reproduction in bacteria bsc 1st year in hindi notes , जीवाणुओं में प्रजनन क्या है ,कायिक प्रजनन , अलैंगिक

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जीवाणुओं में प्रजनन

(Reproduction in Bacteria)

जीवाणुओं में प्रजनन अनेक विधियों द्वारा होता है । इस समूह के जीव विभिन्न वास परिस्थितियों में रहते हैं। एक से अधिक विधियों से पोषण व श्वसन की क्रियाएँ करते हैं। इनमें आवश्यकतानुसार रूपान्तरण की क्रियाएँ भी होती रहती हैं। जीवाणुओं में प्रजनन मुख्य रूप से निम्नलिखित विधियों द्वारा होता है :

  1. कायिक या वर्षी प्रजनन (Vegetative reproduction)
  2. अलैंगिक प्रजनन (Ascxual reproduction)
  3. लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction)

कायिक प्रजनन (Vagetative reproduction )

इस विधि से प्रजनन मुख्यतः दो प्रकार से होता है।

  • द्वि-विखण्डन (Binary-fission) : जीवाणु अनुकूल परिस्थितियों जैसे आदर्श तापमान, भोजन की उपलब्धता, जल आदि को उपस्थिति में इस विधि से प्रजनन करते हैं। इसमें एक कोशिका अनुप्रस्थ भित्ति द्वारा दो समान ( equal) भागों में विभक्त हो जाती है। यह विभाजन संकिरण (constriction) के कारण कोशिका के मध्य में होता है। आदर्श तापक्रम पर जो कि परजीवी जीवाणुओं में 37°C होता है, यह क्रिया तीव्र गति से होती है तथा प्रति 20-30 मिनट पर नयी कोशिकाएँ बनती जाती है। सामान्यतः यह विभाजन 20 मिनट के अन्तराल पर होता है, किन्तु अलग-अलग जातियों में व विभिन्न परिस्थितियों में यह अन्तराल तथा विभाजन की क्रिया तीव्र या धीमी गति से होती है। सामान्य जीवाणु से 24 घण्टे के भीतर इस क्रिया से 4 × 1021 जीवाणु उत्पन्न हो जाते हैं। यदि एक जीवाणु का आमाप 25 cu (cubic micron) हो तो इतने ही समय में इनका कुल आयतन 2 लीटर हो सकता है। किन्तु स्थान, भोजन, वायु एवं अन्य कारकों की कमी तथा आपसी स्पर्धा (competition) के कारण यह संख्या लगभग 1% ही रह पाती है। इस क्रिया में गुणसूत्रों की प्रतिकृति बनती है। कोशिका झिल्ली तथा कोशिका भित्ति द्वारा कोशिका के मध्य भाग में वृद्धि कर एक अनुप्रस्थ पट्ट (transverse septum) बनता है जो पैतृक कोशिका को दो पुत्री जीवाणुओं में विभक्त करता है तथा प्रत्येक जीवाणु कोशिका को एक जीवाण्वीय गुणसूत्र प्राप्त होता है।

यह क्रिया दण्डाणु (bacilli) तथा कुण्डलित (spiral) जीवाणु कोशिका में लम्बवत् अक्ष के समकोण बनाते हुये जबकि गोलाणु या कॉकस (coocus) जीवाणु में किसी भी अक्ष पर होती है। द्वि-विभाजन या द्वि-विखण्डन के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रक्रियाएँ होती हैं।

(i) आणुवंशिक पदार्थ का विभाजन (Division of genetic material) : जीवाणु कोशिका जब वृद्धि के उपरान्त अपना पूरा अधिकतम आकार प्राप्त कर लेती है तो विभाजन हेतु लम्बाई में बढ़ती है। आणुवंशिक पदार्थ या वृत्ताकार डी. एन. ए. (circular DNA) पुनरावृत्ति द्वारा दो भागों में बँट जाता है। डी.एन.ए. पुरावृत्ति की क्रिया अर्ध संरक्षी विधि से होती है। यह विभाजन सरल असूत्री (amitotic) प्रकार का होता है जिसमें तर्क नहीं बनता । गुणसूत्र जो कोशिका कला से सामान्यतः मीजोसोम के द्वारा संलग्न रहता है। मीजोसोम के साथ ही विभाजित होता है। दोनों पुत्री मीजोसोम अपने संलग्न स्थल से विपरीत दिशाओं में बढ़ते हैं इनके साथ गुणसूत्र भी जाता है । इस प्रकार प्लाज्मा झिल्ली समसूत्री तर्क (mitotic spindle) का कार्य भी करती है।

