अर्थव्यवस्था सेवा क्षेत्र एवं अधोसंरचना ? सेवा अर्थव्यवस्था किसे कहते हैं परिभाषा सेवा क्षेत्र में Service Economy in hindi

By   September 30, 2021

Service Economy in hindi सेवा क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियाँ शामिल हैं अर्थव्यवस्था सेवा क्षेत्र एवं अधोसंरचना ? सेवा अर्थव्यवस्था किसे कहते हैं परिभाषा क्या है ?

3. सेवा अर्थव्यवस्था (Service Economy)
ऐसी अर्थव्यवस्था जिसके अंतर्गत सकल आय में तृतीयक क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत या उससे ज्यादा होता है, उसे सेवा अर्थव्यवस्था कहते हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था को अपनाने वाले पहले पहल वह देश थे, जो पहले पहल औद्योगिक अर्थव्यवस्था को अपना चुके थे। इस अर्थव्यवस्था में ज्यादातरलोगों की आजीविका तृतीयक क्षेत्र से पूरा होता है। बीते एक दशक के दौरान (2003-04 से लेकर 2012-13) सेवा क्षेत्र में ही ज्यादा वृद्धि देखने को मिली है। इस दौरान पूरी अर्थव्यवस्था में हुई वृद्धि में 65 प्रतिशत हिस्सेदारी सेवा क्षेत्र की रही है जबकि 27 प्रतिशत उद्योग-धंधों और 8 प्रतिशत कृषि क्षेत्र का योगदान रहा है।
19वीं सदी के अंत तक, कम से कम पश्चिमी देशों में तो यह सत्यापित हो चुका था कि औद्योगिक गतिविधियां कृषिगत गतिविधियों की तुलना में आय अर्जित करने का बेहतर और तेज तरीका है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह मान्यता पूरी दुनिया में मान्य हो गई और सभी देशों में औद्योगीकरण की होड़ शुरू हो गई। जब कई देशों ने औद्योगीकरण की कामयाबी के साथ अपना लिया तो आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र से उद्योग धंधों की तरफ आया। इस बदलाव की प्रक्रिया को ही वृद्धि के चरण (Stages of Growth) के रूप में परिभाषित किया गया।
औद्योगीकरण के बढ़ने से, कृषिगत क्षेत्रों परलोगों की निर्भरता कम होती गई और उद्योग-धंधों पर निर्भरता बढ़ती गई। ठीक इसी तरह का बदलाव, उद्योग-धंधों से सेवा के क्षेत्र में बदलाव करने के दौरान नजर आया। सर्विस सेक्टर पर निर्भर आबादी को औद्योगीकरण के बाद के दौर की आबादी माना गया और इसे सर्विस सोसायटीज के रुप में भी मान्यता मिली। पूरे यूरोप और अमेरिका में कुल उत्पादन का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा सेवा क्षेत्र से आ रहा था और लगभग आधी आबादी की आजीविका भी इस पर निर्भर थी। यानी किसी क्षेत्र की उसकी आय में योगदान और उस पर निर्भर जनसंख्या में साम्यता थी, लेकिन कुछ देशों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। भारत में उन देशों में शामिल था, जहां यह साम्यता नहीं थी।
राष्ट्रीय आय की अवधरणा
(The Idea of National Income)
अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। अर्थशास्त्र एवं किसी अर्थव्यवस्था की समझ के लिए राष्ट्रीय आय की गणना से जुड़ी अवधारणों का स्पष्ट होना आवश्यक है। वैसे तो इसका पता सामान्य तौर पर देश और वहां केलोगों की खुशहाली और उगकी प्रसन्नता से लगते हैं। यह तरीका आज भी इस्तेमाल होता है हांकि हम यह जाग चुके हैं कि आय से किसी भी समाज के बेहतर और कुशलहोने का अनुमाननहीं लगया जा सकता है। इस राय के पीछे कई वजहें भी हैं। जब 1990 के शुरुआती सों में मानव विकास सूचकांक की शुरुआत हुई। इस सूचकांक में किसी भी देश में प्रति व्यक्ति आय को काफी प्राथमिकता दी गई थी। लेकिन समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति तभी बेहतर होती है जब इन क्षेत्रों में भारी पैमाने पर निवेश किया जाता हो। यही वजह है कि विकास या मानव विकास का केंद्र बिंदु आय को माना जाता है।
