर कुछ दिनों तक रखा । नीडह्य ने सूप को सूक्ष्म-जीवों से मुक्त मान कर यह प्रयोग किया था। कुछ दिनों के बाद नीडह्य ने पाया कि इन बर्तनों के भरे सूप में वृन्दन (swarming) क्रिया हो रही है। अत: इन्होंने स्वतः जनन के सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके अनुसार ” उचित माध्यम मिलने पर सूक्ष्म जीव स्वतः उत्पन्न होने की क्षमता रखते हैं।”

नीडह्य द्वारा प्रस्तुत यह सिद्धान्त स्वयं के द्वारा किये गये प्रयोगों के आधार पर था। इतालवी चिकित्सक फ्रान्सिस्को रेडी (Francesso Redi) ने 1665 में कुछ प्रयोग करके स्वतः जनन के सिद्धान्त को नकारा। इन्होंने अपने प्रयोग से यह सिद्ध कर दिया कि यदि मांस युक्त बर्तन को महीन जाली से ढक कर रखा जता है तो मैगट उत्पन्न नहीं होते। रेडी ने बताया कि माँस की गन्ध से मक्खियाँ आकर्षित होकर इस पर बैठती है व अण्ड देती हैं जिनसे मैगट उत्पन्न होते हैं।

इतालवी पादरी लेजेरो स्पैलेन्जनी (Lazzaro Spallanzani; 1767) भी इस सिद्धान्त से सहमत नहीं थे, इन्होंने उपरोक्त प्रयोग को पुनः करने का निश्चय किया। स्पैलेन्जनी ने दो फ्लास्क लिये जिनमें मांस सूप को उबाल कर निम्न विधि से रखा गया था। एक फ्लास्क A को पूर्णत: उबले मांस सूप से भरने के उपरान्त वायुरोधी विधि से सील किया गया। दूसरे फ्लास्क B को अंशत: उबले मांस सूप से भरने के बाद सामान्य कॉर्क द्वारा बन्द कर दिया। कुछ दिनों उपरान्त दोनों फ्लास्क का परीक्षण करने के बाद इन्होंने पाया कि फ्लास्क A में (जिसमें पूर्णत: उबाल मांस सूप भरा था वायुरोधी विधि से सील किया गया था) किसी प्रकार के जन्तुक उत्पन्न नहीं हुए थे, किन्तु फ्लास्क B में (जिसमें अशंत: उबाल हुआ मांस सूप भरा गया था सामान्य कार्क द्वारा सील गया था) जन्तुक उत्पन्न हो गये थे। अतः स्पैलेन्जनी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सूक्ष्मकाय कुछ समय उबाले जाने के प्रति प्रतिरोधक क्षमता रखते हैं और स्वतः जनन का सिद्धान्त असफल घोषित कर दिया गया। नीडह्य ने स्पैलेन्जनी के प्रयोगों को असत्य व भ्रामक बताने की सिफारिश की। नीडह्य ने स्पैलेन्जनी के प्रयोगों के बारे में यह दलील प्रस्तुत की कि मांस सूप को ज्यादा देर तक उबाने जाने पर इसमें उपस्थित “जैविक बल” (vegetative force) नष्ट हो जाता है जो जीवों के उत्पन्न होने में बाधा उत्पन्न करता है किन्तु स्पैलेन्जनी ने सभी आरोपों को खण्डित कर दिया। इस प्रकार स्पैलेन्जनी ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया कि अवैजिक पदार्थों से जीव उत्पन्न नहीं होते ।

लॉटार व श्वान (Latar and Schwann; 1857) ने यीस्ट के द्वारा बीयर व मंदिरा में किण्वन की क्रिया का अध्ययन किया। एक बार फिर स्वतः जनन के सिद्धान्त की चर्चा हुई। किन्तु इन दोनों वैज्ञानिकों ने स्वतः जनन के सिद्धान्त को निर्मूल प्रमाणित कर दिया। लैबिग नाम के जर्मन रसायनिज्ञ किण्वन को पूर्णतः रसायनिक क्रिया बताया जो किसी मृत विशिष्ट प्रोटीन की उपस्थिति में होती है। उपरोक्त सभी विवादों का अन्त लुईस पास्तेर के द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्तों के प्रकाश में आने पर हुआ।

एन्टोनी वॉन लीवनहॉक का कार्य (Work of Antony Van Leeuwenhoek)