(ii) पट्ट का बनना (Formation of septum) : जीवाणु कोशिका के मध्य स्थान पर कोशिका कला अन्तर्वलित (invaginate) होती है एवं प्रारम्भिक पट्ट बनाती हुयी इस क्रिया को बढ़ाती है। कोशिका के अर्न्तवलन के परस्पर मिलने पर कोशिकाद्रव्य दो भागों में बँट जाता है।

(iii) कोशिकाओं का पृथक्करण (Separation of daughter cells) : कोशिका की सतह पर संकीर्णन (constriction) गहरा होता जाता है तथा यह दो भागों में विभक्त हो जाती है।

(iv) सूत्र विखण्डन (Filament fragmentation) : कुछ जीवाणुओं जैसे नोकार्डिया जाति एवं एक्टिनोमाइसोज एक सूत्र के रूप में वृद्धि कर जाते हैं जो अनेकों इकाइयों (units) में विभक्त हो जाता है एवं प्रत्येक इकाई एक कोशिका में वृद्धि कर जाती है।

उदाहरण : स्ट्रेप्टोकॉकस फीकेलिस (Streptococus faecalis), प्रोथसीकोबेक्टर फ्यूजीफार्मिस (Prosthecobacter fusiformis)

  • मुकुलन (Budding) : इस क्रिया हेतु जीवाणु कोशिका के एक ध्रुव या सिरे पर कोशिका भित्ति पतली हो जाती है तथा कोशिका के इस भाग से एक या अधिक उद्धर्ध (out growth) बनते हैं। इसी दौरान मातृ कोशिका में आणुवंशिक पदार्थ का विभाजन होता है और उद्धर्ध में प्रवेश कर जाता है। संकीर्णन द्वारा उद्धर्ध मातृ कोशिका से अलग हो जाता है। द्विविभाजन की भाँति इसमें यह आवश्यक नहीं है कि पुत्री कोशिकाएं समान आकार की ही हों। उदाहरण – हाइपोमाइक्रोबियम वल्गैरी (Hypomicrobium vulgare) एवं रोडोस्यूडोमोनास एसिडोफाइला (Rhodopseudomonas acidophyla)। यह उद्धर्ध वृद्धि कर जनक कोशिका से अलग होकर नये जीवाणु की भांति क्रिया करने लगते हैं। हाइपोमाइक्रोबिएल्स के तथा एक्टिनोमाइसिटीज के सदस्यों में मुकुलन की क्रिया सामान्यतः पायी जाती है।

अलैंगिक प्रजनन (Asexual reproduction)

(a) कोनिडिया के द्वारा (By conidia) : यह क्रिया एक्टिनो-माइसीटेल्स तथा मुख्यतः स्ट्रेप्टोमाइसिज के जीवाणुओं में देखी गयी है। जीवाणुकाय की शाखाएँ सीधी घुमावदार होकर कोनिडियॉधर (conidiophores) का निर्माण करती है। इन शाखाओं के दूरस्थ सिरे से छोटी-छोटी गोलाकार काय कोनिडिया (conidia ) लगातार बन कर देह होती रहती है। कोनिडिया अत्यन्त सूक्ष्म गोलाकार रचनाएँ होती हैं जो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर नई सूत्र समान रचनाओं (hyphal structures) को जन्म देते हैं। प्रत्येक कोनिडियम (conidium) में सामान्य जीवद्रव्य एवं केन्द्रीय पदार्थ होता है। ये तलाभिसारी क्रम (basipetal succession) में बनते जाते हैं। इन जीवाणुओं का आकार सूत्र समान ही होता है।

