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सीपिया या कटल फिश क्या है , Sepia or Cuttle fish in hindi , वर्गीकरण , वैज्ञानिक नाम , संघ , संरचना , जाति , वर्ग
जाने सीपिया या कटल फिश क्या है , Sepia or Cuttle fish in hindi , वर्गीकरण , वैज्ञानिक नाम , संघ , संरचना , जाति , वर्ग ?
सीपिया या कटल फिश (Sepia or Cuttle fish)
वर्गीकरण (Classification)
संघ (Phylum) – मोलस्का (Mollusca )
शरीर खण्डविनि तथा द्विपार्श्व सममित होता है। शरीर में सिर प्रावार, पाद तथा आन्तरागपुंज पाये जाते हैं। केल्शियम कार्बोनेट का बना बाह्य या आन्तरिक कंकाल पाया जाता है। देहगुहा समानीत होती है। श्वसन गिलों या फुफ्फुसों द्वारा होता है। उत्सर्जन वृक्कों या मेटानेफ्रिडिया द्वारा होता है। मुख में रेडूला उपस्थित।
वर्ग (Class) : सिफेलोपोडा (Cephalopoda)
कवच आन्तरिक होता है। सिर स्पष्ट और बड़ा तथा सुविकसित नेत्रों सहित सिर पर स्पर्शक और साइफन के रूप में पाद पाये जाते हैं। मुख में रैडुला पाया जाता है। एकल व समुद्रवासी परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है।
गण (Order) : डेकापोडा (Decapoda)
दस भुजाएँ पायी जाती है इनमें से 8 छोटी होती है व दो बड़ी जो स्पर्शक कहलाती है।
वंश (Genus): सीपिया या कटल फिश Sepia or cutile fish)
आवास एवं स्वभाव (Habit and Habitat) :
यह एक समुद्रीजल में पाया जाने वाला जन्तु है । यह सामान्यतया किनारे की ओर छिछले पानी में पाया जाता है। यह गर्म समुद्रों जैसे भूमध्य सागर (Mediterrian sea) में पायी जाती है। यह बहुत अच्छी तैराक होती है। यह अपने पंखों (fins) एवं साइफन ( siphon ) की सहायता से जल की पिचकारी छोड़ते हुए आगे तथा पीछे की ओर तैर सकती है। तैरते समय या समुद्र के पैदें पर विश्राम के समय ये समूह में पायी जाती है।
यह एक शिकारी प्रवृत्ति का मांसाहारी जन्तु होता है। यह मछलियों, केकड़ों, शिम्प्स तथा प्रॉन आदि को भोजन के रूप में ग्रहण करती है। शत्रु को धोखा देने के लिए यह गहरे रंग की स्याही की एक धार छोड़ती है जिससे कुछ समय तक शत्रु को कुछ दिखाई नहीं देता है व यह वहाँ से हट जाती है। इनमें प्रजनन सर्दियों व गर्मियों के मध्य होता है। प्रजनन के दौरान ये जाति के अनुसार गहरे या छिछले पानी में चली जाती है।
अन्य सिफेलोपोड जन्तुओं की तरह कटल फिश में अपने वातावरण के अनुसार रंग बदलने की क्षमता पायी जाती है। इससे सन्दीप्तशीलता (luminescence) का गुण पाया जाता है।
बाह्रा आकारिकी (External morphology)
आकार व आकृति (Shape and Size) : कटल फिश या सीपिया का शरीर मांसल द्विपात सममित तथा पृष्ठ से प्रतिपृष्ठ की तरफ चपटा होता है। शरीर काफी लम्बा होता है व पश्च सिरे की ओर संकरा होता है। इसके अग्र व पश्च सिरे वास्तव में शरीर की पृष्ठ व अधर सिरों को निरूपित करते हैं। इसका रंग परिवर्तनशील होता है। इसके शरीर को दो भागों में विभेदित किया जा सकता है अग्र प्रमुख विशिष्ठ सिर तथा पश्च धड़ (trunk) दोनों भाग आपस में एक संकरी ग्रीवा द्वारा जुड़े रहते हैं।
