Sense organs of Sepia or cuttlefish in hindi , सीपिया के संवेदी अंग क्या है , प्रजनन तन्त्र (Reproductive system)

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संवेदी अंग (Sense organs):

सीपिया के संवेदी अंग सुविकसित होते हैं। सीपिया में निम्न संवेदी अंग पाये जाते हैं। एक जोड़ी नेत्र, एक जोड़ी स्टेटोसिस्ट या सन्तुलन पुटिका (statocyst) एक जोड़ी पक्ष्माभी घ्राण गर्त (cilliated olfactory pits) तथा एकल स्वाद ग्राही अंग (gustatory organ)

1.नेत्र (Eves): सीपिया के सिर के पार्श्व में बड़े उभरे हुए कार्य में दक्ष एक जोड़ी नेत्र पाये जाते हैं। दिखने में, संरचना में व कार्यिकी में सीपिया के नेत्र कशेरूकी जन्तुओं के नेत्रों से काफी समानता प्रदर्शित करते हैं। सीपिया के नेत्र में कार्निया, लेन्स, आइरिस व रेटिना उपस्थित होते हैं। कशेरूकी जन्तुओं की तरह इसमें भी रेटिना पर उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है। किन्तु यदि हम नेत्र के भ्रूणीय विकास की दृष्टि से कशेरूकी जन्तु के नेत्र से तुलना करें तो यह पूर्ण रूप से कशेरूकियों से भिन्न होती है। सीपिया व कशेरूकी जन्तुओं के नेत्रों में जो समानता मिलती है वह अभिसारी उद्विकास (convergent evolution) के कारण है न की जातिवृत्तीय (phylogenetically) है।

संचरना की दृष्टि से प्रत्येक नेत्र उपास्थि के बने कोटर में स्थित होता है। नेत्रगोलक (eyeball) की बाहरी भित्ति स्क्लेरोटिक आवरण कहलाती है जिसे उपास्थि द्वारा मजबूती प्रदान की जाती है। र आवरण चांदी की तरह चमकदार झिल्ली द्वारा आवरित रहता है। स्क्ले रोटिक आवरण नेत्रगोलक के सामने की और फैल कर संकुचनशील आइरिस का निर्माण करता है। आइरिस के मध्य एक गोल छिद्र पाया जाता है जिसे प्यूपिल या तारा कहते हैं। पेशियों की सहायता से प्यूपिल का व्यास घटाया या बढ़ाया जा सकता है। आइरिस के ठीक पीछे एक बड़ा गोलाकार लेन्स पाया जाता है। यह लेन्स दो समतल उत्तल (plano-convex) अर्धाशों से मिल कर बना होता है। लेन्स को सिलीयरी काय के माध्यम से अपने स्थान पर रखा जाता है। कॉरोइड स्तर का अभाव होता है। नेत्र गोलक का सबसे आन्तरिक स्तर संवेदनशील रेटिना होता है। रेटिना की संरचना कुछ जटिल होती है। इसमें एक स्तर में समानान्तर रूप से विन्यासित शलाका कोशिकाएँ (rods) पायी जाती है। इसमें शंकुओं का अभाव होता है। नेत्र गोलक के ठीक पीछे दृष्टि तंत्रिका (optic nerve) फूल कर दृष्टि गुच्छक (optic ganglion) का निर्माण करती है। इस गुच्छक से कई तंत्रिकाएँ निकल कर दृष्टिपटल या रेटिना के पश्च सतह पर फैली रहती है। दृष्टि गुच्छक के समीप एक छोटी दृष्टि ग्रन्थि (optic gland) या श्वेत काय (white body) पायी जाती है जिसका कार्य अज्ञात है। इसमें वास्तविक कॉर्निया का अभाव होता है। नेत्र की बाहरी सतह पर त्वचा का एक पादर्शी शृंगीय (hormey) भाग पाया जाता है जो कॉर्निया की तरह नेत्र को ढके रखता है, इसे कूट कार्निया (false cornea) भी कहते हैं। नेत्र पर त्वचा द्वारा निर्मित आच्छद (lids) भी पाये जाते हैं। नेत्र गोलक की गुहा लेन्स द्वारा दो प्रकोष्ठों में बंटी रहती है। एक अगला प्रकोष्ठ छोटा होता है जो पानी समान एक्वस ह्यूमर (aqueous humour) से भरा होता है तथा एक पिछला प्रकोष्ठ जो जैली सदृश्य तरल विट्रस ह्युमर (vitrous humour) से भरा रहता है।

