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Scope of biotechnology based industries in hindi , जैव तकनीकी आधारित उद्योगों एवं उद्यमिता
पढ़िए Scope of biotechnology based industries in hindi , जैव तकनीकी आधारित उद्योगों एवं उद्यमिता क्या है ?
जैव तकनीकी आधारित उद्योगों एवं उद्यमिता की राजस्थान के विशेष संदर्भ में भविष्य
(Scope of biotechnology based industries and inter prener ship with particular reference to Rajasthan)
जैव प्रौद्योगिकी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे औद्योगिक प्रक्रमों में सजीवों अथवा उनसे प्राप्त पदार्थों का उपयोग किया जाता है। किसी न किसी रूप में दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक महत्त्वपूर्ण जीचें इसी प्रकार के उत्पाद हैं, जैसे वृद्धि हॉरमोन (growth homones), इंटरफेरॉन (interferon), इंसुलिन (insulin), टीका (vaccine), विकर ( enzymes ), एंटिबायोटिक औषधियाँ (antibiotics), कार्बनिक अम्ल (organic acids) । जैव प्रौद्योगिकी का मुख्य उद्देश्य ऐसे उत्पादों (products), प्रक्रियाओं (processes) और प्रौद्योगिकी ( technology) का विकास करना है जिनका स्वास्थ्य, कृषि तथा उद्योगों में व्यापक प्रयोग किया जा सके। जैव प्रौद्योगिकी के विकास में आनुवंशिक अभियांत्रिकी (genetic engineering), सूक्ष्मजीवविज्ञान (microbiology), ऊत्तक संवर्धन (tissue culture) एवं आण्विक जीवविज्ञान (moleculer biology) का बहुत बड़ा योगदान है।
जैव प्रौद्योगिकी एक प्राचीन विधि है। जैव प्रक्रिया की उत्पत्ति मानव इतिहास की गहराई तक है। प्राचीन जैव प्रौद्योगिकी का सर्वप्रथम उत्पाद ऐल्कोहॉल था। गन्ने के रस से सिरका ( vinegar) बनाने की विधि प्रागैतिहासिक काल से ही लोगों को मालूम थी । इथाइल ऐल्कोहॉल सर्वप्रथम 1150 में ऐल्कोहॉलिक पेय से बनाया गया था। बेकरी उद्योग में यीस्ट का प्रयोग प्राचीन समय से ही लोग करते आ रहे हैं। चौदहवीं शताब्दी में सबसे पहला सिरका बनाने का उद्योग फ्रांस में शुरू किया गया था। मशरूम की अप्राकृतिक खेती (artificial cultivation) 1650 में फ्रांस में शुरू किया गया था। 1680 में एण्टॉनी वान ल्यूवेनहॉक (Anton van Leeuwenhoek) ने सर्वप्रथम यीस्ट कोशिकाओं को अपने द्वारा नवनिर्मित सूक्ष्मदर्शी से देखा था ।
1818 में एरक्सलेबेन (Erxleben) ने सर्वप्रथम यीस्ट के किण्वन के गुणों का पता लगाया था। 1875 में लुई पाश्चर (louis pasteur) ने सूक्ष्मजीवों द्वारा लैक्टिक एसिड किण्वन का पता लगाया था। एडवर्ड बुकन ने 1897 में यह पता लगाया था कि यीस्ट से निकाले गए एंजाइम में शर्करा को एल्कोहॉल में परिवर्तित करने की क्षमता होती है।
1928 में एलेक्जेंडर फ्लेमिंग (Alexandar Flaming) ने पेनीसीलीन की खोज की। पेनीसीलीन का बड़े पैमाने पर उत्पादन 1944 से शुरू हुआ। 1950 से कई एटिबायोटिक की खोज हुई और उनका उत्पादन शुरू हुआ।
1953 में वाटसन और क्रिक (Watson and Crick) ने DNA की संरचना का पता लगाया था जिसने आनुवंशिक अभियांत्रिकी (genetic engineering) की नींव डाली थी। 1962 में सूक्ष्मजीवों की मदद से यूरेनियम की माइनिंग की गई। 1971 में राइजोबियम से nif को जीवाणु Klebsiella में स्थानांतरित किया गया। 1973 में पहला जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग सफलतापूर्वक किया गया।