एक आदमी की आय को आकलित किया जा सकता है, उसी तरह से पूरे देश की आय का आकलगी संभव है और पूरे विश्व की आय का अनुमान लगना संभव है हांकि पूरे विश्व की आय को मापने का तरीका मुश्किल जरूर है। बहरहाल किसी भी देश की आय को आकलित करने के लिए अर्थशास्त्र में चार दृष्टिकोण हैं। ये चारों दृष्टिकोण हैं- ळक्च्ए छक्च्ए ळछच् और छछच्। यह सब किसी भी देश की राष्ट्रीय आय के रूप हैं, लेकिन सब एक-दूसरे से अलग हैं। ये अलग-अलग किसी भी देश की आय के बारे में अपने खास अंदाज में विश्लेषण करते हैं। इस अध्याय में हम इन चारों दृष्टिकोण के बारे में अलग-अलग अध्ययन करेंगे।
जीडीपी (GDP)
सकल घरेलू उत्पाद (GrossDomesticProduct–GDP ) किसी भी अर्थव्यवस्था में एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का अंतिम (थ्पदंस) मौद्रिक मूल्य है। भारत के लिए यह एक वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक है। इसका आकलगी राष्ट्रीय निजी उपभोग, सकल निवेश, सरकारी एवं व्यापार शेष (निर्यात-आयात) के योगफल द्वारा भी किया जाता है। इस विधि में देश के बाहर उत्पादित आयातों के व्यय को तथा उन देश-निर्मित वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य जुड़ा होता है जिगहें देश में नहीं बेचा गया है।
इस दृष्टिकोण में इस्तेमाल किए गए पदों को समझना आवश्यक है। अर्थव्यवस्था और वाणिज्य में ग्रास का मतलब वही होता है जो ग.िात में कुल का मतलब होता है। ‘डोमेस्टिक’ का मतलब सभी अर्थव्यवस्थाओं में किसी भी देश और उसकी पूँजी के दायरे में होने वाली आर्थिक गतिविधि है। ‘प्राॅडक्ट’ का मतलब सामान और सेवा है, जबकि ‘फाइनल’ का मतलब है कि किसी भी उत्पाद में अब वैल्यू ,डिशन का मौका नहीं है। जीडीपी के विभिन्न उपयोग निम्न हैंः
;i) GDP में होने वा वार्षिक प्रतिशत परिवर्तन ही किसी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर (Growth Rate) है। उदाहरण के लिए किसी देश की ळक्च् 107 रुपया है और यह बीते साल से 7 रुपया ज्यादा है तो उस देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7 प्रतिशत है। जब हम किसी देश की अर्थव्यवस्था को ग्रोइंग इकाॅनमी कहते हैं तो मतलब यह होता है कि देश की आय परिमाणात्मक रूप से बढ़ रही है।
;पपद्ध यह परिमाणात्मक दृष्टिकोण है। इसके आकार से देश की आंतरिक शक्ति का पता चलता है। लेकिन इससे देश के अंदर उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता के स्तर का पता नहीं चल पाता है।
;iii) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की ओर से सदस्य देशों का तुलनात्मक विश्लेषण इसके आधार पर ही किया जाता है।
एनडीपी (NDP)
