प्रादेशिक विकास क्या है वर्णन कीजिए | संतुलित प्रादेशिक विकास की अवधारणा regional development in hindi

By   March 5, 2021

regional development meaning in hindi प्रादेशिक विकास क्या है वर्णन कीजिए | संतुलित प्रादेशिक विकास की अवधारणा ?

संतुलित प्रादेशिक विकास की अवधारणा और उसका क्षेत्र
देश के विभिन्न भागों का संतुलित विकास, आर्थिक प्रगति के लाभों का कम विकसित प्रदेशों में विस्तार और उद्योग का बड़े पैमाने पर प्रसार नियोजित विकास के मुख्य लक्ष्य रहे हैं। एक के बाद एक पंचवर्षीय योजनाओं में इन लक्ष्यों को बड़े पैमाने पर प्राप्त करने का आह्वान किया गया है।

अर्थव्यवस्था का विस्तार एवं और अधिक तीव्र विकास राष्ट्रीय और प्रादेशिक विकास में बेहतर संतुलन स्थापित करने की क्षमता को क्रमिक रूप से बढ़ाता है। इस तरह का संतुलन स्थापित करने के प्रयास में, विशेषरूप से आर्थिक विकास के प्रारम्भिक चरणों में, कतिपय अन्तर्निहित कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। चूंकि संसाधन सीमित हैं इसलिए प्रायः उन्हें अर्थव्यवस्था के उन बिन्दुओं पर केन्द्रित करना लाभप्रद होता है जहाँ इसके प्रतिफल के अनुकूल होने की संभावना रहती है।

विकास की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, अधिक विस्तृत क्षेत्र में निवेश किया जाता है तथा अधिक बिन्दुओं पर संसाधनों को लगाया जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप अधिक लोगों और क्षेत्रों तक लाभ पहुंचता है। स्वयं विकास के लिए भी यही अनुकूल है कि राष्ट्रीय आय में अधिकतम वृद्धि प्राप्त की जाए तथा और निवेश के लिए संसाधन प्राप्त हों।

यह प्रक्रिया संचयी है तथा प्रत्येक चरण अगले चरण की रूपरेखा निर्धारित करता है। कुछ क्षेत्रों में, जैसे उद्योग में, गहन और स्थानीयकृत विकास अनिवार्य हो सकता है। इसके साथ-साथ अन्य क्षेत्रों, जैसे कृषि, लघु उद्योगों, विद्युत, संचार और समाज सेवा में अधिक फैला हुआ विकास लक्ष्य होना चाहिए।

उद्योग के साथ समान रूप से, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में बंधे हुए निवेश से विकास के लिए असंख्य संभावित केन्द्रों के सृजन में सहायता करता है। एक बार अगर राष्ट्रीय आय और विभिन्न क्षेत्रों में विकास एक न्यूनतम स्तर तक पहुँच जाता है, तो पूरी अर्थव्यवस्था की प्रगति को प्रभावित किए बिना अल्प विकसित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास के लिए अनेक दिशाओं में संसाधन उपलब्ध कराना संभव हो जाता है। प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न एक विशाल देश, दीर्घकालीन योजना के परिप्रेक्ष्य में इसके विकास के प्रत्येक चरण को देखते हुए, के पास न सिर्फ उच्च और धारणीय वृद्धि दर प्राप्त करने अपितु, इसके कम विकसित प्रदेशों को अन्य प्रदेशों के बराबरी में लाने का भी साधन है।

इस प्रकार, दो लक्ष्य-राष्ट्रीय आय में वृद्धि तथा अर्थव्यवस्था के विभिन्न प्रदेशों का अधिक संतुलित विकास-एक दूसरे से अधिक संबंधित हैं, और सोपान-दर-सोपान ऐसी दशा का सृजन करना संभव हो जाता है जिसमें राष्ट्रीय प्रदत्त संसाधनों, कौशल तथा पूँजी के रूप में संसाधनों का प्रत्येक प्रदेश में पूरी तरह से उपयोग किया जाता है। कभी-कभी विकास में पिछड़ने की भावना क्षेत्र में समग्र विकास की धीमी दर के कारण उतनी नहीं होती जितनी कि कृषि, सिंचाई, विद्युत अथवा उद्योग अथवा रोजगार जैसे विशेष क्षेत्रों में अपर्याप्त अथवा मंथर गति से विकास के कारण होती है। प्रत्येक प्रदेश में समस्या की प्रकृति और विशेष क्षेत्रों में तीव्र विकास में विधनों के बारे में सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहिए तथा त्वरित विकास के लिए समुचित उपाय किए जाने चाहिए। यह मूल उद्देश्य होना चाहिए कि प्रत्येक प्रदेश के संसाधनों का यथासंभव पूरा-पूरा उपयोग किया जाए ताकि यह राष्ट्रीय निधि में अपना सर्वोत्तम योगदान कर सके और राष्ट्रीय विकास से उपार्जित लाभों से अपना उपयुक्त हिस्सा ले सके।

