sulphur system in hindi phase diagram गंधक तंत्र का चित्र क्या है किसे कहते हैं परिभाषा

गंधक तंत्र का चित्र क्या है किसे कहते हैं परिभाषा क्या है sulphur system in hindi phase diagram ?

 गंधक तंत्र (Sulphur System) गंधक के दो क्रिस्टलीय अपररूप (allotropic forms) होते हैं। दोनों ही रूपों में गंधक क्रिस्टलीय अवस्था में होती है। एक रूप एकनताक्ष गंधक (Monoclinic sulphur Sp) और दूसरा विषमलम्बाक्ष गंधक (Rhombic sulphur Sp) कहलाता है। विषमलम्बाक्ष और एकनताक्ष गंधक 95.6°C ताप पर साम्यवस्था में रहते हैं अर्थात्

इस ताप को संक्रमण ताप (Transition Temp.) कहते हैं अर्थात् एक वायुमण्डल दाब पर इनका संक्रमण ताप 95.6°C है। 95.6°C से नीचे ताप पर विषमलम्बाक्ष गंधक और 95.6°C से ऊपर ताप पर एकनताक्ष गंधक स्थायी होती है। एक वायुमण्डल दाब पर विषमलम्बाक्ष गंधक का गलनांक 144°C तथा एकनताक्ष गंधक का गलनांक 120°C है। जब द्रव गंधक को गर्म किया जाता है तो लगभग 450°C पर द्रव पर उबलने लगता है और वाष्प में परिवर्तित होने लगता है। इस प्रकार गंधक की चार प्रावस्थाओं में दो ठोस एक द्रव तथा एक गैस संभव हैं, जो कि निम्नलिखित हैं-

(i) विषमलंबाक्ष गंधक ( Rhombic sulphur Sp)

(ii) एकनताक्ष गंधक (Monoclinic sulphur SM)

(iii) द्रव गंधक (Liquid sulphur Sp)

(iv) वाष्प गंधक (Sulphur Vapour Sy)

इस तंत्र की प्रत्येक प्रावस्था को प्रदर्शित करने वाला अवयव एक ही गंधक (Sulphur) है। अत: यह तंत्र एक घटक तंत्र है।

यदि प्रावस्था का मान (P = 4) प्रावस्था समीकरण में रखा जाये तो स्वातन्त्र्य की कोटि संख्या -1 होगी। जो कि संभव नहीं है-

F = CP + 2

=1- 4 + 3 =-1

अतः उपर्युक्त चारों प्रावस्थाऐं एक साथ साम्यावस्था में नही रह सकती है। इसलिये चारों प्रवस्थाओं में से केवल तीन प्रावस्थाएँ ही एक साथ रह सकती है क्योंकि एक घटक तंत्र में साम्य में रहने वाली अधिकतम प्रावस्थाओं की संख्या तीन होती है। चित्र 4.2 में गंधक का प्रावस्था आरेख दर्शाया गया है। गंधक तंत्र के निम्नलिखित लक्षण है।

(i) वक्र – FA, AB, BE, AC, BC, तथा CD वक्र हैं, जिन पर दो प्रावस्थाऐं विभिन्न ताप व दाबों पर साम्यावस्था में हैं ये एक चर होते हैं।

(ii) वक्रों के बीच का क्षेत्र वक्रों से विभाजित चार क्षेत्र है जिनमें विभिन्न तापों व दाबों पर केवल एक ही प्रावस्था विद्यमान है। ये द्विचर तन्त्र है।

(iii) त्रिक बिन्दु – A. B. C तथा O चार त्रिक बिन्दु है जिन पर विभिन्न ताप एवं दाबों पर तीन प्रावस्थाऐं विद्यमान है। ये अचर तंत्र है।

अब हम इन वक्रों, क्षेत्रों तथा त्रिक बिन्दुओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे और इनकी सार्थकता पर विचार करेंगे।

(i) विभिन्न वक्र (Different Curves)-

वक्र FA – यह वक्र विषमलंबाक्ष गंधक का ऊर्ध्वपातन वक्र (Sublimation Curve of SR) कहलाता है। इस वक्र पर निम्न साम्य स्थापित होता है।