शुद्ध घरेलू उत्पाद (छक्च्), किसी भी अर्थव्यवस्था का वह जीडीपी है, जिसमें से एक वर्ष के दौरान होने वाली मूल्य कटौती को घटाकर प्राप्त किया जाता है। वास्तव में जिन संसाधनों द्वारा उत्पादन किया जाता है, उपयोग के दौरान उगके मूल्य में कमी हो जाती है, जिसका मतलब उस सामान का घिसने (Depreciation) या टूटने-फूटने से होता है। इसमें मूल्य कटौती की दर सरकार निर्धारित करती है। भारत में यह फैस केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रलय करता है। यह एक सूची जारी करता है जिसके मुताबिक विभिन्न उत्पादों में होने वाली मूल्य कटौती (घिसावट) की दर तय होती है। उदाहरण के लिए, भारत में रिहाइशी निवास की साना मूल्य कटौती एक प्रतिशत है, वहीं बिजली से चलगे वाले पंखे के मूल्य में 10 प्रतिशत की कमी होती है। अर्थशास्त्र में मूल्य कटौती का इस्तेमाल किस
तरह से होता है, ये उसका एक उदाहरण है। दूसरा तरीका ये भी है जब बाहरी क्षेत्र में उसका इस्तेमाल होता है जब घरेलू मुद्रा विदेशी मुद्रा के सामने कमजोर होता है। अगर बाजार की व्यवस्था में घरेलू मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्रा के सामने कम होता है तो उसे घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन कहते हैं। यह घरेलू मुद्रा में दर्ज गिरावट से तय होता है।
इस तरह से देखें तो NDP = GDP– घिसावट।
ऐसे में जाहिर है कि किसी भी वर्ष में किसी भी अर्थव्यवस्था में एनडीपी हमेशा उस साल की जीडीपी से कम होग। अवमूल्यन को शून्य करने का कोई भी तरीका नहीं है। लेकिन मानव समाज इस अवमूल्यन को कम से कम करने के लिए कई तरकीबें गिकाल चुका है।
छक्च् का अलग-अलग प्रयोग निम्न हैः
(अ) घरेलू इस्तेमाल के लिए-इसका इस्तेमाल घिसावट के चलते होने वाले नुकसान को समझने के लिए किया जाता है। इतना ही नहीं खास समयावधि के दौरान उद्योग-धंधे और कारोबार में अलग-अलग क्षेत्र की स्थिति का अंदाजा भी इससे लगया जा सकता है।
;पपद्ध अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में अर्थव्यवस्था की उपलब्धि को दर्शाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
लेकिन एनडीपी का इस्तेमाल दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना के लिए नहीं किया जाता है। ऐसा क्यों है? इसकी वजह है दुनिया की अलग-अलग अर्थव्यवस्थाएं अपने यहां मूल्य कटौती की अलग-अलग दरें निर्धारित करती हैं। यह दर मूल रूप से तार्किक आधार पर तय होता है। (उदाहरण के लिए भारत में मकान में होने वाले मूल्य कटौती की दर को लें, मकान बनाने में सीमेंट, ईंट, बालू और ेहे की छड़ इत्यादि का इस्तेमाल होता है और यह माना जाता है कि ये आगे वाले 100 साल तक चलेंगी। लिहाजा यहां मूल्य कटौती की दर 1 प्रतिशत साना होती है।) हांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार इसका फेस तार्किकता के आधार पर ही हो। उदाहरण के लिए, फरवरी 2002 में भारी वाहन (ऐसे वाहन जिनमें 6 या उससे ज्यादा चक्के हों) में मूल्य कटौती की दर 20 प्रतिशत थी लेकिन उसे आगे चलकर 40 प्रतिशत कर दिया गया। ऐसा देश में भारी वाहन की बिक्री को बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया। दर को दोगुना करनेके लिए कोई तर्क सही नहीं हो सकता। मूलतः मूल्य कटौती और उसकी दरें भी आधुनिक सरकारों के लिए आर्थिक नीतियों को बनाने के लिए एक हथियार है। अर्थव्यवस्था में अवमूल्यन का तीसरी तरह से इस्तेमाल इस रूप में होता है।
जीएनपी (GNP)