(b) एण्डोस्पोर द्वारा (By Endospore) : प्रजनन की यह विधि प्रतिकूल परिस्थितियों में उपयोग में लायी जाती है। इस क्रिया के अन्तर्गत कोशिका के भीतरी पदार्थ कोशिका भित्ति से अलग- होकर सिकुड़ जाते हैं तथा कोशिका के मध्य में एकत्रित हो जाते हैं। सिकुड़े हुये पदार्थ प्रोटोप्लास्ट (protoplast ) जिसमें कोशिकाद्रव्य एवं कुछ आनुवंशिक पदार्थ होता है, के चारों ओर एक मोटी भित्ति बन जाती है यह रचना एन्डोस्पोर ( endospore) कहलाती है। मातृकोशिका के फटने पर एन्डोस्पोर बाहर निकल कर मुक्त रूप से वितरण के लिये माध्यम में चले जाते हैं । एन्डोस्पोर अत्यन्त प्रतिरोधक क्षमता रखते हैं तो प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम होते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में बाह्य मोटी भित्ति अलग हो जाती है तथा एन्डोस्पोर से नये जीवाणुओं का जन्म होता है। जीवाणुओं में एण्डोस्पोर अर्थात् बीजाणु अंतश्चोल वायुवीय (aerobic) अथवा अवायुवीय (anaerobic) दोनों ही परिस्थितियों में बनाये जा सकते हैं। बैसिलस (Bacillus ) में बीजाणुक भवन (sporulation) क्रिया केवल वायुवीय (aerobic) परिस्थिति में ही होती हैं जबकि क्लोस्ट्रीडियम (Chostridium) में यह क्रिया पूर्णतया अवायुवीय ( anaerobic) परिस्थितियों में होती है। ये अण्डाकार, गोल या दीर्घवृत्ताकार हो सकते हैं। इसे विपरीत परिस्थितियों से बचने की विधि ही माना जाता है क्योंकि सामान्यतया इस विधि में जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि नहीं होती है।

(c) बीजाणुक भवन (Sporulation) : जीवाणु कोशिका में कुछ आवश्यक वृद्धि उपापचजों (metabolites) के देहली स्तर (threshold level) से घट जाने पर अनेकों आकारिक (morphological) एवं जैव रासायनिक (bio-chemical) परिवर्तन होने आरम्भ हो जाते हैं। इस क्रिया के आरम्भ होने पर कोशिका में कायिक वृद्धि तथा विभाजन की क्रिया अवरुद्ध हो जाती है।

यह क्रिया मुख्यतः चार चरणों में पूरी होती है –

(i) अक्षीय तन्तु के रूप में कोशिकीय DNA का परिवर्तन होना एवं अनुप्रस्थ पट्ट का बनना। यह पट्ट कोशिका को दो असमान भागों में विभक्त करता है । केन्द्रिक पदार्थों का वितरण इस प्रकार होता है कि प्रत्येक कक्ष को एक गुणसूत्र प्राप्त होता है । जीवाणु कोशिका का छोटा कक्ष अग्रबीजाणु (forespore) व बड़ा कक्ष मातृ कोशिका (mother cell) कहलाता है।

(ii) अक्षीय तन्तु कोशिका झिल्ली द्वारा घिर कर अग्रबीजाणु में परिवर्तित हो जाता है। यह स्वयं भी अपनी झिल्ली का निर्माण करता है।

(iii) अग्रबीजाणु की दोनों झिल्लियों के मध्य 3-6 अवरोधी प्रोटीन स्तर बनाते हैं जो वल्कुट (cortex) भाग का निर्माण करते हैं। जिसमें पेप्टीडोग्लाइकन, Ca++ एवं DPA (डायपीकोलिनिक अम्ल) आदि पाये जाते हैं। अग्रबीजाणु परिपक्व होकर श्वेत रंग की अप्रवर्तनी निर्जलीकृत संरचना में बदल जाता है।

(iv) अग्रबीजाणु स्वलयन (autolysis) की क्रिया द्वारा मातृ कोशिका से अलग हो जाता है। इस क्रिया का नियंत्रण कुछ जीन्स के द्वारा किया जाता है। बीजाणु अनेक जीवाणुओं में कोशिका के विभिन्न भागों में बनते हैं। बेसिलस में ये कोशिका के केन्द्रीय भाग में तथा क्लोस्ट्रीडियम में कोशिका के अन्तस्थ सिरे पर बनते हैं। यह अनेक आकृतियों के हो सकते हैं।

