रामकिंकर बैज कौन है ? रामकिंकर बैज की भारतीय रिजर्व बैंक नई दिल्ली में स्थापित मूर्ति का नाम Ramkinkar Baij in hindi

By   August 18, 2021

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मूर्तिकार

रामकिंकर बैज
हालांकि वह पश्चिमी विचारों से प्रभावित थे, लेकिन वह भारतीय मूर्तिकारों की स्वदेशी भारतीय आवाज बनने में सफल रहे। वर्ष 1940 और व 50 के दशक के दौरान उनके नेतृत्व में अधिक-से-अधिक भारतीय मूर्तिकारों ने अपने शिल्प के साथ प्रयोग करना आरंभ कर दिया। उन्होने पश्चिमी प्रयोगात्मक शैलियों के साथ पारंपरिक भारतीय शैलियों का विलय कर दिया और अनूठे मिश्रण का निर्माण किया। वे प्रासंगिक आधुनिकता की सबसे बड़ी समर्थकों में से एक थे। उन्होंने कच और देवयानी, मिथुन, सरस्वती आदि जैसी कलाकृतियों की रचना की। उन्होंने लकड़ी और पत्थर की मूर्तियों के साथ प्रयोग किया। वर्ष 1970 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से और विश्व-भारती विश्वविद्यालय द्वारा देशिकोत्तम जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनके जीवन का एक बड़ा भाग शांतिनिकेतन में बीता और उन्होंने यहीं पर अपनी अंतिम सांस भी ली।
अमरनाथ सहगल
मूर्तिकारी में आने से पहले वे इंजीनियर थे और उसके बाद उनका कैरियर आसमान छूने लगा। वह अग्रणी आधुनिकतावादी, वास्तुशिल्पियों और चित्रकारों में थे। उनकी कुछ बहुत की प्रसिद्ध रचनाओं में कंक्वेस्ट ऑफ द मून, कलेक्शन इन व्हाइट हाउस, राइजिंग स्पिरिट सम्मिलित हैं। उन्हें ललित कला अकादमी फैलोशिप से सम्मानित किया गया था। उनके भित्ति चित्र विज्ञान भवन में प्रदर्शित किए गए। उन्हें भारत के संविधान के भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अंतर्गत कलाकारों / लेखकों के नैतिक अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए भी जाना जाता है। उन्हे भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया।

देवीप्रसाद रॉय चैधरी
वह अवनीन्द्रनाथ टैगोर के छात्र थे और उनके काम से अत्यधिक प्रभावित थे। एक अन्य प्रभाव प्रसिद्ध फ्रांसीसी शिल्पकार रोडिन का सुंदर और प्रयोगात्मक काम था। उनकी कुछ प्रसिद्ध कृतियों में महात्मा गांधी, श्रम की विजय, स्वामी विवेकानंद, शहीद स्मारक आदि सम्मिलित हैं। वे मूर्तिकला और चित्रकला के प्रशासनिक पक्ष में भी उत्सुकतापूर्वक लीन थे और वर्ष 1954 से वर्ष 1960 तक राष्ट्रीय कला अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उनकी मूर्ति ‘श्रम की विजय‘ उनके कामों में सबसे उल्लेखनीय है और चेन्नई के मरीन बीच में प्रदर्शित की गई है। यह कलाकार की कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति झुकाव को प्रतिबिंबित भी करती है।
मीरा मुखर्जी
मीरा हमारे समय की सबसे प्रसिद्ध महिला मूर्तिकारों से एक हैं। वह चित्रकला, ग्राफिक्स और मूर्तिकला में दक्ष हैं। उन्होंने फोल्क मेटल कास्टिंग तकनीक के साथ पश्चिमी शैलियों का संयोजन किया है। उनही सबसे प्रसिद्ध रचना को अशोक कहा जाता है, जिसे कलिंग में खड़ा किया गया है। वह भारतीय शास्त्रीय मूर्तियों से प्रेरित रही हैं और अपने काम में बस्तर (मध्य प्रदेश) का ढोकरा कला का प्रयोग किया है।
उनकी कुछ अति उत्तम रचनाओं में बैठी हुई महिलाएं, अशोक, स्पिरिट ऑफ डेली वर्क आदि सम्मिलित हैं। उन्हें पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा अवनींद्रनाथ पुरस्कार और धातुकार्य में कुशल शिल्प कौशल के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वे अपनी मूर्तियों पर बंगाली सुलेखन का उपयोग करने के लिए जानी जाती रही हैं, जो उनकी रचनाओं में अर्थ की परतों का योगदान करता है।

वी.पी. करमाकर
विनायक पांडुरंग करमाकर मराठी मूर्तिकार और कलाकार हैं। वे भी प्रयोगात्मक मूर्तिकारी के अग्रदूतों में थे। वे उन अग्रणी भारतीय मूर्तिकारों में हैं, जो रोडिन जैसे फ्रांसीसी मूर्तिकारों द्वारा लाए गए अनुभवजन्य परिवर्तनों से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने ‘मत्स्य-कन्या‘, ‘शंख-ध्वनि‘ और ‘हमजोली‘ जैसी कई प्रसिद्ध कलाकृतियों का निर्माण किया है। उन्हें वर्ष 1964 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री और ललित कला अकादमी पुरस्कार जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।