1978 में प्रतिबंधन एंजाइम्स (resriction enzymes ) का उपयोग मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में किया गया। वर्ष 1980-90 के दशक में जेनेटिकली इंजीनियर्ड इंसुलिन इंटरफेरॉन, मानव- वृद्धि हॉरमोन, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज, हीपेटाइटिस का टीका का आविष्कार भी हुआ और इनका उपयोग जनमानस के लिए किया जाने लगा। 1990 के बाद पुनर्योगज DNA प्रौद्योगिकी (recombinant DNA technology) का व्यावहारिक उपयोग बड़े पैमाने पर मानव स्वास्थ्य, कृषि और उद्योग में किया जा रहा है।
जैव प्रौद्योगिकी द्वारा विकसित सूक्ष्मजीवों के स्ट्रेन पर आधारित एक बहुत विशाल उद्योग विकसित हुआ है। ध्यान से चयनित सूक्ष्मजीव के स्ट्रेन, शुद्धिकरण तथा पृथक्करण की उन्नत विधियों के कारण पर्याप्त मात्रा में उत्पादन में वृद्धि हुई है। कुछ उत्पाद हैं: यीस्ट तथा ऐल्कोहॉल, वृद्धि हॉरमोन, टीका या वैक्सीन, एंटीबायोटिक, एंजाइम, कार्बनिक अम्ल आदि ।
कृषि – क्षेत्र में आनुवंशिक अभियांत्रिकी (genetic engineering) का उपयोग कर उन्नत किस्में, रोग-प्रतिरोधी किस्में, जैविक खाद, दुर्लभ संकर के प्राप्त करना सम्मिलित है। प्रोटोप्लास्ट संवर्धन विधि का उपयोग फसलों, जैसे आलू, गन्ना, केला आदि की उन्नत किस्में प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है। आनुवंशिकतः संशोधित फसलों (genetically modified crops) का विकास आनुवंशिक अभियांत्रिकी का ज्वलंत उदाहरण है तथा उनसे प्राप्त भोज्य सामग्री को आनुवंशिकतः संशोधित आहार (genetically modified food, GMF) कहा जाता है। विटामिन A समृद्ध चावल तथा लाइसीन-समृद्ध दलहन बीज आनुवंशिकतः संशोधित आहार के उदाहरण है।
जैव तकनीकी विज्ञान की नई, मानव उपयोगिता एवं तेजी से वृद्धि करती हुई सबसे जवान (Young) शाखा है। विज्ञान की अन्य शाखाओं ने मानव का भला जरूर किया पर इस शाखा ने मानव का सीधा कल्याण किया है। इसमें आण्विक विज्ञान, ऊत्तक संवर्धन, आनुवंशिक अभियांत्रिकी तथा पादप रोग विज्ञान को शामिल किया जाता है जो हमारे सीधे लाभ से जुड़े हुये हैं। पिछले वर्षों में जैवतकनीकी के शुद्ध एवं अनुप्रयुक्त पहलुओं में तेजी से वृद्धि हुई है। विभिन्न कई नई तकनीकों का विकास हुआ जिसके परिणामस्वरूप सजीवों की आवुवंशिकी, वृद्धि, परिवर्धन, प्रजनन, रोगों का इलाज, खाद्य समस्या आदि के संबंध में नई सूचनाओं की प्राप्ति हुई है। राजस्थान में जैवतकनिकी आधारित उद्योगों की सम्भावनायें या भविष्य उज्जवल है। अभी तक राजस्थान में इस शाखा से आधारित उद्योगों से लाभ नहीं प्राप्त किया है। अन्य प्रदेशों की तुलना में हमारा प्रदेश अत्यधिक पिछड़ा हुआ है। राजस्थान में जैवतकनिकी आधारित उद्योगों के सम्भावनाओं के बारे में चर्चा करने से पूर्व हम यह देखें कि किस प्रकार हम इस शाखा से राजस्थान में लाभ ले सकते हैं जो अन्य प्रदेश वर्तमान में प्राप्त कर रहे हैं।
राजस्थान में ऐसे उद्योग एवं प्रयोगशाला की स्थापना की जाये जहाँ पादप कोशिकाओं तथा ऊत्तक संवर्धन की विभिन्न तकनीकों का उपयोग फसलों के माइक्रोप्रोपेगेशल (Micropropagation) तथा आनुवंशिक सुधार (Genetic improvement) किया जाये जिससे खाद्य उत्पादन में वृद्धि कर अन्य राज्यों (पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश आदि) के समान समानता प्राप्त की जाये। कायिक रूप से प्रजनन करने वाले सजीवों जैसे आलू, केला तथा गन्ना में प्रोटोप्लास्ट संवर्धन (Protoplast culture) तथा प्रोटोप्लास्ट संगलन (Protoplast fusnion) तकनीकों का उपयोग कर खाद्यान उत्पादन बढ़ाया जा सके। बेसिका नेपस (Bsassica napus) के संश्लेषण के लिये तथा ब्रेसिका ओलीरेसीआ (Brassical oleracea) तथा ब्रेसिका कम्प्रेस्ट्रीस (Brassiacal campestsis) के प्रोटोप्लास्ट का संगलन किया गया एवं उत्पादन में वृद्धि की गई।
कुछ जैवतकनिकी उद्योग जो राजस्थान में लगाये जा सकते हैं एवं उनके लाभ
| क्र.स.