किसी अर्थव्यवस्था में ग्राॅस नेशनल प्राॅडक्ट (GNP) उस आय को कहते है जो जीडीपी में विदेशों से होने वाली आय को जोड़कर हासिल होता है। इसमें देश की सीमा से बाहर होने वाली आर्थिक गतिविधियों को भी शामिल किया जाता है। विदेशों से होने वाली आय में निम्नांकित पहलू शामिल हैंः
;i) निजी प्रेषण (Private Remittances)ः भारत के नागरिक दुनिया के दूसरे देशों में काम करते हैं और दुनिया के दूसरे देशों के नागरिक भारत में भी काम करते हैं। इनलोगों के निजी लेनदेन से जो आमदनी होती है उसे निजी प्रेषण से होने वाली आमदनी कहते है। भारत 1990 के दशक की शुरुआत तक हमेशा फायदे में रहा क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीयलोग खाड़ी देशों में काम कर रहे थे (हांकि खाड़ी युद्ध के चलते इसमें भारी कमी देखने को मिली)। इसके बाद भारतीय अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में काम करने के लिए जाते रहे। आज भारत दुनिया में निजी प्रेषण के जरिए सर्वाधिक आमदनी करने वा देश है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक 2015 में भारत को इस तरीके से 72 अरब डाॅलर की आमदनी का अनुमान है (2013 में भारत को 70 अरब डाॅलर की आमदनी हुई थी,साल में सबसे ज्यादा)। चीन 2014 में 64 अरब डाॅलर की आमदनी के साथ दूसरे नंबर पर है।
;ii) विदेशी कर्जे पर ब्याज (Interest of the External Loans)ः ब्याज के भुगतान पर कुल फायदा या नुकसान। इसमें एक स्थिति वह होती जहां एक अर्थव्यवस्था दूसरे देशों को कर्जे पर रकम देता है, तो उसे ब्याज की आमदनी होती है। एक दूसरी स्थिति भी है, जब कोई अर्थव्यवस्था किन्हीं दूसरे देशों से कर्ज लेता है तो उसे ब्याज का भुगतान करना होता है। भारत की इस ब्याज से होने वाली आय इसके ब्याज व्यय से कम होती है क्योंकि इसके द्वारा लिया गया विदेशी कर्ज इसके द्वारा दिए गए ऐसे कर्ज से अधिक है।
;iii) विदेशी अनुदान (External Grants)ः इसके अंतर्गत भारत द्वारा प्राप्त किए गए एवं दूसरे देशों को दिए गए अनुदान का शेष (Balance) शामिल किया जाता है। काफी निम्न ही सही लेकिन भारत को अन्यान्य विदेशी क्षेत्रों से अनुदान की प्राप्ति होती है (यथा न्छक्च् एवं राष्ट्रों से) जो मूलतः मानवीय आधारों पर दिए जाते हैं। वैश्वीकरण के प्रारंभ के बाद भारत का अनुदान व्यय बढ़ता गया है-यह भारत के राजनयिक प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है जो भारत को अंतर्राष्ट्रीय पहल पर उच्च भूमिका अदा करने के प्रयास से जुड़ा है।
बहरहाल, इन तीनों अलग-अलग मदों से होने वाली आमदनी कुल मिकर भ में भी हो सकती है और नुकसान में भी हो सकती है। भारत के मामले में यह हमेशा नुकसान वाली स्थिति में होती है क्योंकि भारत पर काफी ज्यादा विदेशी कर्ज है और अनुदानकी प्राप्ति घटती गयी है। इसका मतलब यह कि भारत के GNP को हासिल करने के लिए ळक्च् में विदेशों से होने वाली आमदनी जुड़ने के बजाए घटेगी।
सामान्य फाॅर्मूले के मुताबिक GNP, GDP़ विदेशों से होने वाली आय के बराबर है। लेकिन भारत के मामले में विदेशों से होने वाली आमदनी के बदले हानि होती है लिहाजा भारत का ळछच् हमेशा ळक्च् विदेशों से होने वाली आमदनी के बराबर होता है। यानी भारत का GNP हमेशा GDP से कमतर होता है।
ळछच् के विभिन्न उपयोग इस तरह से हैंः
