सूफी आंदोलन की प्रकृति व विशेषताएँ बताइये। nature of sufi movement in hindi सूफी आंदोलन का महत्व / प्रभाव

By   October 12, 2021

भारत में सूफी आंदोलन का महत्व / प्रभाव क्या है सूफी आंदोलन की प्रकृति व विशेषताएँ बताइये। nature of sufi movement in hindi ? 

प्रश्न: सूफी आंदोलन की प्रकृति व विशेषताएँ बताइये।
उत्तर: 1. इस्लाम में एक रहस्यमयी प्रवृत्ति का प्रतीक, एक इस्लामी आध्यात्मिक आंदोलन के रूप में सूफी आंदोलन, विकास हुआ।
2. यह इस्लाम में आस्था व इस्लाम के बृहद दायरे में आंदोलन था।
3. इस्लाम के औपचारिकता का विरोध, इस्लाम में आडम्बर का विरोध किया। इस्लाम के विशुद्ध रूप को स्वीकृति प्रदान की।
4. ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभति केन्द्रीय विचार के रूप में अर्थात् दैविक वास्तविकता की अनुभूति (हकीकत को मात का प्रयास)
5. ईश्वर के साथ मिलन। इसका आधार व्यक्तिगत अनुभव है।
6. तारिका अर्थात् सूफी मार्ग के महत्व पर बल। ईश्वर की अनुभूति का माध्यम माना गया।
7. अनुभूति के अन्तर्गत (विभिन्न चरणों – मकामत) और अनुभूति परिवर्तनशील मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं के अंतर्गत।
8. साधना, चिन्तन-मनन पर बल और आध्यात्मिक क्रियाएँ जैसे ईश्वर के नाम का मनन, कायाक्लेष इत्यादि बल दिया।
9. मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं में परिवर्तन और आध्यात्मिक अनुभूति से स्वयं के अस्तित्व की समाप्ति। इसे श्फनाश् कहा गया।
10. व्यक्तिगत अनुभवों में ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति।
11. अनुभूति मिलन पाँच चरणों में
(i) सेवा – ईश्वर की विधि का पालन
(ii) प्रेम – आत्मा का ईश्वर के प्रति आकर्षण
(iii) विमुखता – साधना (ईश्वर व दैवीय मुद्दों पर)
(iv) ज्ञान – ईश्वर व प्रकृति का आध्यात्मिक अध्ययन
(v) परमानन्द – (ईश्वर की अनुभूति)
12. सूफी मार्ग के अनुसरण के लिए आध्यात्मिक की महत्ता पर बल।
पीर-ईश्वर की अनुभूति को प्राप्ति किए हुए व्यक्ति है।
13. इसमें तार्किक वाद-विवाद, वार्ता इत्यादि को नकारा गया क्योंकि इसमें व्यक्तिगत अनुभव पर बल है।
14. संगीत से सम्बद्ध, आध्यात्मिक अनुभूति को बल प्रदान करता है। व्यक्ति को परमानन्द की ओर ले जाता है। कुछ सूफी परम्परा ने इसे
स्वीकार नहीं किया।
15. कुरान के विभिन्न आदर्शों व मूल्यों पर विशेष बल –
ं. ं. संयम
इ. दान
ब.. सहानुभूति
क.. समानता
म. शान्तिवाद
.ि. सेवा दृ
ह.. ईश्वर में आस्था
16. विभिन्न सिलसिलों में विभक्त चिश्ती, कादिरी, सुहरावर्दी आदि थे। ये सम्प्रदाय प्रमुख व्यक्तित्व द्वारा स्थापित व उनके अनुयायियों से
निर्मित होते थे।
17. खानकाह व्यवस्था – सूफी सम्प्रदाय की गतिविधियों का केन्द्र था। सूफी प्रशिक्षण का संस्थागत आधार था।
18. पीर-मुरीद परम्परा पर आधारित था जिसका आर्थिक आधार दान-अनुदान था।
प्रश्न: भारतीय समाज पर सूफी आंदोलन का महत्व / प्रभाव के बारे में बताइये।