| उद्योग
| लाभ
|
| 1. | औषधीय महत्व के सूक्ष्म जीवों में आनुवंशिक सुधार
| अच्छी औषधियों का उत्पादन |
| 2. | विभिन्न सजीवों में औद्योगिक हेतु अभियांत्रिकी द्वारा सुधार
| उत्पादन में वृद्धि
|
| 3. | विटामिन B12 के उत्पादन में सुधार
| मानव में विटामिन B12 की कमी दूर करना
|
| 4. | ग्यूकोज एवं फ्रक्टोज का उत्पादन
| मानव लाभ
|
| 5. | सतत् किण्वन के द्वारा इथेनोल का उत्पादन
| अधिक इथेनोल का उत्पादन
|
| 6. | मानव इंसुलिन का उत्पादन
| मधुमेह के इलाज
|
| 7. | मानव इंटरफेरोन का उत्पादन
| मानव का लाभ
|
| 8. | अंग प्रतिरोपण के लिये मोनोक्लोन प्रतिरक्षी का निर्माण
| अंग प्रत्यारोपण में सहायता
|
| 9. | विषाणु, कीट तथा रोग प्रतिरोधी पौधों का अधिक खाद्य उत्पादन
| अधिक खाद्य उत्पादन
|
| 10. | प्रकाश संश्लेषी पौधों का उत्पादन
| अधिक खाद्य उत्पादन
|
| 11. | बायोपेस्टीसाइड तथा बायोफर्टिलाइजर का उत्पादन
| अधिक खाद्य उत्पादन
|
| 12. | मानव जीन थैरेपी
| आनुवंशिक रोग एवं अन्य रोगों का उपचार
|
| 13. | विभिन्न टीकों का निर्माण
| रोगों को रोकने से सहायता
|
राजस्थान में जैव प्रौद्योगिकी आधारित उद्योगों को लगाने के लिये एक निश्चित प्लान एवं दिशा निश्चित कर उद्योग पतियों को उद्योग लगाने के लिये आकर्षित करना होगा। उन्हें सुविधायें एवं रियाते देनी होगी। उद्योग लगाने में आने वाली कठिनाइयों को दूर करना होगा ।
देश एवं राजस्थान यहाँ तक की मानव का विकास और भविष्य जैव प्रौद्योगिक कर ही सीधे निर्भर है। जैस कि हमने पहले बताया कि यह जीव विज्ञान की वह शाखा है जो हमारे लाभ से सीधे सम्बंधित है। यही शाखा एवं इस पर आधारित उद्योग ही हमारे भविष्य को सुखद एवं रोग रहित बना सकते हैं। राजस्थान में इस क्षैत्र में निम्न लिखित उद्योगों की स्थापना की जा सकती है।
- जैवतकनिकी एवं औषधि संबंधित उद्योग
(Industries of Biotechnology and medicine)
- जैवतकनिकी तथा प्रोटीन अभियांत्रिकी की संबंधित उद्योग
(Industries of Biotechnology and protein enginerring)
- इंटरफेरॉन के उत्पादन संबंधित उद्योग
(Industries of production of interferon)
- मानव वृद्धि हॉरमोन उत्पादन
(Production of human growth hormone)
- टीका निर्माण संबंधित उद्योग
(Industries of vaccine preparation)
- मोनोक्लोनन एंटीबॉडीज कारखाना
(Industries of monoclonal antibodies)
7 एंटीबायोटिक्स संबंधित उद्योग
(Industries of formation of antibiotics)
- पशुपालन उद्योग
(Animal husbandry Industries)
- मधुमक्खी पालन उद्योग
(Industries of Beed keeping)
- मत्स्य की उद्योग (Industries of Fisheries)
जैव तकनिकी जीव विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है। राजस्थान में उद्योग लगाकर जैवतकनिकी का उपयोग औषधि, प्रोटीन अभियांत्रिकी, उपापचय अभियांत्रिकी, कृषि, उद्योग पर्यावरण तथा मानव कल्याण हेतू किया जा सकता है । एवं अर्थिक स्त्रोत में वृद्धि की जा सकती
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