सिर (Head) : सिर शरीर की एक प्रमुख संरचना होती है। सिर के पार्श्व में एक जोड़ी बड़े एवं सुविकसित नेत्र पाये जाते हैं। सिर के स्वतन्त्र सिरे पर मुख पाया जाता है। मुख चारों तरफ से 5 जोड़ी पेशीय परिमुखीय उपांगों से घिरा रहता है। इनमें से चार जोड़ी छोटी व मजबूत भुजाएँ (arms) कहलाती है तथा एक जोड़ी लम्बे स्पर्शक होते हैं। स्पर्शक आधार पर उपस्थित गर्त में खींचे जा सकने योग्य होते हैं। स्पर्शक शिकार को पकड़ने तथा मैथुन क्रिया में सहायक होते हैं। आठों भुजाएँ अधर सतह व आधार (base) की तरफ अतभुजीय जाल (inter branchial web) द्वारा परस्पर जुड़ी रहती है। भुजाओं की आन्तरिक चपटी सतह पर चार लम्बवत् पंक्तियों में उपस्थित चूषक पाये जाते हैं। प्रत्येक चूषक एक पेशीय, छिछले प्याले नुमा संरचना होती है जिस पर एक शृंगीय किनारी (hormy rim) पायी जाती है। प्रत्येक चूषक एक छोटे व मोटे वृन्त द्वारा भुजा से जुड़ा रहता है। चूषक निर्वात की स्थिति उत्पन्न कर मजबूती से शिकार के शरीर के साथ या अन्य किसी वस्तु या सतह पर चिपक सकते हैं।
नर कटल फिश में बांयी या अधरीय पांचवीं भुजा प्रवेशी ( entromittent ) अंग के रूप में रूपान्तरित हो जाती है। इस भुजा के चूषक नीचे अधरीय भाग की और खिसक जाते हैं अग्र भाग पर चूषक नहीं पाये जाते हैं। स्पर्शकों में चूषक केवल उनके अन्तस्थ फैले हुए भाग पर ही पाये जाते हैं। स्पर्शक के शीर्ष पर एक मांसल गद्दी पायी जाती है। भुजाएँ व स्पर्शक मिलकर पाद समान सरचनाएँ बनाते हैं अत: इन्हें सम्मिलित रूप से सिफेलोपोडियम (cephalopodium) या कपाल पाद कहते हैं।
धड़ (Trunk) : सिर के पीछे वाला शेष भाग धड़ कहलाता है। सीपिया का धड़ लम्बा व ढाल नुमा होता है। इसका पश्च सिरा या अपमुखी सिरा नुकीला होता है। धड़ ऊपर की तरफ हल्का उत्तल तथा अधर की तरफ थोड़ा चपटा होता है। धड़ के पार्श्व किनारों की तरफ झल्लरनुमा फिन्स या पंख (मीन मंख) पाये जाते हैं। अपमुखी सतह पर फिन्स एक खांच द्वारा एक-दूसरे से पृथक रहते हैं। फिन्स पानी में आराम से तैरने के काम आते हैं।
प्रावार (Mantle) : सीपिया का धड़ एक मोटी पेशीय प्रावार से ढ़का रहता है। प्रावार अधर सतह की ओर प्रावार गुहा ( mantle cavity) को घेरे रहती है जिसमें आन्तरांग उपस्थित रहते हैं। स्वतन्त्र मुखीय सतह की ओर प्रावार का किनारा संकरी ग्रीवा को घेरे रहता है तथा ऊपर की तरफ एक पालि (lobe) एवं नीचे की ओर कॉलर का निर्माण करता है।
साइफन या कीप (Siphon or Funnel) : सिर के नीचे एक बडी शंक्वाकार पेशीय नलिका पायी जाती है जिसे साइफन या कीप (funnel) कहते हैं, जो ग्रीवा से आगे निकली रहती हैं। साइफन या कीप एक संकरे छिद्र द्वारा बाहर की ओर खुलती है परन्तु भीतर की ओर एक चौड़े छिद्र द्वारा प्रावार गुहा में खुलती है। कीप की पश्च अधर सतह पर उपस्थित खांचों में प्रावार की उपास्थि द्वारा निर्मित घुण्डियाँ (knobe) पूरी तरह समाई रहती है । गमन के समय कीप या साइफन पानी की एक तेज धार छोड़ता है जो जन्तु को विपरीत दिशा में धकेलती हैं। इसलिए इसकी तुलना रूपान्तरित मोलस्कन पाद से की जा सकती है।
वर्णक कोशिकाएँ (Pigment cells) : सीपिया या कटल फिश की त्वचा की डर्मिस में अनेकों वर्णक कोशिकाएँ (pigment cells) जैसे क्रोमेटोफोर्स व इरिडोसाइटस (chromatophores and eridocytes) पायी जाती है जो सीपिया के रंग बदलने की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। जीवित सीपिया बार-बार अपना रंग बदलती रहती है और यह कार्य वर्णक कोशिकाओं द्वारा किया जाता है। क्रोमेटोफोर्स तीन प्रकार की होती है लाल, पीताभ भूरी एवं नारंगी । वर्णक कोशिकाएँ प्रसरित व संकुचित होकर रंग बदलने का कार्य करती है। इसके लिए पेशीय तन्तु जिम्मेदार होते है जो एक तरफ इन क्रोमेटोफोर कोशिकाओं से जुड़े होते हैं व दूसरी तरफ ये पेशीय तन्तु त्वचा से जुड़े रहते हैं। इन पेशी