एन्टोनी वॉन लीवनहॉक (1632-1723) डच सूक्ष्मदर्शक (Microscopist ) था जिसने सर्वप्रथम 1676 में जीवाणुओं का अध्ययन करके एक अभिलेख तैयार किया। लीवनहॉक ने अनेकों लेन्स बना कर सूक्ष्मदर्शी की आवर्धक क्षमता को 160 को 300 गुना तक बढ़ाने का प्रयास किया। सूक्ष्मदर्शी द्वारा जल, मल, दन्त खुरचनों, मृदा आदि स्त्रोतों से जीवाणु एकत्रित करके इनका अध्ययन किया तथा इनको अपने द्वारा लिखे गये शोध पत्र “एनीमेक्यूला वायवा” में सजीव जन्तुओं (live animalcules) का नाम दिया 1695 में लीवनहॉक ने अपने द्वारा किये गये शोध कार्य को “दी सीक्रेट्स ऑफ नेचर डिसकवर्ड बाइ एन्टोन वॉन लीवनहॉक” के नाम से प्रकाशित किया । लीवनहॉक ने जीवाणुओं का केवल मात्र अध्ययन ही नहीं किया बल्कि इन जीवाणुओं का सचित्र उल्लेख भी किया है।” लन्दन की रायल सोसायटी” ने लीवनहॉक द्वारा किये कार्य को पूर्ण सम्मान प्रदान किया। इन वैज्ञानिक के द्वारा इस दिशा में किये गये कार्य से प्रभावित होकर अनेक वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म जीवाणुओं के क्षेत्र में कार्य आरम्भ कर दिया। लीवनहॉक को सूक्ष्मजैविकी एवं आदि जैविकी के पिता के रूप में जाना जाता है।

हालेण्ड निवासी लीवनहॉक डेल्फ नामक छोटे कस्बे में कपड़े का व्यापार करते थे। इनकी स्वयं की कपड़े की दुकान थी, पेशे से वस्त्र विक्रेता थे। ये योग्य सर्वेक्षक भी थे एवं कस्बे के मदिरा जांच अधिकारी भी थे। इन्हें अपने खाली समय में काँच के टुकड़ों को घिस कर लेन्स बनाने व इन्हें लेन्सों के द्वारा सूक्ष्म वस्तुओं को देखने का शौक था। लीवनहॉक ने स्वयं घिस कर अनेका लेन्स बनाये और लगभग 250 सूक्ष्मदर्शी यन्त्र तैयार किये (चित्र 8.2)। इन सूक्ष्मदर्शी के द्वारा जीवाणुओं का अध्ययन किया और अपने अनुसंधान कार्य को प्रकाशित भी किया। लीवनहॉक ने जीवाणुओं को “जन्तुक” (animalcule) का नाम दिया। ये जन्तुक इन्होंने वर्षा, मृदा, मल-मूत्र, पोखरों तथा मनुष्य की दन्त खुरचनों जैसे स्रोतों से प्राप्त किये थे। इन्होंने रोम, पादप संरचनाओं, क्रिस्टलों, कीट के नेत्र आदि का अध्ययन अपने द्वारा निर्मित सूक्ष्मदर्शी के द्वारा किया।

लीवनहॉक द्वारा वर्णित जन्तुक कुण्डली तथा मुड़ी हुई लकड़ियों व शलाखा की आकृति के थे। इन्होंने अपने कार्य का विवरण लन्दन की रॉयल सोसायटी को भी भेजा किन्तु इन्होंने अपने अनुसंधान पत्रों में यह उल्लेख नहीं किया कि ये मनुष्य की देह में रोग उत्पन्न करते हैं अतः इनके द्वारा किया गया कार्य जिज्ञासावश किया गया कार्य ही माना गया।

इस वैज्ञानिक ने अपने अनुसंधान कार्य को “दी सीक्रेट्स ऑफ नेचर डिसकवर्ड बाई एन्टोन वॉन लीवनहॉक” के नाम से प्रकाशित किया इन्होंने न केवल “जन्तुओं” का अध्ययन ही किया वरन उसका सचित्र वर्णन भी किया (चित्र – 7.3) जीवाणु के अतिरिक्त इन्होंने स्वतंत्र व परजीवी प्रोटोजोआ, तन्तुकीय कवक व शुक्राणुओं की भी खोज की थी। इनके कार्य से अनेकों वैज्ञानिकों को सूक्ष्मजीव विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करने की प्रेरणा हुई। सन् 1678 में रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने दो लैन्स युक्त सूक्ष्मदर्शी की खोज की एवं लीवनहॉक द्वारा की गयी खोजों की पुष्टि की। इस समय तक रोग व महामारियों से संबंधित इन जीवाणुओं का महत्त्व किसी ने नहीं पहचाना। उन्नीसवीं शताब्दी में जाकर इस संबंध में अधिक प्रगति हुई। लीवनहॉक को सूक्ष्मजीवी जगत् का प्रमुख खोजकर्ता एवं सूक्ष्मजैविकी का जनक (father of microbiology) माना जाता है।