तरुण स्त्री सभा की स्थापना किसने की और कब की , tarun stri sabha was founded by in hindi

tarun stri sabha was founded by in hindi तरुण स्त्री सभा की स्थापना किसने की और कब की ?

प्रश्न: तरूण स्त्री सभा
उत्तर: जे.ई.डी. बेटन द्वारा 1819 में कलकत्ता में तरूण स्त्री सभा की स्थापना की। यह ईसाई मशीनरियों द्वारा स्थापित संस्था थी। इसका उद्देश्य स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना था। एन.एम. जोशी ने दो अन्य संस्थाएं और स्थापित की
1. इण्डियन नेशनल सोशियल कॉन्फ्रेस
2. बोम्बे सोशियल रिफॉर्म एसोसिजन

प्रश्न: ‘धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का योगदान
उत्तर: राजा राममोहन राय एक महान समाजसुधारक व धर्मसुधारक थे। बहुभाषाविद् होने के कारण उन्होंने अनेक धर्मों का अध्ययन किया और बताया कि सभी धर्मों में एकेश्वरवादी सिद्धान्त का प्रचलन है। उन्होंने 1828 में ‘‘ब्रह्म समाज‘‘ नामक संस्था की स्थापना की। वे धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के पुजारी थे। उन्होंने अंधविश्वास, मूर्तिपूजा, धार्मिक कर्मकाण्ड आदि की निन्दा की। सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में उन्होंने स्त्रियों की दशा सुधारने की ओर पर्याप्त ध्यान दिया। उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप ही 1829 में बेंटिक ने कानून बनाकर सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया। वे औरतों को पैतृक सपंत्ति में अधिकार दिलाना चाहते थे। वे विधवा विवाह के समर्थन एवं बहु विवाह के विरोधी थे। वे स्त्री शिक्षा के घोर समर्थक थे। उन्होंने जातिवाद पर भी प्रत्यक्ष प्रहार किया। निस्सन्देह धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सर्वोपरि है।
प्रश्न: आर्य समाज की स्थापना व इसके लक्ष्य के बारे में बताइए।
उत्तर: आर्य समाज की स्थापना दयानंद सरस्वती ने 1875 में बम्बई में की थी। यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया के रूप में शुरू हुआ। यह हिन्दू धर्म का प्रबल समर्थक था, इसलिए इसे सैनिक हिन्दुत्व भी कहा जाता है। स्वामी जी ने पहली बार स्वराज, स्वदेश, स्वभाषा, स्वधर्म का नारा ही नहीं दिया बल्कि प्रयोग भी किया। दयानंद ने वेदों की ओर लौटों न कि वैदिक काल की और लौटों का नारा दिया।
आर्यसमाज का उद्देश्य वेदों की सर्वोच्चता, पुनर्जन्म तथा कर्म के सिद्धांत में विश्वास की भावना आदि को प्रतिष्ठापित करना था। साथ ही इसके माध्यम से हिंदू धर्म एवं समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने का भी प्रयास किया गया। इसने बहुदेववाद, मूर्तिपूजा, धार्मिक कर्मकांड तथा पुरोहिती आधिपत्य को समाप्त करने का उद्देश्य रखा। साथ ही जाति प्रथा, अज्ञानता, बाल विवाह, दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा आदि की भी आलोचना की और विदेश यात्रा, विधवा विवाह, नारी शिक्षा आदि को अपना समर्थन दिया। इसका एक प्रमुख उद्देश्य शुद्धिकरण और धर्म-परिवर्तन द्वारा अन्य व्यक्तियों को हिंदू समाज में पुनः शामिल कराना भी था।

प्रश्न: श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (SNDP)
उत्तर: श्री नारायण गुरू (1854-1928) इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे जो एक समाज सुधारक थे। वे एझावा जाति से थे जो दरिद्र जाति थी। उन्होंने SNDP की अनेक जगह स्थापना की। जाति उत्थान के लिए दो सूत्री कार्यक्रम बनाया।
1. नीची जातियों के प्रति अस्पृश्यता को समाप्त करना।
2. विवाह संस्कार, धार्मिक पूजा, अंत्येष्टि क्रिया आदि कर्मकाण्डों को सरल बनाना।
3. इनका मुख्य कार्य यह रहा कि इन्होंने दलित जातियों को पिछड़ी जातियों में परिवर्तित कर दिया। गुरू ने गांधीजी की दो बातों को लेकर आचोलना की।
4. गांधी द्वारा निम्न जातियों के प्रति केवल मौखिक सहानुभूति प्रकट करना।
गांधीजी का चर्तुवर्ण व्यवस्था में प्रगाढ़ विश्वास होना।