उत्तर: राजनीतिक प्रभाव
i. मध्यकालीन शासन व्यवस्था व राज्य की नीतियों पर प्रभाव। इसे प्रारंभिक चिश्तियों के प्रभाव के अन्तर्गत देखा जा सकता है।
ii. सामाजिक समन्वय के वातावरण की स्थापना में राज्य की भूमिका को बल प्रदान करने में भूमिका निभायी।
iii. राज्य की नीतियों को उदारवादी स्वरूप प्रदान करने में भमिका निभायी। दारुल-उल-इस्लाम की बजाय दारूल-उल-हर्ब पर ही टिके रहना।
iv.  इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण राज्य द्वारा भू-राजस्व की वसली में उदारवादिता को लाने में भूमिका।
v. सल्तान विशेष आदि मुहम्मद बिन तुगलक नीतियों में असहमति प्रकट करने के उल्लेख प्राप्त होते हैं।
आर्थिक क्षेत्र में प्रभाव
i. आर्थिक क्षेत्र में विकास के अन्तर्गत भूमिका।
ii. सूफियों के द्वारा बंजर भूमि क्षेत्र में कृषि विकास व कृषि-विस्तार को बल।
iii. सूफियों के द्वारा बागीचे-बागान का विकास।
iv. .सूफियों के द्वारा सार्वजनिक उपयोगिता वाली संरचनाओं का निर्माण।
v. सूफियों ने शिल्प, व्यापार, वाणिज्य को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। वार्षिक उर्स की परम्परा। आध्यात्मिक गुरु की मृत्यु
की वर्षगाँठ को मनाने का दृष्टिकोण ने इससे स्थानीय क्षेत्रों में वाणिज्यिक-व्यापारिक प्रवृत्तियों को बल।
नगरीकरण में सहायक
i. सल्तनत व मुगलकाल में नगरीकरण की विकास की प्रक्रिया में भूमिका।
.ii. खानकाह क्षेत्रों में नगरीय विशेषताओं का विकास।
iii. इसके कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण – अजमेर, गुलबर्गा इत्यादि।
सामाजिक समन्वय की स्थापना
i. सामाजिक समानता के आदर्शों को बल
ii. खानकाह व्यवस्था समानता के सिद्धांतों पर आधारित। इसके अन्तर्गत सामाजिक श्रेणीकरण को नकारा जाना।
iii. सूफी केन्द्र समाज के सभी सदस्यों के लिए खुले थे व सामाजिक मूल के आधार पर इसमें प्रवेश नहीं था। इससे
सामाजिक समन्वय को बल मिला।
iv. खानकाह व्यवस्था व सूफी दर्शन के प्रति ब्राह्मणवादी व्यवस्था के निम्न स्तर के सदस्यों का आकर्षण व इन पर इस्लामी विचारों
का प्रभाव।
v. अतः इस्लाम के प्रति उन्मुखता व धर्म-परिवर्तन को बल मिला। नैतिक आदर्शों की स्थापना ।
vi. सूफी विचारों के विभिन्न नैतिक आदर्श थे।
vii. संयम, दान, सहानुभूति आदि, इससे सामाजिक जीवन में नैतिक आदर्शों के विकास को बल मिला।
viii. सूफी धारा ने रूढ़िवादी धारा व भक्ति की धारा के बीच समन्वय की स्थापना में भी एक भूमिका निभायी।
ix. नासिरूद्दीन चिरागी देहली – गेशुदराज जैसे सूफी सन्तों ने उलेमा वर्ग के प्रति समझौतावादी दृष्टिकोण दर्शाया व
रूढ़िवादी और उदारवाद के बीच समन्वय पर बल दिया।
भाषा व साहित्य का विकास
i. सूफियों ने भाषा व साहित्य के विकास में भूमिका निभायी। फारसी व उर्दू के विकास में इनकी भूमिका रही। सूफी सन्तों के द्वारा लिखित रचनाएं साहित्य के एक महत्वपूर्ण भाग के रूप में उभरी।
