चट्टान का निर्माण किससे होता है , चट्टान का निर्माण कैसे होता है स्मिथ (1799) का विचार rocks formation process in hindi

By   June 11, 2021

rocks formation process in hindi चट्टान का निर्माण किससे होता है , चट्टान का निर्माण कैसे होता है स्मिथ (1799) का विचार क्या है ?

चट्टान भूगर्भिक इतिहास की पुस्तकें हैं तथा जीवावशेष उनके पृष्ठ हैं
(Rocks are the books of earth history and fossils are the pages)
वर्तमान में चट्टान का अध्ययन करें तो यह स्पष्ट किया जा सकता है कि- यह चट्टान कितनी पुरानी होगी तथा इसका निर्माण किस प्रकार हुआ होगा? यदि हम जीवावशेष का अध्ययन करें तो चट्टान के विकास में एक पूर्ण चक्र अथवा इससे अधिक चक्रों का बोध होता है। उदाहरणार्य परतदार चट्टान का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि इसमें जीवावशेष पाये जाते हैं। परन्तु इसके पूर्व की कायान्सरित चढ़ानों में जीवावशेष नहीं पाये जाते हैं। अर्थात् इनका निर्माण कायन्तरित चट्टानों से हुआ होगा। यदि कायन्तरित चट्टानों का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि इनका निर्माण निश्चित रूप से आग्नेय प्रकार की चट्टानों से हुआ होगा। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है – (i) आग्रेय शैल पृथ्वी के शीतल होने के बाद में बनी तथा इसके निर्माण के वाद विघटन तथा वियोजन प्रारम्भ हुआ। (ii) अपरदन की क्रिया के कारण प्रथम परतदार चट्टान का निर्माण हुआ। यहाँ पर दो सम्भावनायें व्यक्त की जा सकती हैं- (क) रूपान्तरित शैल के विघटन तथा वियोजन से परतदार शैलों का निर्माण होता है, तथा (ख) रूपान्तरित शैल पर दबाव पड़ा, जिससे पुनः आग्नेय शैल बनी। इसके बाद परतदार शैलों का निर्माण हुआ। इसको स्पष्ट किया जा सकता है –
(क) आग्नेय शैल → रूपान्तरित शैल → परतदार शैल
(ख) आग्नेय शैल → रूपान्तरित शैल → आग्नेय शैल → परतदार शैल
दबाव
इसी प्रकार यदि रूपान्तरित शैल का अध्ययन करें, तो दो तरह इनका निर्माण स्पष्ट होता है-
(क) परतदार शैल → रूपान्तरित शैल
(ख) आग्नेय शैल → रूपान्तिरत शैल → अति रूपान्तरित शैल -आग्नेय शैल → रूपान्तरित शैल

इसी प्रकार आग्नेय प्रकार की चट्टानों का चक्रीय विश्लेषण किया जा सकता है। जब पृथ्वी की उत्पत्ति हुई तो उस समय तप्त एवं तरल अवस्था में थी। वाद में, ठोसीकरण की क्रिया हुई, जिससे आग्नेय प्रकार की चट्टानों का निर्माण हुआ, परन्तु इस प्रकार निर्मित चट्टाने दृष्टिगोचर नहीं हैं, बल्कि आग्नेय के प्रथम निर्माण के बाद उस पर अपरदनात्मक प्रक्रम कार्य करने लगे। परिणामस्वरूप दूसरे स्थान पर इनका जमाव हुआ, परन्तु इस प्रकार की आग्नेय शैलें भी देखने को नहीं मिलती हैं, बल्कि अत्यधिक दवाव के कारण इनका कायान्तरण हो गया है तथा पुनः आग्नेय शैल का निर्माण हुआ। इसको इस तरह स्पष्ट किया जा सकता है।
पृथ्वी का ठोसीकरण आग्नेय शैल → रूपान्तरित शैल → अति रूपान्तिरत शैल → आग्नेय शैल