तन्तुओं के संकुचन व प्रसरण से क्रोमेटोफोर कोशिकाएँ प्रसरित व संकुचित होती है। इन कोशिकाओं के प्रसरण से त्वचा का रंग हल्का हो जाता है जबकि इनके संकुचन से त्वचा का रंग गहरा हो जाता है। क्रोमोटोफोर कोशिकाओं की संख्या पृष्ठ सतह की तरफ अधिक होती है। जबकि अधर सतह की ओर इनकी संख्या काफी कम होती है। यही कारण है कि पृष्ठ सतह की तुलना में अधर सतह का रंग हल्का पीला होता है। त्वचा में दूसरे प्रकार की वर्णक कोशिकाएँ इरिडोसाइट्स (iridocytes) होती है जो पारदर्शी तथा जालिकावत होती है तथा क्रोमेटोफोर कोशिकाओं के नीचे स्थित होती है। ये प्रकाश की किरणों को परावर्तित कर क्रोमेटोफोर कोशिकाओं के रंगों को चमकाते हैं। सीपिया में रंग परिवर्तन का नियंत्रण केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र के अधीन है। परिरक्षित (preserved) जन्तु अपना नैसर्गिक रंग खो देते हैं।
कवच (Shell): सीपिया में कंकाल आन्तरिक होता है। यह प्रावार की ऊपरी सतह में धंसा रहता है। यह पूर्ण रूप से प्रावार की एक थैले नुमा संरचना में बन्द रहता है तथा इसे उपकला कोशिकाओं द्वारा स्रावित किया जाता है। कंकाल एक प्लेटनुमा चपटा चौड़ा तथा अण्डाकार होता है। इसका मुखीय सिरा चौड़ा व गोल होता है जबकि अपमुखीय सिरा संकरा व नुकीला होता है तथा एक तीक्ष्ण कटिका के रूप में समाप्त होता है। कवच पूर्ण रूप से मृत संरचना होती है तथा कैल्शियम कार्बोनेट का बना होता है। कठोर एवं प्रतिरोधी कवच अन्त:कंकाल की तरह धड़ को मजबूती प्रदान करता है। कवच में केल्केरियस पदार्थ समानान्तर परतों में विन्यासित होता है जिनके बीच-बीच में वायु अन्तराल पाये जाते हैं जिनके कारण कवच हल्का हो जाता है। यह कवच तैरने तथा संतुलन बनाये रखने में सहायक होता है।
प्रावार गुहा (Mental cavity) : मध्य अधर सतह से एक लम्बवत् काट द्वारा प्रावार को काटा जाये तो एक बड़ी प्रावार गुहा दिखाई देती है। प्रावार गुहा पीछे की ओर धड़ के शीर्ष तक फैली रहती है. मुखीय सिरे की ओर साइफन या कीप स्पष्ट दिखाई देती है जिसमें बाहर की ओर संकरा व भीतर की ओर चौड़ा छिद्र दिखाई देता है। कीप की आधारी सतह पर एक जोड़ी उपास्थिल कोटर (cartileginous sockets) पाये जाते हैं जिन्हें कीप उपास्थि (funnel cartilage) कहते हैं। इन उपास्थिल कोटरों के सम्मुख प्रवार की भीतरी सतह पर एक जोड़ी अण्डाकार उपास्थिल घुण्डियाँ (cartilaginous knobs) पायी जाती है जिन्हें प्रावार उपास्थि कहते हैं। ये घण्डियाँ कीप की कोटरों में समाई रहती है। इसी प्रकार ग्रीवा की पृष्ठ सतह में एक नकल उपास्थि (nuchal cartilage) पायी जाती है जो प्रावार की पृष्ठ उपास्थि (dorsal cartilage) में समाई रहती है।
प्रावार गुहा दो तरह से बाहर की ओर खुलती है एक तो ग्रीवा के चारों ओर उपस्थित चौड़े छिद्र द्वारा तथा दूसरी कीप के संकरे छिद्र द्वारा। जब प्रावार गुहा के फैलने से गुहा का आयतन बढ़ता है तो ग्रीवा के चारों ओर उपस्थित चौड़े छिद्र द्वारा पानी प्रावार गुहा में भर जाता है। जब प्रावार गुहा सिकड़ती है तो अधर की तरफ प्रावार व कीप उपास्थियों के मध्य तथा पृष्ठ की तरफ नूकल व पष्ठ उपास्थियों के मध्य इन्टरलॉकिंग स्थापित हो जाती है, जिससे ग्रीवा का छिद्र मजबूती से बन्द हो जाता है। इस प्रकार प्रावार गुहा के संकुचन से उत्पन्न दबाव के कारण कीप के मुख पर भीतर की और स्थित पल्ले (flap) समान कपाट खुल जाता है व पानी दबाव के साथ तेज धार के रूप