अधिकतर जीवाणुओं में एक ही एन्डोस्पोर बनता है कुछ में ही 3-4 एन्डोस्पोर बनते देखे गये हैं। अतः इसे विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को बनाये रखने की विधि ही माना गया है। सजीवों में एन्डोस्पोर भित्ति को सर्वाधिक अवरोधी व कठोर स्तर माना जाता है।

बीजाणु अन्तश्चोल (Endospore अनेक जीवाणुओं की कोशिका के भीतर अन्तश्चोल (endospore) भी पाये जाते हैं। अन्तश्चोल या एन्डोस्पोर का निर्माण जीवाणुओं में प्रतिकूल परिस्थितियों के दौरान किया जाता है। ये जीवाणुओं की सप्त ( dormant ) एवं ताप तथा रसायन रोधी अवस्था है जबकि सामान्य जीवाणु कायिक-अवस्था (vegetative stage) को निरूपित करता है जिसमें वृद्धि एवं सभी जैविक लक्षण पाये जाते चित्र 10.6 : जीवाणु कोशिकाओं में अन्तः बीजाणु हैं।

अनेक ग्रैम ग्राही प्रकार के जीवाणु जैसे सारसीने (Sarcinae ) तथा एक्टिनोमाइसीटीज (actinomycetes) के कुछ सदस्य कार्बन, नाइट्रोजन या फास्फोरस की मात्रा के कम उपलब्ध होने की स्थिति में ताप तथा रसायन रोधी (heat and chemical resistant) काय बीजाणु अन्तश्चोल (endospore) उत्पन्न करते हैं। ये काय सूखा पड़ने, हिमकारी (freezing) तथा विकिरण (radiation) जैसी असामान्य परिस्थितियों में भी जीवित बनी रहती हैं। बेसिलस तथा क्लोस्ट्रीडियम जाति के जीवाणुओं में एन्डोस्पोर बनने की क्रिया अधिकता से पायी जाती है। इनके अतिरिक्त स्पोरोबेसिलस (Sporobacillus ), स्पोरोसारसीना (Sporosarcina) तथा डेसल्फोटोमेक्यूलम (Desulfotomaculum) में भी एन्डोस्पोर बनने की क्रिया होती है। प्रत्येक वास्तविक प्रकार के ” एन्डोस्पोर” में ताप परिरक्षी (heat resistant) गुण होते हैं। इस प्रकार के एन्डोस्पोर भोजन के पकाये जाने तथा रोगाणुनाशन ( sterilization) के समान उच्च ताप जैसी क्रियाओं पर भी सुरक्षित बने रहते हैं। ये सामान्य अम्ल, क्षार, अन्य रसायनों एवं रोगाणुनाशियों (disinfectants) तथा विकिरण (radiation) के प्रति भी रोधी होती है।

जीवाणुओं द्वारा विकसित बीजाणु (spore) अण्डाकार, दीर्घवृत्तीय (ellipsoid) या गोलाकार आकृति के होते हैं। बीजाणु कोशिका में केन्द्रित (central), उप- अन्तस्थ (sub terminal) या अन्तस्थ अवस्थाओं में पाये जाते हैं।

विपरीत परिस्थितियों में DNA एवं अन्य कोशिकीय संरचनाओं के चारों ओर विशिष्ट जटिल प्रकार की पतें बनने लगती है। यह क्रिया डिपीकोलिनिक अम्ल ( dipicolinic acid) DPA के अणुओं एवं कैल्शियम के द्वारा की जाती है, इन पर्तों के भीतर प्रोटीन्स एवं सभी जैविक कारक लम्बे समय तक सजीव बने रहते हैं। एन्डोस्पोर बन जाने के उपरान्त जीवाणु कोशिका से यह अलग हो जाता है और शेष भाग अर्थात् जीवाणु खोल हो जाता है। मिस्त्र के पिरेमिड्स की सूखी धूल से प्राप्त हजारों वर्ष पुराने एन्डोस्पोरों के परिस्थितियों के लौटने पर पुनः इनसे वर्धी प्ररूप अंकुरण द्वारा प्राप्त होने के प्रमाण मिले हैं। अनुकूल नष्ट एन्डोस्पोर का रसायनिक संगठन जटिल प्रकार का होता है ये कठिनता के साथ अभिरंजन ग्रहण करते हैं। सूक्ष्मदर्शी से देखे जाने पर ये जीवाणु कोशिकाओं में चमकदार काय के रूप में दिखाई देते हैं। जीवाणुओं में एन्डोस्पोर बनने की क्रिया का नियंत्रण कुछ जीन्स के द्वारा किया जाता है।

