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tetanus in hindi , टेटनस में कौनसे जीवाणु होते हैं , रोग , वर्गीकरण , उपचार क्या होता है
जाने tetanus in hindi , टेटनस में कौनसे जीवाणु होते हैं , रोग , वर्गीकरण , उपचार क्या होता है ?
टेटनस (Tetanus)
वंश क्लोस्ट्रडियम के अन्तर्गत ग्रैम ग्राही अवायुवीय, बीजाणु बनाने वाले गतिशील छड़ रूपी बैसिलाई जीवाणु आते हैं। इनके बीजाणु जीवाणु काय से अधिक बड़े तथा तर्क रूपी (spindle shaped) होते हैं। इस वंश के जीवाणुओं द्वारा गैस ग्रैंग्रीन, खाद्य विषाक्तन (food posioning) तथा टेटनस रोग उत्पन्न किये जाते हैं। कुछ जातियाँ मनुष्य की आन्त्र या अन्य अंगों तथा अन्य कुछ जातियाँ जल, मिट्टी एवं मृतोपजीवी कार्बनिक पदार्थों पर पायी जाती है। क्लो. टेटनाई. (Clostridium tetani) टेटनस या धनु स्तम्भ रोग उत्पन्न करता है। इस रोग की जानकारी आदिकाल से ही मनुष्य को थी। अनेकों वैज्ञानिकों ने अनुसंधान कर इस रोग की जीवाणु तथा फैलाने के कारणों पर कार्य किया किन्तु किटेसाटो (kitasato ; 1889) ने शुद्ध संवर्धन प्राप्त करने तथा पुनः स्वस्थ जन्तुओं में इन जीवाणुओं का संक्रमण कराकर रोग उत्पन्न करने के प्रमाण प्रस्तुत किये। यह जीवाणु मिट्टी में व्यापक रूप से पाया जाता है किन्तु समुद्री जल के अवायवीय क्षेत्रों में भी रहता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य एवं अन्य जन्तुओं की आन्त्र में भी यह रहता है। यह सड़कों की धूल, अस्पतालों के समान जैसे पट्टी ऑफ पेरिस, पाउडर, दीवारों की सतह, कपड़ों, घावों आदि पर भी पाया जाता है।
आकारिकी (Morphology)
क्लो. टेटनस ग्रैम ग्राही प्रकार तर्कुरूपी जीवाणु हैं जो 4-8 लम्बे व 0.5 व्यास की चौड़ाई के होते हैं। जीवाणु कोशिका की एक लम्बवत् अक्ष होती है जिसके सामान्तर पार्श्व सतह पायी जाती है। कोशिका के सिरे गोलाकार होते हैं यह सामान्यतः एकल होते हैं किन्तु कभी-कभी शृंखला भी बनाकर रहते हैं। इनके द्वारा बनाये गये बीजाणु गोलाकार होते हैं जिनके किनारे फूले हुए होते हैं। आकृति लगभग ढोल बजाने की लकड़ी (drum stick) जैसी होती है। जीवाणु की मुख्य संरचना शलाखा रूपी (बैसिलस) लक्षण दर्शाती है। बीजाणु परिपक्वन की विभिन्न अवस्थाओं में अण्डाकार आकृति का भी हो सकता है। सामान्यतया इन पर सम्पुट (capsule) अनुपस्थित होता है ये परिरोमी कशाभिकाओं द्वारा संचलन की क्रिया करते हैं। पुराने संवर्धन ग्रैम अग्राही भी हो सकते हैं।
संवर्धन लक्षण (Cultural characteristics)
क्लोस्ट्रीडियम टेटनी अविकल्पी वायुवीय जीवाणु जो 37°C के आदर्श तापक्रम पर वृद्धि करते हैं। ये सामान्य माध्यमों में pH 7.4 पर संवर्धन करते हैं। वृद्धि रक्त तथा सीरम में तीव्र गति से होती है। ऐगार प्रयोगशाला में संवर्धन सम्भव है।
जैव रसायनिक क्रियाएँ (Biochemical reactions)
क्लो. टेटनी क्षीण प्रोटीन, लयनकारी है। यह शर्करा पर कोई क्रिया नहीं करते हैं इनके द्वारा नाइट्रेट्स का अवकरण नहीं होता किन्तु जिलेटिन का द्रवीकरण इनके द्वारा धीमी गति से किया जाता
प्रतिरोधकता (Resistance)
ताप के प्रति प्रतिरोधकता जीवाणु के विभेदों के अनुसार परिवर्तनशील रहती है अधिकतर जीवाणु 10-15 मिनट तक जल में उबालने पर नष्ट हो जाते हैं, किन्तु कुछ तीन घण्टे तक उबाले जाने पर भी नष्ट नहीं होते हैं। बीजाणु अवस्था को नष्ट करने हेतु आटोक्लेव में 121°C पर 20 मिनट तक रखने की आवश्यकता होती है। मिट्टी में बीजाणु वर्षों तक जीवनक्षम बने रहते हैं। इन्हें आयोडीन के 1% जलीय विलयन तथा हाइड्रोजन पर ऑक्साइड के 10 गुणा मिश्रण द्वारा कुछ घण्टों में नष्ट किया जाता है।
वर्गीकरण (Classification)
सीरमीय परीक्षणों के आधार पर ये 10 जातियों के होते हैं। जिन्हें I से X संख्या द्वारा दर्शाया जाता है। जाति संख्या VI में अकशाभित विभेद पाये जाते हैं। अन्य सभी जातियों के जीवाणु कशाभित प्रकार के होते हैं। सभी जातियों विषैले पदार्थों को उत्पन्न करती है।
रोगजनकता (Pathogenicity)