ii. तसव्वुफ गेशुदराज के द्वार रचा गया।
iii. फैयब-उल-फुवाद की रचना अमीर हसन सिजदी के द्वारा।
iv. अब्दुल कुदुस गांगोही के द्वारा सूफी विचारों पर कई पुस्तकें लिखी गयी।
v. बाद के चिश्ती सन्तों ने अरबी व फारसी रचनाओं पर टीकाएँ लिखीं।
vi. के सूफी संतों के द्वारा रहस्यवाद पर संस्कृत रचनाओं का फारसी में अनुवाद किया गया।
प्रश्न: सूफी आंदोलन ने भारत में एक श्संश्लेषित संस्कृति के विकासश् में योगदान दिया। विवेचना कीजिए।
उत्तर: (i) सूफी धारा ने संश्लेषित संस्कृति के विकास का एक मंच प्रदान किया।
(ii) एकेश्वरवादी आंदोलन व सूफी आंदोलन के बीच समानता के विभिन्न बिन्दु
(ं) एकश्वरवाद, (इ) रूढ़िवादिता का विरोध, (ब) समानता का आदर्श, (क) उदारवादी दृष्टिकोण. (म) शान्तिवाद ()ि ईश्वर में आस्था,
(ह) सहानुभूति, (ी) सेवा, (प) दान, (र) संयम।
(पपप) नाथपन्थ योगियों के साथ सूफियों का संबंध (चिश्तियों व समानता के बिन्दु)
(ं) गैर-रूढ़िवादिता, (इ) सामाजिक श्रेणीकरण को नकारना, (ब) रहस्यवाद, (क) फना, (म) समा, ()ि हठयोग (ह) योग-क्रियाएँ, (ी)
तपस्या व साधना, (प) उपवास, (र) काया-क्लेष।
(पअ) इनसे संबंधित रचनाओं का अनुवाद जैसे – योग पर महत्वपूर्ण भारतीय ग्रंथ श्अमृतकुण्डश् का फारसी सूफियों के भारत आने के पूर्व ही हो चुका था व सूफियों के द्वारा इसके विभिन्न आदशों को स्वीका जसे – निजामुद्दीन औलिया ने योग की प्राणायाम (हक्स-ए-दम) पद्धति में निपुणता प्राप्त की। अतः. वे श्योगी सिद्धश् (सिद्ध पुरुष) कहलाने लगे।
;अ) नाथ योगियों का सर्वाधिक प्रभाव कलंदरी सम्प्रदाय के घुमक्कड़ फकीरों पर पड़ा। इन्होंने नागपंथियों की कई एवं मान्यताओं को अपना लिया। वे नाथ योगियों के समान कान छिदवाते तथा चिमटा व कमण्डल रखते थे।
(अप) भारत में चिश्ती सन्तों ने श्विलायतश् नामक संस्था विकसित की, जो राज्य के नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक
(अपप) कश्मीर में श्उदित ऋषि आंदोलनश् (शेख नरूददीन वली- संस्थापक) पर लालदेव के गैर-रूढ़िवादी विचारों का (अपपप) प्रारंभिक चिश्तियों के द्वारा श्हिन्दवीश् का प्रयोग (हिन्दी व उर्दू के संश्लेषण की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति व सूफी संतों के द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग कई सूफी संतों ने क्षेत्रीय भाषाओं में कविताएँ लिखीं।
(पग) मौलाना दाऊद की रचना श्चन्दायनश् संश्लेषण की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है जिसमें हिन्दू रहता को समाहित करने का प्रयास किया है। इसकी भाषा हिन्दवी है। इसका अनुवाद अब्दुल कुदुस गंगोही के द्वारा फारसी में किया गया। गंगोही ने श्अलखश् नाम से कविताएं लिखी।
(ग) श्शमाश् की परम्परा से समन्वित संगीत परम्परा का विकास हुआ। कव्वाली का उद्भव जिसका जनक और खुसरो माना जाता है। इसी संगीत परम्परा की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है।