(c) स्पोरेन्जिओफोर द्वारा ( By sporangiophores ) : ये सचल (mobile), प्लेनोस्पोर (planospore) होते हैं। इस प्रकार की रचनाओं द्वारा जनन राइजोबियम ( Rhizobium) तथा क्लेमाइडो बैक्टीरिएल्स समुदाय के सदस्यों में होता है। इन्हें एक्सोस्पोर (exospore) भी कहते हैं। यह क्रिया शखित जीवाणुओं (branching becteria) में तन्तुओं के सिरों पर स्पोरेन्जिया (sporangia) के बनने से शुरू होती है। ये स्पोरेन्जिया बाद में मातृ तन्तु से अलग हो जाते हैं। स्पोरेजियम का जीवद्रव्य विभक्त होकर स्पोरेन्जिओ बीजाणु (sporangiophore) बना सकता है जो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर तन्तुनुमा शाखित जीवाणु को जन्म देते हैं।

एक्टिनोमाइसिज के तन्तुओं के खुले सिरों पर अनेक पट्ट (septum) बन जाते हैं। इस प्रकार बनी सूक्ष्म जनन इकाईयाँ ऑइडियम (oidium) कहलाती हैं। यह अंकुरित होने पर तन्तुनुमा जीवाणु को जन्म देती हैं।

(d) पुटी द्वारा (By cyst formation) : ‘ इस क्रिया के अन्तर्गत कोशिका के भीतरी पदार्थ सिकुड़ कर मोटी भित्ति से ढक जाते हैं। प्रत्येक पुटी एन्डोस्पोर की ही भाँति नयी जीवाणु कोशिका को जन्म देती है। यह क्रिया विपरीत परिस्थितियों में ही होती है किन्तु इस क्रिया पर जीन्स का नियंत्रण नहीं होता। ये एन्डोस्पोर की भाँति कठोर भी नहीं होते हैं। इन्हें भी प्रतिकूल परिस्थितियों से स्वयं को बचाने की विधि ही माना गया है।

पुटी (Cyst) : अनेक जीवाणुओं में पुटी भवन (encystment) की क्रिया अर्थात् स्वयं को विपरीत परिस्थितियों में रक्षित रखने की क्रिया पायी जाती है। इस क्रिया के अन्तर्गत सम्पूर्ण जीवाणु की देह पर परिरक्षी, आवरण पुटी बनने लगती है जो इसे पूरी तरह से घेर लेती है। पुटी भवन पूर्व जीवाणु कोशिका आमाप घट जाता है, ये गोलाकार होती हैं।

एजोटोबैक्टर (Azotobacter) में यह क्रिया पायी जाती है। इस जीवाणु में पुटी भवन की क्रिया से पूर्व वर्धी कोशिका द्वि-विखण्डन (binary fission) की क्रिया करती है अतः संतति कोशिकाएँ छोटी व गोल बन जाती हैं। इनकी कोशिका भित्ति में विभिन्न प्रकार के प्रतिरक्षी पदार्थ संश्लेषित हो जाते हैं अतः जीवाणु पूर्व की अपेक्षा मोटे एवं कड़े आवरण में स्वयं को परिबद्ध कर लेता है।

अनुकूल परिस्थितियों के लौटने पर ये पुनः वर्धी अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं। ये अन्तश्चोल के अपेक्षा कम प्रतिरोधी होते हैं। इनके निर्माण की विधि भी एन्डोस्पोर से भिन्न होती है। ये सामान्य सूखे व अल्ट्रावायलट रेडिएशन्स (ultraviolet radiations) को तो सहन करने में सक्षम होते हैं किन्तु के प्रति कम प्रतिरोधी होते हैं। परिकोष्ठन की क्रिया के दौरान कोशिका की कोशिका भित्ति में ही आवश्यक परिवर्तन होते हैं, इसके भीतर स्थित कोशिका वर्धी कोशिका के समान ही बनी ताप रहती है।