सल्तनतकालीन चित्रकला के बारे में बताइए 

सल्तनतकालीन चित्रकला में भारत में नई आई फारसी चित्रकला और पारम्परिक भारतीय शैलियों के सम्मिलन के प्रयास दिखाई देते हैं। नियामतनामा की चित्रित पांडुलिपि (आरंभिक 16वीं सदी) में फारसी और जैन चित्र शैलियों का सम्मिलन दिखाई देता है। सल्तनत कालीन प्रयासों से प्रमुख शैलियां विकसित हुईं मुगल, राजस्थानी और दक्कनी इनका विकास लगभग साथ-साथ, करीब 1550 ईस्वी के आसपास हुआ था। सभी में कुछ तत्व समान थे लेकिन हर शैली ने अपनी अलग पहचान भी सुरक्षित रखी थी।
मुगल शैली
सोलहवीं शताब्दी में जब प्रथम बार स्थायी रूप से मुगल हमारे देश में आए, तब यहां की चित्रकला जीवित रहते हुए भी मृतप्राय हो रही थी। परंतु उनके आगमन के साथ ही हमारी सुप्त चित्रकला में फिर से शक्ति और जीवन का संचार हुआ और नए कला-पारखियों के सौजन्य और सहयोग से वह पुनः अपने विकास के माग्र पर चलने के लिए तत्पर हो गई।
मुगल स्वभाव से ही कलाप्रेमी थे। बुद्धिमान और स्वतंत्र विचारों के होने के कारण प्रकृति प्रेम उनमें कूट-कूट कर भरा था। इस्लाम के प्रादुर्भाव से पूर्व ही उनका चित्रकला-प्रेम पूरी तरह विकसित हो चुका था। अपनी कलाप्रियता को वह कभी छोड़ नहीं सके।
बाबर और हुमायूं के राजदरबारों में फारसी चित्रकला की तैमूरी शैली चालू रही। अकबर के काल में एक शैली का आरंभ हुआ जो आश्चर्यजनक रूप से अपनी प्रकृति में तो भारतीय थी पर जिसका निर्देशन दो फारसी उस्तादों ने किया था। वे थे मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस समद। बसावन, दशवंथ और केशुदास जैसे हिंदू चित्रकार अकबर के दरबार में बहुत प्रसिद्ध थे। मुगलकाल में चित्रकला के विकास की ओर सर्वप्रथम सम्राट अकबर का ध्यान आकृष्ट हुआ। उस समय तक भारत के पारस्परिक गृहयुद्ध प्रायः समाप्त हो चुके थे और जनसामान्य पुनः सुख और समृद्धि की गोद में अपना जीवन व्यतीत करने की तैयारी कर रहा था। अकबर प्रारंभ से ही बुद्धिमान और विवेकशील था। उसने चित्रकला के महत्व को समझा और कलाकारों को समुचित राजाश्रय प्रदान किया। कला के प्रचार-प्रसार और उसके संवर्द्धन के संबंध में उसने इस्लाम के कठमुल्लाओं की एक नहीं सुनी।
अकबर के दरबारी अबुलफजल के अनुसार तत्कालीन भारतीय चित्रकारों का काम अनुपमेय था और संसार में कोई भी उनकी बराबरी नहीं कर सकता था। वस्तुतः इस बात में किसी को भी कोई संदेह नहीं हो सकता है कि अकबर और जहांगीर का काल भारतीय मुगल चित्रकला का स्वर्णिम काल था।
उन दिनों विशेषकर दो ही प्रकार के चित्र बने मिनिएचर और पोट्रेट। जाहिर है, मिनिएचर में बड़े चित्र नहीं बनते थे। आमतौर पर उनमें दृश्यों का ही अंकन होता था, जैसे युद्ध, दरबार अथवा शिकार के दृश्य। इसके विपरीत पोट्रेट में आमतौर पर व्यक्तियों की छवि का ही चित्रण किया जाता था और उनके अंग-प्रत्यंग बड़ी सावधानी के साथ रेखांकित किए जाते थे।
अकबर के समय के जिन प्रमुख चित्रकारों के नाम आज हमें मिलते हैं उनमें अधिकांश हिंदू थे। तत्कालीन इतिहास में जगन्नाथ, बसावनलाल, हरबंस, केशव, मुकुंद और जसवंत आदि चित्रकारों का उल्लेख मिलता हैं। अबुलफजल के अनुसार केशव, मुकुन्द और जसवंत सामूहिक रूप से एक साथ चित्रों का अंकन करते थे। जगन्नाथ को मयूरों के चित्र में विशेषज्ञता प्राप्त थी और बसावन दरबार संबंधी चित्र और पृष्ठभूमि के रेखांकन में सिद्धहस्त थे। फतेहपुर सीकरी की दीवारों पर जो चित्र बने हुए हैं उन्हें इन्हीं कलाकारों की देन कहा जा सकता है।