SR ⇒ Sv

इस प्रकार वक्र पर दो प्रावस्थाऐं विद्यमान हैं अर्थात् P = 2 एवं C = 1 है । अतः स्वातंत्र्य कोटि पर्याप्त है। अर्थात् F= 1 होगी। तंत्र को वक्र के किसी बिन्दु पर व्यक्त करने के लिये ताप अथवा दाब एक ताप पर तंत्र का केवल एक ही दाब हो सकता है। अतः तंत्र एक चर होता है। वक्र AB – यह वक्र एकनताक्ष गंधक का ऊर्ध्वपातन वक्र (Sublimation Curve of SM) कहलाता है। इस वक्र पर निम्न साम्य स्थापित होता है।

SM ===> Sv

इस वक्र पर प्रत्येक ताप पर दो प्रावस्थाऐं SM तथा S विद्यमान है। अतः तंत्र की स्वातंत्र कोटि एक होगी। अतः यह एक चर तंत्र है।

वक्र BE – यह द्रव गंधक का वाष्प दाब वक्र (Vapour Pressure Curve of S) कहलाता है। इस वक्र पर SS साम्य स्थापित होता है। प्रावस्था की संख्या 2 तथा स्वातन्त्र्य की कोटि एक है है। यह भी एक चर तंत्र है।

वक्र AC – यह विषमलम्बाक्ष एवं एकनताक्ष गंधक का संक्रमण वक्र (Transition Curve of Sp & SM) कहलाता है। इस वक्र पर दो ठोस प्रावस्थाऐं साम्यावस्था में है ।

SR ⇒ SM

इस वक्र पर तंत्र की स्वातन्त्र्य कोटि एक है अर्थात् तंत्र एक चर है। यह वक्र संक्रमण ताप दाब के प्रभाव को प्रदर्शित करता है। वक्र के झुकाव (inclination) से यह कहा जा सकता है कि दाब बढ़ाने पर संक्रमण ताप बढ़ता है। अर्थात् विषमलम्बाक्ष गंधक को एकनताक्ष गंधक में बदलने पर आयतन में वृद्धि होती है।

वक्र BC – यह एकनताक्ष गंधक का गलन वक्र (Fusion Curve of SM) कहलाता है। यहाँ एकनताक्ष गंधक व द्रव गंधक साम्यवस्था में हैं-

SM ===> SL

इस वक्र पर भी तंत्र एक चर है यह तंत्र एकनताक्ष गंधक के गलनांक पर दाब के प्रभाव को दर्शाता हैं वक्र का झुकाव यह प्रदर्शित करता है कि गलनांक दाब बढ़ाने से बढ़ता है तथा एकनताक्ष गंधक के पिघलने पर आयतन बढ़ता है।

वक्र CD – यह विषमलम्बाक्ष गंधक का गलन वक्र (Fusion Curve of Sp) कहलाता है। इस पर दो प्रावस्थायें साम्यवस्था में हैं-

SR ⇒  SL

अतः इस वक्र के किसी बिन्दु पर तंत्र की स्वातन्त्र्य कोटि एक होगी व तंत्र भी एक चर है। केवल ताप अथवा दाब ही तंत्र को व्यक्त करने के लिये पर्याप्त है। [150°C तथा 1290 वायुमण्डल दाब के उपरान्त SM का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता

(ii) क्षेत्र (Areas)-

FACD के बांयी ओर का क्षेत्र जैसा कि चित्र 4.2 से स्पष्ट है इस क्षेत्र में केवल विषम लम्बा गंधक (Sp) उपस्थित है। अतः प्रावस्था की संख्या एक है, अर्थात् स्वान्त्र्य कोटि दो होगी। यह तत्र द्वि है। इस क्षेत्र में किसी बिन्दु पर तंत्र को पूर्णतया व्यक्त करने के लिये ताप एवं दाब दोनों घरों में आवश्यकता होगी दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है यह क्षेत्र विषमलम्बाक्ष गंधक के अस्तित्व के लिए आवश्यक शर्तें बताता है।