;i) इस राष्ट्रीय आय के मुताबिक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) दुनिया के देशों की रैंकिंग तय करता है। इसके आधार पर आईएमएफ देशों को उगकी क्रय शक्ति तुल्यता (PPP) के आधार पर रैंक करता है। PPP के बारे में विस्तार से आप अध्याय-22 में पढ़ सकते हैं। इस आधार पर भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। चीन और यू.,स.ए. के बाद भारत का स्थान है। लेकिन भारतीय मुद्रा के विनिमय दर के आधार पर भारत दुनिया की 7वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है (आई.एम.एफ., अप्रैल 2016)। अब यह तुलना GDP के आधार पर भी की जाती है।
;ii) राष्ट्रीय आय को आंकने के लिहाज से GNP , GDP की तुलना में विस्तृत पैमाना है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था की परिमाणात्मक के साथ-साथ गुणात्मक तस्वीर भी पेश करता है। किसी भी अर्थव्यवस्था की आंतरिक के साथ-साथ बाहरी ताकत को भी बताता है।
;पपपद्ध यह किसी भी अर्थव्यवस्था के पैटर्न और उसके उत्पादन के व्यवहार को समझने में काफी मदद करता है। यह बताता है कि बाहरी दुनिया किसी देश के खास उत्पाद पर कितनी निर्भर है और वह उत्पाद दुनिया के देशों पर कितना निर्भर है। यह अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में किसी भी अर्थव्यवस्था को अपने मानव संसाधनों के बारे में, उगकी संख्या और और उनसे होने वाली आमदनी के बारे में बताता है। इसके अवा यह किसी भी अर्थव्यवस्था के दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ रिश्ते पर भी रोशनी डालता है (यह दुनिया के देशों से लिए कर्जे या फिरदूसरे देशों को दिए कर्जे से पता चलता है)।
एनएनपी (NNP)
ग्राॅस नेशनल प्राॅडक्ट (GNP) में से मूल्य कटौती को घआगे के बाद जो आय बचती है, उसे ही किसी अर्थव्यवस्था का शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP) कहते हैं।
यानी NNP को हम इस तरह से हासिल कर सकते हैंः
NNP = GNP – घिसावट
या फिर,
NNP = GDP ़ विदेशों से होने वाली आय – मूल्य कटौती
NNP के विभिन्न उपयोग इस तरह से हैंः
;i) यह किसी भी अर्थव्यवस्था की राष्ट्रीय आय (National Income (NI) है। यद्यपि GDP , NDP और GNP सभी राष्ट्रीय आय ही हैं लेकिन राष्ट्रीय आय (NI) के तौर पर नहीं लिखा जाता।
;ii) यह किसी भी देश की राष्ट्रीय आय को आकलित करने का सबसे बेहतरीन तरीका है।
;iii) जब हम NNP को देश की कुल आबादी से भाग देते हैं तो उससे देश की प्रति व्यक्ति आय का पता चलता है। यह प्रति व्यक्ति साना आय होती है। यहां एक मूल बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि अलग-अलग देशों में मू्ल्य कटौती की दर अलग-अलग होती है। ऐसे में किसी देश में मूल्य कटौती की दर ज्यादा होने पर प्रति व्यक्ति की आय में कमी होती है। (यही वजह है कि मूल्य कटौती का इस्तेमाल नीति निर्माण में हथियार के तौर पर किया जाता है)। हांकि अर्थव्यवस्थाओं को किसी भी संपत्ति के मूल्य में कटौती करने का प्रस्ताव दिया जाता है। जब आईएमएफ, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसी वित्त संस्थाएं नेशनल इगकम के आधार पर देशों की तुलना करती हैं।
वैसे राष्ट्रीय आय आकलित करने के लिए सेंट्रल सांख्यिकी संगइन (सीएसओ) ने जनवरी 2015 में बेस ईयर और मेथडाॅॅजी को संशोधित किया है। इसका वर्णन आगे दिया गया है।