क्लो. टेटनी में भेदन क्षमता बहुत कम होती है, ये घावों या जख्मों, कील या फाँस द्वारा गहराई तक पहुँच कर बीजाणु अंकुरण कर वृद्धि करना आरम्भ कर देते हैं। ये इनके द्वारा उत्पन्न विषैले पदार्थ टेटेनोनाइसिन (tetanolysin) एवं टेटेनोस्पेसमिन (tetanospasmin ) तंत्रिकाओं द्वारा अवशोषित किये जाने के कारण तंत्रिक ऊत्तकों को प्रभावित कर धनुस्तम्भ रोग उत्पन्न करते हैं जिसके अन्तर्गत पेशियाँ कठोर होकर दर्द करती हैं। दर्द जोड़ों पर असह्य रूप से बढ़ता जाता है। यह रोग सर्वव्यापी है अधिकतर घाव या चोट के बीजाणुओं के सम्पर्क में आने तथा अवायुवीय परिस्थितियों के मिलने पर ही यह रोग उत्पन्न होता है। कभी-कभी जन्म लेते शिशुओं में संक्रमण द्वारा या रोगी के शल्य चिकित्सा के उपरान्त यह रोग उत्पन्न होता है । सामान्यतया नुकीली संक्रमण युक्त कील, ब्लेड, पिन, गुलाब के काँटों आदि से जीवाणु देह के भीतर प्रवेश करते हैं। बीजाणुओं के कम संख्या में प्रवेश करने पर ये भक्षाणु कोशिकाओं द्वारा भक्षण किये जा सकते हैं या सुषुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। यदि घाव भर जाता है तो रोग होने की संभावना कम हो जाती है किन्तु रोगी में प्रतिरोधक क्षमता में कमी होने पर यह जीवाणु वृद्धि कर रोग उत्पन्न कर देते हैं। रोग के लक्षणों में जोड़ों का दर्द, मरोड़े आना, पेशियाँ कठोर होना आदि हैं। रोग के लक्षण उत्पन्न होने तथा संक्रमण होने के मध्य अन्तराल घाव की प्रकृति स्थान एवं अन्य कारकों पर निर्भर करता है सामान्यतया 8 दिन का समय लगता है। अन्य पेशियों के साथ-साथ जबड़े की पेशियाँ भी संकुचन करती है। अतः यह रोग जबड़ों का भिंचना (lock-jaw) भी कहलाता है, 80-90% रोगी मृत्यु के शिकार के हो जाते हैं। अनेकों बार परिपक्वन काल अन्यन्त छोटा होता है अन्य भागों की अपेक्षा सिर के घाव इसमें अधिक घातक होते हैं।
निदान (Diagnosis)
सूक्ष्मदर्शी से घावों का परीक्षण स्लाइड बनाकर तथा संवर्धन विधि से निदान करते हैं। स्लाइड पर सक्रिय ड्रमस्टिक समान रचनाओं को देखकर एवं बीजाणु की पहचान कर निदान किया जाता है। संवर्धन हेतु घावों से ऊत्तक लेकर संवर्धन माध्यम में रखकर परीक्षण करते हैं। .
उपचार (Therapy)
रोग का उपचार जितना जल्टी हो सके आरम्भिक अवस्था में ही शुरू कर देना चाहिए क्योंकि तंत्रिकीय ऊत्तकों में इनसे उत्पन्न आविष शीघ्रता से फैलता है अतः इसे उदासीन बनाने हेतु सीरम रोग की प्रारम्भिक अवस्थाओं में ही रोगी ही देह में प्रवेश कराते हैं। रोगी का परीक्षण व रोगी का निदान करने के साथ ही लगभग 2 लाख इकाई ” सीरम ” पेशियों में इंजेक्शन द्वारा पहुँचाने पर लाभ होता है।
प्रतिआविष का तैयार किया जाना (Prepration of Antitioxin)
टेटनेस प्रति आविष (antitioxin) ए टी एस (an anti teatanus serum) कहलाता है जो घोड़े से प्रतिरक्षीकरण (immunization) द्वारा तैयार किया जाता है। रोगी की देह में पेशियों या रक्त में 1500 इकाई ATS की प्रवेश करायी जाती है मनुष्य में ए टी एस का अर्ध जीवन काल (half life) लगभग 7 दिवस है। रोगी की देह में एक बार प्रति आविष प्रवेश कराने पर काफी समय तक सक्रिय रहता है। अतः बार-बार ए टी एस के इंजेक्शन लगाने की आवश्यकता नहीं होती है। टेटनस जीवाणु दो प्रकार के विषैले पदार्थ उत्पन्न करता है-
(1) टेटेनोस्पास्मन (tetanospasmin
(2) टेटेनोलाइसिन (tetanolysin)
दोनों आविषयों में से टेटनोस्पास्मिन अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि तंत्रिकीय उत्तकों के प्रति यह अधिक सक्रिय बन्धुता रखता है तथा टेटेनस के लक्षण, उत्पन्न करता है। टेटेनोलाइसिन लाल रक्त कणिकाओं का लयन करता है। प्रति आविष में सीरम के भीतर स्यूडोग्लोब्यूलिन (pseudoglobulin) होते हैं जो विषैले पदार्थों को उदासीन बनाते हैं क्लो. टेटनाई को नष्ट करते हैं। रोग से बचाव हेतु शिशु को DTP का टीका व उसके बाद 5 वर्ष की उम्र में एन्टीटेटनस ट्राइऑक्साइड बूस्टर लगाया जाता है। रोगाणुओं की वृद्धि पेनिसलीन द्वारा अवरोधित की जाती है ।
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