अबुल फजल ने मुगल वंश का विस्तृत इतिहास लिखा था अकबरनामा इसमें अकबर के दरबार और साम्राज्य के प्रशासन प्रबंध का विस्तृत और क्रमवार विवरण था (आइन-ए-अकबरी/ अकबर की संस्था)। अकबर विवरण के वे अंश चुनता था जिन्हें वह चित्रित कराना चाहता था और फिर नियमित रूप से चित्रकारों के काम का निरीक्षण भी किया करता था। अबुल फजल ने इस महान रचना को 1590 ई. में अकबर को भेंट किया था। अकबरनामा में सौ से भी अधिक ऐसे चित्र हैं जिन्हें ‘अत्युगाम कलाकृतियां’ माना गया है।
अकबरनामा में बने चित्र मुगल दरबार की गतिविधियां दर्शाने वाले असाधारण दस्तावेज हैं। इनमें महान राजपूत दुग्र चित्तौड़ और रणथम्भौर की युद्धपराजय का चित्रण, शिकार दृश्य, दरबार में आने वाले राजदूत,एक शहजादे के जन्म पर मनाई जागे वाले हर्ष-उल्लास के दृश्य और फतेहपुर सीकरी के निर्माण के दृश्य हैं।
कुछ चित्रों में सुदूर क्षितिज के दृश्य हैं जिनमें दूरी का भ्रम देने के लिए नीले रंग का प्रयोग किया गया है। यह तरीका यूरोपीय कलाकारों से सीखा गया था। अकबर के शिल्पकारों ने पश्चिमी कला से प्रत्यक्ष सम्बंध स्थापित किया था। उसने 1575 में गोआ की पुर्तगली बस्ती में कुछ चित्रकारों को भेजा था ताकि वे दुर्लभ कृतियां लेकर आएं और विदेशी शिल्प और कौशल भी सीख सकें।
यथार्थवाद मुगल शैली की चित्रकला का प्रमुख तत्व है। इसके अधिकांशतः विषय तत्कालीन भव्य दरबारी गतिविधियों पर आधारित हैं। माप में मुगल चित्र छोटे हैं और फारसी पुस्तक चित्रण कला से भी इसका संबंध जोड़ा जा सकता है।
अकबर द्वारा मुगल शैली में लघु चित्रकला को प्रोत्साहन दिया गया। जहांगीर ने इस परंपरा का अनुपालन किया। बादशाह तथा शाही घराने के सदस्यों के अतिरिक्त मुगल कलाकारों ने फकीरों, साधु-संतों, नर्तकियों, सैनिकों, प्रेमियों, सुलेखकों, तथा चित्रकारों के लघु चित्र भी बना,। यद्यपि जहांगीर के काल में समूह चित्रांकनों को प्रश्रय दिया जाता था, परंतु कलाकार ज्यादातर एकल चित्र ही बनाया करते थे।
बाबर के प्रकृति प्रेम को जहांगीर ने पूर्णता से ग्रहण किया था और उसने कलाकारों को दुर्लभ पशु-पक्षियों के चित्र बनाने के काम में लगाया था। कुछ पशु-पक्षियों के संपूर्ण चित्र उपलब्ध हैं जैसे हिमालय महोख, नर मीरू (विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय, लंदन में संग्रहीत) और बाज (प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम, बम्बई)। समझा जाता है ये सभी चित्र कलाकार मंसूर ने बना, थे। ये अद्भुत चित्र हैं, जो न केवल विवरण की परिशुद्धता बल्कि रंग की नाजुक समझ और बारीक ब्रश कार्य की दृष्टि से महान कलाकृतियां हैं। कलाकारों ने खेल के मैदान के अत्यंत रोमांचक दृश्य भी चित्रित किए हैं। ‘लाल फूल’ शीर्षक चित्र मंसूर द्वारा बनाया गया सर्वश्रेष्ठ पुष्प चित्रांकन है।
जहांगीर-काल में चित्रकला की एक नवीन शैली का भी प्रचलन हुआ, जिसे फ्लोरेन्स पेंन्टिग कहते हैं। उसके अंतग्रत फूल और पत्तियों के विविध प्रकार के चित्र बना, जाते हैं। दिल्ली और आगरा के किलों की दीवारों पर इस शैली के बेहद अच्छे नमूने मिलते हैं। आज कपड़ों पर हम जो विभिन्न प्रकार के डिजाइन देखते हैं यह फ्लोरेंस शैली ही थी। इस प्रकार अकबर द्वारा प्रारंभ की गई भारतीय मुगल चित्रकला का पूर्ण विकास हम जहांगीर के काल में देखते हैं।
जिस कला की आराधना में जहांगीर ने अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर दिया वह उसके निधन के बाद स्वयं मृत हो गई। इसका कारण यह था कि बाद के मुगल सम्राटों को चित्रकला में अपेक्षित रुचि नहीं रह गई थी।
शाहजहां के काल में चित्रकला को वास्तुकला जितना महत्व नहीं दिया गया। हालांकि इस कला में तकनीकी दृष्टि से अवश्य निखार आया, लेकिन यह घिसीपिटी एकरस-सी हो गयी और पहले जितनी जीवंत नहीं रही। औरंगजेब के शासन काल में मुगल दरबारों में कला का पतन हो गया।