यूनियो का श्वसन क्या है , Respiratory System of unio in hindi , गिल्स या जलक्लोम (Gills or Ctenidia)

जाने यूनियो का श्वसन क्या है , Respiratory System of unio in hindi , गिल्स या जलक्लोम (Gills or Ctenidia) ?

श्वसन तन्त्र (Respiratory System)

यूनियो एक जलीय प्राणी होता है यह स्वच्छ जल में निवास करता है, अत: अपनी आवश्यकता के अनुसार जल में घुली हुई ऑक्सीजन ग्रहण करता है। इसके लिए यूनियो में मुख्य श्वसनांग गिल्स या जलक्लोम (ctenidia) पाये जाते हैं। इनके अलावा प्रावार (mantle) भी सहायक श्वसनांग के रूप में कार्य करता है।

गिल्स या जलक्लोम (Gills or Ctenidia)

यूनियो में एक जोड़ी गिल्स पाये जाते हैं। ये प्रावार गुहा में आन्तरांग पुंज (visceral mass) के दोनों तरफ एक-एक स्थित होते हैं। गिल्स लम्बे होते हैं तथा सम्पूर्ण प्रावार गुहा की लम्बाई में फैले रहते हैं। प्रत्येक गिल एक तरफ प्रावार भित्ति से तथा दूसरी तरफ आन्तरांग पुंज से जुड़ा रहता

गिल की संरचना (Structure of gill)

प्रत्येक गिल दो अर्द्धक्लोमों (demibranchs) या पटलों (laminae) का बना होता है। इनमें से एक बाहर की तरफ तथा दूसरा भीतर की तरफ स्थित होता है। भीतरी पटल (inner lamina) बाहरी पटल (outer lamina) की तुलना में अधिक चौड़ा होता है, अन्यथा दोनों पटलों की संरचना समान होती हैं। प्रत्येक पटल (lamina) में दो समान लम्बी तथा कुछ आयताकार प्लेट्स पायी जाती है, इन्हें पटलिकाएँ (lamellae) कहते हैं। ये पटलिकाएँ अग्र, पश्च एवं अधर सिरों की तरफ से आपस में जडी रहती हैं तथा थैले समान संरचना का निर्माण करती है। पटलिकाओं की थैले समान गुहा ऊत्तकों से बने ऊर्ध्वाधर गुटों द्वारा छोटे-छोटे कक्षों में विभाजित रहती है। इन पटों को अन्तरापटलिका संगम (inter lamellar junctions) कहते हैं तथा इन कक्षों को जल-नलियाँ (water tubes) कहते

ये जल नलियाँ (water tubes) पृष्ठ की तरफ अधिक्लोम कोष्ठ (sup-rabranchial chamber) में खुलती है। इस तरह प्रत्येक गिल में दो लेमिना या गिल पटल पाये जाते हैं तथा प्रत्येक गिल पटल में दो पटलिकाएँ पायी जाती हैं अर्थात् एक गिल में चार पटलिकाएँ (lamellae) पायी जाती है।

प्रत्येक पटलिका अनेक, एक-दूसरे से सटे हुए, संकरे ऊर्ध्वाधर गिल तन्तुओं (gill filaments orgill bars) की बनी होती है। इनके कारण पटलिका की बाहरी सतह पर उदग्र रेखाएँ दिखाई पड़ती हैं। पटलिका के निकटवर्ती गिल तन्तु एक दूसरे से छोटे-छोटे सेतुनुमा अन्तरातन्तु संगम (intrafilamental junction) द्वारा क्षैतिज (horizontal) रूप से जुड़े रहते हैं। दो पटलिकाओं के गिल तन्तु अधर सतह की तरफ आपस में जुड़े रहते हैं अतः ये ‘V’ के आकार के दिखाई देते हैं। सम्पर्ण गिल अनुप्रस्थ काट में ‘W’ के आकार का दिखाई देता है। पटलिकाओं के ऊर्ध्वाधर गिल तन्तुओं तथा क्षैतिज रूप से विन्यासित अन्तरातन्तु संगमों के कारण प्रत्येक गिल पटल एक टोकरीनुमा संरचना दिखाई देती है जिसमें अनेक सूक्ष्मछिद्र पाये जाते हैं। इन छिद्रों का आस्य या ऑस्टिया (ostia) कहते है। ये छिद्र एक तरफ अधक्लोम कोष्ठ (infrabranchial chamber) में खुलते हैं तथा दूसरी तरफ जल नलियों (water tube) में खुलते हैं। ‘V’ के आकार के प्रत्येक गिल तन्तु के कोण पर एक खांच होती है जो उत्तरोत्तर गिल तन्तुओं की खाँचों से मिलकर एक अनुदैर्ध्य भोजन खाँच (food groove) का निर्माण करती है।