स्मिथ (1799) का विचार है कि – एक ही प्रकार की चट्टान में एक ही प्रकार के जीवावशेष पाये जाते हैं। एक समय का जीवावशेष उसी समय की चट्टान में पाये जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक युग में अथवा काल में एक विशेष प्रकार के जीव उत्पन्न हुए, जो उसी समय की निर्मित चट्टानों में पाये जाते हैं। न तो वे जीव पुनः उत्पन्न हुए, न तो अन्य किसी प्रकार की चट्टानों में पाये जाते हैं। यदि विभिन्न स्थानों में पाई जाने वाली चट्टानों में जीवावशेष एक हैं, तो चट्टानों का निर्माण-काल एक होगा, यदि जीवावशेष भिन्न-भिन्न हैं, तो जीवावशेष के आधार पर उसके समय का विश्लेषण किया जा सकता है।
जीवावशेष का एक उदाहरण लेकर स्पष्ट किया जा सकता है कि उस चट्टान की स्थिति क्या होगी अथवा उसका निर्माण कब हुआ होगा? मूंगा एक प्रकार का सागरीय जीव है, जिस पर यदि रासायनिक क्रिया होती है, तो चूने की चटृान का निर्माण होता है। इस आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता की भूपटल पर जहाँ कहीं भी चूना पत्थर की चट्टाने विधमान होगी, यहाँ पर कभी सागर का विस्तार होगा। भारत की विन्ध्यन-कम की चट्टानों का अध्ययन करें, तो स्पष्ट होता है कि यहां पर लाइमस्टोन की मान राई आती है, अतः इसका जमाव सागर में हुआ होगा। वर्तमान में, जहाँ पर इस प्रकार का स्थलखण्ड है, वहाँ पर अतीत काल में सागर का विस्तार रहा होगा।
लावा की चटृान का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि यहाँ ज्यालामुखी का उद्गार अतीतकाल में अवश्य हुआ होगा। भारत की काली मिट्टी की उत्पत्ति का विश्लेषण करें, तो ज्ञात होता है कि यहाँ पर अतीतकाल में बड़े पैमाने पर ज्यालामुखी का उद्गार हुआ था, जिसकारण लावा की एक मोटी परत 3 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैल गई थी। यदि किसी स्थान पर नमक की चट्टान अथया नमकीन झील है.तो इसके विश्लेषण से ज्ञात होता है कि यहाँ पर अतीत काल में सागर का विस्तार रहा होगा। राजस्थान की बारीझीलों तथा नमक की चट्टानों का अध्ययन करें तो स्पष्ट होता है कि आज जिस स्थान पर राजस्थान है, वहाँ पर अतीतकाल में सागर रहा होगा। बाद में ज्यों-ज्यों सागर का खिसकाव होता गया. नदी तया पवन के द्वारा जमाव की क्रिया चलती रही, जिस कारण राजस्थान का निर्माण हुआ। इसी प्रकार यदि गंगा के डेल्टाई भाग का अध्ययन करें, तो स्पष्ट ज्ञात होता है कि यहाँ काँग्लोमरेट पाया जाता है। अर्थात् अतीत में यहाँ पर सागर का विस्तार रहा होगा। यदि हम उड़ीसा की तालचीर की कोयले की खानों की निचली सतह का अध्ययन करें, तो यहाँ पर विद्यमान हिमानी गोलाश्म इस तथ्य की कहानी कहेंगे कि अतीत काल में यहाँ पर हिमानी प्रकार की जलवायु रही होगी। कोयले का पाया जाना भी इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि अतीतकाल में यहाँ की जलवायु उष्णार्द्र रही होगी, जहाँ पर घनी वनस्पतियों का आवरण विधमान रहा होगा। परन्तु स्थलखण्डों के खिसकाव से स्पष्ट होता है कि जलवायु का परिवर्तन हुआ है। इसकी पुष्टि ‘फ्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त‘ के द्वारा होती है।