  1. सन्तुलन पुटिका (Statocyst): कपालीय उपास्थि में बन्द, पार्श्व आन्तरांग गच्छक अधर सतह पर एक जोड़ी सन्तुलन पुटिकाएँ या स्टेटोसिस्ट (statocyst) पाये जाते हैं। सन्त पुटिकाएँ जन्तु के सन्तुलन या समस्थिति को बनाये रखने का कार्य करती है। प्रत्येक सन्तुलन परिक एक गोलाकार खोखली संरचना होती है। इसकी गुहा में एक स्टेटोलिथ व तरल पाया जाता है। सन्तुलन पुटिका की आन्तरिक सतह चपटी संवेदी उपकला द्वारा आस्तरित होती है जो कई स्थानों पर गुहा में उभरी रहती है जिसे इसकी गुहा अनियमित हो जाती है।
  2. घ्राण गर्त (Olfactory Pits) : इसमें जलेक्षिका या ऑस्फ्रेडिया (ospradia) अनुपस्थित होते हैं। इनके स्थान पर नेत्र के पीछे की ओर पक्ष्माभी घ्राण गर्त (cilliated olfactory pits) पाये जाते हैं। इन गर्मों में संवदी कोशिकाएँ पायी जाती है। दृष्टि गुच्छक (optic ganglion) के समीप उपस्थित एक छोटे घ्राण गुच्छक (olfactory ganglion) से तंत्रिकाएँ निकल कर इन गर्मों तक जाती
  3. स्वाद ग्राही अंग (gustatory organs) : मुख गुहा के फर्श पर ओडोन्टोफोर के ठीक सामने की ओर एक छोटा उभार पाया जाता है जिस पर अनेक अंकुरक या पेपिली (papillae) पायी जाती है। संभवतः यही स्वाद ग्राही अंग होता है।

प्रजनन तन्त्र (Reproductive system) :

सीपिया में नर व मादा जन्तु पृथक-पृथक होते हैं। नर सामान्यतया मादा से छोटे होते हैं, पृष्ठ की ओर कम गोलाकार होते है व इनकी भुजाएँ अपेक्षाकृत लम्बी होती है।

नर जनन तन्त्र (Male reproductive system): आन्तरांग पुंज के शीर्ष के पास एक पील रंग की बडी अण्डाकार, सुगठित वृषण (testis) पाया जाता है। वषण एक छोटे छिद्र द्वारा देहगहीर थैले (coelomic sac) में खुलता है। बायीं ओर देहगुहीय थैला एक संकरी कुण्डलित नलिका में सतत रहती है जिसे शुकवाहिका (vasdeferens) कहते हैं। शुक्रवाहिका फिर एक लम्बी शक्राशय में खुलती है। शक्राशय के अन्तस्थ सिरे से दो अन्धप्रवर्ध निकले रहते है उनमें से एक प्रोस्टेट ग्रन्थि या सहायक ग्रन्थि (prostate gland or accessory gland) कहलाती है। दूसरा प्रवर्ध सीकम कहलाता है। शुक्राशय अन्त में एक चौड़े आशय में समाप्त होता है जिसे नीधम का थैला (Needham’s sac) कहते हैं। यह थैला जनन छिद्र द्वारा प्रावार गुहा में खुलता हैं जो गुदा द्वार के बायीं ओर शिश्न की पेपिला पर पाया जाता है।