(गप) समन्वित सामाजिक-धार्मिक जीवन के विकास में भूमिका। मुसलमान व गैर-मुसलमान के बीच सामाजिक सांस्कृतिक समन्वय को बल। (गपप) बाद के दिनों के सूफी लोक-साहित्य में इस्लाम, सूफी-दर्शन और भारतीय परम्पराओं से सम्बद्ध आदर्शों व प्रतीकों का समन्वय। (गपपप) बंगाल के शासक हुसैनशाह का श्सत्यपीर आन्दोलनश् चिश्ती सम्प्रदाय से 18वीं सदी में दिल्ली के नक्शबंदी ख्वाजा मुहम्मद नासिर अंदलीब व उनके पुत्र ख्वाजा मीर दर्द ने श्इल्मे इलाही मुहम्मदीश् (तरीका-ए-मुहम्मादिया) नामक रहस्यवादी सिद्धान्त का विकास किया। (गपअ) सिख परम्परा की लंगर व्यवस्था के आधार पर सुहरावर्दी संत शेख जलालुद्दीन तबरीजी ने बंगाल में श्मुफ्त लंगरश् की व्यवस्था शुरू की।
प्रश्न: सूफी और मध्यकालीन रहस्यवादी सिद्ध पुरुष (संत) हिन्दूध्मुसलमान समाजों के धार्मिक विचारों और रीतियों को या उनकी बाह्य संरचना को
पर्याप्त सीमा तक रूपान्तरित करने में विफल रहे। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर : सूफी तथा मध्यकालीन रहस्यवादी संतों का प्रादुर्भाव तत्कालीन समाज में व्याप्त रूढ़िवादी तथा निरंकुश प्रथाओ, अंधविश्वासों के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। ये अपने आध्यात्मिक शांति. भाईचारे, प्रेम, मानवतावादी, ईश्वर तक सरलता से पहुंच आदि के विचारों के कारण सीमित समय में ही जनसामान्य के बीच प्रसिद्ध हो गए। इन्होंने अपन पुन जीवन, ईश्वर के नाम का जाप और कुप्रथाओं से मुक्ति के उद्देश्यों द्वारा जनसामान्य को अपनी तरफ आकर्षित किया,
अपने सरल और सर्वमान्य शिक्षाओं तथा उपदेशों के बावजूद ये तत्कालीन किसी भी धार्मिक प्रथा या कुरीतियों का – मूर्ति पूजा, मानव एवं पशुबलि, अस्पृश्यता, सती प्रथा, बहु-विवाह, महिलाओं की दयनीय स्थिति आदि का बल असफल रहे। धार्मिक मामलों में अब भी अंधविश्वासी और स्वार्थी पुजारियों का आधिपत्य बना रहा, जो अपन स्वा के लिए धर्म की व्याख्या करते थे। सूफी संतों तथा रहस्यवादी संतों का इस उपमहाद्वीप में धार्मिक सुधारात्मक लाने का कोई स्पष्ट दृष्टिकोण भी नहीं था। यह एक स्थानीय तथा असंगठित आंदोलन रहा, जिस कारण अपने उद्देश्य की प्राप्ति में असफल रहा। यद्यपि उन्होंने विभिन्न सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई, लेकिन कोई वैकल्पकि मार्ग प्रदान करने में असफल रहे।
कालान्तर में इस आंदोलन में श्गुरु-शिष्यश् संबंधित नियमों का समावेश हो गया. जिस कारण इनमें गुटबदा तथा प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो गई। ये सभी कारक सम्मिलित रूप से हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के धार्मिक एवं सामाजिक सुधार मार्ग में अवमन्दक सिद्ध हुए। उल्लेखनीय है कि इन सूफी एवं रहस्यवादी संतो का उद्देश्य ईश्वर के प्रति सच्ची आस्था एवं भक्ति के विचार को प्रचारित करना था। उन्होंने कभी समाज की व्यवस्था में सधार करने का प्रयत्न किया ही नहीं।