अन्टार्कटिक के हिमायरण के नीचे कोयले का पाया जाना इस बात का इतिहास प्रस्तुत करता है कि अतीतकाल में यहाँ पर उष्णार्द्र प्रकार की जलवायु रही होगी, बाद में ‘प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त‘ के आधार पर स्पष्ट होता है कि इसका खिसकाव हुआ होगा। परिणामस्वरूप वर्तमान में शीत प्रकार की जलवायु है। सऊदी अरब, ईरान, इराक, अफगानिस्तान, कुवैत आदि दक्षिण-पश्चिमी एशिया के देशों में पेट्रोलियम की विधमान राशि इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि अतीत काल में यहाँ पर सागर का विस्तार था, जिसमें शंघाल नामक आय थे, जो बाद मे जमाव के कारण तिरोहित हो गये तथा रासायनीकरण, कार्बानीकरण आदि क्रियाओं द्वारा पेट्रोलियम पिण्डोकाओं में परिवर्तित हो गये।
भारत में जलवायु चक्र का विश्लेषण चट्टान के आधार पर करें, तो स्पष्ट किया जा सकता है कि – उड़ीसा की तालचीर कोयले की खान में नीचे हिमानी-गोलाश्य पाये जाते हैं तथा कोयले की चट्टानों के ऊपर Iron stone shale पाई जाती है। फलतः स्पष्ट होता है कि गोन्डवाना प्रकार की चट्टानों के वाद यहाँ पर शीत जलयायु, पुनः उष्णार्द्र जलवायु, बाद में शुष्क जलवायु तथा वर्तमान में उष्णार्द्र जलवायु पाई जाती है। कहीं पर कोयले के नीचे लाल चूना-पत्थर पाया जाता है तथा इसके नीचे पुनः कोयला पाया जाता है तो इस आधार पर जलवायु-चक्र की व्याख्या इस प्रकार कर सकते हैं कि – पहले यहाँ पर उष्णा प्रकार की जलयायु थी, इसके बाद अतिशुष्क, पुनः उष्णार्द्र तथा इसके पहले शुष्क अथवा शीत जलवायु विधमान थी। यदि Iron stone shale और शुष्क हिमानी गोलाश्म है तो शीत जलवायु का अनुमान लगाया जाता है।
परतवार घटानों का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि यहाँ पर अतीतकाल में या तो सागर रहा होगा या खाड़ी रही होगी। उदारणार्थ – भारत के मध्यवर्ती मैदान का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि अतीतकाल में यहाँ सागर विधमान था।
उपयुक्त अनेक तथ्यों के आधार पर स्पष्ट होता है कि – चट्टानों तथा उनमें स्थित जीवाश्म के द्वारा भूगर्भिक इतिहास का विश्लेषण किया जा सकता है। इसी को आधार मानकर वेगनर का ‘महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त‘ तथा वर्तमान समय में ‘प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त‘ का प्रतिपादन किया गया है।
चट्टानों तथा जीवाश्मों के आधार पर स्थलरूपों में परिलक्षित जटिलताओं का विश्लेषण किया जा सकता है। प्राचीन अपरदन के अवशेष, जो वर्तमान स्थलरूप में विद्यमान हैं तथा इनमें जटिलताओं को उत्पन्न किये हैं, इनके काल तथा जलवायु का भूगर्भिक इतिहास ज्ञात किया जाय, तो जटिलताएँ जो स्थलरूपों में हैं, दूर की जा सकती हैं। इनके अध्ययनों से स्थलरूपों के विकास की समस्या, चट्टानों के रचना-काल, धरातल पर जीवों का उद्-विकास, तात्कालिक संस्कृति, प्रक्रमों की क्रियाशीलता आदि का ज्ञान प्राप्त होता है।
वर्तमान में अनेक भू-आकृति विज्ञानवेत्ता जीवाश्म एवं अति प्राचीन चट्टानों के आधार पर स्थलरूपों के ऐतिहासिक विकास को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। इन अध्ययनों से इस संकल्पना की सार्थकता एवं सत्यता का बोध हो रहा है।