दीमक (termite) कीट के जीवन चक्र का विस्तृत वर्णन कीजिए दीमकों की जातियाँ व आर्थिक महत्त्व termite life cycle in hindi

termite life cycle in hindi दीमक (termite) कीट के जीवन चक्र का विस्तृत वर्णन कीजिए दीमकों की जातियाँ व आर्थिक महत्त्व ?

दीमकों का आवास एवं वितरण

दीमक ऊष्ण कटिबन्धीय प्रदेश में पाई जाती हैं। दीमक सामान्यतया दो तरह के आवासों को पसन्द करती है- मिट्टी अथवा लकड़ी। मिट्टी या जमीन में पाए जाने वाली दीमकें अपना नीड़ (nest) या तो जमीन के नीचे बनाती है या कुछ जातियाँ जमीन से बाहर वल्मीक या दीमक गृह (termitaria) बनाती है। लकड़ी पर पाई जाने वाली जातियाँ वृक्षों के तनों या शाखाओं पर अथवा उनके अन्दर अपना ‘नीड़’ बनाती हैं।

दीमक का जीवन-वृत्त

एक बस्ती की दीमकें (राजा व रानी) एक विशेष ऋतु में संपख नर व मादा उत्पन्न करती। हैं। हमारे देश में यह मौसम वर्षा का होता है। वर्षा के उपरान्त अनेक चींटी से मिलते-जुलते नर-मादा जमीन या वल्मीक से बाहर निकलते हैं। इन पर पंख पाए जाते हैं तथा रंग में भी ये चींटी की तरह होते हैं परन्तु इन्हें एक गुण के आधार पर चींटियों से अलग किया जा सकता इनका उदर वक्ष से पूर्ण रूप से जुड़ा होता है जबकि चींटी में वक्ष व उदर को एक पतले वृन्त से जुड़े रहते हैं। चीटियाँ कीटों के एक अन्य गण हाइमेनोप्टेरा (Hamenoptera) की सदस्य हैं।

नर व मादा के बिल से निकलने की इस घटना को वृन्दन (swarming) कहते हैं। दीमक की यही अवस्था ऐसी ही है जो खुली हवा में दिखाई देती है अन्यथा शेष अवस्थाएँ तो प्रकाश से दूर रहना पसन्द करती हैं। नर व मादाएँ सपंख होने के कारण उड़ान भर सकते हैं। इस उड़ान को कामद उड़ान कहा जाता है परन्तु यह सच्ची कादम उड़ान (nuptial flight) नहीं है क्योंकि इस दौरान मैथुन नहीं होता है। यह उड़ान प्रकीर्णन का कार्य करती है। अधिकांश सपंख नर व मादाएँ इस उड़ान के उपरान्त पंख त्याग देते हैं तथा जोड़ा बना लेते हैं। हमारे देश में मानसून की सुबह प्रकाश स्रोत के पास ऐसे टूटे पंखों को देखा जाना आम बात है। वल्मीक या नीड़ से निकली सभी दीमकें जोड़ा नहीं बना पाती हैं वरन् इनमें से अधिकांश छिपकलियों, मेढ़कों, पक्षियों आदि द्वारा खा ली जाती हैं।

जोड़ा बना लेने के उपरान्त नर मादा बिल बनाते हैं तथा इसमें अण्डे देते हैं। अण्डों की देखभाल व अर्भकों का पालन भी यही नर व मादा करते हैं। पहली पीढ़ी जैसे ही वयस्क होती हैं वैसे ही नर व मादा अण्डोत्पादन के अतिरिक्त अन्य सभी कार्य त्याग देते हैं। अब बस्ती के शेष सभी कार्य पहली पीढ़ी के श्रमिक ही करते हैं। इस तरह पहली पीढ़ी का प्रजनकों से अलग न होना सामाजिक जीवन की शुरूआत करता है। शेष जीवन चक्र पर सामाजिक जीवन का पूर्ण प्रभाव देखा जा सकता है।

रानी व राजा लगातार प्रजनन करते रहते हैं तथा श्रमिक व सैनिक उत्पन्न करते रहते हैं परन्तु ये सपंख सदस्य तभी उत्पन्न करते हैं जब बस्ती की सदस्य संख्या पर्याप्त हो जाती है। में एक मिनट में 60 व प्रतिदिन 2000 से 3000 अण्डे तक दिए जाते हैं। उच्चतर जातियों में बस्ती कुछ जातियों वह शाही दम्पत्ति की आयु 15 से 50 वर्ष तक हो सकती है। एक बस्ती में 15,000 से 5,00,000 तक सदस्य हो सकते हैं। बस्ती में श्रमिक, सिपाहियों व जननक्षम सदस्यों का अनुपात फेरोमानों (pheromones) द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

एक व्यवस्थित बस्ती में रानी द्वारा उत्पन्न अण्डों को श्रमिक विशेष अण्ड-कक्षों में ले जाते हैं जहाँ ये सात दिन में स्फुटित हो जाते हैं। श्रमिक इनका लालन-पालन करते हैं। चार से दस निरूप या इन्स्टार के बाद इनसे एक वयस्क उत्पन्न होता है।