गिल पटल के समस्त गिल तन्तु संरचना में समान होते हैं। इस प्रकार की स्थिति को होमेरैब्डिक अवस्था (homorhabdic) कहते हैं। प्रत्येक गिल तन्तु संयोजी ऊत्तक का बना होता है तथा भीतर से काइटिनी शलाखाओं (chitinous rods) द्वारा आधारित रहता है। गिल तन्तु की बाहरी सतह पक्ष्माभित उपकला (ciliated epithelium) द्वारा आस्तरित रहती है। इसमें तीन प्रकार के पक्ष्माभ या सीलिया पाये जाते हैं- (i) ललाट पक्ष्माभ (frontal cilia) (ii) पार्वीय सीलिया (lateral cilia) (iii) पार्श्व-ललाट सीलिया (latero-frontal cilia)| पार्वीय सीलिया ऑस्टिया (ostia) को आस्तरित करते हैं।

गिल का संलग्ननन  (Attachment of Gills)

प्रत्येक गिल में दो गिल पटल (gill lamina) पाये जाते हैं जिन्हें क्रमश: बाहरी व आन्तरिक गिल लेमिना या गिल पटल कहते हैं। प्रत्येक गिल लेमिना फिर दो गिल पटलिकाओं या गिल लेमिली (gill lamellae) का बना होता है। इन्हें भी बाहरी व आन्तरिक गिल लेमिला कहते हैं। गिलों का प्रावार गुहा से जुड़ने का तरीका बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह जल धारा की दिशा को निश्चित करता है। बाहरी गिल लेमिना की बाहरी लेमिना लम्बाई में प्रावार से जुड़ी रहती है। बाहरी गिल लेमिना की भीतरी लेमिला तथा भीतरी गिल लेमिना की बाहरी लेमिला संयुक्त रूप से गिल अक्ष (ctenidial axis) बनाते हैं जो सम्पूर्ण लम्बाई में आन्तरांग पुंज (visceral mass) के पार्श्व तल से जुड़ी रहती है। भीतरी लेमिना की भीतरी लेमिला आन्तरांग पुंज के पार्श्व तल से आगे की तरफ जुड़ी रहती है।

गिलों के लेमिला से जुड़ने की इस विशेष विधि के कारण एक पर्दा सा बन जाता है जो प्रावार गहा को दो असमान कक्षों में बाँट देता है। इनमें ऊपरी कक्ष छोटा होता है तथा उसे अधिक्लोम कोष्ठ (supra branchial chamber) कहते हैं। निचला कक्ष बड़ा होता है तथा अधोक्लोम कोष्ठ (infra branchial chamber) कहलाता है। अधिक्लोम कोष्ठ बहिर्वाही साइफन (exhalent siphon) द्वारा बाहर खुलता है जबकि अधोक्लोम कोष्ठ अन्तर्वाही साइफन द्वारा बाहर खुलता है।

गिलों की रुधिर आपूर्ति (Blood supply of gills)

वृक्कों से अशुद्ध रक्त अभिवाही क्लोम वाहिका (afferent branchial vessel) द्वारा गिलों में लाया जाता है। यह वाहिका क्लोम अक्ष (ctenidial axis) में चलती हुई अन्तरा पटलिका सगमा (inter lamellar junction) में शाखाएँ भेजती हैं। ये शाखाएं पुनः मिल कर अपवाही क्लोम वाहिका (efferent branchial vessel) का निर्माण करती है। यह भी गिल अक्ष में होती हुई रक्त को हृदय में पहुँचा देती है।

गिल में जल धारा का मार्ग (Course of water circulation in gill)

गिल तन्तुओं (gill filament) के सीलिया के अनवरत स्पन्दनों के कारण एक निरन्तर जल धारा बन जाती है जो अन्तर्वाही साइफन द्वारा अध: क्लोम कोष्ठ में प्रवेश करती है। यहां से यह ऑस्टिया (ostia) में होकर गिल लेमिना की जल नलियों में चला जाता है। यहां से जल अधिक्लोम कोष्ठ (supra branchial chamber) में चला जाता है, जहाँ से बहिर्वाही साइफन द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

जो जल धारा अधोक्लोम कोष्ठ में पहुँचती उसमें ऑक्सीजन तथा सूक्ष्म भोजन के कण जाते हैं। गिल तन्तु के पार्श्व ललाट सीलिया (latero-frontal cilia) ऑस्टिया का बार्डर बनाते हो लचीली कंघी बना लेते हैं। यह कंघी एक छलनी का कार्य करती है तथा भोजन के कणों को भी जाने से रोकती है। भोजन के कण गिल पटल के पार्श्व में होते हुए अधर सतह पर स्थित भोजन खान में होते हुए मुख में चले जाते हैं। इस तरह गिल श्वसन एवं पोषण दोनों में सहायक होता है।

गैसों का विनिमय (Exchange of gasses)

गिल में गैसों का विनिमय तब होता है जब जल धारा जल नलिकाओं में ऊपर की तरफ चढती है। अन्तरा पटलिका संयोजनियों (inter lamellar junction) में उपस्थित रक्त वाहिकाओं के रक्त तथा जल के बीच गैसों का आदान-प्रदान होता है। जल में घुलित ऑक्सीजन रक्त में ले ली जाती है तथा रक्त में उपस्थित CO2  को बाहर जाने वाले जल में मुक्त कर दिया जाता है।