 भारत में प्रादेशिक विषमता
यद्यपि कि भारत में आर्थिक नियोजन का मुख्य उद्देश्य संतुलित प्रादेशिक विकास स्वीकार किया गया है, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि अभी तक भारत में इस उद्देश्य की प्राप्ति में अधिकांशतः विफलता ही हाथ लगी है। ऐसा इस तथ्य के बावजूद भी हुआ जबकि राष्ट्रीय राज्य में निरपवाद रूप से आय में वृद्धि हुई है, साक्षरता बढ़ी है, निर्धनता अनुपात में कमी आई है तथा शिशु मृत्यु दर में हास हुआ है। प्रादेशिक असंतुलन अन्तर-राज्यीय विषमता और अन्तर्राज्यीय (राज्यांतरिक) विषमता दोनों ही रूपों में देखने को मिलता है।

 अन्तरराज्यीय (राज्यों के मध्य की) विषमताएँ
देश के अलग-अलग राज्यों के बीच विकास के स्तर में भारी विषमता दिखाई पड़ती है। दि सेण्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमकी (सी एम आई ई) ने विकास के विभिन्न पहलुओं से संबंधित जिला आँकड़ों का उपयोग करके आर्थिक विकास दर्शाने के लिए एक समुचित सूचकांक तैयार किया है। सूचकांकों की गणना चयनित नौ आधार-संघटक संकेतकों से की गई है:
ऽ कृषि से दो (18 प्रमुख फसलों के लिए प्रति व्यक्ति निर्गत का मूल्य और कृषि के लिए प्रति बैंक ऋण)
ऽ खनन् और विनिर्माण से तीन (प्रति एक लाख जनसंख्या में खान और फैक्टरी कर्मकारों की संख्या, प्रति एक लाख जनसंख्या में विनिर्माण कर्मकारों के परिवारों की संख्या और विनिर्माण क्षेत्र को प्रति व्यक्ति बैंक ऋण)
ऽ सेवा क्षेत्र से चार (प्रति व्यक्ति बैंक जमा, सेवा क्षेत्र को प्रति व्यक्ति बैंक ऋण, साक्षरता और नगरीकरण का प्रतिशत)।

अखिल भारतीय औसत 100 माना गया है। इस तरह से विभिन्न राज्यों के लिए तैयार सूचकांक की लम्बी श्रृंखला है अर्थात् यह संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली के लिए 1,075 है तो मणिपुर राज्य के लिए 10 है।

अन्य राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के लिए परिणाम नीचे तालिका 29.1 में संक्षेप में दिया गया है।
तालिका 29.1: भारतीय राज्यों में आर्थिक विकास में अंतर, वर्ष 2001
राज्य/संघ राज्य क्षेत्र (औसत से नीचे) राज्य/संघ राज्य क्षेत्र (औसत से ऊपर)
गोवा
गुजरात
हरियाणा
कर्नाटक
केरल
महाराष्ट्र
पंजाब
तमिलनाडु
पश्चिम बंगाल
चंडीगढ़
पाण्डिचेरी
दिल्ली
आन्ध्र प्रदेश
अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह
अरुणाचल प्रदेश
असम
बिहार
दादर और नगर हवेली
हिमाचल प्रदेश
लक्षद्वीप
मध्य प्रदेश
मणिपुर
मेघालय
मिजोरम
नागालैंड
उड़ीसा
राजस्थान
सिक्किम
त्रिपुरा
उत्तर प्रदेश

स्रोत: सी.एम.आई.ई.: 2001
पैटर्न स्पष्ट है: सिन्धु-गंगा मैदान में अधिक जनसंख्या वाले राज्यों और आदिवासी बहुसंख्या वाले क्षेत्रों जैसे पूर्वोत्तर राज्यों और उड़ीसा को सामान्य तौर पर कम विकसित राज्य कहा जाता है। जिन राज्यों में जनसंख्या कम है तथा कम आदिवासी इलाका है और शहरी संघ राज्य क्षेत्र अधिक विकसित हैं जैसे आन्ध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान?