मख से बाहर निकल जाता है। कीप के मुख पर स्थित पल्लेनुमा कपाट पानी को केवल हर जाने देता है भीतर की ओर नहीं आने देता है।
प्रावार गुहा के अधिकांश भाग में आन्तरांग स्थित होते हैं। पाचक ग्रन्थियाँ आगे की ओर स्थित होती है जो सिर व कीप की प्रतिकर्षी पेशियों द्वारा सीमाकिंत होती है। मध्यवर्ती मलाशय, कीप (funnel) के आधार पर उपस्थित केन्द्रीय गुदा द्वार द्वारा बाहर खुलती है। मलाशय के दोनों ओर वृक्क कोष स्थित होता है जो रीनल पेपिला पर उपस्थित रीनल छिद्र द्वारा प्रावार गुहा में खुलता है। बांयी तरफ जनन छिद्र खुलता है। इनके थोड़ी बांयी तरफ दोनों ओर गिल्स या क्लोम (ctenidia) पाये जाते हैं। प्रावार भित्ति के दोनों तरफ जहाँ ग्रीवा धड़ से मिलती है वहाँ दो बड़े स्टेलेट गुच्छक (stellate ganglia) पाये जाते हैं। पीछे की ओर एक मसि थैला (ink sac) उपस्थित होता है। इसकी वाहिका आगे की ओर मलाशय की अधर सतह से होती हुई गुदा द्वार के समीप खुलती है। नर सीपिया में मसि थैले से वृषण अधूरे रूप से ढके रहते हैं। जबकि मादा में एक जोड़ी निडामेन्टल ग्रन्थियों व एक जोड़ी सहायक निडामेन्टल ग्रन्थियों की उपस्थिति के कारण वृक्क थैला (renal sac) भी दिखाई नहीं देता है।
जनन वाहिकाएँ (genital ducts) नर में शिश्न व मादा में अण्डवाहिनी बांयी वृक्क छिद्र (renal aperture ) के बांयी ओर स्थित होती है।
गमन (Locomotion) : सामान्य रूप से सीपिया पंख या फिन की तरंगित ( undulating) गति द्वारा धीमे-धीमें तैरती रहती है। फिन्स गमन की दिशा भी तय करते है । परन्तु सीपिया द्वारा प्रदर्शित तेज गति द्वारा गमन महत्त्वपूर्ण है जो प्रावार व कीप की सहायता से सम्पन्न होता है। यह क्रिया निम्न प्रकार सम्पन्न होती है सबसे पहले प्रावार के शिथिल होने से प्रावार गुहा का आयतन बढ़ जाता है जिससे ग्रीवा के समीप उपस्थित कॉलर छिद्र से पानी प्रावार में भर जाता है। बाद में जब प्रावार संकुचित होती है तो प्रावार कॉलर मजबूती से ग्रीवा में फिट हो जाती है जिससे ग्रीवा के चारों ओर उपस्थित छिद्र बन्द हो जाता है। जिससे प्रावार में भरा पानी बलपूर्वक तेज धार के रूप में साइफन या कीप द्वारा बाहर फेंका जाता है इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जन्तु विपरीत दिशा में धकेला जाता है।
इसमें तेज गति से सीपिया पीछे की ओर गति करती है यह इतना तेज व अचानक होता है जाता है कि सीपिया अचानक से गायब हो गई है। साइफन गमन के साथ-साथ गमन की दिशा करता है। यह सम्पूर्ण क्रिया तंत्रिका तन्त्र द्वारा नियंत्रित की जाती है इसके लिए इसमें काय (giant) तंत्रिका तन्तु पाये जाते हैं जिनमें तंत्रिका आवेग तीव्र गति से गमन करती है। पिया का यह गमन रॉकेट व जेट विमानों में प्रयुक्त जेट प्रपल्शन (Jet Proputtion) सिद्धान्त पर आधारित होता है।
देहगुहा (Coelom) : सीपिया में देहगुहा अत्यन्त समानीत होत है। इसमें सीलोम अन्तरांग-परिहद सोलोम (viscero pericardial coelom) तथा वृक्ककोष की गुहा द्वारा निरूपित होती है। इनमें से प्रथम आन्तरांग परिहद सीलोम एक बड़ी थैले समान गुहा होती है तथा एक संकुचन द्वारा दो भागों में बंटी होती है। इसका अग्र भाग परिहद गुहा या पेरिकार्डियम कहलाती है जो हृदय को घेरे रहती है तथा यह गुहा रीनो पेरिकार्डियल छिद्रों द्वारा वृक्क कोष की गुहा से जुड़ी रहती है। सीलोम का पश्च भाग जनन गुहा (gonococl) कहलाता है जो जननांगों को घेरे रहती है।
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