.FABE के नीचे का क्षेत्र इस क्षेत्र में सर्वत्र गंधक वाष्प (Sy) उपस्थित है। चूंकि प्रावस्था तथा घटक एक हैं अतः स्वातंत्रय कोटि दो होगी और तंत्र द्विचर है। यह क्षेत्र गंधक वाष्प के अस्तित्व के लिये आवश्यक शर्तें प्रतिपादित करता है।

EBCD के दांयी ओर का क्षेत्र- इस क्षेत्र में सर्वत्र द्रव गंधक (S) विद्यमान है। इस क्षेत्र में भी केदन एक प्रावस्था अस्तित्व में हैं। अतः स्वातंत्र की कोटि दो है और तंत्र द्विचर है। यह क्षेत्र द्रव गंधक के अस्तित्व के लिये आवश्यक शर्ते प्रतिपादित करता है।

AB, BC तथा AC वक्रों द्वारा घिरा क्षेत्र गंधक तंत्र के चित्र से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में केवल एकनताक्ष गंधक (Sp) उपस्थित है अर्थात् एक ही प्रावस्था अस्थित्व में है। चूंकि यह एक घटक तंत्र है अतः इस क्षेत्र में भी स्वातंत्र कोटि दो ही होगी। तथा यह तंत्र भी द्विचर है। यह क्षेत्र एकनताक्ष गंधक के अस्तित्व के लिये आवश्यक शर्तें बताता है।

(iii) त्रिक बिन्दु (Triple points)-

बिन्दु A – इस बिन्दु पर FA. BA, CA वक्र मिलते है अतः इस बिन्दु पर SR- Sy तथा S- परस्पर साम्यावस्था में होंगे।

SR ⇒ SM ⇒ Sv

यह बिन्दु SR तथा SM का संक्रमण ताप भी कहलाता है। इस बिन्दु पर P = 3, C = 1 अतः F=0 है। अर्थात् इस बिन्दु पर तंत्र अचर है। तंत्र की अभिव्यक्ति के लिये ताप अथवा दाब को निश्चित नहीं करता पड़ता चूंकि यह साम्य एक निश्चित ताप (95.60) तथा निश्चित दाब (0.006 मिमी.) पर ही संभव है ।

बिन्दु B – इस बिन्दु पर AB. EB तथा CB वक्र मिलते हैं। अतः इस बिन्दु पर SR,SL तथा परस्पर साम्यावस्था में हैं।

चूंकि तीन प्रावस्थाएं साम्यवस्था में है, अतः इस बिन्दु पर तंत्र अचर होगा। यह साम्य भी एक निश्चित ताप (120°C) तथा निश्चित दाब (0.04 मिमी) पर ही संभव है। यह बिन्दु Sm का गलनांक भी कहलाता है।

बिन्दु C – इस बिन्दु पर AC, BC तथा DC वक्र मिलते हैं। अतः इस बिन्दु पर SR,. Sm तथा SL. परस्पर साम्यावस्था में हैं।

SR ⇒ SM ⇒ SL

चूंकि बिन्दु C पर तीन प्रावस्थाएँ उपस्थित है, अतः बिन्दु पर भी तंत्र अचर होगा। यह साम्य भी एक निश्चित ताप (150°C) तथा निश्चित दाब (1290 वायुमण्डल) पर संभव है। यह बिन्दु Sp का गलनांक भी कहलाता है।