औद्योगिक सूचकः औद्योगिक सूचकों का उपयोग करके विषमताओं को स्पष्ट रूप से दर्शाया जा सकता है। हाल के अध्ययन के अनुसार, पूरे देश की कुल फैक्टरियों का 83 प्रतिशत 10 राज्यों में है। विनिर्माण द्वारा प्रतिव्यक्ति सर्वोच्च मूल्य संवर्द्धन (वी ए एम पी) महाराष्ट्र और गुजरात में रिकार्ड किया गया है। दूसरी ओर बिहार और उत्तर प्रदेश है जहाँ वी ए एम पी स्तर कम है और यह गुजरात और महाराष्ट्र के स्तर का चैथाई अथवा पांचवे हिस्से के बराबर है। हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल बीच में है। विनिर्माण में कर्मकारों के समानुपात (पी डब्ल्यू एम) के मामले में भी स्थिति समान ही है। सिर्फ गुजरात, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में पी डब्ल्यू एम 12 प्रतिशत अथवा अधिक रहा है। औद्योगिक रूप से पिछडे़ राज्यों में यह सिर्फ 5 यह स्पष्ट है कि बन्दरगाहों के निकट स्थित राज्यों ने अपने अन्तर्निहित लाभों जैसे कच्चे मालों और तैयार माल के परिवहन पर नहीं के बराबर खर्च होने के कारण तेजी से विकास किया है जबकि भूमि से घिरा प्रदेश अर्थात् बन्दरगाह विहीन राज्यों को माल ढुलाई पर भारी राशि खर्च करनी पड़ी और यह उनके विकास में बाधक बना।

तथापि, यहाँ यह भी जोड़ा जा सकता है कि विगत साढ़े तीन दशकों से औद्योगिक विषमताओं में कमी आने लगी है। यह प्राथमिक और सेवा क्षेत्रों में, और इन दोनों में भी प्राथमिक क्षेत्र में अधिक, बढ़ती हुई विषमता के बिल्कुल विपरीत है।

आधारभूत संरचना सूचकः विभिन्न राज्यों के बीच भारी असमानता आधारभूत संरचना सूचक से भी प्रदर्शित होता है। ये सी एम आई ई इंडैक्स ऑफ इन्फ्रास्टक्चर डेवलपमेंट (आधारभूत संरचना विकास की सी एम आई ई सूचकांक) द्वारा प्रकाशित किया जाता है जिसमें सम्पूर्ण भारत को 100 का आधार दिया गया है। यह सूचकांक अत्यन्त ही विविधतापूर्ण है जो पंजाब में 211 से लेकर अरुणाचल प्रदेश में 32 तक है। हरियाणा, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और गोवा 100 से अधिक सूचकांक वाले राज्य हैं। दूसरी ओर आन्ध्र प्रदेश, असम, बिहार, कर्नाटक, मध्य-प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, नागालैण्ड और त्रिपुरा हैं जिनका सूचकांक 100 से नीचे है।

नीतिगत जटिलताएँ
उपर्युक्त समीक्षा से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि विकास के स्तरों में अन्तरराज्यीय असमानता बनी हुई है तथा कुछ मामलों में इसमें वृद्धि भी हुई है।

इन अन्तरराज्यीय विषमताओं की नीतिगत जटिलताओं को संक्षेप में निम्नवत् रूप में रखा जा सकता हैः

प) चूंकि निर्धनता और बेरोजगारी भौगोलिक दृष्टि से कुछ क्षेत्रों में केन्द्रित हैं, इन क्षेत्रों मेंसापेक्षिक रूप से अधिक निवेश संसाधनों के प्रवाह के लिए तंत्र होना चाहिए। यहाँ तक कि कृषि संबंधी विकास भी, जो निर्धनता और बेरोजगारी को घटा सकता है, कुछ ही क्षेत्रों में सीमित रहा हैय अतएव निर्धन क्षेत्रों में कृषि संबंधी विकास तेज करने के लिए तत्काल उपाय किए जाने चाहिए।
पप) कई निर्धन क्षेत्रों में प्रचुर प्राकृतिक संसाधन हैं जिनका पूरी तरह से सर्वेक्षण तथा दोहन नहीं किया गया है। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के पूरे-पूरे दोहन में जो बाधाएँ हैं उन्हें दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किए जाने की आवश्यकता है।
पपप) कुछ पूँजी-गहन उपक्रमों में संकेन्द्रित निवेश स्वयं अल्प विकसित प्रदेशों में व्याप्त निर्धनता को कम नहीं कर सकता। इन प्रदेशों के लिए अधिक संतुलित निवेश पैकेज की आवश्यकता है।
पअ) एक निवेश पैकेज में और चाहे जो कुछ भी हो, इसमें जल-ऊर्जा, परिवहन आधारभूत संरचना तथा साक्षरता एवं कौशल के स्तरों में उन्नयन अनिवार्य रूप से सम्मिलित होना चाहिए।
अ) पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में एक या अधिक शहरी औद्योगिक इलाका के अस्तित्व के कारण उनकी औसत आय अधिक हो सकती है, इसके बावजूद भी राज्य के अन्तवर्ती क्षेत्रों में अत्यधिक निर्धनता हो सकती है तथा यह है भी। इससे पता चलता है कि इस देश में विकास का समीप के क्षेत्रों पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है।