बस्ती में अण्ड कक्ष के अलावा गलियारे, वायु हेतु मार्ग, खाद्य भण्डार, उद्यान आदि हो सक हैं। दीमकों की कुछ जातियाँ विशेष कक्षों (उद्यान या gardens) में खुम्भियों या कवकों की खेती करती हैं।

दीमकों का प्रमुख भोजन लकड़ी या वनस्पतियाँ हैं जिनमें सेलुलोस नामक जटिल बहुर्शकरा पाई जाती है। इस सेलुलोस का पाचन करने की क्षमता ससीमकेकेन्द्रकी जीवों में नहीं पाई जाती है। इनकी आंत्र में एक फ्लेजिलेट प्रोटोजोआ पाया जाता है। पहले यह माना जाता था कि प्रोटोजोआ (Myxotricha paradoxa) ही सेलुलेज (cellulase) नामक एन्जाइम से सेलुलोज का पाचन करता है परन्तु बाद में यह ज्ञात हुआ कि इस प्रोटोजोआ के शरीर पर अनेक स्पाइरोकीट बैक्टीरिया पाए जाते हैं जो सेलुलोस का पाचन करते हैं। दीमकों के कुल टर्मेटिडी (Termatidae) में सहजीवी प्रोटोजोआ नहीं पाए जाते हैं। इनके स्थान पर दीमक की आंत्र में मौजूद बैक्टीरिया ही यह कार्य करते हैं। दीमकों की आंत्र में पाए जाने वाले ये सहजीवी निर्मोचन के समय मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। यदि इन्हें पुन: प्राप्त न किया जाए तो श्रमिकों में सेलुलोस पचाने की क्षमता नष्ट हो जायेगी अतः इन श्रमिकों का मल अन्य श्रमिकों द्वारा खा लिया जाता है तथा इस तरह दीमकें सहजीवी जीव से ‘पुन: संक्रमित’ होती रहती हैं। नए उत्पन्न श्रमिकों में भी ये प्रोटोजोआ मल के माध्यम से ही पहुँचते हैं। सामाजिक जीव विज्ञान (Socio-biology) पर महत्त्वपूर्ण कार्य करने वाले विद्वान एडवर्ड ओ. विल्सन का मत है कि यह सहजीवन (प्रोटोजोआ के साथ) ही दीमकों में सामाजिक जीवन के उद्विकास का कारण हैं। दीमकों को निर्मोचन के उपरान्त पुनः सहजीवी प्रोटोजोआ प्राप्त करने के लिए अन्य साथियों के सहयोग की आवश्यकता होती है। एकल जीवन की तुलना में सामाजिक जीवन में सहजीवी को मल से पुनः प्राप्त करने की सम्भावना कहीं अधिक बढ़ जाती है अतः दीमकों ने साथ रहना प्रारम्भ किया होगा। साथ रहने के कारण धीरे-धीरे इनमें बहुरूपता, श्रम-विभाजन उत्पन्न हो गया होगा ऐसी परिकल्पना की जाती है।

दीमकों की जातियाँ व आर्थिक महत्त्व

विश्व में गण आइसोप्टेरा की दो हजार जातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से अधिकांश अफ्रीका में पाई जाती है। भारत में इनकी 270 जातियाँ खोजी जा चुकी हैं। इनमें से 30-40 प्रमुख हानिकारक जातियाँ हैं। भारत में वंश ओडोन्टोटर्मीज़ (Odontomtermes) की 38 जातियाँ प्रमुख मानी जाती हैं। इस वंश के अलावा मेक्रोटर्मीज़ व माइक्रोटर्मीज़ दीमकों के दो अन्य भारतीय वंश हैं।

दीमकों का पारिस्थितिक तंत्र ( eco-system) में महत्त्वपूर्ण योगदान है क्योंकि ये कार्बनिक पदार्थों को सरल रूपों में तोड़ती है। इससे मृदा के तत्व पुनः मृदा में लौट आते हैं। ये केंचुओं की तरह अवमृदा (subsoil) को ऊपर लाती हैं तथा मृदा को खोखली बना कर उसमें ऑक्सीजन पहुँचाने में मदद करती है।

मनुष्य ने जब अपने उपयोग हेतु कागज, कपड़े व लकड़ी का उपयोग करना प्रारम्भ कर दिया तब उसे इन वस्तुओं के साथ दीमक का वह नैसर्गिक सम्बन्ध पसन्द नहीं आया जो दीमकों में मानव उत्पत्ति से पूर्व पनप चुका था। दीमकें इमारतों की लकड़ी, फसलों, जंगलों, पुस्तकालयों आदि को नुकसान पहुँचाती हैं अतः मनुष्य इन्हें हानिकारक मानकर नष्ट करना चाहता है।

इस अध्याय का लक्ष्य दीमकों का आर्थिक महत्त्व की विवेचना करना नहीं है अतः यहाँ इनके द्वारा किए नुकसान तथा इसके नियंत्रण पर विस्तृत चर्चा नहीं की जा रही है। फिर भी यहाँ पर कहना असंगत न होगा कि दीमकों का नियंत्रण उचित योजना बना कर, डी.डी.टी., सल्फर, आर्सेनिक, मिथाइल ब्रोमाइड, एल्ड्रीन आदि रसायनों से किया जा सकता है।