मितस्थायी साम्य एवं मितस्थायी त्रिक बिन्दु Metastable equilibrium and metastable triple point)– यदि विषमलम्बाक्ष गंधक को तेजी से गर्म किया जाता है तो उसके बिन्दु A पर एकनताक्ष गंधक में संक्रमण नहीं होता, क्योंकि गंधक के अणुओं की पुनर्व्यवस्था के लिये समय नहीं मिलता है। SR. Sv के साथ साम्यवस्था में रहती है। साम्यवस्था की शर्तें बिन्दुकित वक्र AO द्वारा इन परिस्थितियों में प्रदर्शित की जाती है। 95.6° से. उच्च ताप पर S, स्थायी नहीं होती अतः यह साम्य मितस्थायी साम्य है। इसी प्रकार यदि द्रव गंधक को तेजी से सावधानीपूर्वक ठण्डा किया जाता है तो बिन्दु B पर द्रव गंध कि Sxx में नहीं बदलती बल्कि द्रव अवस्था, वाष्प गंधक के साथ की साम्यावस्था में रहती है। साम्यवस्था की शर्तें बिन्दुकित वक्र OB द्वारा प्रदर्शित की जाती है। यह साम्य भी मितस्थायी साम्य है। इसी प्रकार वक्र CO विषमलंबाक्ष गंधक का मितस्थायी साम्य दर्शाता हैं।

बिन्दु O पर मितस्थायी साम्य वक्र AO, BO तथा CO मिलते हैं। अतः इस बिन्दु पर SP, SL तथा S. मितस्थायी साम्यवस्था में होते हैं।

SR ⇒ SL ⇒ Sv

इस प्रकार बिन्दु O पर तीन प्रावस्थाएँ है। अतः यह मितस्थायी त्रिक बिन्दु कहलाता है। चूंकि P = 3. C = 1 अतः F = 0 हैं इस बिन्दु पर तंत्र अचर है। यह साम्य एक निश्चित ताप ( 114°C) तथा एक निश्चित दाब (0.03 मिमी.) पर ही संभव है। बिन्दु 0 इस दाब पर SP का गलनांक है तथा वक्र OC. SR के गलनांक पर दाब का प्रभाव प्रदर्शित करता है ।

स्थिर दाब पर तंत्र के ताप को बदलने पर उसमें होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन (Study of changes in the system by varying the temperature at constant pressure) – माना कि चित्र 4.2 में कोई बिन्दु X है। इस बिन्दु पर Sp उपस्थित हैं यदि दाब स्थिर रखते हुये SR को गर्म किया जाता है तो बिन्दु G तक ताप बढ़ता है। चूंकि Gबिन्दु संक्रमण वक्र पर है। अतः बिन्दु G पर SR का SM में संक्रमण होने लगता है। यदि इस स्थिति में तंत्र को गर्म किया जाता है तो ताप नहीं बढ़ता बल्कि Sp का SM में संक्रमण होता रहता है। जैसे ही संक्रमण पूर्ण हो जाता है ताप में फिर वृद्धि होने लगती है तथा G से H तक SM प्रावस्था स्थायी रहती है। बिन्दु H. SM के गलन वक्र पर है। अतः बिन्दु पर SM पिघलने लगती है। दो प्रावस्थायें SM तथा S उपस्थित हो जाती है। गर्म करने पर ताप नहीं बढ़ता बल्कि SM का द्रवण होता रहता है। जैसे की द्रवण पूर्ण होता है ताप फिर बढ़ने लगता है। और गंधक द्रव अवस्था मैं (एक प्रावस्था) बिन्दु I तक स्थायी रहती है। बिन्दु I पर S वाष्प गंधक (S) में परिवर्तित होने लगती है तथा SL====→ SV साम्य स्थापित हो जाता है और ताप बढ़ना रूक जाता है। गर्म करने पर S वाष्प में परिवर्तित होती रहती है। जैसे ही सम्पूर्ण द्रव गंधक वाष्प गंधक में परिवर्तित हो जाती है, ताप फिर से बढने लगता है और X’ की दिशा में केवल वाष्प गंधक अस्तित्व में रहती है।

उपरोक्त परिवर्तन तंत्र को धीरे-धीरे गर्म करने पर ही होंगे। यदि SR को तेजी से गर्म कर दिया जाये तो वह SM में परिवर्तित हुए बिना ही सीधा सल्फर द्रव S में परिवर्तित हो जाएगा क्योंकि SR का सक्रमण SM में होने वाले आण्विक परिवर्तनों के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता।

इसी प्रकार अन्य कोई बिन्दु लेकर इन परिवर्तनों को समझाया जा सकता है। गंधक तंत्र की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में सारणी 4.2 में दर्शाया गया है।

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