वृषण में शुक्राणुजनन की क्रिया द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण होता है। परिपक्व शुक्राणु वृषण से। शुक्र वाहिका द्वारा शुक्राशय में भेज दिये जाते हैं। शक्राशय में शक्राणओं को लपेट कर सकरें बण्डल बना दिये जाते हैं जो काइटिनी केप्सूल में बन्द कर दिये जाते हैं। इन शक्राणु युक्त काइटिनी कप्सूल। को शुक्राणुधर (spermatophore) कहते हैं। शुक्राणुधर एक स्वचालित विस्फोटक बम की तरह होता है। इसके एक सिरे पर स्प्रिंग की तरह का विन्यास पाया जाता है जो मैथन क्रिया के पश्चात् काइटिनी आवरण को तोड़कर शुक्राणुओं को विसर्जित करता है।

मादा जनन तंत्र (Female reproductive system) : मादा में नर की तरह ही देहगुहीय थैले में आन्तरांग पुंज के शीर्ष के पास एक बड़ा गोल सफेद रंग का अण्डाशय पाया जाता है। अण्डाशय से एक छोटी, पतली भित्ति की चौड़ी नलिका निकलती है जिसे अण्डवाहिनी (oviduct) कहते हैं। जो गुदा द्वार के बायीं ओर प्रावार गुहा में खुलती है। अण्डवाहिनी के संकरे निचले सिरे की भित्ति मोटी व ग्रन्थिल होती है इसे अण्डवाहिनी ग्रन्थि कहते हैं। यह ग्रन्थि अण्डाणु के चारों तरफ एक आवरण का स्त्रवण करती है। स्याही ग्रन्थि की वाहिका के दोनों ओर एक जोड़ी बड़ी अण्डाकार तथा चपटी ग्रन्थियाँ पायी जाती है जिन्हे निडामेन्टल ग्रन्थियाँ (nedamental glands) कहते हैं। ये ग्रन्थियाँ अपनी-अपनी वाहिका द्वारा आगे की ओर प्रावार गुहा में खुलती है। इसी तरह एक जोड़ी नारंगी रंग की सहायक निडामेन्टल ग्रन्थिया पायी जाती है जो निडामेन्टल ग्रन्थियों के सम्मुख स्थित होती है। ये ग्रन्थियाँ कई छोटे-छोटे छिद्रों द्वारा प्रावाह गुहा में खुलती है। ये सभी ग्रन्थियाँ मिल कर अण्डे के चारों तरफ लचीले केप्सूल का स्रावण करती है।

मैथुन क्रिया (Copulation) : नर सीपिया की पांचवी भुजा मैथनु क्रिया के लिए रूपान्तरित होती है। इस भुजा पर चूषकों की आधारी पक्तियाँ पायी जाती है मैथुन क्रिया के पूर्व नर अपनी इस भुजा को अपनी स्वयं की प्रावार गुहा में प्रवेश कराता है तथा वहाँ से शुक्राणु युक्त शुक्राणुधरों को बाहर निकाल लेती है। इसके बाद नर इस भुजा को शुक्राणुधरों सहित मादा की प्रावार गुहा में प्रविष्ठ करा देता है तथा शुक्राणुधरों को मादा की प्रावार गुहा में स्थित बर्सा कोपुलेरिस (bursa copularis) में छोड़ देता है। बर्सा कोपुलेरिस प्रावार गुहा में उपस्थित कीप से रूपान्तरित हुआ भाग होता है। जब परिपक्व अण्डाणु एक-एक करके प्रावार गुहा की कीप से बाहर आते हैं तब शुक्राणुधर फट कर शुक्राणु इन अणुओं पर छोड़ते हैं जिससे निषेचन की क्रिया सम्पन्न होती है। निषेचन उपरान्त निषेचित अण्डों पर निडामेन्टल ग्रन्थियों व मसि ग्रन्थियाँ द्वारा अण्डों पर जिलेटिनी आव” चढ़ा दिया जाता है।

इस प्रकार निषेचित अण्डों के समूह समुद्री वनस्पति की शाखा या अन्य किसी पदार्थ पर अग के गुच्छों की तरह चिपका दिये जाते हैं।

अण्डे बड़े व पीतकी होते हैं। अण्डों में भ्रूण का विकास होता है। विकास के दौरान अण्डों में संचित पीतक से पोषण प्राप्त करते हैं। परिवर्धन प्रत्यक्ष (direct) होता है। अण्डों से सीधे शिश सीपिया बाहर निकलती है जो वयस्क के समान होती है।